माँ


© Amar Sneh

त्रिवेणी तट लोगों से अटा पड़ा है। मानवी सैलाब थमने का नाम ही नहीं लेता। जहां तक दृष्टि जाती है छाजन, गुमटियाँ, तंबू, पंडाल, लहराते झंडे-झंडियां, धर्म पताकाएँ। हर तरफ धर्माचारी, भांग, चरस, सुलफे में लीन। कहीं भी पैर रखने तक की जगह नहीं। दानी-धर्मी, निरंकारी, सेठ-साहूकार, भिखारी, योगी, नागा, साधु-संन्यासी, गृहस्थ, फक्कड़, बाल-वृद्ध, नर-नारी की आवाजाही, रेलमपेल। स्नान-ध्यान, कीर्तन-आरती, हवन-यज्ञ, प्रवचन-भंडारे, घंटे-घडि़याल, झाँझ-मंजीरे, धौंसे-डफ-डमरू-ढोल, बिगुल-शंख-करतालों की ध्वनि, जयकार करता जनसमूह और नदी का कोलाहल। कुल मिलाकर इतना शोर कि अपनी भी आवाज सुनाई नहीं देती। ऐसे में एक बूढ़ी औरत भीड़ के बीच एक टीले पर खड़ी दूर तक पास से गुजरते एक-एक चेहरे को गौर से देखती है और निराश होकर पुकारना शुरू कर देती है। जब वह थक जाती है तो वहीं बैठ जाती है और फिर वही क्रम दोहराने लगती है। उसे देख कर लगता है- जैसे बाँस के बीहड़ जंगल में कोई पक्षी फंसकर चिख-चिल्ला रहा हो। मैं उसे काफी दूर से देखता आ रहा था। एक क्षण रुका तो भीड़ का ऐसा रेला आया कि मैंने कुछ देर बाद खुद को एक घाट पर पाया।

Maa Amar Sneh  करीब दो घंटे बाद जब मैं फिर उधर लौटा तो उस बूढ़ी को उसी तरह पुकारते देखा। वह बहुत थकी हुई लग रही थी। कभी-कभी वह रो भी पड़ती थी। मैं जैसे-तैसे भीड़ में से उस टीले तक पहुंचा। दो-तीन बार ‘मां’ के संबोधन के बाद वह जान छोड़कर मेरी तरफ लपकी और गिरते-गिरते बची। मैंने उसे संभाल लिया। उसने दोनों हाथों में मेरा चेहरा लेकर गौर से देखा, शायद उसे कम नजर आता था, ‘बेटा हम पहिचाना नहीं…कौन है तू?’

   उसने प्यार की जिस शिद्दत से दोनों हाथों में मेरा चेहरा लिया हुआ था उससे लगा कि वह मेरी ही मां है, ‘’ माँ मुझे अपना ही बेटा समझ……. क्या कोई खो गया है? ’’

– हाँ, हाँ कल सुबह मेरा बेटा और बहू मुझे यहां बिठाकर मंदिर गये थे। उन्होंने मुझसे कहा, ‘अम्मां तू इन्हाँ बैठ। काहे कि भीड़-भड़क्का है, हम लोग मंदिर दरसन करके आते हैं…… फिर वो लोग दुबारा आये ही नहीं।

– खैर माँ वो मिल जाएंगे। -मैंने तसल्ली देते हुए उसे अपनी बोतल से पानी दिया तो उसने कुछ घूंट पानी पिया। थर्मस से चाय देने लगा तो संकोच करने लगी लेकिन मेरे आग्रह पर उसने चाय ले ली और मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए ढ़ेरों आशीर्वाद दिये। कुछ देर रुक कर सिसकने लगी। इसी बीच किसी संत- महात्मा की सवारी आ गई। बड़ी मुश्किल से मैं उस बूढ़ी माँ को भीड़ से बचाते-बचाते दूसरी तरफ निकाल लाया और एक मंदिर के पास बिठाया। सर्दी ज्यादा थी। मैंने बैग से शाल निकालकर उसे उढ़ाया तो वह बिलखकर रो पड़ी। संयत होते हुए शाल उतारकर वापिस देने लगी, ‘‘ न बेटा तोहके सर्दी पकड़ लेई….. माँ तो सब सह जात है…… सुखा में ओके सुलाया, गीला में खुद सोई, का-का नही किया उसकी खातिर……।’’ 

मैंने उसे तसल्ली दी, ‘‘ तू चिंता न कर माँ। मैं कैसे भी उन्हें ढूंढ़ निकालूंगा। हाँ, क्या नाम है बेटे का?’’

– सरबन कुमार (श्रवण कुमार)। हम जानित हैं बेटा, ऊ ना मिलीं फिर भी  माँ के ममता हार जात है आँख ढूंढे लागत है, मन नहीं मानत। मन के झुठला के ममता पुकारे लागत है। हाँ बेटा ओ लोग माँ के छोड़ के चले गये।…… कल बहू गंगा नहाए ले गई रही, खुद सांखल पकड़ के हमका आगे ढकेले लागी तभी एक लड़का हाथ पकड़ लिहिस और हमका सम्हाल के बाहर ले आया……. हमार सरबन पहिले ऐसा नहीं रहा। उनीवस्टी (यूनिवर्सिटी) मा पढ़ता रहा, जब्बै कभी गांव आता तो हमारी गोद में सर रखके कहता, ‘‘ माँ भगवान अगर कहे कि तोहके पूरी दुनिया के दौलत देबे तू माँ के छोड़ दें तो हम भगवान से कहबे कि का तू हमका मूरख समझे है? माँ के गोद में सुरग (स्वर्ग) बसता है, माँ की ममता के आगे पूरी दुनिया की दौलत मिट्टी है’ और आज…… हमका छोड़ के चला गया। बेटा यहाँ आये से चार-पाँच रोज पहले आधी रात के हमरे सोते में बहूरानी सरकारी स्टाम कागज (स्टेंप पेपर) में आहिस्ता से हमारे अंगूठा में स्याही लगाके, कागद पे अंगूठा लगा लिया-जब हम जागी तो भाग के बाहर निकल गई, हम अपनी आँख से देखा सरबन बाहर खिड़की के पास खड़ा रहाय और फिर दोनों जल्दी से अपना कमरा में चले गये। तोहरे बाबूजी को चार महीना हुआ सुवर्गवासी हुए। बीमार रहे…… ऐ लोग हम दोनों के गांव से लाके शहर के बंगला के एक कमरा में डाल दिये हम दोनों परानी के।

हम जब भी कहें, ‘‘ बाबूजी के अस्पताल ले चलो, तो बहूरानी कहती कि का अस्पताल ले जाए से ओ जवान हुई जइहें। बुढ़ापा में तो बिमारी-ठिमारी लगी ही रहती है औऊर फिन (फिर) रोज-रोज अस्पताल के चक्कर काटे का टाइम कहाँ हैं? ई सब देख-सुन के बाबूजी हमसे कहे कि बड़की जाए दे, हम समझ लिया कि इनके इच्छा का बा? बिना डाकटर-दवा के बाबूजी चले गये……. बेटा, दो सौ बीघा जमीन रहाय। बाबू जी                       पचास बीघा बेच के सहर मा इनकी खातिर बंगला बनवा के दिये, मोटरगाड़ी ले के दिये। इतना जमीन जायदाद…..छह दुकान, एक आम के बाग छोड़ के चले गये बाबू जी…… अरे सब इन्हीं का तो रहा, माँ का छाती पर ले जाती? माँ की ऐके साध रहती है कि बेटा सामने हो जब प्राण जाए।’’

उसकी कहानी सुन के मैं पूरी तरह से अंदर से हिल गया था। मैंने उसका पता जानना चाहा तो वह शून्य दृष्टि से आसमान निहारने लगी फिर आहिस्ता से बोली ,‘‘ हमरा पता? बेटा अब यही है। यहीं बाकी जिंदगी लेकिन जी के का करब? के के (किसके लिए) खातिर जियब ? ’’

    मैंने संयत होते हुए बूढ़ी माँ से कहा, ‘‘ माँ उन्होंने यह अच्छा नहीं किया। तू उन्हें क्षमा कर दे। चल, मैं समझूंगा कि मेरी माँ फिर से मुझे मिल गई है।’’ -वह काफी देर तक मौन रही फिर आंसू पल्लू में समेटकर मुझे गले से लगा लिया। अपना पल्लू मेरे सिर पर रखकर बोली, ‘‘ बेटा प्यार का बीजा (बीज) तुरंतै फर (फल) जात है। तू माँ के प्यार दिये तो हमरी छाती मा माँ के ममता के बिरबा उगके फर फूल गया। इ दुखिया के सारा दुख ऐके छन मा सुख बनाये दिये तू……जुग-जुग जियो बेटा। तू हमका, अपनी माँ के, बेटा के सारे सुख दे दिये।’’

मैंने उससे अपने साथ चलने के लिए कहा, लेकिन माँ ने मेरा अनुरोध स्वीकार नहीं किया शायद उसने वक्त की क्रूरता को सहने का संकल्प कर लिया था। मैंने बार-बार उसके घर का पता पूछा लेकिन वह गांव और शहर जानती ही नहीं थी अगर जानती भी होगी तो शायद वह बताना नहीं चाहती होगी क्योंकि बार-बार वह यही कहती कि अगर बेटे-बहू की खुशी इसी में है तो वो खुश रहें।

अब मेरे सामने यही एक विकल्प रह गया था। मैं उसे एक वृद्ध आश्रम में ले गया। उसे कुछ कपड़े और ज़रूरी सामान लाकर दे दिये और आश्रम वालों के पास कुछ धन भी जमा करा दिया। मैंने बार-बार उनसे प्रार्थना की कि वह माँ का पूरा खयाल रखें। मैं उससे विदा लेकर दो ही कदम चला होऊंगा कि उसने मुझे बेटा कहकर पुकारा और मेरे पास आकर बोली, ‘‘ तू माँ कहे है न, तो हमका चारों धाम का सुख मिल गया। चिंता न करना। हाँ, माँ के पास से खाली हाथ जाइका ?’’ -उसने आंचल को फाड़ के मुझे दे दिया,  ‘‘ बस बेटा यही पूंजी है हमारे लेखे। माँ जिन्दगी भर का सुख-दुख यही में समेटती रहती है-मां का आशीर्वाद हमेशा तेरे साथ है- जा फूलों फलो बेटा………। ’’

माँ का आँचल मेरे लिए एक ऐसी प्रेरणा बन गया कि मुझमें जीवन के दुखों को आत्मसात करने की क्षमता आ गई। जब भी कभी ऐसे क्षण आते मैं माँ के आँचल को आँखों से स्पर्श कर लेता और माथे से लगा लेता।

इस बीच मैं विदेश चला गया, एक वर्ष से अधिक समय बीत गया था। जब मैं लौटा तो मैंने आनन-फानन में इलाहबाद जाने का कार्यक्रम बना लिया। आते समय मैंने माँ के लिए बहुत सी चीजें खरीदीं। सर्दी के दिन थे कुछ गरम कपड़े भी ले लिए और सीधा संगम पहुँच गया – यहाँ तो सब-कुछ बदला हुआ मिला, वो जगह कहीं खो गई थी – ये वो जगह है ही नहीं……. मैं कहीं गलत जगह तो नहीं आ गया? कई दिनों तक मैंने जितने भी आश्रम और रैन-बसेरे थे सब छान डाले लेकिन मुझे बूढ़ी माँ का कहीं पता नहीं चल रहा था। रोज़ मैं माँ को ढूढ़ते-ढूढ़ते न जाने कितने निःसहाय और बेसहारा लोगों से मिल लेता और उनकी दास्तां सुनकर बोझिल मन लिए होटल वापिस आ जाता- इनमें कुछ लोग दूर-दूर की प्रांतों के थे जिनके सगे-संबधी उन्हें धोखे से यहाँ छोड़ गए थे। उनकी तो भाषा भी समझ नहीं आती थी लेकिन सबके पीछे जमीन-जायदाद हड़पने या फिर उन निःसहाय बूढ़ों की उनके नज़दीकी संबधियों द्धारा जिम्मेदारी न उठाने की कहानियाँ थी। इस में कुछ ऐसे भी थे जो अपनी औलादों के अपमान न सह सकें थे और हार कर घर छोड़ आए थे। आज होटल वाले ने मुझे एक आश्रम का पता दिया और सुबह जल्दी पहुँचने की हिदायत दी क्योंकि ज्यादातर वहाँ ठहरे लोग सुबह ही भीख माँगने या मजदूरी करने निकल जाते हैं। मैं सुबह ही वहाँ पहुँच गया। लोगों को माँ के बारे में बताया लेकिन वो नहीं मिली, हाँ इसी बीच कुछ लोगों की दर्दीली कहानियां सुनीं तो लगा कि धर्म का ढोल पीटनेवाला हमारा यह समाज कितना निदर्यी, क्रूर, संवेदनहीन, असभ्य और स्वार्थी है। एक बूढ़े ने अपनी छह संतानों को पाल-पोस, पढ़ा-लिखाकर बड़ा किया था। सभी बड़े-बड़े ओहदों पर पहुँच गये। बड़ा लड़का उनके ही घर में रहता था लेकिन उन्हें वहां रखने को तैयार नहीं था। वह उन्हें किसी बहाने दूसरे भाई के पास भेज देता और दूसरा, तीसरे के पास भेज देता। अतं में बड़े ने उन्हें पागल करार देकर पागलखाने में भर्ती करा दिया। वहां से भाग कर ये यहाँ आगए और छोटी-सी ट्रांसपोर्ट कम्पनी में मेनेजर हो गए। इसी दौरान उन्हे पॅरालेसिस अटेक पड़ा और अपाहिज हो गए। अब सड़क पर भीख मांगते है। इन्हीं के साथ एक और बूढ़ा है जो उठाने-बिठाने में इनकी मदत करता है। इस बूढ़े के लड़कों ने जायदाद हडंपने के लिए बुखार में इन्हें नींद की दवा का हैवी डोज दे दिया था और पैसा देकर डाकटर से इन्हें मृत घोषित करवा कर तुरंत शमशान ले गये। चिता पर रखते ही इनमें चेतना आ गई फिर इन्हीं के बेटों ने इन्हे भूत बना दिया। लोग इन्हे देखते तो पत्थर मारते । तंग आकर इन्होने यहाँ शरण ले ली। – इस देश में संपन्न और बड़ा बनने और बने रहने का ये शाश्वत फार्मूला है, कमजोर का शोषण, लूट-पाट, धोका, झूठ-फरेब, बेईमानी……..मैं पूरी तरह से दुःखी और निराश हो चुका था। सोचा लौट जाऊं। मैंने सोचा माँ शायद वापिस चली गई होगी या उसका बेटा उसे ले गया होगा। ज्योंहि मैं मैदान की तरफ मुड़ा तो पीछे से किसी ने आवाज दी। मुड़कर देखा तो एक भिखारिन पूछने लगी, ‘‘ बाबूजी आपकी माँ मिल गई?’’ मैने नकारत्मक भाव से उसे देखा तो वो सड़क पर पुनः अपने बच्चें के पास आकर बैठ गई- जिसको उसने एक गंदे कपड़े पे लिटाया हुआ था और भीख मांग रही थी। इससे मैं दो दिन पहले एक रैन बसेरे में मिला था। बेचारी के साथ गांव में ऊंची जात के कुछ लोगों ने बलात्कार किया था और जब उसने ये बात लोगों को बताई तो ऊँचे लोगों ने उसे रंडी करार देकर उसका काला मुंह करके गाँव में घुमाया था। दूसरे दिन उसके बड़े भाई ने नदी में कूदकर आत्महत्या कर ली थी, शायद अपमानित होकर जीने से उसके भाई ने मर जाना बेहतर समझा। अपमान और प्रताड़ना से बचने के लिए ये एक अजनबी के साथ बनारस आ गई तो एक आश्रम में साफ-सफाई का काम मिला लेकिन यहां भी ब्रह्यचारी मुस्टंडे इसके साथ वही सब करने लगे। एक दिन बड़े महाराज ने बदनामी के डर से उसे निकाल दिया। वह मुंह छिपाकर इलाहाबाद आ गई और अब भीख मांगकर संयासियों के बच्चे को पाल रही है। – मैं कुछ दूर चला और कुछ सोचकर वापस आ गया और मैंने जो कपड़े माँ के लिए खरीदे थे वह उस भिखारिन को दे दिये।

   काफी देर तक खाली मन लिये संगम पर घूमता रहा, सर्दी काफी बढ़ गई थी। मैं एक चाय की टपड़ी पर बैठकर जब सुस्ताने लगा तो किसी ने बच्चों की तरह मेरी आंखों को हथेलियों से बंद कर लिया। वह एक मेरे साथ टी.वी. पर अभिनय करने वाले पुराने मित्र थे। कुछ औपचारिक बातों के बाद बताने लगे कि वह एक डाक्यूमेंट्री बना रहे हैं। केमरा टीम उनके साथ ही थी। बड़ा इंट्रेस्टिंग सब्जेक्ट है। रियल लाइफ एक्टर्स – जिज्ञासा वश मैनें पूछा, ‘’ भाई ये क्या है ? ’’ तो उन्होंने फ्रेंचकट दाढ़ी को खुजलाते हुए कहा, ‘‘ हमारे देश में भीख मांगना एक पेशा है। भिखारी हम-तुम प्रोफेशनल से अच्छा अभिनय करते हैं। इन्हें सामने वाले की साइकलोजी का पूरा ज्ञान होता हैं और रो-रोकर, गिड़गिड़ाकर, गाकर ऐसी कलाकारी कर गुजरते हैं कि सामनेवाले को जेब से पैसा निकालना ही पड़ता है। दिया तो ठीक, नहीं तो आँख बचाकर जेब सफाई। दिन में घरों मे जाकर सब देख-परखं लेते हैं रात को चोरी। चलते-चलते भी हाथ सफाई कर जाते हैं-अभी आते-आते एक कवरेज की। सड़क पर बच्चे को लिटाकर वह भिखरिन रोने लगी, ‘’ बच्चे को दूध पिलाना है, भूखा है बाबूजी।’’ अचानक मेरी नजर एक पैकेट पर गई तो पूछा यह कहां से ले आई? तो वह बोली एक बाबूजी दे गये हैं।

-क्या नये-नये कपड़े थे उसमें?

-हमने पुलिस का नाम लिया तो एक सेकंड में रफूचक्कर हो गई साहब। इन समाज विरोधी तत्वों से समाज को जागरूक करने के लिए यह फिल्म बना रहा हूँ।’’

  मैंने सोचा यह तो वहीं बच्चों वाली भिखारिन है जिसके बारे में यह बता रहे हैं। मैंने बेचारी को नाहक ही नये कपड़े देकर मुश्किल में डाल दिया उसे। वह तो नये कपड़े पहनकर भीख भी नहीं मांग सकेगी लेकिन इन फिल्म वालों की सोच और समझ भी कितनी ओछी और बौनी हैं ? मेरे मित्र ने अपनी बात जारी रखी, ‘‘यहीं पास में एक अंधी है। सुबह से शाम तक उसका एकल अभिनय चलता रहता है। आज उसी की शूटिंग करने की योजना बनाकर आया हूँ। अच्छा हुआ तुम से मुलाकात हो गई, बड़े मौके पर मिले, कुछ शूटिंग की टिप्सें लूगां तुमसे।’’

हालांकि शूटिंग में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं थी लेकिन मित्र होने के नाते मैं चला गया।

हम जब पहुंचे तो अंधी का खेला चालू था। सोचा गया जब ये दूसरा आवर्तन करेगी तो शुरू से शूट कर लिया जायगा। इस बीच केमरे और रिफलेक्टर्स आदि का सही-सही स्थानों पे लगाने का काम जारी रहा। मैंने अंधी के क्रिया-कलापों पर गौर किया तो लगा कि जिसे यह लोग कलाकार समझ रहे हैं। वह मानसिक रूप से बीमार कोई ग़मज़दा हैं। इसके पूरे शरीर पर चोट लगी हूई हैं। खासतौर से सिर पर जो रंग-बिरंगी पट्टियां बंधी हुई हैं वह सिर पर गहरी चोट लगने के कारण बांधी होंगी, न कि अभिनय करने के लिए। जो भी कपड़ा कहीं से मिल गया होगा इसने एक के ऊपर एक बांध लिया होगा। इसने सर्दी से बचने के लिए ऐसा किया होगा न कि विशेष तौर से डिजाइन करके कोई कास्ट्यूम पहनी हुई है। यह खेल उसके स्वयं की जीवन यात्रा की त्रासदी नज़र आ रही है। जीवन संदभों को याद करते-करते इसके मानस में कोई रट कायम हो गई है वो बच्चे को कैसे पालती-पोसती है उनके मन में गहरी पैठ बनाए हुए हैं – इसके तथा कथित खेला में उसकी यादें शामिल हैं। -मैं पूरी तरह से उसके मन में उतर कर खोया हुआ था- कि अचानक वह भावावेश में भागी और पास के शिलाखंड से टकरा गई। मेरे मुंह से अनायास ही ‘‘ माँ ’’ निकल गया और मैंने भागकर उसे संभाल लिया। उस शिलाखंड को देखकर मेरे दिमाग में बिजली कौंधी, शायद यह वही टीला है जहां माँ से पहली बार मिला था। दर्द से आहत वह बुदबुदाई, ‘‘ सरबन बेटा तूने माँ को ढूंढ़ ही लिया।’’

‘‘ हाँ सरवन उसी के बेटे का नाम है ’‘ मुझे याद आया। लेकिन दुःखों को झेलते-झेलते माँ इतनी बदल जाएगी मुझे विश्वास नहीं हो रहा था। उसने मेरे चेहरे को दोनों हाथों से लेकर चूमा और मुझे छूकर बुदबुदाने लगी, ‘’बेटा मैं तुझे ढूंढते-ढूंढते अंधी हो गई…… तेरी माँ तेरे लिए ही जिंदा है। माँ का मन अंदर से हर क्षण बोलता रहा कि बेटा जरूर आई……।’’ वह कुछ देर शांत रही फिर उठी और गिरती-पड़ती पास में पड़ी गठरी उठा लाई। मैंने जो शाल दिया था उसी की उसने गठरी बनाई हुई थी। वह गठरी मुझे देते हुए बोली, ‘’ बेटा, माँ का सब तेरा है। भीख मांग-मांगकर जमा किया है…सब यही में हैं।‘’ यह कहते-कहते वह प्यार से गले लगाकर मेरा सिर सहलाने लगी और फिर मेरे कंधे पर सिर रख दिया जैसे किसी असीम सुख में वो खो गई हो। मैंने उसकी चोटों को सहलाया तो वह मेरे आंसू पोंछने लगी और मेरे कंधे पर सिर रखकर खामोश हो गई। मैंने कई बार उसे पुकारा-लेकिन माँ अपने बेटे से मिलकर चली गई थी। उसकी आँख में ठहरे आखरी बूंद पानी ने ढलते-ढलते कहा- इसके सिवा माँ के पास कुछ भी नहीं हैं।

(यह रचना कदिम्बिनी, मधुमती, आउट लुक, देनिक जागरण, नब भारत, नयी दुनिया आदि में प्रकाशित हो चुकी है)

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2 thoughts on “माँ

  1. कहानी पढ़ कर पहली प्रतिक्रिया यही है, ‘ कोई इतनी सहजता से इतना अच्‍छा गद्य कैसे लिख सकता होगा’। बाकी प्रतिक्रिया तब, जब इस संवेदना के स्‍तर पर इस योग्‍य हो जाऊंगा।

    • आपकी प्रतिक्रिया का सम्मान करते हुए. धन्यवाद.

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