पीठ पीछे


© अमर स्नेह

पीठ के पीछे की तमाम जिज्ञासाएँ इतनी अहम हो जाती हैं कि गर्दन को मुश्किल होने लगती है। अपनी नज़र में उनकी पीठ पीछे का भी जवाब नहीं। नितंबिनी का गुमान किसी अद्भुत सौंदर्य के दर्शन करा रहा हैं – मतिमुग्ध नज़ारा अल्लाह! अल्लाह!!

 Behind your back1     पहले अपनी पीठ पीछे खुद से नज़र बचा कर, पर्दे मे ऐसा कुछ कर डालते थे या कुछ हो जाता था, तो हमें अफसोस होता था-आत्मग्लानि होती थी – लेकि़न आज जनाब, खैर छोडिये।हम अपने विषय से कहीं भटक न जाए-इत्तेफाक है मैं स्टेशन पर अपना सामान लिए अपने काम्पार्टमेन्ट मे पहुँच पाने की जल्दी में हॅू और हमारे आगे एक नारी विशेष जिनके अर्धनितम्ब तक जीन्स किसी तरह मुश्किल से पहुँच पाई है, बाकी पूरी पीठ लिबास की मोहताज नज़र आ रही है।

उनके कूल्हो की मशक्कत एैसी की अल्लाह मियां को भी अपनी कारसाज़ी पे शर्मिंदगी का अहसास हो- हम सामान लादें या मुआयना करे! कुछ समझ मे नही आ रहा है। लीजिए जनाब बिन मागें ऊपर वाले ने हमारी मुराद सुनली, वो हमारे कम्पार्टमेन्ट में ही दाखिल हो गई – जनाब हम बधाई के पात्र है कि परवरदिगार ने हमारा डर डर के किया गया हमारा एस0 ओ0 एस0 कबूल फरमाया – उनकी रहमत का नज़ारा तो दखिए कि वो हमारे सामने वाली सीट पर हमारे रूबरू हैं – लेकिन उन पर नज़र पड़ते ही हम पर चार सौ चालिस वाट का झटका एैसा लगा कि होश फाक्ता हो गए। कुल मिलाकर उनके आगे और पीछे की उम्र मे बीस साल का फर्क था। हमने अपने मन में कहा कि अल्लाह मियाँ ने ये क्या मज़ाक कर दिया। हम ये सोच ही रहे थे कि हम और वो एक साथ ठहाका लगा कर हॅसे और मुस्करा दिए। एैसा लगा जैसे इस जुगल-बन्दी के लिए काफी रिहर्सल की थी दोनों ने। एक साहब भीड़ में अटके हुए थे और उनके पीछे एक और साहब बेचैनी से रास्ता तलाश रहे थे। उन्होनें आगे वाले व्यक्ति से कहा’’ अंकल – – – ओ अंकल रास्ता दो ना’’ अंकल ने बड़ी कुटिल मुद्रा मे गर्दन धुमाई और पीछे वाले को ऊपर से नीचे तक देखा और पूछा ’’मैं तुम्हे अंकल लगता हूँ?’’ पीछे वाले ने बड़ी बेतकल्लुफी से उत्तर दिया’’ जनाब आप इतना नाराज़ क्यों हो रहे हैं मैने तो आपको पीछे से देख कर अंकल कहा था। शायद आपने, आप को पीछे से नही देखा है जो आपके सर के पिछले हिस्से पर परमानेन्ट पूर्णमासी का चाँद खिला हुआ है उसे देखकर, किसी से भी पूछ लीजिए पीछे से आप अंकल ही लगते है। आगे वाले व्यक्ति ने खिसिया कर उन्हे हिदायत दी’’ किसी से भी अगर रिश्तेदारी करनी है तो सामने देखकर करना वर्ना इतना बड़ा धोखा खा जाओगे कि नानी याद आ जाएगी।’’ उनकी हिदायत पर फिर एक बार वो हंसी, मैं हॅसा और बात ख़तम ! माफ कीजिएगा यहाँ मैं बात सिर्फ पाठकों के लिए कर रहा हॅू । वैसे मन तो कुछ और कह रहा था कि कुछ एैसा बार-बार हो कि सामने वाली मुझे बीस की ही नजर आएँ।

पीठ पीछे की बात ही कुछ और है। मुझे लगता है पूरा संसार आमने-सामने की बजाय पीठ पीछे में ज्यादा रूचि लेता है कि एक अहम शख्सियत को भी एक नाचीज़ का तस्किरा कर स्कून हासिल होता है। जनाब सारे खेल, दावँ – पेंच प्रगति, तरक्की और परमानन्द की अनुभूति इसी में है। आज के इन्सान की कुल एनर्जी का नब्बे प्रतिशत सरमाया पीठ पीछे ही लग जाता है। बड़ी अहम उपलब्धियाँ होती है पीठ पीछे की – एक पुलिस दस्ता एक अज्ञात उपराधी के पीछे दौड़ रहा है, और वो हाथ नहीं आ रहा। आखीर में जब एनकाउन्टर हुआ तो पता चला कि ये वो नहीं है जिसकी तालाश में पुलिस पिछले एक वर्ष से थी। हाँ कभी-कभी इसका उल्टा भी हो जाता है और हमें अखबारों में पढने को मिलता है – एक फरार कैदी ने पीछा करती पुलिस का पीछे मुड़कर पुलिस के एक अफसर और जवानो को मार दिया। खैर पीछा करने वाले पुलिस कर्मी तो अब नही रहे, उनके पीछे (बाद) कुछ और पुलिस कर्मी अभी भी उस फरार कैदी के पीछे हैं।

जनाब ज़रा ग़ौर  फरमाए कि ये महिलाएं कितनी खुश क्यों नज़र आ रही हैं। इसलिए कि “सारी जनानियां आईयां परताप कौर न आई।“ कितनी खुशगवार घड़ी है ये, इन सबके लिए। कोई भी अवसर हो – किसी की बीमारी का या फिर मय्यत ही क्यों न हो – ऐसे खुशगवार मौके भगवान सबको दें जब कोई परताप कौर न आए ! – परताप कौर की पीठ पीछे उसकी शान में यहाँ क्या-क्या तफसीले बयाँ हो रही है, इस वक्त या तो ये तीन महिलाएँ जानती हैं या फिर ऊपरवाला। लेकिन इन सबके रूख़सत होते ही एैसा भी वक्त आएगा जब इन्होने किससे क्या कहा और जो नही भी कहा वो भी, पूरा का पूरा महोल्ला, पूरा शहर जान जाएगा, इस हिदायत के बावजूद भी,  ’’बहन ये मैं सिर्फ तुमसे ही कह रही हूँ और किसी से न कहना’’ और फिर वो वचन लेती है किसी दूसरे से कहते वक्त’’ आपसे कह तो दिया लेकिन मेरा नाम न लेना ये बात फलानी ने फलानी से कही थी।’’ – और फिर यूँ शुरू होता है पीठ पीछे का खेल। प्रकाशित और नुमाया होती है हर बात। व्यक्तिगत के मन्तव्यों और मन तरंग के अनुसार वही बात अपना रूप रंग, चाल-ढाल, विषय उन्वान बदलते-बदलते पहुँच जाती है कहाँ की कहाँ। थूक लगाने से थूक चाटने तक। जूते की नोक पे रखने से जूतों मे दाल बंटवाने तक । झन्डे़ गाड़ने से लेकर झाड़ू मारने तक। छिद्रांवेषण से छींटे माने तक। ईंट की लेनी पत्थर की देनी से लेकर ईंट से ईंट बजाने तक।  खून उबालने से खू़न लगाकर शहीदों मे शामिल होने तक। आपस में टोपी बदलने से लेकर केचुली बदलने तक। कान में फॅूकने से कान काटने तक और ज़बां शीरी से ज़हर उगलने तक। जिससे बुझती हूई लड़ाई भड़क जाती है। डंका बजाते लोग डंक मारने लगते हैं। गंगा नहा कर भी लोग गठरी मार देते है। – और फिर बतंगड़ बनी बात, शंटिंग करने लगती है, अल्लारक्खा के ज़नानख़ाने से सलामुद्दीन की मजार तक। परताप कौर की किचिन से मरियम आन्टी के अड्डे तक। आकाशानन्द के तैखाने से धरती पकड़ के स्काई क्रेपर तक। ई मेल से फीमेल और फीमेल से तूफानमेल तक।

ज़र्रे से आफताब और बात से बतंगड़ बन गई जब बात। फेक्ट फाइन्डिग कामेटी तीन साल तक खोदती रही पहाड़, और पूरा पहाड़ खोदने के बाद निकली चुहिया और वो भी हाथ न आई। सुना है किसी राजनेता की उसने टोपी कुतर डाली है। ये भी सुना है राजनेता ने उसे पाल लिया है और ये भी कोई बता रहा था ……………. कौन बता रहा था? ओह! साली यादाश्त भी एैन मौके पर घास चरने चली जाती है – खै़र कोई बता रहा था कि उस चुहियां को सी0बी0आई0 की फाइल कुतरने की ट्रेनिगं दी जा रही है। जनाब ये तो पीठ पीछे का, एक नमूना है।

अफवाहों मे भी पीठ पीछे अपनी पूरी जगह बनाए हुए है। सुना है कि एक अमुक धर्म के राज मिस्त्री ने मंदिर की चिनाई करते वक्त ठीक मूर्ति के नीचे गाय की हड्डी रख दी थी। अब सवाल ये हैं कि कौन भगवान का पैर उठा कर सही बात का पता लगाए। भगवान का मामला है! – ऊपरवाले से संबन्धित किसी भी मामले को तै करने के लिए जेहाद और जेहाद के लिए दंगा-फसाद। माफ़ कीजिएगा जनाब ये मैं नहीं कह रहा हूँ । दरअसल मेरी पीठ के पीछे दो इतिहासकार, पीठ किए बात कर रहे थे। और इतफाक है कि उस वक्त मेरे कान खुले हुए थे और मैनें सुन लिया – जनाब इन इतिहासकारो ने मेरी पीठ के पीछे की अच्छी जगह ढूंढी है। ये न जाने क्या-क्या बातें करते रहते है। मेरा बस चले तो इनपे सरकारी रूप से फतवा जारी करवा दूँ जिसकी अब थोड़ी ही कसर बाकीं है, उसके लिए पार्लियामेंट की मंजूरी जरुरी होगी। – मालूम है क्या कह रहे हैं ये फसाद करवाने वाले ? कि  वो सब जि़न्दा हैं – मरे सिर्फ वो ही जिन्हे इस फसाद से कुछ लेना देना ही नहीं था। – चलो यूँ सब्र कर लेते है, कहते है ऊपर वाले की मर्जी के बगैर परिंदा भी नही हिल सकता – उन बेचारों की आई थी इसी बहाने वो निजात पा गए।

जनाब अभी-अभी मैनें बाज़ार में सुना है कि मरने वालों की पीठ पीछे भी कुछ हो रहा है। उन बेगुनाह गरीब बेचारों को शहीद घोषित करने के लिए मजलिसें चल रही हैं, विचार-विमर्श हो रहे है। – अब लोग आमने-सामने रहते हुए भी पीठ पीछे छुरा भोंकने की तैय्यारी मे जुट गए है। – कोई ये भी कह रहा था इसी सन्दर्भ में कि जल्दी ही वर्तमान सरकार को हटाने के लिए काला-पीला दिवस मनाने की घोषणा की जाएगी, जिसके लिए वर्ष का हर रोज़ लाल-लाल किया जाएगा जब तक सरकार हट नहीं जाती। इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए पड़ोसी मुल्क से रंगबिरंगी मदद भी आना शुरू हो गई । – ये जो कुछ भी हो चुका है या हो रहा है, मैं समझता हूँ कि इसमें पीठ पीछे का ही हाथ होगा।

नन्दनी खाली हाथ वापिस लौटी नरेन्द्र को कुछ सूझ नही रहा कि क्या करें ? यूनियन का सक्रिय कार्य-कर्ता होने की वजह से दूसरी पार्टी की सरकार बनते ही कई लोगों के साथ नरेन्द्र को भी झुठे-सच्चे इलज़ाम लगा कर सस्पेन्ड कर दिया गया था। इस बात को छः माह बीत चुके हैं – किराए का मकान छोड़ने की नौबत आ चुकी है। लेकिन लोगों ने नरेन्द्र के ससुराल वालों को कुछ और ही बातो से कान भर रखे है। कोई कहता है नरेन्द्र को चोरी  के इल्जा़म में निकाल दिया है। कोई कहता है नौकरी पर जाता ही कहाँ था, सारा दिन तो जुआ खेलता था। जितने मुहॅ उतनी बातें। कुछ लोग ये भी कहते हैं कि दमाद की करतूतों से नन्दनी के माँ-बाप मुहॅ दिखाने काबिल नहीं रहे। ये मुंह छिपाने बाली बात क्या है, नन्दनी के माँ-बाप को भी मालूम नहीं है। लेकिन एैसी बाते सून सूनकर अब तो उन्होने लोगों से बेबात मुहॅ छिपाना शुरू भी कर दिया है।

नन्दनी के लौटते ही पड़ोसन ने संवेदना जताई ’’हजारों ससुराल सूने पड़ें है सिर्फ इस वजह से कि उन्हे कोई घर जंवाई नहीं मिला और यहाँ मद्द करने से कतराते हैं तेरे माँ-बाप।’’ नरेन्द्र से भी लोगों ने कहा, ’’आदमी की कद्र तब तक ही होती है जब तक उसके पास पैसा हो। ऐसे रिश्तेदारों को गोली मारो जो वक्त पे काम न आएँ।’’ – यही सहानुभूति जताने वाले, नरेन्द्र के ससुराल में भी आग लगा आए, कि नन्दनी और उसके बाल-बच्चे तो अब भीख मांगने वाले है। इतनी सुशील लड़की, इतने अच्छे घर की होते हुए क्या-क्या सजा भुगत रही है बेचारी। कैसी थी और क्या हो गई।’’ नरेन्द्र को इन साहब ने जुआड़ी-शराबी-उच्चका तक कह डाला। यहाँ तक ये महाश्य कह आए कि नरेन्द्र और उसके परिवार को महौल्ले से निकाला जाने वाला है घर की बात तो छोड़ो।

लोगों ने नरेन्द्र और उसके ससुराल में जंग छिड़वा कर ही दम लिया। लोग बुराइयां करके उकसा कर, गलत फहमियां पैदा करके आत्मीयता और रिश्तेदारी का फर्ज़ अदा कर रहे है। और अब वो दिन दूर नहीं जब नन्दनी या नरेन्द्र आत्म-हत्या कर लें। — लीजिए समाजकल्याणी हवन शुरू हो गया है। चारो ओर से निंदा-मंत्रो के साथ ग़लतफहमी के हवनकुन्ड में आहुति डाली जा रही है – नरेन्द्र के ससुराल वालों ने अपने दमाद को दहेज माँगने और उनकी लड़की को जिन्दा जलाने की साजि़श में गिरफ्तार करवा दिया है, और नन्दनी आज कल अपने बाल-बच्चों के साथ अपने माता-पिता के घर पे है। क्या कोई जान सकता है कि असल बात, पीठ पीछे चलते-चलते यहाँ तक पहुंची है। काश कि लोग पीठ पीछे मुड़ कर देख पाते कि उनकी पीठ पीछे क्या हो रहा था।

परिवारिक जीवन हो या निजी जीवन। व्यवसाय हो या सरकारी काम काज तरक्की का सवाल हो या तबादले का। काई भी क्षेत्र हो। आप खुशहाल हों या दुखी। आप कहीं भी हों। अगर आप सजग नही हैं, तो पीठ-पीछे अपना वो काम कर दिखाता है, कि लाइलाज़ हो जाती है बातें, और कुछ ऐसा हो जाता है जो नही होना चाहिए था, या फिर लोग एक-दूसरे को धोखा देकर अपने अहम को पोषित करते हैं।

नीना शीबू का हाल-चाल पूछ रही है और शिकायत कर रही है कि उसने दो दिनों से फोन क्यों नही किया। शीबू बस प्रतिउत्तर में हाँ । हूँ ।। ही किए जा रहा है। नीना तड़प कर बोली, ’’क्या हो गया है तुम्हे! व्हट्स रोंग विद यू’’ तुरन्त उत्तर आया, “डोन्ट प्रिटेन्ड नीना यू नो एव्री थिंग’’

-व्हट डू यू मीन

-जाने दो। लीव इट………. बट इट्स टू मच।

-देखो तुम्हें कोई ग़लत फहमी हूई है।

-नो नो इट्स नॉट ग़लतफहमी – नीना नाउ आई नो माई वर्थ।

      जब दोनों में वार्ता चल रही है तो नीना अपने मन में षड़यंत्र बुन रही है, ’’कमीने तेरी औकाद तो मैं तुझे बताऊगीं, तूने इला से दोस्ती करने के लिए मुझे लो, मीन और अगली कहा था।’’ नीना ने अपनी तुरूप चाल चली,’’ बिलीव मी शीबू आई लव यू मोर देन एनी थिंग इन द वर्ड, तुम किसी की बात मत सुनना। लोग हमारे तुम्हारे रिलेशन से जलते है।’’

      शीबू ने तुरूप का जवाब, तुरूप से दिया। इस वक्त वो भी मन मे जाल बुन रहा है कि हरामज़ादी मैं तुझे मिट्टी मे मिलाके रहूगां। तूने मेरे वारे में कहा कि मैं एक आर्डिनरी फेमली का हॅू, शेलो हॅू, घटिया हॅू। उसने भी बनावटी अंदाज़ में अपनी मोहब्बत का इज़हार कर डाला, ’’आई स्वियर, नीना न जाने क्यों मेरे मुहॅ से एैसी बात निकल गई। आई डोन्ट मीन एनीथिंग रोंग, दरअसल यू आर माई ओनली ओनली चायस – नीना मैं तुम्हारे बिना जी नहीं सकूंगा, माई नूनू – मैं … मैं …. तुमसे दूरी बर्दाश्त नहीं कर सकता। तुम इसी वक्त वहाँ से चल चुको और गांधी र्पाक के लव ट्री के नीचे मिलो।’’

-हाँ मैं अभी इसी वक्त पहुँच रही हूँ। मैं तुम्हे सब कुछ बताउगीं, इला ने तुम्हारा नाम बिना दुम का कुत्ता रखा हैं। शीबू शी इज़ ए रियल बिच, शी इज़ प्लेईंग ए वेरी डर्टी रोल…… शीबू……शीबू तुम रो रहे हो! रूको मैं आती हॅू तुम भी जल्दी वहाँ पहुँचों। मैं……… आ …….रही हूँ ……….आ रही हूँ शीबू जस्ट टेक केयर आफ योर सेल्फ………………………।

      पीठ-पीछे के काउन्टर एनकाउन्टर से निर्मित हो रहा है स्तही, मिथ्या संबंधो का नेटवर्क। और अब पीठ पीछे के पीछे एक खेल का विस्तार हो रहा है। जो नीना से शुरू होकर नवरोज़, इला से शुरू होकर शीबू, नवरोज से अब इला, शीलू और शबरी और गोनसालविस तक पहॅूच कर बढता ही जा रहा है। और एक दिन पता चलता है कि इस नेटवर्क के एक अहम किरदार ने कॉलेज होस्टल में आत्महत्या कर ली है। माँ-बाप, प्रिन्सिपल, मेनेजमेन्ट पुलिस और समाज के लोग ढूंढ रहे है कि इसके पीछे किसका हाथ है, और मैं साफ-साफ देख पर रहा हॅू, कि पीठ-पीछे अपना ख़ून से रंगा हाथ अपनी पीठ पीछे छिपाए खड़ा है।

      जनाब सरकार बन गई। सरकार गिर गई। गिरते-गिरते टोपी झाड़के खड़़ी हो गई एक पैर पे खड़े-खड़े थक गई, दूसरा पैर टेकने के चक्कर मे धराशायी होकर मिट्टी चाटने लगी। धूल झाड़कर खड़े होते होते अपने ही लोग आँखों मे धूल झोंकने लगे। मुहॅ के सामने कुछ और पीठ पीछे कुछ। पीठ पीछे अपनी ही सरकार को गिरा कर दूसरी सरकार में मंत्रीपद पक्का। फितरती यस-सरों के सर पे ताज। हमारे सर पे ताज नही तो दूसरों का सर भी नहीं।

      आज सरकार चलाने का मतलब संख्या बनाए रखना। और संख्या बनाए रखने के लिए सारी देश भक्ति की शक्ति, सारी विद्या लग जाती है सिर्फ कोरम का पहाड़ा पढ़ने में। पीठ पीछे का काम सम्हालने वालों के पीठ पीछे भी उन वफादार लोगों को लगाना पड़ता है, जो पीठ पीछे कब सरकार गिरा देगें कुछ भरोसा नहीं।

      यूँ चलता है इस श्रेष्ठतम् प्रजातंत्र का राजनीतिक कारोबार, जिसमे पीठ-पीछे की भूमिका कम अहम नहीं हैं। काश इस प्रजातंत्र को कोई पीठ लगाने वाले मिल जाते।

      कहते है सबसे ज्यादा छल-कपट इंसान स्वयं अपने साथ ही करता है। मन अपनी ही नज़र से छिपा के अपनी ही पीठ पीछे न जाने क्या-क्या बुनने लगता है रचने लगता है। उस वक्त हमे लगता है कि मानवीय प्रकृति कितनी रहस्यात्मक और जटिल है। कितनी हास्य-स्पद और कृत्रिम बातें, कभी-कभी कितनी अहम हो जाती है।

      एक दिन हम एक मित्र के साथ उनके किसी मित्र के घर चले गए। इन्ही मित्र के साथ इनसे पहले भी एक-दो बार उनसे अलग-अलग अवसरों पर भेंट हो चुकी थी। यहाँ एक साफ-सुथरे इलाके में एक सामान्य सा घर है इनका। हम ड्राइंगरूम में बैठे थे – कुछ देर की बात – चीत के बाद वातावरण में चुप्पी छा गई। और हमे अटपटा सा लगने लगा। यूँही चुप्पी को तोड़ने की गरज़ से हमने दीवार पर लगे चित्रों का मुआयना करना शुरू कर दिया – एक चित्र में किसी बूढे़ व्यक्ति ने मुकुट धारण किया हुआ था। चित्र राम लीला या किसी नाटक का मालूम दे रहा था। हमने यूँ ही मेजबान जनाब से पूछा, ’ये किसका चित्र है।’ उन्होने एक दम सांस रोक गंभीर मुद्रा धारण कर ली, ’’किसका हो सकता है?…………..खै़र जाने दीजिए, हमारे परिवार के गौरमय इतिहास के ये एक ऐसे महापुरुष हैं जिनका जिक्र करूगां तो आपको यकींन नहीं आयेगा।………… ये हैं महाराजा सूर्य प्रताप सिंह। मेरे परदादा के दादा। बेगराज सिंह भूमि के अंतिम चिराग।

      हम उनकी इस कथा से सकते में आ गए। मुझे इनके घर लाने बाले मेरे मित्र भी कुछ आश्चर्य चकित नज़र आए। मेजबान साहब के हुलिए और घर-द्वार रख-रखाव में रजवाड़ो का कोई भी चिन्ह या संकेत नज़र नही आ रहा था। अपने गौरवमय इतिहास का बखान करते वक्त उनका मस्तक गर्व से जितना ऊॅचा था उतनी ही हमारी मुन्ड़ी नीचे गिरी हुई थी कि कहीं हमारे मन की शंका हमारे चेहरे से उन तक न पहुँच जाए। लेकिन उन्होने हम दोनों मित्रों के नत हुए मस्तक का भाव पढ़ ही लिया। – कुछ देर मौन रहने के बाद गौरव गाथा को आगे बढ़ाने से पूर्व अबकी उन्होने एक विशेष राजपूताना मुद्रा धारण कर ली। सोफे पर बैठते हुए शाही अंदाज मे दोनों हाथ सोफे की बाहों पर चौड़े होकर रख, फिर एक हाथ से मूछे मरोड़ते हुए बोले ’’बड़ी विचित्र गाथा है हमारे राजघराने की – महराजा सूर्य प्रताप सिंह मेरे परदादा के दादा आन और वचन के पक्के थे। एक बार खुश होकर उन्होनें अपने नाई को एक गांव बतौर तोहफा दे दिया। ये ख़बर बगल वाले राजा तक पहुंची – उन्होने अपनी शान दिखाने के लिए अपने नाई को दो गांव उपहार में दे दिए। फिर जब महाराजा सूर्य प्रताप सिंह को पता चला तो उन्होने तीन गांव अपने नाई को पुरूष्कार में प्रदान कर दिए। ये सिलसिला बढ़ता ही रहा और अंत में हमारे परमपूज्य महाराजा जी ने राज्य का अंतिम हिस्सा भी नाई को दे दिया। ऐसा करते ही पूरे राज्य में त्राही-त्राही मच गई – प्रजा और असामान्य लोगो ने महाराजा जी से राज्य वापिस लेने की  प्रार्थना की लेकिन महाराजा जी ने कहा, ’’मैने एक बार जो वचन दे दिया उससे विमुख नही हो सकता चाहे जो कुछ हो जाए।’’

      वो कहते-कहते कुछ ज्यादा ही गम्भीर हो गए और रूमाल से आँखे पोंछते किसी खास सुख का अनुभव करने लगे, ’हमे और सभी को उनकी बचन-वद्धता पर नाज़ रहेगा हम चाहे आज की स्थिति से भी, और नीचे धरातल में चले जाएँ। लेकिन अपने राजषी कोल का सम्मान करते रहेगें। यह गाथा मेरे पिता जी ने दोहराने के लिए मना किया था लेकिन ख़ास मित्र होने के नाते मैनें सुना दिया । ताकि आप भी स्वयं को मित्र होने के नाते अपने को गौरान्वित अनुभव कर सकें।

      मन मे बहुत से प्रश्न उठ खड़े हुए। लेकिन पहली बार इनके घर आए थें, धृष्टता न हो जाए इसलिए अपने ऊपर काबू किए रहे और राजषी गौरव को साझा रूप से महसूस करते और कराते हमने विदा ली।

      हमारे साझा मित्र उनके द्वार से निकलते ही शर्मिंदगी व्यक्त करने लगे। दरअसल उनसे भी इस राघराने की कुछ ही समय पूर्व मुलाक़ात हूई थी – उसका एक बड़ा दिचस्प किस्सा इन्होने बयान कर दिया।

      एक दिन वो एक सतसंग में गए। अचानक एक व्यक्ति ने उस सड़ी गर्मी मे चलते पंखे का स्विच आफ कर दिया। पंखा जब पूरी तरह से रूक गया तो देखा, उस पंखे की तीने पंखडि़यो पर पंखा दान करने वाले का पूरा नाम लिखा था कि ये पंखा अमुक व्यक्ति ने दान किया। काफी देर तक पंखा रूका रहा – मैं वही बैठा था मैनें उठ कर पंखा चला दिया और तुरन्त ही खिसक कर आप जनाब मेरे पास आ गए और अपना परिचय भी दे डाला। मैंने इनका मंतव्य समझ कर उनसे पूछ ही लिया ये पंखा आपने ही दान किया है न – ये मुस्कराए और बोले जनता का सेवक हूँ। यही हमारी इन जनाब से पहली मुलाक़ात थी।

      आप इस हादसे को कोई अजीबोग़रीब हादसा न समझें। अवसर आने पर हम सभी आँख बचा कर ऐसी हरकतें कर जाते है जो मानवीय फितरत के चलते ऐसे हादसों और घटनाओं को जन्म देते रहते है कि हैरत होने लगती है।

      अभी जब मैं पीठ पीछे लिख रहा हूँ मेरी नातिन जो मेरे दूसरे चश्में से खेल रही थी। अचानक उसके हाथ से चश्मा गिरने की आवाज़ आई लेकिन मैंने कोई प्रतिक्रिया नहीं की । चश्मा टूट तो गया ही था बेकार उसे शर्मिंदा होना पड़ेगा। सो मैं लिखने मे ही व्यस्त रहा। उसने चश्मा केस में रख दिया और वो चुप चाप दूसरे कमरे में चली गई। मेरा टूटा चश्मा मेरी पीठ के पीछे जब तक साबूत नज़र आएगा, जब तक मैं चश्मे का केस खोलता नहीं।

(यह रचना मराठी और  अंग्रेजी में प्रकाशित)

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