दर्द बंटवारे का


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ये कैसी सियासत है, ये कैसी है मजबूरी ।
इस घर के मुक्कदर में दीवार थी जरुरी ।।

आँखे भी हमारी है, सपने भी हमारे है ।
फिर दरमियाँ दिलों के ये किस लिए हैं दूरी ।।

ये किसने तोड़ डाला रस्में चमन ऐ यारो ।
लगता है कि गुलशन की हर शाख है अधूरी ।।

बेपरवाह है हवाएं हदों से नावाकिफ ।
कह तो जाती होंगी नई पुरानी सारी ।।

जख्मी है कलम मेरा मजरूह उंगलियां है।
ऐ काश के हो सकती आशिक की गज़ल पूरी ।।

ये कैसी सियासत है, ये कैसी है मजबूरी ।
इस घर के मुक्कदर में दीवार थी जरुरी ।।

-अमर स्नेह

(मेरी यह गज़ल फिल्म “आशिक लखनवी” से ली गई है जो भारत और पाकिस्तान के बंटवारे के दर्द को नुमाया करती है)

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