खिसकते विराम


बाजार के नुक्कड़ पे नजर मिलते ही कदम सिंह ने सतबीर से पूछ लिया, “सुणा भई क्या हाल है तेरे……।’’ जवाब में त्योरियां चढ़ाते हुए उसने आग उगल दी’ ’’ अबे तेरे से हर बात में अच्छे है और बोल…..।’’ -इससे पहले कि वो कुछ कहता सतवीर ने एक जुमला और जड़ दिया।’’……….अबे तरी औकात क्या है जो हमसे पुच्छे (पूछे) कि कैसे हो….।’’ उसकी आन तान से विस्मित वो मौन उसे देखता रहा, एक क्षण संय्यत होकर वो उससे उसके उग्र होने की वजह पूछने की बात सोच ही रहा था कि उसके क्रोध ने उसके विवेक को धकिया कर किनारे कर दिया। उसके दिमाग में खुन उबल पडा, ‘‘अबे तू बता कि तेरी औकात क्या है….. कुते के बीज मैन्ने (मैने) तुझसे यही तो पूच्छा कि तेरे हाल क्या है कोई गोली तो तुझे न मार दी….।’’

       -अबे हराम के गोल्ली तो कल मै तेरे घर भर कू मार देता,

-क्या तू मेरे घर भर कू गोली मार देता ? अबे मारी क्यों न ! कही इसलिए तो अक्ल मन्दी न करली कि तुझे अगले की ताकत का ख्याल आ गया……अपने कुड़बे के निपट जाने का एहसास हो गया होगा…..।

       -तू कुछ ज्यादा बकवाद (बकवास) कर रया है।

-अबे तो क्या हम भेड़ बकरी हैं जो तू घर भर को गोली मार के चला जाता- हिदायत दे रया हूँ किसी के भुलावे में मत न रहियो वर्ना खडे़-खड़े जमीन में गाड़ दिया जावेगा समझा……।

Khisakate Viram1झगड़े का ओर छोर कहा है खुदा जाने लेकिन अकड़-फूँ मुंहजोरी की झपट कटाई से दोनो मे आग भड़क गई । आते-जाते लोग उनके इर्द-गिर्द जमा हाने लगे, दुकानदार, फड़ वाले दुकान छोड़ तमाशा देखने लगे। आग बबुले एक दुसरे को कच्चा चबा जाने के लिए पेंतरे बदलते हुए ललकार उठे, ‘‘बस अब न बचेगा तू कदम सिंह आवज दे ले तू अपनी लाश पे रोने वालों कू…..। वो दोनो लुहार की दुकान की ओर लपके एक ने कुल्हाडी और दुसरे ने लोहे की खंती उठा ली और एक दूसरे पर वार करने के लिए झपटे लेकिन लोहार और आसपास के लोगो ने हिम्मत करके उन्हे पकड़ लिया। उनकी पकड़-छूटाई, गाली-गालोच और चेलेन्जिया ललकार के बीच लोग उनसे मिन्नतें दरामद करते नजर आ रहे है। ‘‘अरे सतवीर पंडित जी गम खाओ ! -कदम सिंह जरा समझदारी से काम लो !!- लाओ इसे दे दो …….अरे छोड दें मेरे भाई नासमझी में अगर किसी के लग लगा गई तो पूरी उमर का रोणां हो जावेगाा !!!

बामुश्किल लोगो ने उन पर काबू पाया। लुहार की जान में जान आई। लोहार हांफता कांपता कुल्हाड़ी और खंती को दुकान के अंदर फेंक शटर गिराके दुकान के बाहर खडा हो गया, ‘‘अजी कुछ हो जाता तो मैं अंदर हो जाता, पुलिस तो नू केत्ती की हथियार बुद्धू लोहार ने सपलाई किए।’’

       बात अभी खत्म नही हूई थी कि मैं-मैं-तू-तू के बीच भीड़ से कुछ लोग अपना चौधराना हक अदा करने लगे और उनकी पूछा ताछी के बीच सड़क कचहरी में तब्दील हो गई-‘‘क्यों भई कदम सिंह क्या बात हो गई’’ एक लाला जी पूछने लगे।

       देख्खो जी मुझे तो मालुम न है इस सूरमा कू खबर होगी-मैने तो नू पुछी कि भाई क्या हाल है तो नू कहने लगा कि तेरी हैसियत क्या है जो हमसे हाल चाल पूछ रहा है।-नू कह रहा था कि ये कल मेरें घर भर कू गोली मार देत्ता कंईए।

       पूछा-गाछी के बीच भीड़ से निकल कर प्रधान ठाकुर जिले सिंह आने लगें तो लोगों ने दोनो योद्धायों के पास पहुंचने के लिए जगह बना दी, ’‘क्यों भई पन्डित सतवीर क्या बात हो गई?’’ प्रधान जी ने तफतीश करने के अंदाज में पूछा ।

-परधान आज इससे निपट लेने दें……..बस

-अरे कोई बात भी होगी पंडित जी जो निपटने-निपटवाने पे तुले पड़े हो-देख्खो जी बेजह तो कोई बात होती न……..।

       कुछ अन्य लोग जब यही बात दोहराने लगे तो सतबीर संय्यत होते हुए बोला, ’’बात तो बहुत बड़ी है और कहो तो कुछ भी न है।- कल इसके लड़के गुड्डू ने मेरे बालक सोनू कू खेलते-खेलते सड़क पे धक्का दे दिया-अजी सोच्चो जो म्हारा सोनू ट्रक, मोटर, ट्रेक्टर क निच्चे (नीचे) आ जाता तो? इनके बाप का क्या जात्ता, म्हारा तो घर का चिराग चला जात्ता। -अजी मेरी घर वाली शिकात (शिकायत) कू लेके इसकी घरवाली पे गई तो उस महारानी ने छूटते नू कह दिया, ’’अरे किसीकी आई हो तो उसे कोन रोक सके है। अजी अपने लड़के कू समझाने की बजाय उसने बार-बार येई बात दोहराई ओर ये कमरे मे बेठा सुन रया था……अब म्हारा इकलोता घर का चिराग मिट जाता तो……?

प्रधान जी विचारक की मुद्रा में सर खुजलाते सुनते रहे, अचानक उनके मुंह से निकल गया, ’’भई कदम सिंह की घर वाली ने बात तो सही कही……लेकिन ………….ऐसा है……।’’- सतबीर ने बात पूरी नहीं होने दी और उसका दिमाग फिर से घूम गया, ’’इसकी ने बात सही कही……? अरे प्रधान वाह, चोर का भाई ठाणेदार- अरे तरफदारी क्यो न करेगा जात का मामला जो ठहरा।’’

प्रधान जी और उनके साथ के लोगो की त्योरियां तन गई ,‘’अरे सतबीर तू कह क्या रया है कुछ शरम कर ।’’-सतवीर और खौल गया ,’’शरम तो इन प्रधान जी ने (को) आनी चईए (चाहिए) कोन सा कुकर्म छूटा है इससे । लौंडिए इसने भगाईं… लोगो की जमीने इसने हड़पीं, सड़को, खड़जों , पुलियों का पैसा इसने हड़पा और हमे सिका (सिखा) रया है कीवाने बात ठीक कही। ’’

प्रधान जी की तरफदारी करने के लिए ब्रहमपाल भीड़ के पीछे से सामने आकर बोला, ’’देख पंडित जी तू कुछ ज्यादा ही बोल रया है – ये हमारे प्रधान है इनका अपमान सहन न होवेगा समझा।’’

प्रधान जी ने भी संभलते हुए तीखी प्रतिक्रिया की,’’ कह लेन दे इसे – अरे मैने परधानी की, कोई घास नहीं चरी, अरे मुकदमे कर दे मेरे पे कोई रोक्के है क्या- खैर इसे नू पुच्छो (पूछो) इसका बाप धरमबीरा दूसरी घरवाली कू लेके न्यारा क्यों हो गया ? अजी इसकी करतूतों की वजह से -अरे मुझे क्या कहना है इसके चाल-चलन से तो दुनिया वाकिफ है – इसे तो चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए। ये मामला जब पंचायत तक आया तो इसकी गऊ मां ने मेरे गोड्डे पकड़ लिए, कहने लगी अजी प्रधानजी मामले कू खतम करवा दो वर्ना घर की रई सई इज्जत भी चली जावेगी (जाएगी) ।

सतबीर ने प्रधानजी पे हाथ उठाने की कोशिश की लेकिन लोंगो ने उसे रोक लिया- प्रधानजी भी क्रोध में विफर गए, ‘‘अरे तेने मुझपे हाथ उठाने की जुर्रत की- मुझे पुलिस बुलवाने की जरूरत न है आज तेरा फैसला तो यहीं हो जावेगा।

प्रधान ठाकुर जिले सिंह की घोषणा एैलाने-जंग में तब्दील हो गई। मोंबाइल, फोन गांव में खड़कने लगे। सड़क पर मैं-मैं तू-तू , बहस मुहासों ने अब उग्र रूप धारण कर लिया है। देखते ही देखते ठाकुर जिले सिंह और सतबीर शर्मा के हिमायती, रिश्तेदार और जान पहचान वालों के लड़ाकू दस्ते सड़के-समर पर पहुंच गए। लगता है जैसे ये लोग शक्ति परी़क्षण के लिए पहले से ही तैयार बैठे थे। इनके आने के बाद आस-पास के कुछ मुअजिंज लोंगो के हस्तक्क्षेप से अभी यु़द्ध पर विराम लगा हुआ है। बीच बचाव के प्रयासों के चलते फिर से गपड़चैंथ शुरू हो गई और सारी बातें फिर से दोहराई जाने लगीं।

प्रकाश मेसी भीड़ से साइकिल घसीटता, लोगों के जमघट के पास आकर रूक गया जहां इस वक्त कचहरी लगी हूई है। वो थका-हारा फैक्ट्री से डबल शिफ्ट करके लौट रहा था कि भीड़ में फंस गया। बेचैन मेसी ने मजबूरन खड़े-खड़े झगडे की सारी बातें सुन लीं थी – सहसा उदासीन भाव से वो अपने-आप से बोला,‘’ओफ! इस छोटी सी बात को घर पे ही सुलटा लेना चाहिए था सड़क पे जमघट लगाने की क्या जरूरत थी…..।‘‘ उसका कहना भर था कि पास खड़े सतबीर के एक हिमायती ने उसकी खबर ले ली, ’‘क्यों रे मजिस्ट्रेट की औलाद हमने तेरी राय मांगी क्या ?’’

इससे पहले कि वो कुछ जवाब देता, कुछ और लोग भी उससे पूछने लगे, ’‘अरे क्या बात है क्या तकलीफ है तुझे!’‘.- पहले वाला अती गंम्भीर होकर बताने लगा, ‘‘अजी ये हरामी नीचका कह रया है कि सड़क पे जमघट लगााने की क्या जरूरत थी, इतनी सी बात कू घर पे क्यों न सुलटा लिया।’‘

ये सुनते ही दोनो पार्टियों के लोग भिर्र-भिर्र करने लगे जैसे बर्रिइया के छत्ते को छेड़ दिया हो। ’’क्यों बे ? …अबे हम सब क्या तुझे बेवकूफ लग रहे है सारी अकलमंदी घरी रह जावेगी!!’’

बात चीत और बहस में व्यवधान उपस्थित होते देख सड़किया कचहरी से आवाज आई,’‘ अरे ये है कौन जो बेबात दखलंदाजी कर रया है। मेसी के पास खड़े एक ने पहचानते हुए सूचना दी,’‘ अजी परधान जी ये संतू मेसी का लौंडा प्रकाश मेसी है डकतो (डकैतों) के गांव का-अजी जे बोई (वही) है जिसके पूरे खानदान ने धर्म परिवर्तन करके म्हारे धर्म की ऐसी-तैसी करवादी!’’

अब तो प्रकाश मेसी ने भीड़ में ही साईकिल स्टेंन्ड पे लगा दी और अड़बड़ करने वालों के सामने आकर खड़ा हो गया,’‘ देखो जी आपने गाली भी दे ली और नीच भी कह दिया, मेरे गांव को डकैतों का गांव भी घोषित कर दिया, घर्म परिवर्तन निजी मामला है उसके लिए भी गुनहगार ठहरा दिया लेकिन अगर मैं कहूं कि डकेती और कतल के इल्जाम में सबसे ज्यादा केस आप लोंगो के गांव में चल रहे है, रेप और राहजनी में भी सबसे आगे आपके गांव है तो जनाब गलत तो नहीं हूँ- चाहो तो पुलिस के रिकार्ड देख लो।’’

भीड़ में से एक ने मेसी को नीच कमीना कहते हुए गिरेबान पगड़ कर खींच लिया। जवाब में मेसी ने भी गिरेबान छुड़ाते हुए उस पर भरपूर वार कर दिया, ‘‘मै नीच- कमीना कोख से, जान से, इतिहास से जब था आज नहीं हूँ आज मै इन्सान हूँ समझा-एक मारोगे तो मैं दो मारूंगा चाहे अंजाम जो भी हो……।’’

लगता है इस क्षण लोग अपने-अपने पक्ष की अड़ा-अड़ी भूल कर अब और कहीं केंद्रित हो रहे हैं। मेसी के इस बयान को लोगों ने चेलेन्ज समझ प्रतिक्रिया शुरू कर दी, भीड़ में जैसे आग भड़क गई, वो लोग अब अपनी रंजिश भूल कर, अपना क्रोध प्रकाश मेसी पर निकालने लगे, मेसी पर बगछुट प्रहार होने लगे,’‘ मारो सालो को जाने न पावे इसने हिन्दू धरम का अपमान किया है!’’…… ‘’इन सालों को दिन लग रहे है!!’’ जिन्दा फूंक दो हरामी के पिल्ले को !!!’….’अधर्मी साला कुजात…मारो धरम के दुसमन को!!!!

कुछ लोगों ने मेसी को बचाने का प्रयास किया-लेकिन वो लोग कुछ ही देर में भीड़ के क्रोध से खुद को बचाकर भीड़ से निकल गए। इस बीच कुछ लोग नारे भी लगाने लगे, ‘‘गर्व से कहो…….।’- मेसी मार खाता, खुद को बचाता और मारने वालों से मुकाबला भी करता रहा। अब लोगों ने उसे चारों तरफ से घेर लिया था जैसे शिकार को घेर लेतें है, लात, घूंसे, पत्थर से उस पर वार होने लगे-उसके नाक और मुहॅं से खून निकलने लगा, वो बेवस हो चुका था, लेकिन हिम्मत करके उसने साईकिल उठा ली और वार करने वालों पर फैंक मारी, दो-चार लोग उसकी चपेट में आ गए और जमीन पर जा गिरे। इसी बीच कुछ लोग जीप से लाठियाँ और लोहे की छड़े निकाल लाए और मेसी पर टूट पडे। वो उफ भी न कर पाता कि चार-छः लाठियाँ और छड़े उस पर पड़ जातीं, उसके नाक, मुहं, सर और आँखों से खून की धार बह निकली। मार खाते-खाते ही उसने हिम्मत करके एक बड़ा पत्थर उठाया लेकिन तभी किसी ने लाठी से प्रहार किया और वो जमीन पर बेजान सा गिर पड़ा।

   दुकाने बंद करके लोग जहाँ-तहाँ निकलने लगे। टेरेस और छज्जों के तमाशबीन घरों के अंदर चले गए। धर्म-रक्षक सूरमाओं में से कुछ लोग अपने-अपने जूते, चापल, मोबाइल ढुंढने और सहेजने में लगे हुए है ताकि कोई निशान न रह जावे। खून से लथपथ मेसी उठता और गिर कर फिर तड़पने लगता, मारने वाले जीप की तरफ भागते-भागते उसे देख कर रूक गए और मंत्रणा करने लगे, ’‘अरे ये तो जिंदा है …..लेकिन बचे ना, इसे तो जीप में डालो नदी में फैक दो ’’….’‘अवे अब टेम (टाइम) न है पुलिस आ गई तो ?’‘ …‘‘अरे पुलिस तो… वो कोई वी.आई.पी. आरया है उसके बंदोबस्त में लग रही है। मैं तो कह रया हूं अभी यहाँ कोई भी न है इसे साले को खत्म ही कर दो, बयान हो गए तो सब मुशिकल में आजवेंगे – खत्म कर दो, न रहवेगा बाँस न बजेगी बाँसरी।’’

वो लोग लौट कर आए और मेसी पर ड़ंड़ो और लाठियों से दरिंदों की तरह टूट पड़े। मेसी ने इस हाल में भी उनसे दया की भीख नहीं मांगाी, वह उनके सामने गिड़गिड़या नहीं बल्कि पास पड़ी क्षड़ को उठाने का प्रयास करने लगा। प्रहारियों ने उस तड़पते मेसी पर जम के प्रहार किए और जीप मे सवार हो भाग निकले।

मानवीय गरिमा के लिए लड़ता मेसी कितना अकेला था अब उसका साथ निभाने मौत ही उसके करीब है। – अचानक स्कूल से लौटते सोनू और गुड्डू(क्रमश सतबीर और कदम सिंह के सुपुत्र) एक दुसरे के गले में हाथ डाले उस रास्ते पे निकले तो मेसी को देख स्तब्ध रह गए, ’‘अरे देख-देख लगे है बेचारे का एक्सीडेन्ड हो गया’’……’’-मुझे तो डर लग रया है चल जल्दी….।‘‘ पहला बच्चा सहमे-सहमे ही कुछ सोचते हुए, ‘’जल्दी-जल्दी अपने बेग से पानी की बोतल निकाल उसे खोलने लगा, ’‘खूनम खून हो गया बेचारा… टी. वी. पे एक दिन दिखाया था चोट लगे तो उसकी मदत करनी चाहिए….पानी पिला दो तो आदमी जिन्दा हो जावे है……।‘‘ यह कहते वो मेसी के करीब आ गया – मेसी के मुहं से बुझे-बुझे कुछ स्वर निकले,‘‘रा रा जू’’

-न अंकल मेरा नाम गुड्डू है और इसका सोनू……अंकल बहुत खून जा रया है …. लो आप पानी पी लो अंकल आप ठीक हो जाओगे, हाँ लो……। – गुड्डू ने मुंह में पानी डाला ही था कि उसकी सांस टूट-टूट कर निकल गई। बच्चों ने कई आवाजे दी,’‘ अंकल-अंकल !’’-‘‘ लागे है बेहोश हो गए….चल सोनू जल्दी, याहां तो कोई नजर भी न आरया …..गांव में खबर कर दें – पिता जी गाडी में लिवा ले जावेंगे अस्पताल……..।’’ – बच्चो ने जाते-जाते एक आती हूई गाड़ी को रोकने का प्रयास किया लेकिन वो निकल गई।

       मेसी के जीवन का केमरा उसके प्राणों की रील रनआउट होते-होते, उसके नन्हे बेटे राजू का अंतिम चित्र उसके मस्तिष्क में अंकित कर गया था जिसको वो हर रोज इसी वक्त स्कूल से घर लाने के लिए पहुंचाता था, हाँ उसे अभी-अभी कुछ देर पहले उसकी तोतली अवाज भी सुनाई दी थी, ’‘पापा तब (कब) आओगे कितनी देल तो हो गई……। ‘’- वो अभी भी स्कुल के गेट पर पापा के आने का इंतजार कर रहा है ।

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