खल्वाटिया अभिव्यक्ति


पड़ोसी का और मेरा घर सटे हुए है, कमरों में आवाजों के माध्यम से अन्दर की गतिविधियों का आभास दोनों को होता रहता है। इधर कुछ दिनों से सुबह के समय रह – रह कर काफी देर तक कुछ ऐसे स्वर सुनाई देते है लगता है जैसे मेरे पड़ोसी महोदय को बार बार कोई सूई चुभा रहा है या कोई गर्म लोहा उनके शरीर के साथ लगा हटा रहा है। उनसे पूछने की हिम्मत मैं इसलिए नही कर सका कि जबभी मैं उन्हें आते जाते देखता तो वो एकदम ठीक लगते। सुबह वो आंगन में लगे बेसिन पर ब्रश करते हैं और पेपर लेकर अन्दर चले जाते है, इसके कुछ देर बाद ही कमरे से वो आवाजें शुरु हो जाती। कुछ दिनों बाद बड़ी मुश्किल से मैं ये पता लगाने में कामयाब हो गया की ये आवाजें क्यों होती है। -वो पेपर पढ़ते पढ़ते गुस्सें में आ जाते है और फिर अपने सर से एक बाल पकड़कर उखाड़ डालते है। करीब करीब दो घण्टे तक उनका ये दैनिक कार्यक्रम बिना नागा चलता है।

Khalvatiya Abhivyaktiएक दिन मैंने गौर से देखा कि उनके सर पे बाल काफी कम हो गए थे और फिर देखते देखते कुछ ही समय में वो गंजे हो गए। ये बात मैंने अपनी एक नजदीकी दोस्त से कही थी लेकिन दो ही दिनों में ये बात पूरे शहर में फैल गई। ऐसी स्थिति में मीडिया का आगमन स्वभाविक है लेकिन बिन बुलाये मेहमान की तरह। उनके घर में मीडियाई रौनक नजर आने लगी। एक चैनल ने तो बाकायदा उनका एक बड़ा इन्टरव्यू ही कर डाला। उनका पहला प्रश्न था:

-सुना है पहले आपकी खोपड़ी पर भरपूर जुल्फें थी।

-सही सुना है लगभग एक साल पहले। ये जो मेरा बाल-शून्य खल्वाट देख रहे है ये इस बात का लेखा जोखा है कि इस देश में पंचायत, नगरपालिकाओं, राज्य सरकारों, केन्द्रिय सरकार और गैर सरकारी संस्थाओं में स्कैम ,घपले, रिश्वत खोरी, चोरी, लूट की कितनी वारदातें होती है जिसके परिणाम स्वरूप आम आदमी तो सर धुनकर रह जाता है खीज, प्रतिक्रिया और आक्रोश में वो सिर्फ बेबस सा सर नोचता है। मैं ऐसे हर हादसे के लिए सिर्फ एक बाल को नोच कर बेबसी में अपना आक्रोश दर्ज करता हूँ। साल भर भी नही हुआ कि मेरे सर के सारे बाल खत्म हो गए। मेरे पास लोकल और राष्ट्रिय समाचार पत्रों से जो जानकारी मिल पाती है ये केवल उसी का लेखा जोखा है। यानी जो पकड़ में आ जाते है और जो नही आ पाते उनकी अगर गिनती करनी हो तो आप साहिबानों की खोपड़ी के बाल भी कम पड़ जायेंगे।

-इसका मतलब है हर जगह बेईमानी, भ्रष्टाचार बरपा है, यही न?

-कल अगर आप मुझसे पूछते तो सौ पच्चास बाल मेरे सर पर थे, मैं कह सकता था कि देश में कुछ सरकार चलाने वाले, पोलिटिशन, नौकरशाह, कर्मचारी, इमानदार हो सकते है किन्तु आज की तारीख में तो मेरी खोपड़ी कुछ और ही अभिव्यक्ति दे रही है। इस बात की कसम खाकर कहने के लिए मेरी खोपड़ी पर एक भी बाल नही है।

-क्या आप अन्ना जी की तरह इमानदारी के मामले में पूरी तरह से निराश है?

-अन्ना जी क्या पूरा देश ही निराश है पर अन्ना जी भ्रष्टाचार का निवारण चाहते है। जबकि घपला, बेईमानी, निजी स्वार्थो को पूरा करने की गुंजाईश रखने वाले इस पर अटकलिया दलीले देते रहते है,बजाय कोई सार्थक सुझाव देने के। पार्लियामेंट डेमोक्रेसी के खत्म हो जाने की बात करते है। जनाब प्रजातन्त्र केवल वहीं जीवित रह सकता है जहाँ लोग डिसिपलिन्ड सिविलाईजड कर्तव्यनिष्ट और कानून नियमों का पालन करने वाले हो। ये सरकार चलाने वाले, व्यवस्था चलाने वाले, बड़ी बड़ी कम्पनियां, धंधे चलाने वाले अगर कर्तव्यनिष्ट ईमानदार और सिविलाईजड हो जाये तो मैं इस खोपड़े पर बाल दोवारा उगें या न उगें मैं अपना गंजा सर उठाकर ही कह सकूंगा की मुझे भारतीय होने पर गर्व है।

-ठीक है देश में व्याप्त भ्रष्टाचार का, आपकी ये गंजी खोपड़ी लेखा-जोखा है।

-इसके अतिरिक्त अभिव्यक्ति भी है।

-वो कैसें?

-वो ऐसे कि दुनिया के सबसे गंदे शहर हमारे देश में ही भिनभिनाते है। गांव की तो बात ही छोड़ दीजिए। विश्व के सबसे ज्यादा गरीब, अनपढ़, बेरोजगार और बेबस लोग भारत में बसते है और वो मजबूरन वोट देकर इस लोकतंत्र को बचाये रखते है। भारतीय अर्थशास्त्रियों को दरकिनार करके अगर आप देखें और मेरी खोपड़ी को देखें तो यहाँ विकास की स्थिति साफ सफाचट है मेरी खोपड़ी की तरह।

-लेकिन सरकारों के ढोल तो कुछ और ही दावें करते है।

-मरे हुए चमड़े की आवाजों जैसे ही होंगे ये दावें लेकिन अगर आप मेरी खोपड़ी को ब्रह्मांड की जगह इंडिया मान लें तो ये बाल शून्य खोपड़ी शाईनिंग इंडिया प्रतीत होगी।

-आप बताईये कि भ्रष्टाचार की जड़ कहां है इसे आपकी खोपड़ी कैसे अभिव्यक्त करेगी।

-अगर आप बेईमान नीयत का जायजा लेना चाहते हैं तो ईमानदारी के मामले में मेरी खोपड़ी की तरह साफ सफाचट है, यानी ईमानदारी नाम की उस बला से अब हम मुक्त हैं जैसै बालों से मुक्त है ये खोपड़ी और अगर आप चेारी सीना जोरी का आकलन करना चाहे तो मेरी खोपड़ी पर पानी डालकर देख लें चिकने घडे की तरह इस पर एक बूंद भी पानी नही ठहरेगा।

-आम आदमी के हालात की अभिव्यक्ति करेंगे?

-जी बिलकुल। देश की नीतियाँ, विशेष तौर पर अर्थ सम्बन्धी जो केवल समृद्धों को मजबूत करने के लिए हैं बाकी देश की इकोनोमी सुधारते-सुधारते हालात ये हो गए हैं कि आम आदमी की महीने की कमाई एक ही दिन में साफ हो जाती है मेरी सफाचट खोपड़ी की तरह। वो आम आदमी अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए वैसे ही तरसता रहता है जैसे मैं अपनी खोपड़ी पर बालों के लिए।

-आपको अब अपनी खोपड़ी पर बालों की चिन्ता अधिक है या देश की?

-हम अपनी फिक्र का कुछ हिस्सा देश हित में अपने आचरण को सुधारने के लिए लगायें, बालों की फिक्र ज्यादा न करें, कुछ वक्त के बाद ये बाल रंग बदल देते है अगर होते हैं तो। हाँ हमारे यहाँ कुछ ऐसे भी लोग होंगे जो देश के बारे में सोचते-सोचते अपनी खोपड़ी के बालो से मेहरूम हुए होंगे, मेरी ऐसे महानुभावों से गुजारिश है कि वो नाखूनों को बढ़ने से बचायें।

-ये तो आप ने अपने देश के फिक्रमंदों के लिए हिदायत दी। उन लोगों के लिए आपका क्या कहना है जो बेफिक्र लूट, स्कैम, बेईमानी किये ही जा रहे हैं?

-उसके लिए तो आपका चैनल बार-बार चिल्ला-चिल्लाकर बिना सांस लिए भविष्यवाणी कर ही रहा है किसी बारह दिसम्बर को दुनिया खत्म हो जाएगी। तब प्रजातन्त्र के ऐसे तौर को झेलने से तो अपने आप निजात मिल जायेंगी।

-दुनिया खत्म होने से पहले, नयी सरकार आ चुकी है तो इसके विषय में आपकी खोपड़ी क्या कहती है?

-आपका प्रश्न बहुत गंम्भीर होते हुए भी दिलचस्प है, भारत का बहुमत वर्तमान सरकार को मिला है। सुना है अच्छे दिन आने वाले है। अगर कही गलती से अच्छे दिन आ गये तो मुझे पूरा विश्वास है कि मेरी इस गंजी खोपड़ी पर पुन: बाल लहलहाने लगेंगे।

-परम्पराओं के अनुसार छियासठ बर्षों में केवल अच्छे दिनों के आ जाने की बात सूचना भर ही साबित हुई है।

-अच्छे दिनों को आना ही होगा, ये बात सम्पूर्ण भारत वर्ष के लिए हो या ना हो लेकिन मेरे खल्वाटिया मुकाम पर बाल आने के लिए बहुत जरुरी है। मैं आशावादी हूँ, हालाँकि आम आदमी की आस कभी पूरी नहीं हुई। लेकिन सरकार से मेरी गुजारिश है की सिर्फ मेरी एक गंजी खोपड़ी के लिए ही अच्छे दिन उसे लाने ही होंगे। ये हमारे सिर का सवाल नहीं सर पे बालों का सवाल है।

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