बरसे कम्बल भीगे पानी


Written By Amar Sneh

घसीटा राम ने सुन रखा था कि, ‘भगवान जब देता है तो छप्पर फाड़ के देता है।‘ इसी इंतजार और उम्मीद में उसने आधी से ज्यादा जि़न्दगी गुजार दी थी। अचानक उसे ख्याल आया कि भगवान देगा कहाँ से इसके लिए उसके पास छप्पर तो होना चाहिए ?

       अब तो, छप्पर के लिए बेचैन रहने लगा और इससे भी ज्यादा तो ये सोचकर परेशान हो जाता कि भगवान बेचारा भी उसके छप्पर के इंतजार में थक गया होगा। उससे न रहा गया। वो भगवान से क्षमा माँगने चल दिया। चैराहे पर आते ही वो सोचने लगा कि वो किस भगवान के पास जाए। यहाँ तो हर कदम पर-हर गली-कूँचे, सड़क, चौराहे , तिराहे, दो-राहे, यहाँ तक की बन्द गली में भी भगवानों के मन्दिर नज़र आ रहे हैं । और कहीं उसने कोई ग़लत दरवाज़ा खटखटा दिया तो क्या होगा ?

barase kambal bheege paani       बहुत सोचने के बाद उसे एक तरकीब सूझी कि वहीं से चारो दिशाओं में घूम कर कह दे, कि ’जो भी भगवान मेरे सर पर छप्पर होने की प्रतिक्षा कर रहे है घसीटा उनसे इस प्रतीक्षा के लिए क्षमा चाहता है।’ लेकिन इस बात से तो सारे के सारे भगवान कहीं ये तो नहीं समझ बैठेंगे कि घसीटा बुड़बक अपने को क्या समझता है वो क्या भगवानों की आबादी को साधारण भीड़ समझता है? -ये सोचकर तो अब वो और परेशान हो गया और सोचने लगा कि घसीटा भईया अब तो बिना गुरू के काम चलने वाला नहीं है।

       अचानक चौराहे पर खड़ा-खड़ा वो सोच ही रहा था कि  उसके ठीक सामने ही एक जटा-जूट साधू और शिष्यों की गाडि़यों का काफिला आकर रूका। ट्रेफिक जाम हो गया था कावडि़यों के जत्थे जय -जय बम भोले ! जय बम भोले !! करते वहाँ से गुजर रहे थे और घन्टे -दो-घन्टे के लिए सड़क बन्द हो गई थी।

घसीटा हिम्मत करके महाराज की गाड़ी के पास पहुँचा ही था कि महात्मा जी के अंगरक्षकों ने उसे धर दबोचा। पूरी तहकीकात की गई, उसकी तलाशी ली गई। घसीटा ने गुरू महाराज की शरण में आने की अपनी इच्छा जताई तो महाराज के सेक्रेट्री ने उसकी क्वालीफिकेशन दरयाफ्त की।

       ’अंगूठा टेक हो माई-बाप’, कहकर वो महाराज के चरणों में लेट गया। महाराज गदगद हो उठे, ’अति उत्तम हमें इसी क्वालीफिकेसन के भगत चाहिए। वैसे पढ़ा-लिखा-अनपढ़ भी हमें चलता है।’ घसीटा महाराज की कृपा से कृतार्थ हो गया।

आश्रम में घसीटा का नया नामकरण हुआ मल्टीपरपज पोपट दास। कई वर्ष बीत चुके हैं उसे बेपैसे मजदूरी-तपस्या करते। घास खोदना, गड्ढे खोदना, झण्डे लगाना, पण्डाल बाँधना, माल ढोना, बर्तन माँजना इसी तरह के बहुत से काम करने पड़ते हैं उसे। इसके साथ ही ज्ञान रट का आनन्द झेलना भी उसके लिए अनिवार्य है।

’उसने जो कूछ भोगा है वो उसके पूर्व जन्म के पापों का फल हैं। माया-मोह छोड़कर गुरू की शरण में आने से पूर्व, वर्तमान और भविष्य के सभी जन्मों के पाप क्षमा हो जाते हैं। ईश्वर को पाने का केवल एक रास्ता हैं गुरू शरणंम्। गुरू की शरण में आने से भक्त जन्मों के आवागमन से मुक्त हो जाता है। गुरू विष्णु है गुरू ही ब्रह्म और महेश सभी कुछ है…..। ’हर रोज सुबह -शाम यही प्रवचन ,यही भजन – संर्कीतन। उसे लग रहा है जैसे सदियों से यही अलाप सुन रहा है।

कभी-कभी अनपढ़ पोपट दास के मन में बवन्डर उठता कि जब गुरू ही सबकुछ है तो फिर भगवानों की जरूरत क्या है। जब जन्मों के बंधन से मुक्त हो गया तो फिर अगले जन्मों के पापों का सवाल ही कहाँ ? उसके दरिद्र और गरीब होने का कारण पूर्व जन्मों का पाप कहा जा रहा है। पर उनकी छत-जमीन और सभी कुछ तो उसके दादा से साहूकारों और समाज के बड़े लोगों ने हड़प लिया था। अकसर उसके मन में सवालों का जमघट लग जाता लेकिन वो कह नही पाता। गुरू के जाहोजलालऔर आश्रम की भव्यता, साधनों और लाखों भक्तों की श्रद्धा के सामने उसे अपने विचारों को अगड़म-बगड़म स्वाहा करना पडता।

       एक दिन पोपट दास आश्रम की फेक्ट्री में बोरियाँ ढोते -ढोते थक गया और ट्रक में ही बोरियों पर सो गया। नींद में आते ही वो स्वप्नलोक में विचरने लगा। उसे एक छप्पर दिखाई दिया और कुछ ही क्षणों में छप्पर से अचानक रुपया, हीरे, जवाहरात बरसने लगे। उसका पूरा परिवार हीरे जवाहरात की  बोरियाँ पर बोरियाँ  भरने लगा। बोरियाँ भरते-ढोते उसका परिवार थक कर चूर हो गया लेकिन माया बरसनी बंद नहीं हुई। अचानक स्वप्न के अंदर एक दूसरा स्वप्न शुरू हो गया। उसकी पत्नी पहले सेठानी बनी, फिर महारानी और उसके बाद सारा का सारा परिवार रजवाड़े में परिवर्तित हो गया। लेकिन ये सुख ज्यादा देर तक न रह सका, ट्रक के  ड्राइवर के हार्न बजाने से वो पुनः महाराजा से पोपट दास में परिवर्तित हो गया।

       वास्तविकता की जमीन पर आते ही वो अपनी पत्नी और बच्चो की याद में तड़पने लगा। बर्षों हो गए थे उसे अपने परिवार से बिछड़े हुए और बेपैसे की मजदूरी करते हुए।

ट्रक किसी दूसरे शहर में आश्रम का माल ले कर जा रहा था और माल की उतराई के लिए वो भी इस ट्रक के साथ है। रास्ते भर परिवार की याद में डूबा रहा और जैसे ही एक सिगनल पे ट्रक रूका वो बिना कुछ सोचे समझे उतर कर भागते-भागते कहीं दूर निकल गया।

       उसने कई दिनों की पद-यात्रा की और भूख-प्यास के कारण उसके पैरों ने जवाब दे दिया। वो थक कर एक घने बरगद के पेड़ के नीचे बैठ गया। उस पर बेहोशी तारी होने लगी और वो बेसुध हो लुढ़क गया। एक व्यक्ति की निगाह इस पर पड़ी और उसने साधू को मृत समझ कर तुरन्त ही  गर्म तवे पर रोटी सेंकने की योजना बना डाली । उसने पोपट के कंधे से भगवा चादर उतार उसे ओढ़ा दी और करीब बैठकर जोर – जोर से रूदन करने लगा, ’…..मेरे  गुरू ब्रह्मलीन हो गए है – अभी कुछ देर  पहले ही देव स्वरूप श्री-श्री एक सौ आठ ज्योर्तिधर महाराज ने मुझे अपने पास बैठा कर कहा, हे शिष्य श्रेष्ठ अब हम जाते है और अपनी इच्छा शक्ति से गुरू महाराज ने प्राण त्याग दिए।’

       ये बात करन्ट की तरह आस-पास के इलाके में फैल गई और भीड़ पर भीड़ महाराज के दर्शनों के लिए उमड़ पड़ी। शंख-घन्टे बजने लगे, पैसा चढ़ावा चढ़ने लगा। रूदनकर्ता ने कहानी के आधार को और मजबूत किया, ’ गुरू महाराज मुझे लेकर यात्रा को निकले थे। बीच में ही उन्होने रास्ता बदल दिया। बोले कोई अदृश्य-शक्ति उनका मार्ग-दर्शन करना चाहती है। ब्रह्मलीन हो गुरू महाराज ने कहा, ’बेटा यही है वो स्थान, जहाँ चारों धाम एक ही स्थान पर मिलते हैं। बस यही कहीं वो चार-जटाओं वाला वट-वृक्ष हमें ढूँढना होगा। जैसे ही मुड़ कर हमने देखा तो स्वयं को वहीं पाया इस चार जटाओं वाले वट वृक्ष के नीचे। मैने गुरू महाराज को पहले कभी इतना प्रसन्न नहीं देखा था। यही है वो चारों धाम कह कर उन्होंने योग-मुद्रा धारण कर ली। -कुछ देर के बाद शान्त-भाव से बोले, ’मानव कल्याण आश्रम स्थली की नींव में मैं अपने प्राण अर्पित कर रहा हूँ।’ मेरे हाथ में भूमि की मिट्टी दी और समाधि में स्थित हो परमात्मा में एकाकार हो गए।

       जब रूदन-कर्ता कहानी सुना रहे थे, उसी बीच किसी श्रद्धालु ने पोपट दास के मुँह में गंगाजल और बताशे से बनाया चरणामृत डाल दिया था और पोपट दास मूर्छा से चेतना की ओर बढ़ने लगे थे। आँखे बंद किए-किए ही उन्होने पूरी स्थिति का जायजा ले लिया था। रूदनकर्ता ढोंगी शिष्य की ताजी गढ़ी कहानी भी आँखे बन्द किए-किए ही उन्होंने पूरी सुन ली थी।………. कहानी के अंतिम बिन्दु पर उन्होने ’ऊँ’ का उच्चारण करके कहानी में चार-चाँद लगा दिए। वो चेतना में लौट आए। उनकी गम्भीर वाणी ने भक्तों पर जादू का प्रभाव दिखाया, ’मुझसे भयभीत न हों! स्वर्ग के द्वार पर पहुंचते ही परमपिता परमेश्वर उठ खड़े हुए और द्वार तक आए, कहने लगे मृत्यू लोक में कलियुग का अंत न हो जाए, पृथ्वी प्रलय में  परिवर्तित होने को आतुर है। प्रभु ने कहा मैं चाहता हूँ प्रलय से पृथ्वी को अलग करना है अतः हे भगत-श्रेष्ठ तुम्हे पुनः पृथ्वी पे जा कर अपनी तपस्या से उसे मनाना है ये कहते हुए उन्होंने मुझे पुनः सेवा के लिए पृथ्वी पर आपके बीच भेज दिया है – चारों धाम की महिमा वाले इस स्थान पर इक्कीस वर्षो तक तपस्या की आज्ञा स्वयं ईश्वर ने प्रदान की है, अब हम यह चोला ठीक इक्कीस वर्षो के बाद आज ही के दिन इसी समय छोड़ेंगे।’’

       देखते ही देखते सैकडों से हजारों और फिर लाखों भक्तों में परमधाम-रिटर्न-गुरू महाराज के दर्शनों की होड़ लग गई। दर्शनो की होड़ में दो लोग स्वर्गवासी हो गए और पचास घायल!  लेकिन आशीष पाने के लिए अभी भी लोग जान-छोड़ प्रयत्न कर रहे हैं। गुरू महिमा का कीर्तन, अखण्ड़ आराधना और दान -धर्म का सिलसिला शुरू हो गया। गरीब-अमीर, सेठ-साहूकार, अफसर-नेता, बड़े से बड़ा लिखा पढ़ा, अब अंगूठा टेक देव स्वरूप महाराज के सामने टेक रहा है सर, और ले रहा है आशीष। चारों धाम की जमीन का मालिक चारों खानें चित्त हो चुका है। जमीन मालिक जो कभी मजदूरो को मजदूरी दे कर राजी न हुए । तेल के धन्धे में अस्सी प्रतिशत मिलावट करके महा सेठ बने मटरू लाल, आज नाम कमाने और धर्म लाभ कमाने के लिए अपनी इक्कीस बीघे जमीन महाराज के चरणो मे अर्पित कर रहे है। और अब सात लाख की थैली लिए काला धन संफेद करते हुए वो गुरू चरणों में दंडवत कर रहे है। चारों धाम में चारों ओर से माया बरसनी शुरू हो गई है। जय-जयकार हो रही है गुरू नाम की, इस धाम की और दूसरी तरफ एक किनारे लगे रूदन-कर्ता शिष्य, सफल कहानीकार, अपने बनावटी आँसुओं की जगह अब असली आँसू रोक नहीं पा रहे हैं। उनकी आँखों में सुपारी और नारीयल लेने वाले भाई जानों के चहेरे जलते बुझते नजर आ रहे है। सैकड़ो मठों की कहानियां उनके मस्तिष्क में घूम रही है। जिसमें ईश्वर महिमा के षड़यन्त्र को जानने वाले को अपनी जान गवानी ही पड़ती है। वो सोच रहे है कि महाराज भी उनकें साथ वही न कर ड़ाले जो मठों और आश्रमों में होता आया है। लिहाजा रोए जा रहे है और रोने के अलावा उनके पास कुछ भी बाकी नही बचा है।

मल्टी परपज पोपटदास अब गद्दीनशीन पोपट महाराज हो गए। एक विचित्र मुस्कान महाराज के चेहरे पर अंकित है। ओर मन ही मन कह रहे हैं। ’हे लीलाधर आखिर तंग आ गए थे छप्पर की प्रतीक्षा करते-करते। छप्पर आने से पहले ही छप्पर फाड़कर बरसा दिया – वाह – तेरी लीला अपरमपार है-

 पहले    भिगाय      दियो,

 फिर            छलकायो

 ओ, फिर भरो घड़े मे  पानी।

 अज्ञान    ठहरायो    सच्चा,

 ओ  ज्ञानी  की  झूठी  बानी।

 अबतो रिमझिम बरसेगो कम्बल,

 ओ,   भीगेगो  भईया   पानी।

(यह व्यंग आउटलुक, नयी दुनिया, शिवम, मधुमती, नव भारत टाइम्स, देनिक ट्रीब्यून आदि में प्रकाशित हो चूका है) 

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