विश्वगुरु


kk1अपने बड़े भाई स्वरुप एवं परम मित्र श्री खुशवंत सिंह जी को यह रचना समर्पित

© अमर स्नेह 

          पृथ्वी से आने वाली संग्रहीत आवाज़ो के अध्यन के दौरान एलिअन्स को एक विशेष सुराग हाथ लगा। उनके वैज्ञानिको ने मंत्रणा की और उनके गुप्तचर एक पृथ्वीवासी को उठा कर अपने ग्रह पर ले आए। पृथ्वीवासी को एक जीवन संचरित काच के जार नुमा कमरे मे सुरक्षित रखा गया।       

          कुछ ही देर में एलिअन्स वैज्ञानिको का हुजूम उसके इर्द-गिर्द जमा हो गया। पृथ्वी के जिस भू-भाग से पृथ्वी वासी को लाया गया, उस विशेष भूभाग के अध्यनकर्ताओं और विशेषज्ञो की टीम पहली कतार में दीख पड़ रही है। पृथ्वी-वासी इन छोटे-छोटे रोवोट नूमा लोगो को देखकर हत्तप्रभ है। असंख्य एलिअन्स चांदी जैसी पोशाक पहने है, जिनकी आखों के स्थान पर बड़ी आखो के आकार के बड़े-बड़े गढे नज़र आ रहे हैं। एलिअन्स भी इस पृथ्वी-वासी का बड़ी जिज्ञासा से मुयाइना कर रहे हैं।

          सभी एलिअन वैज्ञानिक और विशेषज्ञ इस रून्ड-भुन्ड लपेटा शैली के वस्त्रधारी विचित्र प्राणी को देखकर आश्चर्य चकित है। उन्होने इस विचित्र प्राणी की स्वस्थ लम्बी चोटी को देखकर अनुमान लगाया, कि हो न हो, इस प्राणी की खोपड़ी में विशेष रूप से उगाया गया ये प्रकृतिक एंटीना है जिसके माध्यम से ये अन्य ग्रहो पर विधमान हर चीज़ का अध्यन कर पाते होगें और ये भी हो सकता है कि ये किसी न्यूकिलयर आयुध शस्त्र का पलीता हो — अनेकानेक अनुमानो के चलते सभी वैज्ञानिक सतर्कता से परीक्षण में लगे हुए हैं। – पृथ्वीवासी भी आँखे तरेर कर उन्हें देख रहा है। एलिअन्स कुछ भयभीत प्रतीत हो रहे है। -लेकिन परीक्षणो के फौरन बाद ही सब निंश्चिंत और सामान्य लगने लगे।

          एलिअन्स का एक पतले आकर का वरिष्ठ सदस्य, जो इन सब से लम्बाई में काफी बड़ा है इसने चमकती हुर्इ नीली पोशाक पहनी है और उसके इर्द गिर्द नीला प्रकाश फैला हुआ है, आगे बढ़कर उसने पृथ्वी-वासी को गौर से देखा और अपने एक यन्त्र को एक्टिवेट किया जिससे एलिअन्स की भाषा पृथ्वी के इस प्राणी की भाषा में अनुदित होने लगी और साथ ही पृथ्वी-वासी की भाषा एलिअन्स की भाषा में। वरिष्ठ सदस्य ने अपने ग्रह पर पृथ्वी-वासी का स्वागत करते हुए कहा, ”हे पृथ्वी के श्रेष्टतम वासी आपका इस ग्रह पर स्वागत है”। – पृथ्वी-वासी आश्चर्य से फुन्कारा, ”इस का मतलब है आप लोगो ने मेरा अपहरण किया है मैं तो अभी तक समझ रहा था कि मैं कोई स्वप्न देख रहा हूँ।” -सभी पर इसकी हास्यपूर्ण प्रतिक्रिया हुर्इ। एलिअन्स के वरिष्ट सदस्य ने सम्लते हुए कहा, ”आप लोग शुरू से ही स्वप्न में विचरने के आदी रहे है, खैर आप इस समय एक दूसरे ग्रह पर हैं और आपको एक विशेष मकसद से यहा लाया गया है। अभी कुछ समय पहले आप ने अन्य गुरूओं की भांति अपने प्रवचन में ये कहा था कि आप और आपका देश विश्वगुरू हैं, हम जानना चाहते है क्या वास्तव में आप विश्व गुरू हैं?

final12-हम विश्व गुरू थे , हैं और रहेगे। यह सत्य र्इश्वर रचित है, हमारा विश्वगुरू होना अपरिवर्तनीय और शाश्वत है। लोक परलोक, आकाश पाताल व्रह्राान्ड में व्याप्त हर दृश्य अदृश्य का ज्ञान है हमें। हमारे पास ज्ञान-विज्ञान और अदभुत विधाओं का असीम भंडार है, हम हर क्षेत्र में विश्वगुरू हैं। आत्मा-परमात्मा, गूढ़-अगूढ़, जीव-निर्जीव, जड़-चेतन का हर ज्ञान है हमें। विज्ञान तो बहुत छोटी सी चीज है। हम रिद्धी-सिद्धी, जप-तप, मन्त्र-तन्त्र और यज्ञ से हर असम्भव को सम्भव बना सकते है। उससे कुछ भी प्राप्त कर सकतें हैं। अपनी इच्छा से प्राण छोड़ सकते हैं, आत्मा को परलोक में भ्रमण करवाके, पुन:शरीर में प्रवेश करवा सकते है, हमने सदियों पहले अपने ग्रह से स्वर्ग को जाने वाली सीढ़ी का निर्माण कर लिया था। तुम्हे ज्ञान है क्या कि हमारे ही देश में गंगा बहती है जहाँ इन्सान पाप करके अगर एक डुबकी लगा ले तो सब पापो से मुक्त हो जाता है। ऐसी सुविधा पूरे ब्रह्रााड में कहीं भी नही हैं। हम जगतगुरू है हमने ही संसार को ज्ञान-विज्ञान और अघ्यात्म, सभी कुछ दिया है। हमारी शरण में आने से प्राणी मोक्ष को प्राप्त हो जाता है। जन्म मरण के बन्धन से मुक्त हो जाता हैं – – -हाँ ! हमें यहा लाने का क्या प्रयोजन है?

          एलिअन्स वैज्ञानिको के होश फाक्ता हो गये – पूरी सभा में सन्नाटा छा गया, वो  एक-दूसरे का मुंह देखने लगे। वरिष्ठ एलिअन ने सहज भाव से कहा, ”हम आपके ज्ञान और विधाओं का सम्मान करते है लेकिन इससे पूर्व हमारे विशेषज्ञ जो आपके भू-भाग से पूर्णत: परिचित है, कुछ प्रश्न आपसे करना चाहते है। यदि आप हमे संतुष्ट कर देगें तो हम भी आपको गुरू धारण करके, आपकी शरण में आकर , आपकी विधाओं और ज्ञान-विज्ञान का लाभ उठाना चाहेगे।

          पृथ्वी वासी ने अहंकारी भाव से घमन्डी मुद्रा धारण कर ली और कुछ सोचकर खरज में बोला, ”हमारी भी परम्परागत एक शर्त हुआ करती है।”

-वो क्या?

-हमें बदले में गुरु दक्षिणा देनी होगी-यदि आप उसके लिए तैयार हों तो प्रश्न कीजिएगा।    

          एलिअन्स ने एक दूसरे की तरफ देख मूक मंत्रणा की और अंत में वरिष्ठ एलिअन ने सहमती दे दी, ”वो-वो ठीक है लेकिन दक्षिणा क्या होगी – – -।”

-समय आने पर बता दी जाएगी।

वरिष्ठ ने भू-भाग विशेषज्ञो से आग्रह किया कि वो प्रश्न पूछें। विशेषज्ञो ने प्रश्न पूछने शुरू किए- ”हे पृथ्वी के श्रेष्ठतम वासी सदियों से असंख्य गुरू महाराजो ने यह दावा ठोका हुआ है कि गुरू की शरण मे आने से व्यक्ति, जीवन-मरण के चक्र से मुक्त होकर मुकित पा जाता है तो फिर आपके देश में इतनी आबादी क्यों है? -इसके अलावा फिर आप यह भी प्रचारित करते रहते है कि अमुक और कभी-कभी स्वयं भी घोषित करते है कि यह गुरू फलाने गुरू या देवता का अवतार है, क्या यह अपने-आप में विरोधाभास नही है? -हम विश्व गुरु से जानना चाहते है कि यदि इंसान जीवन मरण से मुक्त हो भी जाय तो फिर विश्व तो इंसानो से खाली हो जायगा। ये गुरु लोग पृथ्वी को इंसानो से खाली क्यों करना चाहते हैं। -एैसा हो या न हो, परन्तु यह फलसफा है क्या ?”

उत्तर की आपेक्षा में ज्यों ही विशेषज्ञ रूके तो विश्व गुरू तनिक हिनहिनाए और सौम्य होकर उन्होने प्रश्न-कर्ताओं से प्रश्न करते रहने के लिए कहा। लेकिन एलिअन्स ने उनसे पहले इन प्रश्नों का उत्तर माँगा तो वो पुन: हिनाहिनाए और बोले, ”आपकी जिज्ञासा का सम्मान करते हुए संक्षिप्त उत्तर है, गुरू की शरण में आने के बाद गुरू भक्ति से स्वत: ही इन प्रश्नों का उत्तर प्राप्त हो जाता है। -गूढ़ और रहस्य को ऐसे प्रकाशित करना धर्माचरण के विरूद्ध है। आप आगे प्रश्न करें।”

– ओह! एैसा है-खैर ये बताइए- – -आपके यहा आश्रमों, अक्खाड़ो, पीठो, धार्मिक संस्थानों, मंदिरो ने आपके देश में तैतिस प्रतिशत से भी ज्यादा भूमि पर कब्जा कर रखा है। जहाँ कभी कभार गुरूओं, पुरोहितों के धार्मिक क्रिया-कलाप होते है-लेकिन उन पर बने भवन अटालिकाएँ अक्सर खाली पड़ी रहती हैं। बाकी जमीनों पर आपके पैसे वाले विल्डरर्स छाते जा रहे है जहाँ केवल पैसे वाले करोड़ों का इंवेस्ट करके संपतियों को केवल अपने नाम कर लेते है-आश्रमों की तरह नए बिल्डर निर्मित शहर के शहर यूँ ही खाली नज़र आते है लेकिन आपके देश की सत्तर प्रतिशत आम जनता छत को तरस रही है। फिर आप और आपके समाज का मानवतावादी होने का दावा क्या खोखला नहीं है?

-”वो भी मानव है जो भाग्यवान है जिनके पास सब कुछ है। शास्त्र के अनुसार विधि के विधान में संविधान का दखल मिथ्या है-र्इश्वर का तंत्र, जन-तंत्र से बड़ा है।” -यह कह कर उन्होने कुटिल मुस्कान से शेष उत्तर भी दे दिया।

-भाग्यवाद का अलाप! पोथा रटन्त ज्ञान!! क्या इसकी नीव में षड़यंत्र नही है? जिसमें समाज एक बड़े तपके को विधाहीन गुलाम बनाने और इंसानी जिन्दगी जीने के अधिकारों से वंचित रखा गया है। क्या यह बौद्धिक साजिश नही है! आपका यह भाग्यवाद! सुविद्वानों के हक में र्इश्वर रचित लेखा हमें तो उसी षडयन्त्र का हिस्सा लगता हैं। ये ही अगर आपका एक मात्र विश्वास है तो फिर आपकी विधाए, तंत्र-मंत्र-यज्ञों  की सिद्धि शक्तियां क्या निरर्थक नहीं हैं? …………… आप कहते है कि उन विद्याओं से आप कुछ भी प्राप्त कर सकते है। आपके लिए कुछ भी असम्भव नही है। ………… अक्सर आप के यहा प्रकृति आपदायें आती हैं। आए दिन बाढ़-सूखा पड़ता है, गरीबी, भुखमरी, गंदगी-गजालत, बीमारीओं का साम्राज्य है आपका देश; फिर आप अपनी विद्याओं का उपयोग क्यों नही करते! क्या आपकी विद्याओं में दम नही है? क्या वो केवल आप गुरूओं, पंडितो, कर्मकांडियों के स्वार्थसिद्धि के प्रयोजन मात्र नही हैं। क्या वो तथाकथित पांडित्य बघारने, दम्भ प्रदर्शित करने का साधन नही हैं।’

-”पहले तो मैं आपको बता दूँ कि हम प्रकृतिवादी है और प्राकृतिक आपदा भी प्राकृतिक है। रही बात गरीबी, बेबसी में जीने की तो हमें बताना है कि भाग्यवाद में हमारा विश्वास अडिग है। फिर हमारे सत्ताधारी जो भी कुछ कर रहे है वह शास्त्र संवत है। हर वर्ष करोड़ों टन अनाज सड़ा कर सस्ते-अनाज-वितरण-केन्द्रो से वितरित किया जाना, गरीब स्कूली बच्चों को मध्यान भोजन में परोसना, काला बाजारी करके उसका आटा बाज़ारो में बिकवाना, यह सब हमारे आध्यात्मिक मानस के कारण स्वत: ही होता है। हम चाहते है कि छत विहीन, गरीब बेसहारा, मुफलिस, आभावग्रस्त बिना गुरू की शरण में पधारे ही जीवन से मुक्ति पा जाए और दुखों से निजात पा जाए। मुक्ति-प्राप्ती का यह  भी एक साधन है जो हमारे सरकारी, समाजी और ग़ैर सरकारी तंत्र में प्रचुर उपलब्ध है। – – -हाँ और कोई प्रश्न – – -?”

-अन्याय, दायित्वहीनता, विवेकहीनता, संवेदनहीनता, अनाचार, दुराचार, मर्यादाहीनता, अनैतिकता, स्वार्थपरता और पाखण्ड की धार्मिकता का यह असली चेहरा क्या मानवता के साथ मसखरी के अतिरिक्त कुछ और भी हैं? आपके समाज और देश का निर्माण क्या इनके आधार पर ही तो निर्मित नही हुआ? जहाँ संवेदनशील, ईमानदार व्यकित स्वयं को मिसफिट महसूस कर रहा है। -आपके देश में शायद ही कोई ऐसा पदार्थ बचा हो जो मिलावटी और नकली न हो। मानव-उपयोगी चीज में जालसाजी और मिलावट के बगैर कोई व्यापार शायद ही अछूता हो। हजारों लोग जहाँ हर रोज़ एैसे धन्धों के चलते जान गंवाते हो, जहाँ न्याय लुप्त हो, हर इंच पे अराजकता का राज हो, जहाँ हर सरकारी विभाग, मंत्रालय केवल देश का खजाना लूटने के अडडे हो, धूस-खोरी की दुकाने हों, जहा के लोग स्वभाव से ही बदमिजाज़ असभ्य, दम्भी, अकुशल, कामचोर, मक्कार, दुष्चरित्र हों, कुछ अपवादों को छोड़कर जहाँ के लोग आदतन बेइमान, दौमुहे, हठधर्मि, झूठे और मौकापरस्त हों। जहाँ हत्या, लूट, रेप कोई खास बात न हो। जहाँ कमजोरों का शोषण, अपमान एक आम बात हो। जहाँ आम लोगो के जीने की सहूलियत और सपने ज़ोर वाले नोच कर अपने घर भरते हो, वहां आपके श्रेष्ठता का दावा हमें तो खोखला और जर्जर ही नज़र आता है। आज की तारीख में श्रेष्ठता का कोर्इ चिन्ह हमें दिखार्इ नही देता, जगत गुरू, महाराज – – – बोलिए क्या कहते है।’

          प्रति-उत्तर में गुरू महाराज संयत हो शान्त भाव से मुस्कराए और फिर मधुर वाणी में बोले, ”यह सिथति भी धर्म संवत है। एैसी अधर्म की सिथति होगी तभी तो भगवान अवतार लेगें न। भगवान ने स्वयं कहा है -धर्म की हानि ही उनके अवतार का अवसर होगा। हम धर्म गुरू तरस रहे है प्रभू के दर्शनो के लिए।” -यह कह कर गुरू महाराज की आँखों में आंसू छलक पड़े और आखे बन्द करते हुए कुछ अस्फुट स्वर उनके मुंह से निकले, ”अर्धम की पराकष्ठा होगी प्रभू……..अवश्य होगी……। आपके साथ……..गोपियों के बीच बाकी बचे जीवन में रास रचाते रहने को बेचैन है आपके भक्त।”

          इनकी फुस्फुसाती वाणी को एलिअन्स ने अपने यंत्रो से रिकार्ड कर उसे सुना। उनमे से एक विशेषज्ञ मुस्कराता हुआ उठा और गुरू महाराज से संवाद करने लगा, ”हे विलास-रास-प्रिय गुरू महाराज आपके देश में अधिकतर आश्रमों में अंत: पुर की तर्ज पर रौनक पार्इ जाती है। रास का अभ्यास दिन-रात ही चला करता है। पिछले दस वर्षो मे न जाने कितने गुरूओं ने स्वयं को कृष्णा का अवतार घोषित भी किया है-अभी हाल ही एक अवतारी गुरू की रास, एक नवयोवना ने एैसी खैची कि वो कोर्ट में बरामद हुए……..गुरू महाराज आपके अधिकतर आश्रम ड्रग-तस्करी, रेप, भूमि हड़पने, अंधाधुन्द धन बटोरने और रेप के बाद रेप के लिए प्रसिद्धि प्राप्त कर रहे है। अभी कुछ समय पूर्व एक स्वामी जी रेप के केस के बाद जब जेल से बेल पर लौटे तो बड़े धूम धाम से विश्व शांति के लिए यज्ञ करते पाए गए।”

गुरू महाराज ने अपनी भ्रकुटी से बलों को सामान्य करने हुए मधुर वाणी में उत्तर दिया, ”अज्ञात ग्रह वासियों, आध्यात्म गूढ़ है। उन स्वामी जी ने अपने अंदर की अशांति को विश्व शांति में परिवर्तित करने की आध्यात्मिक क्रिया की थी। आत्म शांति के विस्फोट से जो शक्ति रेप करने बाध्य कर सकती है, उसी शक्ति को विश्व शांति में स्थापित करने का योग कितना महान है। भोग में योग के प्रयास में सह-योग न होने से रेप भी स्वाभाविक है और रास के संदर्भ में प्रभूमय होने से परमानन्द की प्राप्ति और परमानन्द में रास भी स्वाभाविक है – इससे गूढ़ आध्यात्म प्रकाशित होता है………शेष प्रभू इच्छा से ही सब कुछ होता है और जो कुछ भी है वह प्रभू इच्छा से ही व्याप्त है।

कुछ क्षण सभी मुंह नीचे करके न जाने क्या-क्या सोचते रहे, हंसते रहे। फिर उन्होने आपस में कुछ विचार-विमर्श किया, और कुछ देर बाद उनमें से एक, पृथ्वी-वासी की ओर मुखातिब हुआ, ”धरती के श्रेष्ठ प्राणी जी आप विज्ञान के सार्वभौमिक, वैश्विक आधार से तो परिचित होगे ही। आप कहते है संसार को सारा ज्ञान-विज्ञान आपने ही दिया है। संक्षेप में छोटी-छोटी बाते ही आपसे अपने ज्ञान अर्जन के लिए जानना चाहते हैं। आपके आश्रम मे बिजली और उससे चलने वाली जो भी चीजे़ है जैसे पंखे, बल्ब, गीज़र, एयरकंडीशनर इनमे से कौन सी चीज़ का आविष्कार आपने किया है। रेल, कार एरोप्लेन, बस, मोबाइल क्या आपने इजाद किए है? खैर छोडि़ए आपके टायलेट मे लगे कमोड क्या आपने अविष्कार किए है, नल बेसिन के अविष्कारक क्या आप है – – टी.वी. जिस पर अपना चौखटा दिखाने को आपके गुरू हरदम लालायित रहते है, वो टी.वी., कैमरा और प्रसारण तरंगे क्या आपकी खोज है? विज्ञान का कौन सा चमत्कार किया है आपने।

– अरे मूर्खो चमत्कार की बात करते हो हमारे हनूमान जी ने तो सूरज को मुख मे ले लिया था-श्री यंत्र सिद्ध करके खड़ाव में पहन कर हमारे लोग आकाश भ्रमण किया करते थे। -समुद्र मंथन की कथा का ज्ञान है आपको?

एलिअन्स एक दूसरे का मुंह ताकने लगे तभी एक विशेषज्ञ को याद आया, ”हाँ! हाँ!! सुना है मेरु पर्वत को समुद्र में डालकर शेष नाग की रस्सी बना कर देवो और असुरों ने उसे मथा था – लेकिन एक बात बताइए – आप कहते है पृथ्वी शेषनाग के फन पर टिकी हुर्इ है।

-तो फिर?

-नहीं मैं पूछना चाहता हूँ अपने ज्ञान में वृद्धि के लिए ।

-पूछिए।

-समुद्र मंथन तो काफी देर चला होगा – जितनी देर समुद्र मंथन हो रहा था, उतनी देर पृथ्वी कहाँ थी क्योंकि शेष नाग तो समुद्र मंथन में व्यस्त था।

-गुरू महाराज की भृकुटी तन गर्इ और खिन्न होकर चेताया, ”याद रखो धर्म की बातों मे तर्क नही होता समझे – – -।

-महाराज ज्ञान वृद्धि के लिए कृपया बताए – पहाड़ की मधानी से मंथन में जलचरों के हाड़-मांस की तो लुगदी बन गर्इ होगी; क्या आप उस लुगदी को अमृत कहते है?

-हमारे पुर्खो ने जो कुछ निकाला वो अमृत था बस और अमृत रहेगा, तर्क करने की कोई आवश्यकता नही हैं। हाँ, हमने इस कथा का जिक्र जिस लिए किया था उसका अभिप्राय कुछ और था – – -।

-खैर आप अभिप्राय भी बता दीजिए।

गुरू महाराज भृकुटी को समान्य कर तनिक मुस्कराए और बोले, ” आप लोग कितने भाग्यशाली है यह कथा पहली बार आप ही को सुनार्इ जा रही है। – कथाओं के अंदर कथाएं छिपी होती है और उचित अवसर आने पर ज्ञानी, पंडित, ऋषि,  गुरू उन्हें प्रकाश में लाते है। – तो ध्यान को एकाग्र करके सुनिए। – – -एक अज्ञात ऋषि हुए है। अमृत मंथन होने के बाद मेरू पर्वत को उठाकर उनकी पर्णकुटि में संगवा कर रख दिया गया था।

-कुटिया में पहाड़ की मधानी को कैसे संगवा कर रख दिया गया था, वो भी पर्णकुटि में – – -?

-अरे वैसे ही रख दी गर्इ थी जैसे समुद्र मंथन हुआ था – कथा के बीच में प्रश्न वर्जित है,  कहा ना कि धर्म की बातों मे तर्क नही होता – – – हाँ तो वो पर्वत अज्ञात ऋषि की पर्णकुटि में रख दिया गया। ऋषि कोई साधारण पुरूष नही थे तपस्वी थे – जब उन्होने देखा कि हमारी पुन्य भूमि पर अर्जित ज्ञान-विज्ञान दूसरे लोग लूटकर ले जा रहे हैं तो उन्होंने ब्रह्राा जी से तपस्या कर वर मांगा कि संसार में विसर्जित जितना भी ज्ञान-विज्ञान है वो उनके मानस मे समा जाये। ब्रह्राा जी ने उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हे वर दे दिया। उनकी तपस्या फलीभूत हूर्इ और संसार का सारा ज्ञान-विज्ञान उनके मानस में एकत्र हो गया। – – अमावस्या की एक रात वो तपस्वी जी अपनी पर्ण-कुटी मे सो रहे थे कि एक चूहा पर्वत मधानी के इर्द-गिर्द उछल-कूद करने लगा और एैसा करते-करते वो पर्वत-मधानी से भी छेड़-छाड़ करने लगा और मधानी-पर्वत ऋषि महाराज के सर पर आ गिरी। ऋषि महाराज के सर पर चोट लगने से वो मूर्छित हो गए। उन्हे होश तो आ गया लेकिन उनके मानस मे एकत्रित सब ज्ञान-विज्ञान विस्मृत हो गया। – तब से लेकर अब तक हम सब कुछ भूले हुए है। हमारा ज्ञान-विज्ञान विस्मृत है। -हाँ हाँ ज्ञान-विज्ञान तो चला गया लेकिन हमारे ऋषियों ने गणेश जी से प्रार्थना की और उन्ही की कृपा से हर कार्य-सिद्धी के लिए टोटका शास्त्र निर्मित कर लिया गया, जिसको श्री गणेशवाणी के नाम से एक टी.वी. चैनल निरन्तर प्रसारित कर रहा है। चूहे की ग़लती से एैसा हुआ था अत: गणेश जी ने हर कार्य सिद्धी के लिए अपना दायित्व समझ कर हमें टोटका शास्त्र प्रदान किया है। हम इससे कुछ भी कर सकते है। बताइए – – -क्या समस्या है आपकी – – -?

          सभी एलिअन्स कुछ दुविधा मे लग रहे है तभी महाराज ने पुन: दोहराया, ”सोच लीजिए टोटका टोने की शक्ति अपार है। इसी के बल पर मेरे देश के लोग जीवन गुज़ार देते है, यदि ये न होता तो हमारे देश में जीने की रस्म ही अदा न होती – – -टोटकों मे अपार शक्ति है।”

एलिअन्स कुछ भी समझ पाने में अस्मर्थ है तभी एक वरिष्ठ सदस्य कुछ संय्यत हो पूछ बैठता है, ” क्या आप बताएगें आपकी गुरू दक्षिणा क्या होगी।”

-हमारी गुरू दक्षिणा में आपको अपना प्लेनेट हमें सौंप देना होगा। 

          वरिष्ठ सदस्य को छोड़कर सभी लाल प्रकाश में परिवर्तित हो गए और वो प्रकाश पृथ्वी-वासी के इर्द-गिर्द एक सैलाब की शक्ल में प्रवाहित होने लगा। यह देखकर पृथ्वी-वासी भयभीत हो गया। वरिष्ठ एलिअन्स ने गुरू महाराज से संवाद किया, ”तुम पृथ्वी-वासियों को मूर्ख बना सकते हो हमे नही – -। जाओ अपनी तंत्र-मंत्र, टोटका, जो भी शक्ति तुम्हारे पास हो उस शक्ति से अपने ग्रह पर लौट जाओ।”

          गुरू महाराज दुहार्इ देने लगे ”मुझे बचाइए – – – हमारी शक्तियां पृथ्वी पर केवल हमारे देश मे ही कामयाब है………मुझे पृथ्वी पर वापिस छोड़िये……….

          तभी वरिष्ठ सदस्य ने आदेशात्मक इशारा किया और क्षण भर में ही वो प्रकाश थमकर समाप्त हो गया अब वरिष्ठ सदस्य ने पृथ्वी-वासी के रूबरू होते हुए कहा, ”तुम्हे पृथ्वी पर सुरक्षित भेज दिया जाएगा। हम तुम्हे अपना शत्रु नही मानते, हम सब एक विराट विश्व के सदस्य हैं और एक ही कासमिक मदर की संताने हैं। देखने में हम तुम भिन्न है लेकिन प्रकृति ने अपने नियमानूसार हमे भी तुम्हारी तरह शरीर मसितष्क और ह्रदय दिया है। जिस जिज्ञासा से हम पृथ्वी और पृथ्वी-वासियों से सम्पर्क करना चाहते है इसका आधार वो मैत्री है। जैसे दो तत्व के परस्पर मेल से किसी तीसरे सत्य का निर्माण होता है। विज्ञान का दर्शन भी वही है और आध्यात्म का भी वही। तुम्हारी पृथ्वी पर त्रिशूल, क्रोस, पिरामिड़, सांकेतिक चिन्ह है जिसमें विज्ञान और आघ्यात्म दोनौ निहित है हम सभी के लिए सृष्टि को समझने का प्रयास करते रहना प्रकृतिक द्वारा दिया गया एक स्वभाविक गुण है, हाँ ये गहन विषय है और कठिन भी है। सदियों से इन्सान इन्ही अनबूझ पहेलियों को सुलझाने का प्रयास कर रहा है। भूतकाल के अनुभव से वर्तमान और फिर भूत और वर्तमान से भविष्य का निर्माण होता है। हम पृथ्वी-वासियों से मैत्री के भाव से जुड़ना चाहते है और अपनी जिज्ञासा को नए अर्थ प्रदान करना चाहते है। लेकिन पृथ्वी पर जो भी हो रहा है हमारे अघ्यन से एैसा लगता है कि पृथ्वी-वासियों ने पृथ्वी को इन्सान के योग्य नहीं रहने दिया या वो लोग पृथ्वी की गरिमा बनाए रखने में असफल प्रतीत हो रहे है। इसके अतिरिक्त जिस प्रकार से आपका दम्भ और आपकी नियत कार्य करती आ रही है उससे हमें दुख हुआ है, हमे लगता है आप मै अमानवता ज्यादा और मानवता शायद है ही नहीं। गुरु कहलाने वालों से एक बात कहनी है कि वो पृथ्वी-वासियों को पृथ्वी पर रहने योग्य बनाए और उससे पूर्व स्वयं को। अगर एैसा हो गया तो हमे प्रसन्नता होगी। फिर हम पृथ्वी-वासियों से मैत्री और प्रेम के सम्बन्ध अवश्य जोड़ना चाहेगें। इस आशा को लेकर शायद कभी जब हमारी मुलाकात होगी तो हम हाथ भी मिलाएगें और गले भी मिलेगें। हाँ……..हम चाहते थे कि हम तुम्हारी यहाँ की उपस्थिति को तुम्हारे मानस से पूर्णतया समाप्तकर देंगे ताकि पृथ्वी पर पंहुचकर तुम्हे कुछ भी याद न रहे लेकिन हम अब एैसा नही करेगें। शुभकामनाओं सहित तुम्हे विदा किया जाता है।

          कुछ ही क्षणो में शीशे का जार एक गोलाकार हवार्इ राकेट में परिवर्तित हो गया पृथ्वी-वासी को उसके गन्तव्य तक पहुचाने के लिए।

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(ये व्यंग नयी दुनिया, आश्वस्त तथा अन्य पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चूका है)

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4 thoughts on “विश्वगुरु

  1. वाह ..!! भैया मुरीद हो गया आपका

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