परलोक सभा


©Amar Sneh

       चेता बेचारा निपट गंवार अनपढ़, लोग जब भी आपस में बातें करते तो वो उनका मुंह ताकता, कभी कुछ पूछ लिया तो लोग झिड़क देते, ‘‘अबे तेरी समझ में नही आएगी ये बातें, जा दो रोटी कमा और सोजा, क्या करेगा ये सब जान के।’’ हर जगह उसे यही सुनना पड़ता लेकिन चेता में हर बात को जानने की जिज्ञासा उसे बेचैन कर देती। सुना सुनाया ही उसका ज्ञान है आखिर वो सुनाये किसको और पूछे किस से, उसने हल ढूंढ ही लिया, सयाने राम आजकल अकेले बैठे हुक्का गुडगुडाया करते है, क्यों न उन्ही के पास बैठ के लोगो की बातों का उन्ही से खुलासा करवा लिया करें। अब वो हर रोज़ सयाने राम के पास आने लगा। आज आते ही राम-राम बजा के उसने बड़ी रहस्मय अंदाज में सयाने राम के कान में फुसफुसाया, “बडकू दसहरी कह रहा था की वो कही नेता जी का भासन (भाषण) सुने है, नेता जी जीत गए तो ओ राममंदिर बना कर रहेगा.. हम बेअक्कल कहता हूँ की इतना मंदिर मंदिर है.. फिर ई काहे…? बडकु हम छप्पर के टट्टर दाल के रहता हूँ लेकिन बिनिया माधो महल्ला के मंदिर के बनाये खातिर चार दिहाड़ी मजदूरी दान दिया… का बडकु फिर चंदा दे का पड़ी…?

Amar Sneh1-अरे मूरख ई इन्द्रजाली माया का बात है यानी… चेता हुकारी भर खुलासा करता हूँ।

-हो

-मंदिर बना

-हो

-सब सुखी

-हो

-गरीब को बंगला

-हो

-बंगला वालों को महल

-हो

-झोपड़ी वालों को चार बुर्जी इमारत भवन

-हो

-बिना बीज डाले.. बिना पानी के.. बिना खाद के.. फसल हर रोज तैयार.. रोज काटो..

-हो हाँ हाँ!!

-सबके दरबाजे दरबाजे मोटर कार

-हो हाँ हाँ!! का!!

-आगे सुना जाये.. सबके बड़ा बड़ा दालान में उड़न खटोला… बिना मसीन के.. बिना तेल पिटरोल के मनतर सक्ति(शक्ति)… “अडंग भडंग चलो मंदिर.. चलो पान दुकान और फुर्रररररररर…”

चेता का सर घूमने लगा और उस पर बेहोशी छाने लगी सयाने राम हिला हिला के पानी पीला के उसे होश में लाये, “काहे रे चेता अभी खुलासा बाकी है हुकारी भर।” चेता बेचारा बेहोशी से होश में आया तो सयाने राम फिर से खुलासा बयानी करने लगे और चेता हुकारी भरने लगा…

-सुबह दोपहर साम तीनों टाम खीर-पूरी, पूड़ा, पूड़ा-कचौड़ा, पकौड़ी-पकौड़ा, चांदी बरक(वर्क) के बरफी-इमरती, गुलाबजामुन, रस्सगुल्ला, चौसठ प्रकार का भोजन सब मनई के रसोई घर में अपने आप परगट होगा..

बेचारा चेता सुन सुन के हुकारी भरना भूल गया इन सारे व्यंजनों का जैसे स्वप्न लोक में स्वाद ले रहा हो। सयाने राम भी बताते बताते अपनी लार पोंछ के फिर से खुलासे में लीं हो गए…

-….चेता मंदिर के बनाये जाये के बाद जनता के घर में इतना धन सम्पति सोना-चांदी बेसी हो जायेगा की बाहर के देसो के चोर डाकून के आवाज लगा लगा के निमंतरण देना पड़ेगा की चोर डाकुओ आओ.. हम आँख बंद किये लेते है भवन के चोसंठ दवाजा खुले है उठा के ले जाओ.. पूरी छूट है…

चेता बेचारा सरक के पास आ गया हाथ पैर काम्पने लगे, “बडकू ई सब हो जाई, लेकिन हमारा तो होसऐ खराब हो गया है.

-चेता मंदिर बने के बाद राम राज की स्थापना से ई सब होए का पूरा भरोसा है

-राम राज!!

-….बस भईया चेता पलटू राम शर्मा जी हमरे कान में जो डाले वाही हम सुना दिए, ज्ञान बात पलटू राम जी के बाप हमरे बाप को बताये.. उनके दादा हमारे दादा को जो बताये वही ज्ञान भंडार है..

चेता सब सुन के अचेत हो गया और अचानक सुबक सुबक कर रोने लगा सयाने राम की नज़र पड़ी तो हैरत से देख पूछा, “काहे भईया चेता राम राज का नाम सुन के रोऐ कहे लगे…”

-खुसी का बात है लेकिन हमको रोना इसलिए पड़ा की आज अगर राम जी के बाप दशरथ जी होते तो अपने बेटा का राम राज देख के कितना खुस होते.. कौनों बाप के आत्मा बेटा के राज देख के का खुस नहीं होता है दशरथ जी चले गए और राम राज आ गया.

-भईया हमारी भी बुद्धि खराब हो रही है समझऐ नहीं आ रहा है, काहे की राम लीला में सारा का सारा सीन तो हम देखे है, रावन के राम जी तीर कमान चला के बध किहिन.. ऊ के बाद… भरत मिलाप का सीन.. ऊ के बाद राम जी का राज तिलक.. बस भईया.. हाँ! अगला सीन राम लीला का परलियामेंट(पार्लियामेंट) में होई..

-चाचा ये परलियामेन्ट………परलियामेन्ट लोग बोलते रहते है जरा खुलासा करें कि ये क्या है।

-भई देखिए मैं भी कम पढ़ा लिखा हूँ। देख सुनकर जो जाना है, वही बता सकता हूँ। इसे हिन्दी में शायद लोक…..लोक।’’ वो बीच में ही बोल पड़ा, ‘‘हाँ..हाँ…..लोक परलोक।’’

-हाँ लोक परलोक तो तू जान ही गया है सही कहा तूने, जनता के लिए ये परलोक सभा है वैसे लोक सभा है।

-ये क्या करती है।

-भाई देख, मैंने तो जो टी.बी. पे देखा है वही बता सकता हॅू , जहाँ तक मेरी समझ में आया ये शोर करती है-मैंने तो जब भी देखा शोर ही करते देखा है।

-शोर क्यों करती है?

-भाई ज्यादा तो नही बता सकता-लोग एक दूसरे को घपलेबाज, चोर और न जाने क्या-क्या कहते रहते है, झगड़ा, जूता चलता रहता है, बीच बीच में घण्टी बजती रहती है, और झगड़ा घंटों चलता है। फिर भईया थक के लोग गाड़ी में बैठके अपने-अपने बंगले चले जाते है।

-चाचा का कोई नशा पत्ती…..?

-इसका तो हमें नही पता लेकिन इतना जरूर जानते है। नेता लोग इलेक्सन जीतने के बाद रुतबे के नशा में रहते है।

-ओ हो ये सब लोग का इलेक्सन वाला है क्या। बापरे इलेक्सन में भी इतना शोर करता है भासन पे भासन हरेक को पढ़ाई, लिखाई, रोटी, कपड़ा, मकान, गरीबी दूर करने का वादा बापरे यहाँ भी सोर वहाँ पर भी सोर….चलो ई तो खुलासा हो गया, एक बात और पूछे का रहे, ई जो मिन्ट मिन्ट में गोर करत है वही का ना गबरमेन्ट कहते है?

-ये तो हम नही जानते कल रामबरन जी अखबार पढ़ के बताईन की गवरनमेन्ट चोर होती है।

-बापरे हमरे घर में दरवाजा का तो एक ही पल्ला है।

-अरे तो क्या तुम समझते हो तुम्हारी ढिबरी लोटा वो चुरा ले जाएगी क्या। भई ये वो चोर नही है उन को तो झट पुलिस पकड़ लेती है। ये वो चोर है जिसको लोकपाल के अधिकार क्षेत्र से बाहर रखके सरकार लोकपाल बिल बनाए है।

-चाचा अजीब किस्म का चोर है, खैर चाचा तुम्हारे पास आके कितना ज्ञान मिला… नही तो ये किस्म का चोर तो हम जिन्दगी भर न जान पाते।

-सरकार की गरीमा का प्रसन है, देस का इज्ज्त मिट्टी में मिल जाएगा।

-लेकिन चाचा हमारी फिर एक बात समझ में नही आई कि इसी देस का सरकार का ये लोग अपने ही घर में डाका क्यों डालते है। बड़ा अजीब बात है।

-भईया हम ज्यादा पढ़े लिखे तो नही है सुने है देस की आजादी के बाद देस भगतो की ये नई किस्म है। जनता-नेता, देस भगत वही मनिस्टर और न जाने का का बनता है।

-हम कहता हूँ आप काहे नही इलेक्सन में खड़े हो जाते हैं।

-न न न एैसा कभी भूल के भी न सोचना अगर हम इलेक्सन जीत गए और कही मनिस्टर बन गए और फिर देस भगती में कही घपला हो गया और पकड़े गए तो हमरा यादास्त चला जाएगा। न बाबा।

-आ रा रा रा ठीक बताए इलेक्सन के बाद जो नेता वादा करके वोट ले जाता है उसको बाद में उसे याद ही नही रहता कि वो क्या वादा किया था। कौनो भूत पिसाच का सांया लग जाता होगा जो यादास्त खींच लेता होगा प्राण की तरह।…….चाचा एक बात तो बता दिया जाए का हम ये सब ज्ञान किसी और को बता दें या नही?……बता देने से तो देस का इज्ज़त खराब न होगा।

                चाचा भावुक हो गए,‘‘चेता तुझे देस की इज्जत का इतना ख्याल है। सही है क्योंकि तू अनपढ़ गरीब और सीधा है इसलिए, ये देस सिर्फ तेरा ही है सिर्फ तेरा देस। बाकि समर्थवान, ताकत पैसा वालो के लिए तो ये सिर्फ लूट खसोट स्थली हैं।

(रचना नव भारत टाइम्स और नयी दुनिया में प्रकाशित)

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