आधी फाँसी


 © अमर स्नेह

        मौके बेमौके लोग यह शुभ कार्य करते नज़र आ ही जाते हैं। मैं जब भी स्वदेश में यात्रा कर रहा होता हूं तो मुझे मेरी अगली सीट वाला यात्री थूकता ही मिलता है। इस वक्त भी मुम्बई की लोकल बस में वही कंटीन्यूटि बरकरार है।

        हम खिडकी वाली सीट पर ध्यान मग्न ठण्डी हवा का आनन्द ले रहे थे तभी भरपूर साऊंड इफेक्ट वाली पिचक-पिचक के साथ द्रव्य की फुहार हमारे तेजस्वी मुखमंडल पर ऐसी पड़ी कि मुंह सिकुड़ कर पुडि़या जैसा बंध गया। मन में तो आ रहा है कि अपना चेहरा धड़ से अलग कर के फैंक दूँ लेकिन जनाब मेरी मज़बूरी है कि मेरे पास सिर्फ एक ही चेहरा है। बहरहाल हमने रूमाल से अपना मुंह पोंछ कर बेक्टिरिया अपनी जेब में संगवा कर रख लिए हैं।

786-2        लगातार इन हादसों से हमारे पौने बारह बज चुके है – पर हमने खुद को संय्यत करते हुए हिम्मत की। क्योकि अगले की थुकयाई फुहार ने हमारे मुंह के अंदर लारवा निर्माण कर दिया है। बमुश्किल अभी हमने ‘ख़ाक’ किया ही था कि हमारी ख़ाक की बुनियाद पर अगली सीट वाले ने अपना ‘थू’ निर्माण कर लिया। बेबसी का घूंट पीते हुए हमारे मुंह से निकला ‘गुड केच’। अगले ने फिर स्वदेशी-रसपूर्ण-सांस्कृतिक-आचरण में अपने से अगली सीट वाले के साथ जुगलबन्दी की तो हमने महसूस किया, ‘गर दोज़ख़ बारूए ज़मी अस्तो हमी अस्तो हमी अस्तो’ (अगर पृथ्वी पे कहीं नर्क है तो यहीं है, यहीं है।)

        थूकने पर हमने उनकी असभ्यता को उजागर कर ऐतराज किया तो जनाब भड़क गए, ‘ऐ हमकू शिकाने का नई (सिखाने) – हमबी (हम भी) दस साल कोरट मधे (में) नौकरी केला हैं (किया है)- कायदा हम सब जानता है। बस मधे लिखेला है बस मधे थूकूं नका (बस में लिखा है बस में थूकना मना है) ऐई से हम खिड़की के बाहर में थूकां (थूका) क्या! ऐ एैसा ‘ख़ाक थू।’…….. हमको बताने वाला तुम कोन? तुम भी अपना स्टेट में जाके थूंको……मैं अपना स्टेट में थूंकेगा…… थू!-थू!!-थू!!! थू।

        थूकने के मामले में इन महाशय की कॅंजूसी मुझे अच्छी नही लगी। इस विशाल देश का नागरिक होने के बाबजूद इनका इस संदर्भ में प्रांतीयता की सीमा तक सिकुड़ना मुझे तो अजीब लग रहा है। लीजिए बाहर आते हमारे राष्ट्रीय विचार इनकी थू पिचक सुन कर हमारे अंदर भाग गए।……पर धीरे-धीरे विचार बाहर आए। मैं बोला, ‘मेरे लिए देश हर मामले में महत्वपूर्ण है।-संपूर्ण भारत मेरा है।’- व्यक्ति ने प्रतिक्रिया की ‘मैं तेरेकू थम्बावते का? तू कुठे पण जाऊन थूंक आणी तुझा राष्ट्रीय धर्म दाखव।’ (मैं तुझे क्या रोक रहा हूँ क्या? तू कहीं भी जाकर थूक और अपना राष्ट्रीय धर्म निभा) मैं भी बड़बडाया,‘मैं जबसे होश में आया तबसे देखता आ रहा हूँ यहाँ लोग जहाँ तहाँ थूकते ही रहते है न जाने इन्हें थूकने की क्या बीमारी है लोगों को ….. छिः कई लोग तो न  थूकने की लिखी चेतावनी पर ही थूक देते हैं।……न जाने इन्हें क्या बिमारी हैं’……

        वो सुनता रहा फिर एक दम उखड़ कर बोला, ‘ऐ साब बीमारी नको। ऐ हमारा मज़बूरी है सौक (शौक) से नही मज़बूरी मे थूकता है। हम गरीब माणस है आम-आदमी। थूकने शिवाय कुछ दूसरा करइछ (करही) नहीं सकता।’

 कुछ देर शांत रहा वो और फिर ऊॅंची आवाज़ में जैसे तड़प के बोला, ‘दर प्रंद्रह अगस्त (हर पंद्रह अगस्त) कू वो लालकिल्ला पे चढ़के भाषण ठोकता- जनता कू गरीब कू रोटी कपड़ा मकान मिलेगा। हर हाथ कू काम मिलेगा। हर आम आदमी की तरक्की होएगां। ग़रीब के बच्चा लोगों कू पढ़ाई लिखाई का इंतजाम होएगां। ग़रीब की हर समस्या को हल मिलेगां। – पूरा दो घंटे तक आम आदमी के लिए चिल्ला-चिल्ली करता। लेकिन लालकिल्ला से नीचू उतरके भूल जाता कि ओ (वो) लालकिल्ला पर चढ़ कर किया बोला था।-साब जी हम और कुछ नई कर सकता सिरफ थूंक सकता है- थूं। थूं।। थूं।।। खाक थू…….पैसठ डाव (बार) थूं…। ..आम आदमी को आज़ादी के बाद से इस श्रेष्ठ प्रजातंत्र में आधी फांसी पे लटका के रखेला हैं ये नेता लोगा। सरकार बोलो, मिनिस्ट्री बोलो सब बंदरबांट केन्द्र। थू… थू…..ठेका बोलो, लाईसेंस बोलो, योजना बोलो, परियोजना बोलो, अपने लोगों में बांटने का, देश को लूटने का। आम आदमी से वसूली और वोई को सूली।……..गरीब जनता का सारा पैसा निगल जाता है ये भाषणकर्ता देशभक्त लोग।……….कानूनी बात करता।-कानून बताके आम आदमी की झुग्गी-झोपड़ी-घर पे बोलडोजर (बुलडोजर) चला के बेघर करता और ओई कानून में जब बड़ा लोग नेता लोग का नम्बर आता तो साला नया कानून बनाने को बोलता। -ये बड़ा-बड़ा बात करने वाला-कानून का रखवाला अपने फायदे के लिए पार्लियामेन्ट में बिल लाकर कानून बदलने का- क्या एई (यही) श्रेष्ठ प्रजातंत्र है इस पृथ्वी पे?…….. तिजोरी ची किल्ली चोराचे हातात दिल्ली (तिजोरी की चाबी चोरों के हाथों में दे दी गई) थू! थू!!……..।’

मैं सोच रहा हूँ, ये ठीक ही तो कह रहा है। चोट्टी कुतिया और जलेबियों की रखवाली। यही रिश्ता है इस प्रजातंत्र और इसके रखवालों का और यूँ चलता है कारोबारे प्रजातंत्र।

        कुछ देर शांत रहने के बाद वो फिर बुदबुदाया, ‘काम धन्दा के वास्ते ग़रीब बेंक लोन मांगता तो बैंक सौ कानून बताता- गारन्टर शिवाय लोन नको (गारन्टर के बिना लोन नही) बैंक को ग़रीब पे विश्वासछ नई। लेकिन अरबोंपती खरबोपती उद्योगपती जब अरबों करोड़ो का लोन लेकर डकार जाता तब इनकू चलता। लूट-खरोट का पूरा छूट, पैसे वाले कू , सत्ता वाले को। और इस देश का बड़ा-बड़ा दार्शनिक बाबा, लेखक बोलता देश महान् है प्रजातंत्र श्रेष्ठ हैं। थू-थू- थू थू थू थू थू !!………..ऊपरवालों के लिए प्रजातंत्र और आम आदमी के वास्ते सजातंत्र। थू ख़ाक थू…….’ वो अविराम बोलता ही रहा,‘साब जी आम-आदमी को इदर में (इधर में) अपना मौत मरने का चांनसछ (चान्स) नहीं। मंहगाई, ग़रीबी, बेरोजगारी, गंदगी, बीमारी, भूख, दंगे-फसाद, बंद, स्ट्राइक, आतंकी हमले, मिलावटी खाद्य प्रदार्थ, नकली-दवा और एैसे प्रजातंत्र का सदमा। बस इसी से आम आदमी का मौत होता है इस प्रजातंत्र में इस देश में। आम आदमी का बली मांगता है ऐ प्रजातंत्र चलाने कू…….थू थू………। करोड़ो टन अनाज, फल, सब्जी सरकारी गोदामों में सड़ाके-सड़ाके समुद्र मधे फेकायचा कायकोकि दाम नीचू नई जाना मांगता। आम आदमी भूक और आभाव से मरेगा तो चलेगा। अर्थशास्त्र का कानून बताता बेईमान लोग। ग़रीब को ग़रीब और अमीर कू अमीर बनाने का षड़यंत्र-थू.. थू.. थू… खाक थू……. साबजी एक-एक बात याद आता, एक-एक थूकाय लागतात। (साब एक-एक बात जब याद आती हैं तो थूकना पड़ता है।)

       हम लोग एक नेता को ग़रीब का हमदर्द समज (समझ) एम.पी. बनाके दिल्ली भेजा। सुना है ओ अपनी टोपी पहिना पहिना (पहने-पहने) किसी दूसरा का टोपी में घुस गया, मंत्री बन गिया। जबसे ओ दूसरे पार्टी की टोपी में घुसा है बाहर निकलाइछ नई- हम सबको भूल गिया।-  थ-ू थू- थू- थू……..थू थू थू थू!’

       अबकी उसकी थू कुछ नरम पड़ गई। काफी देर तक वो शांत बैठा रहा फिर धीरे से बोला, ‘साब……. ऐ साब आप मेरा ऊपर थूंको।’ मै आश्चर्य से उसे देखने लगा, पूछा,‘क्यों भाई?’

       वो बोला, ‘हम सबी (सब ही) तो इनकू चुनके पार्लियामेंन्ट, विधानसभा में भेजता है। अपना समाज ही तो ऐसा लोग पैदा करता।  समाज ई (ही) तो एैसा लोग निर्माण करता………तुम मेरा ऊपर थूंको मैं तुमरा ऊपर थूकता है……… थूंको……..। रूको मैं गुटखा खाके, खाके थूक निर्माण करता है।

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