ओ मोतिया


© अमर स्नेह 

DSC_0507कुछ साल पहले मेरे पड़ोसी के यहा एक नया प्राणी बरामद हुआ। उसके हालात कुछ वैसे ही लगे जैसे कोई सही दिलों दिमाग और नीयत का व्यकित इस परिवेश में मजबूरन रह रहा हो और उसके पास कोई पर्याय ही न हो। वो बेचारा यहा वैसी ही सजा ए जहालत भुगत रहा है। मुझसे इस प्राणी का परिचय तब हुआ जब मैं टेरेस पर बैठा सुबह की चाय का आनंद ले रहा था। पड़़ोसी महाश्य के बड़े सुपुत्र जिनके बैग, झोले, टोपी और बाइक पर पत्रकार अंकित रहता है, उन्होंने उसी रुतबे से इस बेजुबान को घर के खुले कारीडार में ऐसी लात लगार्इ कि वो दस मिनट तक चीखता रहा। दरअसल वो उसके रास्तें मे आ गया था और उन्होंने अपनी ठेठ स्थानीय भाषा और गवारू शैली में, ”ओए परे हट….” का आदेश दिया था। वो गरीब उस अंदाज और भाषा से परिचित नही था। जिसमें उसे फरमाने कहर जारी किया गया था। कुछ देर बाद जब वो दोबारा वहा से गुजरे तो उस गरीब ने अपनी भाषा मे भू-भू करके सफार्इ देने की कोशिश की तो वह आग बबूला हो गए और ये कहते हुए उसे दो किक और जड़ दी, ”……..साला बतमीज आपणे मालका जो भोका? (अपने मालिक को भौकता है।) किकियाता हुआ भौ-भौ करक वो अपनी बात कह ही रहा था कि एक कमरे से सुपुत्र जी के पिता श्री जो किसी गावं के प्रार्इमरी स्कूल के टीचर थे, एक भारी भरकम डन्डे के साथ इस सीन पर अवतरित हुए। डन्डेबाजी के हुनर मे माहिर लंगर घुमाते हुए वो आगे बढ़े, ”जो बातों के बाद लातों से भी नही समझते तिन्हा रे कठे ये हे मौलाबकश। इसके साथ ही उन्होंने अपनी यशो-गाथा का एक वर्क उजागर किया, ”मैंने बड़े-बड़े लोगों को डन्डे से सुधार दिया, प्राइमरी क्लास में मैंनें अगर फलाने की डन्डे से टांग न तोड़ी होती तो आज वो मेजिस्ट्रेट न होता, आजतक भी वो लंगड़ाकर चलता है। उन्होंने उसी एतिहासिक अंदाज में हथियार साधा ही था कि उस बेजुबान ने अपनी नन्ही सी जान खुदा के हवाले कर ऐसी चौकड़़ी भरी कि उनकी मास्टरिया शान धरी रह गर्इ, वो तेजी से दो-चार कदम उसकी नकल करने मे ऐसे रपटे कि चारों खाने चित हो गए और गालियाँ बकते हुए भविष्य में उससे निपटने का संकल्प दोहराते हुए हापते कापते उठ खड़े हुए।

वो छलांग लगाकर  टेरेस पर मेरे पीछे आकर खड़ा हो गया, मैंने उसे प्यार से पुचकारा तो शायद उसे अपने पुराने मालिक की याद आ गर्इ। प्यार से उसने दोनों पैर मुझ पर रख दिये और मेरी आखों में देखने लगा, भू-भू करके मुझे बचाओं मुझे बचाओं कहने लगा। मैंने उसे प्यार करते हुए आश्वस्त किया तो वह दुम हिलाते हुए मेरे इर्द गिर्द घूमने लगा तभी पत्रकार महोदय की भारी भरकम आवाज आर्इ, ”ओ मोतीया हरामजादे चल उपर चल। उन्होंने कर्इ बार आदेश दोहराया लेकिन कुत्ते पर कोई प्रतिक्रिया नही हुर्इ। शायद वो अपने इस नए नाम से परिचित नही था। मैं उसे प्यार करता रहा तभी मास्टर जी बिना डन्डे के मेरे पास पहुच गए तो वो उन्हें भौकने लगा। मास्टर जी ने दूर हटते हुए गुस्से में एलाने जंग की घोषणा कर दी और डण्डा ढून्ढने लगे, ”ओए हराम जादे अपने मालिकों को ही भौंकता है और बुलाने पर इग्नोर करता है तेरे को सबक सिखाकर ही रहुगा।

DSC_0493मैंने इन मालिके दो आलम को किसी बहाने अपने पास बुलाकर टेरेस पर पड़ी चेयर पर बैठाया। दोनों तरफ से कुछ गुस्से का इजहार हुआ लेकिन थोडी देर बाद युद्ध बिराम करवाने मे मैं सफल हो गया। दो बिस्किट मैंने ओ मोतीया की नजर किये और थरमस में से चाय उडेलकर बजुर्गवार को आफर किया और बात बात में मैंने एक पुराना किस्सा उन्हें सुनाया। इस बीच कुत्ता मेरे गोद में अगले पैर रखकर झूलता रहा। किस्सा यूं है कि मेरे एक परिचित के सुपुत्र की शादी एक सुयोग्य पढ़ी लिखी सुन्दर कन्या से हूई। दो-तीन दिन ही हुए होगें कि मैं बधार्इ देने उनके घर गया उन्होंने और उनकी पत्नी ने कोई नाम लेकर अपनी बहू को पुकारा लेकिन बहू नही आर्इ अतं में कुछ खिन्न होकर लड़का उसे बुलाने अन्दर गया। उसके आने के बीच लड़के के माता और पिता मेरे कान में कुछ फुसफुसाने लगे, ”जनाव हमारे साथ धोखा हो गया बड़ी अजीब लड़की है अवाजे देते रहो तो सुनती ही नही। मैंने सोचा ही था कि वो शायद कम सुनती होगी लेकिन उन्होंने ही खुलासा दिया कि कम नही सुनती घुन्नी है। खैर बात आर्इ गर्इ हो गर्इ। बाद में मुझे पता चला कि उसका नाम पुष्पा था लेकिन शादी के वक्त उसका नाम लड़के वालों ने जयश्री कर दिया। तो बेचारी को अपना नया नाम याद ही नही रहता था कि उसे ही बुलाया जा रहा है। मुझे लगता है कि इस प्राणी से साथ भी वही कुछ हो रहा है। मैंने उनसे गुज़ारिश की कि इस गरीब की कोई गलती नही है। इस बेचारे को अपना नया नाम समझने में वक्त लगेगा। इसके लिए तो सब कुछ ही नया है यहा, पहले आप इसे अडाप्ट करें ,अपनाएँ, इसके लिए प्यार की आवश्यकता होगी दूसरे आपको इसके पहले मालिक से पूछना पड़ेगा भाषा के विषय में। प्यार से धीरे-धीरे ये आपकी भाषा को भी अपना लेगा। हमें इस कुते का मनोविज्ञान समझकर  ही इससे व्यवहार करना पड़ेगा। इस पर वो व्यंगातमक भाव से हंसे, ”ओ स्नेह साहब कुत्ते का मनोविज्ञान!!! अरे! कुत्ते को तो दो टुकड़े़ रोटी और लात चाहिए होती है। मुझे उनकी बात पर तरस आया, और हो भी क्या सकता था।

 

इस बात को काफी समया बीत गया लेकिन उन लोगों का रवैया वही रहा । मोती मेरे साथ सुबह घूमने जाता है, एक घण्टा मेरे साथ बाल खेलता है, मेरे साथ नहाता है, मेरे साथ ही टेबल पर नाश्ता करता है, वो मेरी भाषा समझता है मैं उसकी भाषा समझाता हूँ। हाँ शाम को अगर बाल खेलने में अगर देर हो जाए तो मेरा पेन और पेपर लेकर भाग जाता है। आज वो हक जताते हुए कहते है अजी हमने इसे पैसें देकर खरीदा है। आप इसे छोड़ते क्यों नही। मैं उन से कहता हू कि आप ने उसे पैसे देकर खरीदा है ये बात कुत्ता नही जानता। अभी हाँ, इस कुत्ते ने अपने प्यार से मुझे खरीद लिया है और मैं इसके प्यार में बिक गया हू़…….. वैसे ये कुत्ता आपका ही है।

 

                वैसे तो मोती का ज्यादातर समय मेरे पास ही बितता है। हाँ अब धीरे-धीरे वो मास्टर जी के परिवार से जुड़ने लगा है। उसने बहुत से कामों की जिम्मेदारी सम्हालनी शुरु कर दी है। ऊपर मास्टर जी का बगीचा खेत और आस पास घास के मैदान है जहा उनकी गाय चरती है, वो ग्वाला बना गायों को चराता है। घास के मैदान की सीमा पर बैठा रहता है। गाय जरा भी इधर-उधर हुर्इ तो घेरकर सीमा पर वापस ले आता है। बिलिलयों पर नजर रखता है जो अक्सर दूध पी जाती है। एक बार दिख जायें तो वह न जाने कहां तक उनको खदेड़ आता है। लेकिन बिल्लियाँ भी कम नही है। वो आस पास के पेड़ों पर चढ़ जाती है और ये जनाब पेड़ के नीचे बैठकर उनका इन्तजार करते है। तभी दूसरी बिल्ली इनका ध्यान बटाने दूसरी तरफ से आती है, ये उसके पीछे दौड़ते है तो पेड़ पर चढ़ी बिल्ली उतर के छत पे चढ़ जाती है। ये तमाशा  घण्टों तक चला रहता है। चूहों को बिलिलयों से कुछ राहत जरूर मिली है लेकिन वह अब मोती साहब से भी कम परेशान नही है।ये अपनी घ्रण संज्ञान से सांपों का पता चला लेते हैं और फिर उनसे भी पंगा  ले लेते है।

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                मुझे लगता है मोती इस वक्त संसार का व्यस्ततम प्राणी है। एक काम खत्म होने के बाद वो सुबह शाम के अलावा भी गेन्द लेकर मेरे पास आ जाते है। समय और मौसम का कोई बन्धन नही है। हमें अगर अपने पेन, कागजों की खैर रखनी हो तो तुरन्त इनके साथ  गेन्द खेलने टेरेस पर जाना पड़ता है। आज बारिश में हमें वाल खेलता देख मुझे सुनाते हुए मास्टर जी बोले, ”ओए मोतीया खेलणे रा भी कार्इ टाइम हूँआ….(खेलने का भी कोई टाइम होता है)। फिर मुझे मास्टर जी मुझे लोक लाज समझाने लगे कि सफेद बालों वाले व्यकित को बारिश में बाल खेलता देखकर लोग क्या कहेंगे। वो लानते बरामदे देते हुए अपने दो मंजिला कमरे में चले गए लेकिन खिड़की से देखते रहे। जनाब ये मामूली खेल नही है सिर्फ गेंद फैंकने और पकड़ने का । गेंद कितनी भी चलाकी से , किसी भी दिशा में, कितनी भी ऊची -आगे -पीछे फैकें जाने वाले के मन्तव्य को मोती पलों में भांप जाता है और पलकों में ही योजना निश्चित कर गेंद पकड़ लेता है। तीन चार फिट ऊपर उछल  कर हवा में गेंद को पकड़ लेता है। हाँ खेलते खेलते मोती ने कुछ नियम बना लिए है। गेंद फैंकने में अगर फैंकने वाले की गलती है और गेंद सड़क पर गेंद चली जाती है तो गेंद फैंकने वाले को नीचे सड़क से लाना पड़ता है और अगर इनका केच छूट जाये तो ये खुद गेंद ले आते है। बड़ा रोचक खेल होता है जिसको देखने कभी कभी बीसीयों बच्चें टेरेस पर  चले आते है। कभी कभी वो अपने साथ गेंदे भी लाते है और फिर चैातरफा मुकाबला होता है और वो हर आने वाली गेंद को केच करता है। तालियां बजती है बच्चे खुशी से किलकारियां  भरते है लेकिन मास्टर जी को ये सब अच्छा नही लगता। आज इन्होंने बच्चों को डांटकर भगा ही दिया और सारी गेंदें कहीं छिपा दी लेकिन प्यार मुहब्बत जोर जुल्म के आगे कभी घुटने नही टेकती।- दूसरे ही दिन सामने की पहाड़ी के एक छोटे से समतल स्थान से बच्चों की किल्कारियां और तालियों की आवाज सुनार्इ दीं।मैंने वहा जाकर देखा तो मेरा अनुमान सही निकला, मोती बच्चों के साथ गेंद खेल रहा था। यहा कुछ महिलाओं के साथ छोटे बच्चें भी है जो मोती के आगे पीछे उसे प्यार से हाथ लगाकर किल्कारियां भर रहे है। मेरी नजर मैदान के साथ जूडे़ सीढ़ीदार खेतों में गर्इ तो देखा कि आस पास के तमाम कुत्ते लार्इन से बैठे ये नजारा देख रहे थे। अजीब दृश्य है। अचानक मोती की दृष्टि मुझ पर पड़ी तो वह दोनों कान नीचे कर महिला के पीछे छिप गया। खेल पर विराम लगने से सब मुझे देखने लगे। मोती मेरी भाषा समझता है मैंने तुतलाकर उससे कहा,’ चलो चलो बाबू खेल चालू करो तो वो फिर से मैदान पर आ गए और खेल चालू हो गया। कुछ ही देर बाद टेरेस से मास्टर जी की आवाज आर्इ, ”ओए मोतीया हरामजादे आवारा चल घरो आओ नइ तां तरे टांगा भानणी(तोड़नी) पउणी।- उनकी आवाज सुनकर एक औरत बोली, ”अजीब बुडढा है  बच्चो को हंसते खेलते देख ही नही सकता।

 

                मास्टर जी ने काफी हंगामा किया और डंडा लेकर मोती पीछे पड़ गए, ”आसे तू चौकीदारी कठे रखिरा की गेंद खेलने कठे (हमने तुझे चौकीदारी के लिए रखा है या गेंद खेलने के लिए)। आज मोती डरकर मेरे पास ही आ गया और रात में मेरे पास ही सोया।

                सुबह जब हम सैर करके लौटे तो नित्य की भाँती टेरेस पर चला गया और मैं नीचे अपने घर में आकर चाय बनाने लगा। चार और बिसिकट के पैकिट लेकर जब मैं ऊपर पहुचा तो देखा टेरेस पर दस-बारह आवारा कुत्ते मोती के साथ गेंद खेल रहे है। मोती गेंद पा जाने पर अगले पैरों से वाली हिट करता है और दूसरे कुत्ते वाल उठापटक करने लगते है। मास्टर जी भी अपने तीमंजले से ये सब देख रहे हैं। मुझे देखकर बोले, ”स्नेह साहब ये आज मुझ से निपटने के लिए पूरी ब्रगेड लेकर आया है शकित प्रदर्शन कर रहा है। मैंने इसकी गेंदे छुपा दी थी तो ये सूघं-सूघं कर उन्हें भी निकाल लाया।- मोती ने भूँ भूँ करके अपनी भाषा में कहा ,ये मेरे दोस्त आपसे मिलने आये है।- मैंने उसकी भाषा का तर्जुमा किया तो डन्डा लिए बड़बड़ाते हुए ”ठीक है ठीक है अभी मिल लेते है।  वो नीचे आ गए। डन्डा और उनके तेवर देखकर सभी कुत्ते भौंकने लगे। तो बोले, ”अबे सालों मेरी टेरेस पर मुझी को भौंक रहे हो। -इससे पहले कि कोई हादसा हो जाता मैंने उनके हाथ में बिस्किट का डिब्बा थमा दिया तो वो मुझे आश्चर्य से देखने लगे। डन्डा रखते हुए वो शंकित होकर फुसफुसाए, ”ये साले काटेंगे तो नही……। जैसे ही वो बिस्किट डालने लगें। तो सभी कुत्ते दुम हिलाते हुए उनके पास आ गए। मैंने उन्हें आश्वस्त किया, ”डरिये नही अब ये सब आपके दोस्त हो गए है। दुम हिलाकर इन्होंने आपकी दोस्ती कबूल कर ली है। -तभी मोती ने गेंद लाकर उनके सामने डाल दी तो उन्हें ये समझते देर न लगी कि वो खेलने के लिए कह रहा है। उन्होंने गेंद हिट की तो ऐसा मजेदार खेल शुरु हो गया कि हमेशा याद रहेगा। टेरेस पर चार-पांच गेंदे थी सभी कुत्ते गेंद उठाते डालते दौड़ते। मास्टर जी एक गेंद हिट करते तब तक दूसरी और फिर तीसरी आ जाती। मास्टर जी के घर के लोग उनका ये नया रूप देखकर आश्चर्य से तमाशबीनी कर रहे है। फिर क्या था बिस्किट के पैकिट आने लगे खेल जोरो से चलने लगा, मास्टर जी पसीने से तर होकर बोले भार्इ मजा आ गया़…. स्नेह साहब आपने मुझे भी काम से लगा दिया। मैंने कहा, ”ये कारोबारे मुहब्बत के साथ इजहारे मुहब्बत भी है इसे कोई सिर्फ गेंद का ही खेल न समझे।

                अब तो मोती की सौबत में मास्टर जी को मजा आने लगा। दोस्ती इतनी प्रगाढ़ हो गर्इ की सुबह से शाम तक अब वो मोती को पुकारते ही रहते। -”ओए मोतिया चल गमले जो पाणी देणा -”चल मोतिया सैर करणी-”मोतिया किथियो गइरा चल खाणा खाणा-”ओए मोतिया देख बिल्ली आर्इ-ओए मोतिया किथि हा चल बच्चे टेरेसो आइरे। -मोती उनकी आशा  के अनुरूप प्रतिकि्रयाएँ करता, मास्टर जी के हर काम में मोतीया मौजूद रहने लगा। मोती से मेरी दोस्ती अभी भी वैसी ही है। हाँ, कभी-कभी वो मुझे दो किशितयों का सवार लगाता है तब मास्टर जी और मैं टौस कर लेते है। -अब सुबह- शाम टेरेस खुशियों, किलकारियों और तालियों से गूंजता और प्रफुलित रहता है।

 

DSC_0517                आज मैं कम्प्यूटर पर कुछ काम कर रहा था तो समय का पता ही न चला समय देखा तो शाम के सात बजे थे। मैं सोचने लगा टेरेसा से भागने दौड़ने की आवाज ही नही आ रही है। तभी मोती ने दरवाजे पर दस्तक दी लेकिन रोज की तरह आज उसके मुंह में वाल नही थी। मुझे भूँ भूँ करके दौड़ता हुआ वो ऊपर ले गया, लेकिन वो टेरेस की तरफ मुड़ने के बजाये मास्टर जी के कमने की तरफ जाकर खड़ा हो गया। मैं समझ गया की ये मुझे ऊपर बुला रहा है। मैं ऊपर गया तो देखा कि मास्टर जी की तबियत ठीक नही है उनका एक हाथ निरजीव हो गया है और वो बीच बीच में संज्ञा शून्य हो रहे हैं – रात गए उन्हे हास्पीटल ले जाया गया। कर्इ अस्पताल बदले और अन्त में नाउम्मीदी के हालत में उन्हें घर ले आए। नीचे ही मेरे घर के साथ के हाल में रखा गया। कर्इ बार जिद करने पर मैं मोती को उन्हें दिखाने ले गया तो वो शान्त सा उन्हें देखता रहता। उनके पास जाकर बैठ जाता। -दूसरे दिन ही मास्टर जी की मृत्यु हो गर्इ उनकी अंतिम यात्रा की तैयारियाँ हाल मे ही चल रही थी। मातम के मौहोल और लोगों की आवा-जाही के बीच मोती को मैंने अपने बाहर के कमरे में बन्द कर दिया लेकिन वो बेचैन फैंच बिन्ड़ो से एक टक खड़ा बाहर ही देखता रहा। उनकी अर्थी उसी खिड़की के सामने से गुजरी तो वो जोर-जोर से सूघं कर काफी देर तक भूँ-भूँ करता रहा।

                हम लोग अंतिम क्रिया के बाद लौट आए दुख प्रकट करने वालों की आवा-जाही रात तक चलती रही। अचानक मुझे मोती का ख्याल आया, न जाने कब वो कमरे से निकल गया था। उसे इधर -उधर आवाजें लगार्इ लेकिन उसका कोई अता-पता न था। एक नीचे से आने वाले व्यकित ने बताया की आपका कुत्ता नीचे खडड के रास्ते पर जा रहा है। हम लौग गाड़ी लेकर उसी रास्ते पर गए। हमने खडड के पास पहूच कर आवाजें लगार्इ लेकिन उसका कुछ पता नही चल रहा था। फिर हम एक पहाड़ी पर चढ़ गए और मोती को आवाजे लगाने लगे तभी वो बदहवास सा भागता हुआ हमारे पास आ गया। उसने मुँह में गेंद दबा रखी थी। हमने समझ लिया कि वो अपनी घ्रण शकित से मास्टर जी को ही खोज रहा होगा। अभी वो उसी खोज प्रक्रिया में लगा हुआ था कि हमने उसे आवाज लगा दी थी। मैंने उसे चेन किया तो एकदम वो विलक्षण सा व्यवहार करने लगा, हवा के झौंके के साथ कोई अजीब सी गंध आर्इ हमने नीचे देखा तो मेरे साथ आए स्थानीय व्यकित ने बताया की नीचे ये वही जगह है जहा मास्टर जी को जलाया गया है। उनकी चिता में कहीं कहीं अंगारे अभी भी सुलघ रहे थे। मोतीया घ्रर्णेंइनिद्रयों से सूंघकर नीचे देखने लगा। तभी गेंद उसके मुँह से छूट गर्इ। अजीब इत्तेफाक है कि गेंद चिता के पास नदी में जाकर गिरी।

मैंने मोतिया को अपनी बाहों में भर लिया मेरे कन्धे पर सर रखकर शान्त खड़ा न जाने क्या सोच रहा हैं लेकिन उसकी खामोशी बहुत कुछ कह रही है। तभी मुझे लगा की मास्टर जी भी उससे कुछ कह रहे है, ”ओए मोतिया पागल खेलणे रा भी कोई वक्त हुँआ, पर मेरा तां वक्तते खत्म हुर्इ गर्इरा……..प्यारे मोतिया इथि भी तांए आपणी जिद पूरी करि दिति, चल एबे लहराँ भितर समाणे ते बाद तेरी गेंदा कने खेददे रहणा (.ओए मोतिया पागल खेलने का भी कोई वक्त होता है पर मेरा तो़…. वक्त ही खत्म हो गया है……….प्यारे मोतिया यहा भी तूनें अपनी जिद पूरी कर ही ली, लहरों में समाने के बाद फिर तेरी गेंद से खेलता ही रहूँगा)

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(कहानी “शुक्रवार” पत्रिका में प्रकाशित)

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6 thoughts on “ओ मोतिया

  1. amar ji, i am your forever fan, your style of writing and emotional human senstivity create new kind of satire, which invokes reader and teach a unforgetable lession.

    love you sir.

    • om thakurji,I am very thankful to you for giving your reaction,your
      comments are very precious for me.
      with love and regards
      amarsneh

  2. स्‍नेह साहब।
    एक कहानी मां पर थी शायद…आज तक हांट करती है। एक यह है मोतिया पर। आहहहा। क्‍या कहूं। इतना ग़ज़ब का नरेशन। इस कहानी को पढ़ कर कोई पहले जैसा नहीं रह सकता।
    सादर
    नवनीत शर्मा

    • आपकी प्रतिक्रीया निश्चय ही मेरे लिए मूलल्यवान है ,प्रतिक्रीया के लिए आभार व्यक्त करता हूँ

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