कूकुर-क्रांति


© Amar Sneh

वही घटिया मानस, वही सड़ागला व्यवहार और आचरण। चाहे गंवार हो या संभ्रान्त, पढ़ा लिखा हो या अनपढ़ किसी भी धर्म जाति का हो, बस गाहे बगाहे अपनी गालियों और बदकलामी में कुत्तों की ज़ात को शुमार रखता है। आज कूकुर महा सभा में इनकी कुत्ता बयानी ग़ौर तलब है।

झूठे दम्भ के हाशिए में सिमटे ये लोग जब, प्राणी मात्र के कल्याण और विश्व कल्याण के नारे लगाते हैं तो लगता है जैसे शिकारी अपने शिकार को बहका रहा है। इन्ही जगत कल्याण की दुहाई देने वालों से हमें सिर्फ जूते, पत्थर, डन्डे की मार दुत्कार और गालियाँ ही मिलती है। इनके विद्यवानो ने कहावतें गढ़ रखी हैं, ’’चोट्टी कुतिया और जलेबियों की रखवाली’’ कितना घटिया मानस है इनका। कुकूर जात की तौहीन और बदनाम करने की हरकतों को अब बर्दाश्त नही किया जा सकता।

0003कुत्तों ने मजबूर होकर कुत्ता जागरण परिषद और कुत्ता विश्व मंच की स्थापना कर दी। आज यहाँ धिक्कार सभा का आयोजन चल रहा है। स्थानीय गली सड़कों, मोहल्ले, गांव और शहर के नेता कुत्ते(नुमाइन्दे) इस सभा में अपने अपने विचार भौंक रहे है। ये दुमों को उठाए कुत्ते,लगता है अपनी शान को झंडायमान किए हुए है। इनके भौंक भाषण में खुलकर इंसानो की भर्तसना की जा रही हैं। एक गैरतमंद कुत्ता भाषण देते देते शर्मसार हो टीले के पीछे मुंह छिपा कर बैठ गया। वो बता रहा था कि लोग अक्सर गुस्से मे अपनी ही संतान को कुत्ते दा पुत्तर कह बैठते है। इतिहास गवाह है कभी एैसा नही हुआ। अगर किसी कुत्ते से ये हरकत गलती से भी हो जाती तो सब्र कर लेते। ये तो सरासर कुत्तों का चरित्र हनन है।

’शेम!शेम!! शेम!!! – – – – – – ।’ का शोर चोरों ओर गूंजा। अब बारी एक शालीन कुत्ते की आई। बहुत दूसरी किस्म की सोच-समझ है इनकी। इन्होने अपनी नपी तुली जबान में जो हकीकत बयान की तो कुत्तों ने स्वयं को गौरवान्वित महसूस किया। – – – – -“दोस्तो, मादाओं और बच्चों हमे तो खुशी होनी चाहिए कि इन्सान धीरे धीरे हमारे करीब आ रहा है……. देखते ही देखते वो अब हमारी जात में ही शुमार हो जाएगा। आप तो जानते ही हैं मैं शुरू से ही शौकीन तबियत का हॅू। रंगमन्चों के आस पास ही मेरी जिन्दगी गुजरी हैं। दिल्ली के प्रगति मैदान मे अक्सर फैशन शो होते है। मैंने देखा की वो दिन दूर नहीं कि ये लोग मादर ज़ात हमारी तरह हो जाएंगें। इनके पास तो पूंछ भी नही है, सोचो क्या होगा। एैसे ही एक बार बुझे व्युटी कांटेस्ट देखने का मौका मिला। इन्सानी मादाओं ने चड़ढी पहन के सरपे ताज धारण किया हुआ था। विश्व सुंदरी का शायद उनमे से एक को खिताब भी दिया गया। एैसे ही, मैं पार्कों, सड़को पे खुलेआम इंसानी मादाओं और मर्दो को कुकूर छिनारा करते देखता हॅू तो लगता है कि हम कुत्ते कितने मॉर्डन हैं कि ये लोग हमारी कुकूर-छिनारा-संस्कृति को खुले हृदय से अपना रहे हैं। मैं इस सभा के मंच से इस संस्कृति को अपनाने के लिए इंसानों को बधाई देता हूँ, और साथ ही आप सबसे प्रार्थना करता हूँ की उन्हे अपनी जात मे शामिल करने के लिए आप सब अपने हृदय के द्वार खोल दें।“

कुत्तों में इस बात से बबाला मच गया, ’’नही नही’’-’’न न’’-’’ये नही हो सकता’’-’’हम बिना पूंछ वालों को अपनी ज़ात में शामिल नहीं कर सकते।’’

इस प्रस्ताव को स्वीकृति नहीं दी गई। अन्य बहुत से प्रस्ताव पारित किए गए और इन सभी प्रस्तावों को लेकर दावा किया जा रहा है कि ये सभी प्रस्ताव अंतराष्ट्रीय कुत्ता कॉमिनिटि की ओर से दिए जा रहे हैं। लेकिन टॉमी  की राय जरा अलग है उसने असहमति भौंक भौंक कर बयान की, ’’कितनी बेतुकी बात है, भला अंतराष्ट्रीय कुत्ता कॉमिनिटि की सहमति, स्थानीय कुत्तों के द्वारा स्थानीय विवादों के लिए कैसे कायम की जा सकती है?

एक शकल से गंवार लगने वाला कुत्ता, कालू , टॉमी  पर झपट पड़ा, ’ए टामिया(टॉमी ), ए बीदेसी (विदेशी) अपना बिबेक (विवेक) अपनी पॉकेट में रख। यहाँ सब काम परम्परानुसार भारतीय तरीका से किया जाएगा। – – समझे का – – – ।’

टॉमी  विदेशी नस्ल का कुत्ता है। उसके परदादा के लकड़दादा किसी अंग्रेज अफसर के साथ भारत लाए गए थे, और फिर यहाँ से वापिस नहीं गए। अंग्रेजी हुकूमत के दौरान इन कुत्तों ख़ास ने अपनी नस्लों ख़ास की मुहर से न जाने किस किस को नवाज़ा होगा, इसकी फहरिस्त बनना नामुमकि़न है, और इनकी ख़ास संतानो ने न जाने कहाँ-कहाँ आबादी में इज़ाफा किया होगा और फिर इनकी रेस मिक्स होते होते कहाँ तक पहुंची होगी , क्या कह सकते हैं ? इस तरह के मामलो में इंसानो में तो मॅूछों पर ताव देने वालों के दावे अकसर ग़लत ही लगते हैं। खैंर, टॉमी  पे शुद्धता की एगमार्क की तरह मुहर लगी हुई है-लोगो को, वैसे जब इन्हें शर्मिंदा करना होता है तो इन्हे विदेशी कह देते है। जबकि उनका अपना मामला कहाँ तक गड़बड़ हैं उनको भी पता नहीं।

टॉमी  ने विरोध के बावजूद अपनी बात जरी रखी, लेकिन कालू और उसके समर्थको ने आफत बर्पा कर दी, “हम सभा की कार्रवाही नहीं चलने देंगे। हम कह चुकें है कि हमारे देश में कोई भी च़ीज अंतर्राष्ट्रीय होती है चाहे उसका स्थानीय वजूद हो, या न हो। मैं जहाँ रहता हॅू वहाँ एक विस्व (विश्व) मानव सेवा केन्द्र है – लेकिन वहाँ दीवार छोड़ो तम्बू तक नहीं है। एक सड़ी बल्ली पे सिर्फ एक बोर्ड लटका है जिसपे विस्व (विश्व) मानव सेवा केन्द्र लिखा है। लेकिन कागजों पर विश्व स्तर पर ये विस्व (विश्व) केन्द्र चल रहा है – विदेसों (विदेशो) से अनुदान आता है। दूर-दराज़ से सेवा मे रुचि लेने वालों के नाम से पर्चियां काटी जाती हैं। उसी गली मे आगे जाकर विस्व प्रसिद्ध राम लाल पकोड़े वाला है। बोर्ड छः फिट लम्बा है और दुकान का साइज तीन बाई चार है। तो रवायात के मुताबिक यहाँ भी स्वदेसी तौर तरिका ही चलेगा। विदेसी तौर तरिका नहीं चलने दिया जाएगा।“

सभापति ने कालू को समझाया कि आप टॉमी  को अपनी पूरी बात कह लेने दें। – बहुत ज़ोर लगाने पर कालू ने भौंकना बंद किया तो टॉमी  साहब कुछ आगे बढ़े, – – – “बताईए दूसरे देशों के कुत्ते जब जलेबी नाम की चीज को जानते ही नही तो फिर वो कहावत का अर्थ कैसे समझेंगें। देखिए हमें अपनी यहाँ की समस्याओं को यहीं सुलझाना हैं। अंतराष्ट्रीय कुकूर समाज की तरफ से कोई राय कायम करने का हमें कोई अधिकार नहीं हैं। किसी भी बात में अंतराष्ट्रीय शब्द घुसेड़ देने से क्या चीज बड़ी हो जाती हैं ? ये इन्सानो की भारतीय प्रकृति है और हमें इससे प्रभावित नही होना चाहिए।“

टॉमी  साहब के इस वक्तव्य से कुत्तों मे कुछ बेचैनी अनुभव हो रही हैं। बोनी नाम के कुत्ते ने फरमाया कि, ’’टॉमी  दुरूस्त है, लाॅजिकल है, लेकिन इनके वक्तव्य का क्या सीधा सा अर्थ यह नहीं निकलता कि ये टॉमी  साहब पूरी कुत्ता कॉमिनिटि को बांटने की कोशिश कर रहे हैं। मैं कहता हॅू जलेबी भी इसी मुल्क की है और कहावत भी, लेकिन हम कुत्ते, पूरे विश्व के कुत्ते एक हैं। टॉमी  साहब आपके वक्तव्य से हमारी एकता की भावना को बहुत चोट पहुंची है जिसकी भरपाई होना बहुत मुश्किल हैं।’’

कालू ने आवाज बुलन्द की, ’टॉमी  कौम का दुश्मन हाय-हाय, हाय! हाय!! हाय!!!

-टॉमी  ।

– हाय-हाय, हाय-हाय – – – ।

टॉमी  घबराकर सफाई देने लगा लेकिन उसकी किसी ने नहीं सुनी।

जवान जूली कुतिया मीठी गुर्राहट मे कुकयाई , ’टॉमी  साहब आप जिद छोडि़ए। चलिए इसी बहाने विेदेशी कूकरों को, जलेबी और हमारे विचारो का परिचय हो जाएगा…… और इसी बहाने जलेबी का अंतर्राष्ट्रीयकरण हो जाएगा और हमारे यहाँ के उद्योगपति जलेबियों का एक्सपोर्ट करके विदेशी मुद्रा कमा लेगें। लेकिन – – – लेकिन इसमें एक ही खतरा है कि चाइना वाले हमारी स्वदेशी जलेबी से भी ज्यादा शुद्ध और स्वादिष्ट और यहाँ से चौथाई दामों में बेचने लगेंगे तो यहाँ के देशभक्त चोर और मुनाफाखोर व्यापारियों को नागवार गुज़रेगी।

एक गंदी गली का कुत्ता गुल्लू जलेबी का जिक्र सुनते-सुनते तंग आ गया था, लार टपकाता हुआ आगे बढ़ा, ’’देखिए मैं कोई मामूली कुत्ता नहीं हूँ…. फलाने फलाने महान नेता जी की होम लेन मे पैदा हुआ। हालांकि एक बार इलेक्ट होने के बाद उस लेन मे नेता जी कभी नहीं आए – लेकिन आज भी वहाँ का चप्पा-चप्पा नेताजी की याद में रोता हैं। खास तौर से टूटी नालियाँ जो कहीं से अब नाला बन गई है, और कूड़ा घर, जिसका विस्तार अब पूरे मोहल्ले मे हो गयाहै। वो जब अगले इलेक्शन के टाइम पर वोट मांगने आएंगें और लोग जब उनसे पूछेंगे कि अब तक कहाँ थे ?- – तो वो कह देंगे कि सुबह का भूला हुआ जब शाम को लौट कर घर आता है तो भूला हुआ नहीं कहलाता। आप नेता लोग इतनी देर से जलेबी – जलेबी की रट लगाए हो – – कहीं आप लोग भी हमारे गली के – – – – ।’’

कालू उस पर झपटा, ’अरे गुल्लुआ हम तुझे गली मोहल्ला का नेता दिखाई देता है का? अरे हम तो पूरे देश का नेता हैं।’

– अरे कालूआ अल्लम-गल्लम मत बोलिए हमारे नेता जी महान हैं। जिन्होंने इन्सान और अन्य प्राणियों में भेद-भाव ही खत्म कर दिया हैं। हमें तो उनका शुक्रगुजार होना चाहिए। जनाब वही कूड़ा में से हम खाना खाता हूँ और वही मे से भूखा इन्सान भी जो मिलता है ढूंढ के खा जाता हैं।

– ’ओह! अगर एैसा है तो नेता ही को साथ ले आए होते हम लोग भौंक-भौंक के उनका यशोगान करते,’ कालू तंजि़या लहजे़ बोला।

सभापति भी ने आग्रह किया कि, ’’आप लोग आपस की बहस छोड़कर मुद्दे की बात करें तो उचित होगा।’’

-आदरणीय सभापति जी मैं एक बहुत बड़े हलके के बहुत बड़े कुत्तों की फिरके की नुमाइन्दी करता हॅू। जहाँ इन्सानो ने अपने वोट बैंक के बड़े-बड़े खाते खोल रखे है। मैं कहता हूँ कि इंसानी पॉलिटिक्स की रवायात के मुताविक इस लोकल मुद्दे को इंटरनेशनल मुद्दा बनाना ही दुरूस्त होगा। मैं और मेरे फाॅलोअर जबसे इस देश मे पैदा हुए, यही ख्वाब देखते रहे है कि इस देश के लोगों को, जिस देश में हम पले बड़े हुए यहाँ के लोगों को पूरी दुनियां के कुत्ते काटे, नोचें और सबक सिखाए। बल्कि इन्हे पूरी तरह से नेस्तनाबूत कर दें। इनका बजूद ही खत्म हो जाए तो हमें रूहानी मसर्रत मिलेगी।“

काफी कुत्तों ने भौंक-भौंक कर इसका समर्थन किया। टॉमी  से न रहा गया गुस्से मे तरस खाते हुए बोले, ’’भौंको भौंको – और – – – और – -जाने क्या फिलास्फी है इन पागलों की – – – खैंर भौंकते रहो – – – -।’

भौंक-बहस में एक ने प्रतिक्रिया की, अरे ओ फिरंगी विलायती औलाद, बता तेरा भौंकने से क्या मतलब है?

टॉमी  गुस्से मे आग बबूला हो गया लेकिन कुछ क्षणों में खुद पे काबू पाते हुए गंभीरता से बोले ’जनाब मुझसे सफाई मंगने से बेहतर होगा कि आप इंसानी पॉलिटिश्यनों से पूछें कि भौंकनें का मतलब क्या होता है।’

जुली कुतिया ने अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से टॉमी  को देखा और फिर शरारती अंदाज़ से बोली, ’देखिए टॉमी  साहब, पॉलिटिश्यनों बड़े चालाक होते है वो उल्टा वार हम पर ही चला देंगे कि उन्होने भौंकना हम कुत्तों से ही सीखा है तब – – -?’

– ख़ैर ये हम सब के लिए फक्र की बात है। पर इंसानी जनता जनार्दन और नेताओं के भौंक – विश्वास का तो जबाब ही नहीं। – – – हाँ तो जूली डार्लिंग आप कह रही थी कि वो हम पर ही पलट बार कर देंगे, कि उन्होने भौंकना हमसे सीखा है तो हम भी पॉलिटिश्यनों से कह देंगे कि हमने नॉन इश्यूज को इश्यू बनाना हमने उनसे सीखा तो ?”- – टॉमी  ने प्रतिक्रिया की।

      कालू समेत बहुत से कुत्तों को टॉमी  की ये बात अच्छी नहीं लगी और भूं भौं शुरू हो गई। पूरा माहोल गर्माने लगा। और अब टॉमी  के एक वाक्य ने और आग लगा दी, ’’जानते है ऐसी सिच्युएशन में इन्सान क्या कहते ?  – – – कि आप सबने इस सभा को कुत्तों की तरह कुतखाने में बदल दिया है।’’ टॉमी  का ये कहना था कि विरोध के स्वर वातावरण मे गूंजने लगे।

’’टॉमी  अपनी भौंक वापिस ले वर्ना उसे और उसके समर्थको को देख लिया जाएगा और फिर जो खदेडा-खदेडी, नोट-खसोट और खून खराबा होगा उसके लिए सिर्फ टॉमी  ही जिम्मेदार होगा।’’ कालू चिखते हुए भौंका।

      टॉमी  कहाँ चूकने वाला था बोला, ’’- – मैं एक सिद्धान्तवादी हॅू, आप भले ही मुझे विदेशी कहो – – – वैसे यहाँ कौन स्वदेशी है?  – – – खानदान, जाति-वंश की शुद्धता का दावा भी किया जा सकता है, ये सोच कर मुझे हॅसी आती है। सिर्फ वर्तामान पीढ़ी के एक ही डी.एन.ए. टेस्ट मे पोल खुल जाएगी । इन्सानों के बीच रह कर ऐसा मैंने जान समझ लिया है।’’

      अब तो जैसे आग मे पेट्रोल पड़ गया, झपट-कटाई गाली-गलौच के साथ सभी कुत्ते एक दूसरे की पोल खोलने लगे। एक-दूसरे को खा चबा जाने तक की नौबत आ गई। सभापति बेबस नज़र आ रहे हैं। अंत में उन्होने कह ही दिया कि, ’’यदि यही माहौल रहा तो वो स्वयं वाक आउट कर जाएंगें।’’

यहाँ अब कुछ और ही नए मुद्दे खड़े हो रहे हैं और असली मुद्दे कही पीछे लापता हो चुके हैं। टॉमी  खड़ा सोच रहा है, ’’इन्हे कैसे समझाया जाए। ये तो झख़, दम्म और बेतुकी बातों को विचारधारा मानकर प्रतिष्ठा का प्रश्न एक-एक मिनट मे खड़ा कर देते है।’’

      माहौल पूरी तरह से बिगड़ चुका है तभी इस सभा की आयोजक शेरी हिम्मत करके आगे आई और दमदार लहज़े में अपील करने लगी, ’’ मेरे प्यारे आदरणीय कुत्तों-कुत्तियों आपसे गुज़ारिश है कि आप इन्सानी पार्लियामेन्ट की नकल यहाँ न दौहराए। आप मे से कुछ ने टी.वी. पर पार्लियामेन्ट की कार्रवाही ज़रूर देखी है। इसके अलावा भी आप पर अपनी अपनी गली महौल्ले का भी असर दीख पड़ता है, जहाँ विभिन्न धर्मों, साम्प्रदायों के लोग रहते है, अलग-अलग राजनीतिक पार्टी के लोग रहते है, मैं जानती हॅू कि उनके बीच रहना आप सबकी मज़बूरी है और आप पर उनका असर भी आ जाना स्वाभाविक है।’’

      सब धीरे-धीरे शांत हो गए तो शेरी बोली ’’- – – आप सब बैठ जाएँ…… धन्यावाद! मुझे मालूम है आपने तोतों की तरह बहुत सी बातें रट रखी हैं – – – – व्यवहार और सोच भी आप सब ने इन्सानों से ही ग्रहण किया है। बहरहाल इस सभा का आयोजन मैंने आप सबको अपनी नस्ल और ज़ात बताने के लिए नही किया था, खॅूखार बनके अपनी ताकत जताने और गाली-गलौच की महारत सिद्ध करने के लिए भी नही किया था। कौन कितना कटखन्ना हो सकता है और कौन किस पागलपन की सीमा तक जा सकता है, इन सबके आधार पर किसको कितने वोट मिल सकते है – मैंने ऐसी कोई इन्सानो की तरह संवैधानिक प्रतियोगिता भी आयोजित नही की  – – – हमारा मुद्दा क्या था और हम कहाँ पहॅुच गए – – – -।’’

      कालू की सांस सामान्य भी न हुई थी कि बीच में वो अपनी बुलन्द आवाज में बोला, ’’ मेडम, डेमोक्रेसी और फ्रीडम इसी को न कहा जाता है। फ्रीडम का ये उदारवादी रूप है, हम सब पॉलीटीशियन भारतीय पॉलिटिक्स के दायरा मे ही हैं हमको सिखाने की कोई जरूरत नहीं हैं।’’

      शेरी ने समझाते हुए कहा, ’’लेकिन देखिए मुद्दा क्या था और हम न जाने क्या-क्या मुद्दे भौक रहे है…………….’’

      कालू बात काट कर बीच में ही भड़क कर बोला, ’’देखिए, डेमाक्रेसी मे मुद्दा मे से मुद्दा पैदा होता है जैसे कुत्ता मे से कुत्ता पैदा होता है। हम कहता हॅू कॉमिनिटी इज सुप्रीम, वही की विचारधारा को सबको मानना होगा और जो नही मानेगा उसे गली महौल्ला देस से खदेड़ दिया जाएगा। बोलो टॉमी  टिफनिया पेड्रो बुल्ला हाय! हाय! हाय हाय!

– हाय-हाय, हाय-हाय- –

– बोलो – – – -।

      सम्हला हुआ माहौल फिर बिगड़ने लगा, लेकिन शेरी ने हिम्मत नही हारी, ’’सुनिए-सुनिए कालूजी आप जरा मुझे बोल लेने देंगे तो आपकी बहुत कृपा होगी।’’

      कालू ने तड़ाक से वाक़ प्रहार किया, ’’आप अपना भासण चालू रखें लेकिन दूसरे का भासण हजम करने का भी ताकत रखें……………. वाद-विवाद मे ही समाजवाद की शोभा है एैसा हम सुने है – – -।’’

      -लेकिन एक तरफ तो आप विश्व कुत्ता परिषद की एकता की बात करते है और दूसरी तरफ स्थानिय कुत्ते एक दूसरे को खा चबा जाने को तैयार है?

      -शेरी जी कौम टुकड़ा हो जाए और हम नेता लोग देखता रहे”-कालू बोला।

      टॉमी  ने अपना सर दीवार से मार दिया, ’’अरे कौन सी कॉमिनिटि और कहाँ उसका टुकड़ा हो गया…………….न जाने क्या-क्या बके जा रहे हो……………………..।’’

       -ऐ विदेशी की औलाद हम बक रहा हॅू ? अरे एैसा बोल, हम बक्तव्य दे रहा हॅू। जरा नेता – भाषा सीखो, पॉलिटिकल टरमनालाॅजी का प्रेक्टिस करके सभा मे आया करो। देश भक्ति जरा कुश्किल काम है भईया, हाँ। सभापति जी जरा कान खोल के सुना जाए…………… हम ये आखरी ऐलान देता हॅू कि जब तक टॉमी  पूरी सभा से माफी नही मांगता, सभा का कार्रवाही चलने नही दिया जाएगा ………………।

-अरे किस बात की माफी? न जाने क्या-क्या रटा-रटाया इन्सानी तोता रटन्त बोले चला जा रहा है। अरे हम सब अपनी समस्याएं डिस्कस करने आए हैं। बेवजह उसमे देशभक्ति, डेमोक्रेसी सेक्यूलिजम की ठूंस ठांस किए जा रहा है। जानते हो, जो लोग ये सब बाते करते है वो बेसिक एटिकेट भी नही जानते। लगता बहुत गहरा प्रभाव है इन पर यहाँ के इंसानो की मानसिकता का और उनकी रट विद्या का …………… और इन जनाब के तो ब्रेक फेल और हेन्डिल लूज ही नज़र आ रहे है मुझे।“

      -ये सरासर देशभक्त और देशभक्ति का अपमान है- – भाईयों और बिरादराने कुत्ते-कुत्तियों, टॉमी  और इसके समर्थकों को अब इस घोर अपमान की सजा दे ही दिया जाए- – -बोलो टॉमी  टिफनिया बुल्ला पेड्रो मुर्दाबाद ! मुर्दाबाद !!

– मुर्दाबाद ! मुर्दाबाद!!

– बोलो –

      शुक्र है इनके हाथ नही हैं और यहाँ माइक्रोफोन, फरनिचर और फाइलें भी नहीं है, वर्ना ये उनको हथियार बना डालते। टॉमी  और उसके समर्थक भागने के लिए रास्ता ढूंढ रहे है। भागादौड़ी मे संयोजक महोदया लहूलुहान हो चुकी हैं। इस घमासान युद्ध के बीच गर्भवती चम्पियां बच्चे देने की तैयारी मे है उसे कहीं जगह नहीं मिल रही है – बेबस होकर उसने मैदाने-जंग मे ही बच्चे जन दिए।

      कालू और उसके खेमे से युद्ध विराम की घोषणा की जा रही है। धीरे-धीरे सब शांत हो गया। कालू के समर्थकों मे कुछ फुसफुसाहट हो रही है – कालू को एकदम शांत देख कुत्तों ने उससे संजीदा होने का कारण पूछा, तो वो मुस्कराते हुए ऐलान करने लगे- ’’सभापति जी और विरोधी पक्ष सुन लिया जाए। ये पूरे विस्व कुत्ता-कॉमिनिटि के लिए खुसी(खुशी) का बात है, आज हम बारहवीं बार पिता बना हूँ – इन बच्चों का क्रांन्ति सभा मे जन्म हुआ है, इसलिए आप इन्हे अभी से अपना राष्ट्रीय नेता स्वीकार करें। मुझे विस्वास है कि ये सब आगे चलकर क्रांन्तिकारी बनेंगे मेरी तरह ही।

      नवजात पिल्लो की माँ चम्पिया उसके सामने आकर खड़ी हो गई और गुर्राई, ’’ज्यादा शेखी मत बघारो………… दस कुत्ते क्या तुम्हारी तरफ क्या आ गए कि तुम्हारा दिमाग ही खराब हो गया। वहीं इंसानो वाला दम्भ , खोखलापन………………सारे के सारे वही ढंग। सब उनकी ही नकल……………. तुम सब उनकी ही नकल पर उतर आए जो प्राणि मात्र के कल्याण के सिर्फ नारे लगाते, मानवतावादी और प्राणी मात्र के हितवादी होने का सिर्फ ढोंग करते है। जरा सोचो हमे इन्हीसे एक-एक टुकडें के लिए दुत्कार, जूते, ठोकर, पत्थर-डंडे की मार सहनी पड़ती है। दिन में सौ बार जरा जुत्ते, डंडे और पत्थर की मार ख़ाकर तो देखें ये अपने को इन्सान कहलाने वाले।…………………. जो हाल इस देश मे हमारा है वही यहाँ के कमजोर , गरीब और बेबस लोगों का है जिन्हे इंसान कहा तो जाता है लेकिन समझा नही जाता। हमारी तरह कुत्ता ही समझा जाता है…………. नही नही………… हम यहाँ नहीं रहेगे……………………मैं अपने बच्चों को इन इंसानो की बस्ती से दूर ले जाऊॅगी। जंगल मे नए सिरे से जीना सीखूंगी और अपने बच्चों को सिखाऊॅगी……………..कदम कदम पे दुत्कार, हिराकत और मार……………इस जि़न्दगी से तो वहाँ एकबार मर जाना बेहतर होगा…………….। 

      चम्पिया के साहस को देखकर सब दंग रह गए। कमजोर डरी सहमी सी चम्पिया मे अचानक ये चिंगारियां कहाँ से फूटने लगी! उसमे क्रान्ति का ये जज़्वा अचानक कैसे उम़ड़ पड़ा! लगता है शायद उसने कभी भी अपने को तिल-तिल मरने नहीं दिया, वह किसी तड़प को संजोती रही होगी इस बिन्दु पर पहुँचने तक।

(इस व्यंग का नाटय रूपांतर मुंबई की नाटय संस्था थियेटर लैब द्वारा मंचित किया जा चूका है तथा मराठी एवं अंग्रेजी में इसका अनुवाद प्रकाशित है)

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One thought on “कूकुर-क्रांति

  1. kukur kranti is not only a story but a mirror or a photo copy of our society, politics mentality and all other of human being in our country (fully developed in same sence on universe) and world

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