अलख


…………..डूबते सूरज की रोशनी उड़ती धूल और लौटते मवेशियों की बजती घंटियाँ। गौधूलिवेला के वो दृश्य अभी भी मेरी आंखों में बसे हुए हैं।……..ये जहां फेक्ट्रियाँ खड़ी हो गई है यहां हमारी बस्ती के किनारे-किनारे एक मील से भी ज्यादा लम्बा-चैड़ा मैदान था, जिसकी भुरभुरी मिट्टी में बच्चों और नौजवानों की पचासों टोलियाँ फुटबॉल-वॉलीबाल, कब्बड्डी, खो-खो, गुल्ली डन्डा, तड़ापड़ी खेलती नजर आती थीं। और धीरे-धीरे वो मैदान सबको अंधेरे में लेकर डूब जाता था……….फिर घरों से पुकारने की आवाजें शुरू हो जातीं थी………..

वृद्ध प्रकाश की आँखों में बचपन का गुड्डू झांकता नजर आ रहा है वो कुछ क्षणों के लिए मौन हो गए, उसकी आँखे नम हो गंई…….उन्हे अपनी माँ के पुकारने की आवाज सुनाई दे रही है।…….‘‘गुड्डू……ऐ गुड्डूआ……अरे घर आ जा रे…….बहुत खेल हो गया ऐ गुड्डू………..’’

TOPSHOTS-INDIA-SOCIETYवो अति भावुक हो गए, ‘‘………सब कुछ खो गया वो आवाजें, वो हमजोली…….वो मैदान……जो कुछ बचा वो इतना बदल गया कि…….।‘‘

वृद्धों की टोली से अचानक एक अप्रत्याशित ठहाका वातावरण में गूंज गया। जैसे शांत खड़े पानी में किसी ने पत्थर मार दिया हो। ठहाका विस्तृत हो हिनहिनाहट में तब्दील हो गया, ’’अजी हमारी अपनी आँखों के सामने ही देखते-देखते अपना चेहरा बदल गया…….‘‘ रिटायर्ड केप्टन साहब का वाक्य पूरा होते ही अन्य वृद्ध भी हरहरा के ठहाकों में शामिल हो गए।

शीशे में खुद को देखकर लगता है कि आई सा दिस मैन समव्हेअर……..एक दिन मैं खड़ा कुछ सोच रहा था कि अचानक मेरी नजर आदमकद शीशे पे पड़ी, मै सडन बोला ’’क्यों कौन चाहिए आपको ‘‘ तो श्रीमति जी आवाज आई ’’किससे बातें कर रहे हो ‘‘ मैने कहा ’’ अरे आप ये किसे ले आईं हो घर में।‘‘ श्रीमति बोली ’’अरे भाई बोर हो गई थी एक ही सूरत देखते-देखते सो बदल लाई – कैसा है?‘‘ हमने कहा ’’तुम्हारे इश्क का असली इम्तहान तो अब है बहुत कहती थीं कि घर की कुछ फिकर है तुम्हें!- अब कुछ दिनों के बाद हम सिर्फ घर पर ही रहा करेगें।‘‘

फिर क्या हुआ ?-एक वृद्ध ने पूछा।

बर्तन मांजने वाली हटा दी गई……….

       ठहाके के बीच केप्टन साहब को एक इंट्रस्टिगं बात याद आ गई ’’ मैं जब रिटायरमेन्ट के बाद यहाँ आ गया, तो एक दिन मैने सोचा कि आज पूरी बस्ती का चक्कर लगाता हूँ पुरानी यादें ताजा हो जाएगी, लोगों से मुलाकात हो जाएगी। घूमते हुए पुराने बाजार में रहमत अली के शफाखाने पे आ गया- हकीम साहब के पैर छुए तो वजुर्गवार ने गले लगाते हुए कहा कि ये क्या गजब कर रहे हैं लख्खू जी। मैने उन्हें बताया कि अब्बाजान मै तो लख्खू जी का बेटा हूँ, विन्नी….बिरेन्दर। तो वो तपाक से बोले, ‘‘ जनाब में भी रहमत अली नही हूँ मै उनका बेटा हूँ रफीक। ये कहते हुए उन्होने मेरी हथेली खोल कर चूरन की ढेर सारी गोलियां थमा दी और बोले बिन्नी पेट में दर्द हो रहा होगा शायद ’’…….वो खूब जोर से हँसे………। ‘‘ ओफ क्या दिन थे हम जब भी रहमत अली अब्बा के शफाखाने से गुजरते तो पेट दर्द का बहाना कर चूरन मांगते। जनाब दस बार मांगते तो दस बार अलग-अलग तरह के चूरन दिए जाते………..।’’  

       प्रकाश जी (बचपन के गुड्डू) अनायास ही हँस दिए तो नारायण स्वामी ने दरयाफ्त किया, ’’क्यों आप बी चूरन प्रिय था ?‘‘

भई हमारे पेट में थोड़े ही होता था हमारे तो सर में दर्द होता था और हम रहमत अब्बा से गुलकन्द और मुरब्बों की फरमाइश कर डालते थे………कितने अपने थे वो सब लोग……..और पूरी बस्ती के हम लोग मालिक थे……….

       केप्टेन साहब एक दम उछल के प्रकाश के सामने आ गए, ’’अबे गुड्डू तुझे अभी तक वो किस्सा याद है……सुनो-इट्स वेरी इंट्रस्टिग- सुना यार सुना……….‘‘

बचपन में मेरा नाम गुड्डू था और केप्टेन साहब का बिन्नी – कुछ और भी दोस्त हुआ करते थे नाम भूल गया। – खैर अक्सर हम लोग बंदरिया बाग के टीलों पे पढ़ते थे उसके आस-पास भदैया जामुन के झुरमुट थे छोटे-छोटे घने पेड़ थे। पढ़ते-पढ़ते यूँ ही हम लोगों ने रामलीला खेलने की योजना बना डाली । बस मै और ये बिन्नी एक दो और बच्चे रफीक चाचा के पास पहुँच गए। रफीक चाचा हकीम बनने से पहले पतंग फिरकनी और तीरकमान बनाते थे। हमने एक बाँस दिया और कहा, चाचा दो तीर कमान बना दो हमें रामलीला खेलनी है।

       रफीक चाचा ने दो तीर कमान बना दिए, लेकिन गोटा एक में ही लग पाया। उनके पास गोटा खतम हो गया था। रफीक चाचा ने हम दोनों को गौर से देखा और मुझे समझदार मान कर, बिना गोटे वाला तीर कमान मुझे पकड़ा दिया और गोटे वाला इस बिन्नी को।

       अब ये राम राम लीला तो गया भूल और मुझे लगा चिढ़ाने कि मेरा तीर कमान तो सोने का है। बस हमने अपनी तौहीन समझ, बिना गोटे वाला अपना तीर कमान तोड़-ताड़ रफीक चाचा के ऊपर जा फेंका। रफीक चाचा मुहँ बाए देखते रह गए, कि क्या हुआ ?

       हम बिन्नी के पीछे हो लिए। बचपन में ये गोल-मटोल हुआ करता था, दौड़ते-दौड़ते ये एक जगह धम्म से गिर पड़ा, बस हमने मौका पाकर इनके सोने के तीर कमान के दो टुकड़े कर दिए। राम लीला में महाभारत शुरू हो गई। दुश्मनी ठन गई और फिर ये तय हुआ कि तू मेरे टीले, मेरे पेड़ो और मेरे तालाब की तरफ मत आना। हमने कीलो से पेड़ो पत्थरों पर अपने नाम खोद दिए। कोयला, चाक जो भी मिला निशान लगा कर पूरी बस्ती बाँट ली।

       अब इलाके तो गए बँट, बड़े तालाब का इस तरफ का सारा इलाका हमारा और टीले वाला सारा उस तरफ का इलाका इन बिन्नी महोदय के पास। एक दिन एैसा हुआ कि मेरी माँ ने  मुझे मामा जी को बुलाने के लिए भेजा। पर मुश्किल ये थी कि मामा जी का मकान पड़ता था तालाब के उस तरफ बिन्नी साहब के इलाके में…………

       सभी बूढ़े भी तन्मयता से अपने-अपने बचपन में खोए हुए है। कभी जब काल बोघ टूटता है तो ठहाका मार कर फिर सुनने लगते है।

       ……..अब क्या करे साब, हमने बहुत बहाने बनाए कि टाँग मे चोट दर्द कर रही है………मास्टर जी ने स्कूल का काम ज्यादा दे दिया है। माँ समझ गई कि बहाना बनाया जा रहा है बस उनके आँखे तरेरते ही हम मामा जी को बुलाने चल दिए। बड़ी मुश्किल से हम छिपते-छिपाते मामा जी के यहाँ महुँचे। उन्हे साथ लेकर आ ही रहा था कि बिन्नी साहब तीर कमान की मरम्मत करके, तीर कमान साधते हुए ललकारने लगे, ‘‘ मामा जी आप मेरे मामा हो गुड्डू के नहीं ’’ मामा जी ने एक बार इन धनुर्धारी बिन्नी को देखा और फिर हमें, हम शर्म से मुहँ लटकाए हुए खड़े थे। उन्होने बिन्नी को बुलाया और पूछा,’’ क्यो भाई क्या बात हो गई ?‘‘ तो ये जनाब तड़क कर बोले ‘‘ आप जब मेरे इलाके में रहते हैं तो फिर गुड्डू के मामा कैसे हो सकते है ?’’ मामा जी आश्चर्य चकित हो गए, ‘‘ तुम्हारा इलाका ?‘‘ –जी मामा जी तालाब के इस पार का इलाका मेरा है और उस पार का गुड्डू का और आप मेरे इलाके में रहते हैं……..।’’ मामा जी ने बहुत समझाया की वो दोनो के मामा हैं लेकिन बात नही बनी। आस-पास और लोग इक्कठ्ठा हो गए। अब बेचारे मामा जी मेरे घर तो आना गए भूल और हम दोनो को अपने घर ले आए। हम दोनो के अलग-अलग बयान लिए गए तो बात पकड़ में आ गई कि झगड़े की जड़ में कहीं रफीक मियाँ बैठे हुए हैं। मामा जी ने रफीक मियाँ को बुलाने के लिए एक समझदार बच्चे को भेजा तो मामला और उलझ गया – श्रीमान जी में जाकर कह दिया कि, बहुत बड़ा झगड़ा हो गया है मामा जी ने रफीक अंकल को फौरन बुलाया है।

       झगड़े की बात सुनते ही रफीक मियाँ फौरन चल दिए उनकी घबराई नई बेगम भी उनके पीछे-पीछे हो लीं। रफीक साहब के अब्बाजान भी सोते से उठ खड़े हुए। हकीम साहब की नजर किसी दवा के परीक्षण की वजह से काफी कमजोर हो चुकी थी तो वो ज्यादातर घर पर ही तशरीफ़ रखते थें – इस झगड़े की बात से उन्हे घर की कैद से मुक्त होने का मौका मिल गया और वो टोह-टोह के छड़ी लिए चल दिए। – हर दिल अजीज हरफन मौला हकीम रहमत अली इस बस्ती के दिल की धड़कन थे। हर दीवार को गिरा कर इन्होने पूरी बस्ती को अपना घर बना लिया था। शादी-ब्याह, जीने-मरने से लेकर वो हर एक के धार्मिक-सास्कृतिक कामों में शरीक होते। -जसवन्त सिहँ की राम लीला उन्हे पूरी कंठस्थ थी- राम लीला के संगीत पक्ष की जिम्मेदारी उन्ही की होती थी, दो महीने पहले ही वो संगीत का रियाज करवाया करते थे। बड़े मन्दिर के जन्माष्टमी की झाँकी वो ही सजाते थे। राम जी की सवारी में पटेबाजी के कारनामों का अखाड़ा उन्ही के हिंन्दू-मुस्लिम पट्ठों का होता। रहमत अली साहब का जिक्र आते ही प्रकाश जी के मन की आँखों में इस घटना का पूरा दृश्य सजीव हो उठा जिसमें वो और केप्टन साहब दोनों शामिल थे।

       उनके पहुँचते ही कचहरी की सारी कारवाही पर विराम लग गया। अब्बाजान की इज्जत- आफजाई की गई – चारपाई के सिरहाने बैठाया गया। अब्बाजान ने अपनी नजर टीप कर मामले का जायजा लिया और बड़बड़ाने लगे, ‘‘ हमें तो जरूर कोई पतंग बाजी का ही झगड़ा नजर आता है – इन रफीक मियाँ को बचपन से ही समझा रहे हैं कि पतंग बाजी छोड़ दो बुरी चीज है………।‘‘ अदब और गैरत से सर झुकाए रफीक मियाँ ने जवाब दिया,’’ अब्बा हजूर मै आपसे कई बार कह चुका हूँ कि पतंगबाजी मैने छोड़ दी है -अब मैं पतंगें बनाता हूँ………।’’

लाहौल विला कूवत! आप पतंग बाजी करते-करते अब पतंगे बनाने लगे है ? बहुत खूब!………..बचपन में इन्हे हमने पंडित हरीशंकर के स्कूल में भेजा तो हर रोज वहाँ से शिकायतें आती कि ये स्कूल नहीं आते। लड़के बताते कि मैदान में कनकौवा उड़ाते रहते है ये। सोचा हाज़ी फुरकान ज़रा सख़्त तबियत के है लेकिन ये जनाव तो कनकौवे के चक्कर में उन्हे भी धता बता आए और अब कनकौवा निर्मित करके पूरी बस्ती को और बस्ती के बच्चों को बर्बाद करने का ठेका इन्होने ले लिया है-अब्बाजान ने व्यंगात्मक भाव से रफीक मियाँ को देखा।

ये कनकौवे की बात नहीं तीरकमान की है।

तीर कमान की बात ?- अल्लाह अल्लाह ! जरूर आपने किसी की आँख फोड़ी होगी अनाड़ीपन से तीर कमान चलाके। रफीक मियाँ आखिर आपको कब अक्ल आएगी, अब तो आप शादी शुदा हो गए हैं।

मैं तीर कमान चलाता नहीं अब्बा हजूर तीर कमान बनाता हूँ

या परवरदिगार हमें उठा लें या फिर इन रफीक मियाँ को अक्ल अता करें – हर बुरा काम करवाने का ठेका इन्होने ले लिया है। ओफ ! पहले जब हमें ठीक दिखाई देता था तो हम इन रफीक मियाँ के कान पकड़ के ऐंठ देते थे तो ये ठीक हो जाते थे, अब हमारी मजबूरी ये है कि कान छोड़ो, समूचा आदमी भी मुश्किल से दिखाई देता है। इसी बात का फायदा उठाते हैं ये रफीक मियाँ। -रफीक मियाँ!रफीक मियाँ !! हमारा हुक्म है, अपना कान यहाँ लाओ…………..

       अब्बाजान के हुक्म को सुनकर रफीक मियाँ से ज्यादा उनकी बेगम साहिबा शरमिन्दा नजर आ रही है। आस-पास खड़े बच्चे दबे पाँव इधर-उधर होने लगे और अब्बा हजूर की निगाह पड़ते ही फ्रीज हो गए। महौल की नज़ाकत देखते हुए मामा जी ने हिम्मत की, ’’ अब्बाजान रफीक भाई की कोई गलती नहीं है वो दरअसल एैसा था, ये गुड्डू रामनाथ का बेटा और बिन्नी लख्खू जी का लड़का। इन्होने रामलीला खेलने के लिए रफीक भाई से तीरकमान बनाने को कहा, तीर कमान तो बन गए लेकिन गोटा सिर्फ एक में ही लगा। बस यही झगड़ा है बिन्नी और गुड्डू में……..‘‘

जब भी कोई जिम्मेदारी का काम होता है एैन उसी वक्त हमारे रफीक मियाँ की अक्ल घास चरने चली जाती है। क्यों रफीक मियाँ आपने एक ही तीर कमान पे गोटा क्यों लगाया ?

गोटा खतम हो गया था

यानि बच्चों में झगड़ा करवाने की गुंजाइश आप कैसे न कैसे निकाल कर ही चैन लेते हैं।

अब्बाजान आप घर पर ही तशरीफ़ रखते तो मुनासिब होता यहाँ आपको किसने बुलाया………….

अरे बेअक्ल तुम्हारी इतनी हिम्मत – ये पूरी बस्ती हमारी है, हर घर हमारा है। मैं इस बस्ती में पैदा हुआ। यहीं खेला पला बड़ा हुआ और मुझे आप कहते हैं कि यहाँ हमे किसने बुलाया। हम जहाँ चाहें वहाँ जाएगे समझे………….।

       मामा मदन सिहँ सहसा बोल पड़े, ’’ लेकिन अब्बाजान आप गुड्डू बिन्नी से पूछ कर ही इघर आ सकते हैं झगड़े में इन्होने पूरी बस्ती बाँट दी है।‘‘

ये बच्चे तो बस्ती के बादशाह है।…….लेकिन जब हम इन्हे…….यानि इनकी दोनो की तीर कमानों में एक सा गोटा लगवा देंगे तो फिर तो हम फ्रीली कहीं भी आ जा सकेगें……..अरे भई शबनम……….

       शबनम कहीं खोई हूई थी अपना नाम सुनते ही चौंक गई, ’’ जी-जी अब्बा हजूर ‘‘

शबनम हमें यकीन है कि तुम्हें याद ही न होगा कि तुमने अपनी अम्मी की चूनरों से गोटे निकाल कर कहाँ रखे होगें?

नहीं…….जी जी…….याद है! याद है हाँ वो पुश्तैनी वो……..वो सबसे बड़े बक्स में बाँए हाथ पर ही नीचे रखे हैं………

वल्लाह! क्या याददाश्त है तुम्हारी

जी…….जी!………अब्बाहजूर वो गोटे तो असली सोने चाँदी, तारों के हैं……..

तो क्या ये बच्चे नकली है!……..अरे सोने-चाँदी की कीमत क्या ज्यादा है जज़बात से, आज इन्होने पेड़, टीले, तालाब मोहल्ले बाँट दिए है कल को बड़े होकर ये हमें तुम्हे बाँट देगें।

चलो बच्चो चलो तुम्हारी तीर कमान पे गोटा लगा देती हूँ………

       गुड्डू बिन्नी को याद आया कि तीर कमान तो उन्होने लड़ाई-झगड़े में तोड़ डाली थी, ‘‘ दादा जी दादा जी तीर कमान तो…….।’’ –रफीक मियाँ काफी शरमिन्दगी झेल चुके थे गुड्डू बिन्नी को चुप कराते बोले, ‘‘ चुप करो फिर से बना दूगां…….चलो…….और अब्बा हजूर आप भी चलिए शाम हो रही है वर्ना फिर ढूँढना पड़ेगा कि आप कहाँ है ?‘‘

बरखुरदार अपनी बस्ती में खो जाने की हमारी पुरानी आदत है हम अक्सर खो जाते और मेरी माँ मुझे ढूंढती रहती थी……….कहीं दूर के मोहल्लो, ईदगाह के उस पार हमें बच्चों के साथ खेलते हुए बरामद किया जाता था……….हमें लगता है आजादी इन्सान की जिन्दगी की सबसे बड़ी चीज है। अब वक्त मुझे घर और बिस्तर में कैद करना चाहता है, वक्त ने मुझसे हिकमत छुड़वा दी – पर मैं लोगों के सर पर हाथ रखकर दुआएँ तो दे ही सकता हूँ……………रफीक मियाँ आप फिक्र न करें मैं काफी दिनों के बाद निकला हूँ घर से, बहुत सारे लोगों से मिला नहीं हूँ काफी अरसे से………जाइए मुझे कोई न कोई घर छोड़ देगा………..।

       पहले तो रहमत अली साहब का एक शफाखाना था पर अब तो वो जहाँ जाते वहीं शफाखना बन जाता। कहते, ’’ घर घर अलख जगाने का मौसम तो अब शुरू हुआ है इस उम्र में।‘‘ वो इस बस्ती में अपनी मोहब्बत का अलख हमेशा जगाए ही रहे। पर अब तो न वो बस्ती है न वो लोग, यादों में सिमट कर रह गया है सब कुछ।

       अब उनकी उम्र नब्बे के ऊपर ही होगी, कुछ दिनों पहले तो नगें पैर घास पर घूमते नजर आ जाते थे। अब तो उनकी नजर में भी फर्क आ गया है, एक दिन मुझे दूर से ही पहचान कर कहने लगे, ‘‘ अरे प्रकाश नंगे पाँव घास पे चला करो नजर के लिए बड़ी मुफीद एक्सरसाईज है। वो जब भी मिले आयुर्वेद और यूनानी नुस्खे, जड़ी – बूटियों की इतनी लम्बी जानकारी देना शुरू कर डालते कि किताब बन जाए। यही नहीं आर्ट-लिटरेचर का भी अच्छा ज्ञान है उन्हे, एक दिन तो घर ले गए और घन्टो पक्के राग सुनाते रहे। कभी-कभी तो सोचता हूँ कि एक व्यक्ति के पास इतना ज्ञान आया कहाँ से………..।’’

       काफी देर से चुप बैठे छेदी लाल शर्मा गम्भीर वाणी में धीरे से कुछ खीझ कर बोले, ‘‘ प्रकाश भाई आप जो कुछ कह रहे है सारी बातें हंड्रेड परसेन्ट सही हैं – लेकिन ये जो इनके यहाँ पाकिस्तानी आते है रूकते है! कई बार इंक्वारी तक हो चुकी है – क्या पता उन आने जाने वालों में कितने आतंकवादी होगें।

       साँस के मरीज भगत बलीराम अति उतेजित होकर अपने विचार दर्ज कराने लगे, ‘‘ अजी मुझसे तो कोई जलती आग में भी खड़ा करवाके पूच्छे (पूछे) तो मैं यही कहूँगा कि इस कौम पे………भ-भ भरोसा सा……..नही किया जा सक……..सकता। सारे आ………आतंकी इन्ही लोगों के ठहरते हैं अंदर ही अंदर बम बनाते हैं……….हाँ तो क्या।

       नारायण स्वामी भी एक दम खड़े हो गए इस बात को और वजन देने के लिए, ‘‘ देखिए मेरा टॉप फलोर से रहमत साब (साहब) का घर साफ दिखाई देता है उसका आंगन में क्या चलता है क्या नही हम सब देखता है……..अरे कल छह दिसम्बर है न, उसके घर में क्या – क्या तैयारी चल रहा है मालुम है। बाप – बेटा सब मिलके लम्बा – लम्बा बेनर बना रहा है……………..। ’’

       – बेनर क्या………ये लोग घरों में, मस्जिदो में पत्थर, हथगोले, हथियार सभी जमा करके बैठे होंगे – कल देखना राम जी की शोभा यात्रा जब निकलेगी। मुझे लगता है कल बड़ा दंगा होई हो, भगत जी ने ये कहते – कहते झोले से डेर सारे हेन्ड बिल निकाल लिए, ‘‘ ये लोगों को बाँटने है में तो भूल ही गया था। कल शोभा – यात्रा में हर हिन्दू शामिल होना चाहिए।’’

       – जो नई आता वो मैं बोलता हिन्दू बाप की औलाद नई………हिन्दू लोग को भी अपना ताकत दिखाने का – मैइ तो ये बड़ा त्रिसूल घर में रक्का है कल शोभा-यात्रा मे लेकर आएगा – मरने को तो है एक दिन, धर्म के लिए मरेगा तो सीधा स्वर्ग मे न जाएगा। नारायण स्वामी ने ये कहते – कहते कुछ हेन्ड बिल भगत जी से  झपट लिए, ‘‘ अरे मेरे को दो पूरा कॉलोनी में बाँटेगा।’’

       कलके सम्ंभावित झगड़े और फसाद की वार्ता के बीच प्रकाश जी तो घड़ी देखकर घर आ गए। – लेकिन हाल के हादसों और सामाजिक तनावों को याद करके वो पूरी रात सो न सके। सुबह होते ही वो जब सैर के लिए निकले तो उन्होने हकीम साहब के घर की तरफ जाने का मन बना लिया, सोचा वो उनसे मिल भी लेंगे और मन में उठी दुविधा का खुलासा भी हो जाएगा।

       वो हकीम साहब के घर के पास पहुँचे ही थे कि दरवाजे पर लोगों की भीड़ देखकर रूक गए, ‘‘ क्या पुलिस ने छापा तो नहीं मारा………।’’ अजीब-अजीब ख्याल एक साथ उनके मन में कौंध गए, इन्ही ख्यालों के बीच वो हिम्मत करके आगे बढ़े तो रफीक ने उन्हे आते देख लिया, वो भाग कर प्रकाश जी से लिपट कर रोने लगे, ‘‘ प्रकाश कल कई बार अब्बा ने तुम्हें याद किया……प्रकाश अब्बा चले गए………।’’

       अजीब सी चुप्पी थी पूरे माहोल में है, लौवान और अगरबती महका-महका धुआँ पूरे माहोल में छाया हुआ है, प्रकाश जी ने चारों ओर नजर डाल कर देखा शायद वो ढूंढ रहे थें बस्ती के गैर मुस्लिम चेहरों को – प्रकाश, हकीम साहब के पैरों पर सर रख कर उठे तो मन का बाँध टूट गया। शबनम और रफीक  ने उन्हें सम्हाला काफी देर की ख़ामोशी के बाद शबनम हल्की आवाज में बोली, ‘‘ यूँ इतनी उमर में भी अपना काम खुद ही करने की जिद करतें थे – लेकिन बीस दिनों तक अब्बा बिस्तर पर ही पड़े रहे कोई मिलने नहीं आया। कभी-कभी अखबार उलट-पलट कर देख लेते या फिर रेडियो, टी. वी. ऑन करके सुनते-सुनते सो जाते। रात का खाना खिलाने जब मैं जाती तो ये जरूर पूछते क्या कोई मुझसे मिलने आया था। एक दिन तो कहने लगे वो लड़का आए तो उसे सितार दे देना – अब मेरी समझ में ही नहीं आए कि कौन लड़का ! तो बड़ा याद करके बोले, ‘‘ अरे वो प्रकाश बचपन में उसने मुझसे सितार माँगा था – उस वक्त तो मैं खुद बजाता था……….’’

       प्रकाश भावुक हो गए फिर से आँखे तर हो गई ‘‘ हाँ हम बाबा के लिए तो हमेशा बच्चे ही हैं।’’

उन्होने हमेशा इतनी उम्र होने पर भी हम सबको बच्चा ही समझा……..प्रकाश भाई एक हफते पहले न जाने अब्बा मे कहाँ से ताकत आ गई और सीढि़यों से ऊपर की मंजिल मे जा पहुँचे, मुझे बुलाकर बोले – टेरेस पर यहाँ कुर्सी डाल दें और मेरा बिस्तर भी बरसाती में लगवा देना। बड़े लड़के खुर्शीद को बुलवा कर बेंक से कुछ पैसे मंगवाए और खुद की लिखी एक लम्बी फेहरिस्त देकर कपड़ा, पेन्ट, सुतली, डंडे न जाने क्या-क्या मंगवाया। किसन पेंटर के बाप को बुलवाया बोले वो उर्दू, हिन्दी, अंग्रेजी सब जानता है ठीक-ठीक लिखेगा और दिन-रात न जाने उससे क्या-क्या लिखवाते रहे। खान साहब आपके बड़े भाई एक हफते से बाहर ही थे, कल ही फोन करवाके इन्हे बुलवाया। कल रात ग्यारह बजे घन्टी बजाके खुर्शीद को बुलाया और जिद करने लगे कि मुझे मेरे स्टोर रूम में लेके चल। उससे तमाम बक्से खुलवाए और न जाने उन बक्सों से क्या ढूंढने लगे – खुर्शीद काफी देर तक उनकी मदत करता रहा – तो कुछ सोच कर बैठ गए बोले ‘‘ आप जाइए आराम करें मैं खुद ढूंढ लूँगा………।’’

       खुर्शीद ने मुझे जगाकर इतला दी कि दादा जान न जाने इतनी रात स्टोर रूम में क्या ढूंढ रहे है आपकी मान लेते है उनसे कहो कि आराम करें।

       मैने जाकर उनसे कहा तो बोले, ‘‘ बेटी जिन्दगी एक मकसद है। और उस मकसद को पूरा करने के लिए जद्दो- जहद तो होगी ही।’’ मैने पूछा आखिर आप ढूंढ क्या रहे है ? ……..मैं कुछ मदत करूँ। बोले ‘‘ आप ये मत पूछिए कि मैं क्या ढूंढ रहा हूँ, यहाँ तो मसला ये है कि इस वक्त जिन्दगी की हर चीज ढूंढ निकालू, खैर आप दुआ कीजिए कि जो कुछ भी मैं ढूंढ रहा हूँ वो मिल जाए – हाँ मदत करना चाहती हो तो एक मदत कर दो मेरी अच्छी बिटिया रानी मुझे अपने हाथ की चाय बनाके पिला दे। – मैने कहा, ‘‘ चाय तो पिला दूंगी लेकिन आप अभी आराम करें सुबह ढूंढ लीजिएगा ’’ – तो कुछ देर मुझे देखते रहे बोले, ‘‘ बेटी सुबह किसने देखी है ?’’

       मैने चाय बना कर दी तो मेरे सर पर हाथ रख अब्बा ने दुआ पढ़ी और कहने लगे ‘‘ बेटा तूने मेरी बड़ी सेवा की मै इसके बदले तुझे दे भी क्या सकता हूँ – जा तेरी आँखों मे नींद तैर रही है सो जा मै जरूरत हूई तो बुला लूँगा…….।’’ मैं सोने चली गई फिर……..फिर……..सुबह जब खान साहब उठे तो मै भी उठ गई और सीधे स्टोर रूम में गई तो देखा अब्बा वहाँ नहीं थे, ढूढ़ते हुए टेरेस पर गई तो देखा……..दो झंडे, हरा और भगवे झंडे वहाँ टेरेस की रेलिगं पर साथ बँधे थे और वहीं अब्बा नीचे पड़े थे……. मेरे होश काबू न थे मैने चिल्ला कर इन्हे बुलाया, पूरा घर इकट्ठा हो गया अब्बा हमसे बहुत दूर चले गए थे। शायद ये झन्डे अख्खाड़े, ड्रामों और रामलीला के बक्सो से उन्होने खोज निकाले थे……..अल्लाह अल्लाहा कैसे वो ऊपर तक गए इस उम्र में और कैसे उन झंडों को बाँधा होगा…….।

………जिए वो हमारे सामने लेकिन आखरी लम्हात में मुहँ छिपा कर चले गए। कई रोज से बार – बार कह रहे थे मैं मरू तो मेरी आँखे बंद मत करना खुली रखना – और पूरी हर गली दिखा कर ले जाना, कितना प्यार है उन्हे इस बस्ती से………।

       उनकी आँखो में समाया वो सपना अब साफ नजर आने लगा, उनकी रहनुमाई में हर धर्म, जाति के लोग उनके पीछे चल रहे है। जिधर से भी उनकी मय्यत गुज़रती, और लोग उसके साथ शामिल हो जाते। जीते जी जो उन्होने अपनी जिन्दगी का निचोड़ बेनर पर अंकित करवाया था। लोगों ने उसे उनकी अंतिम यात्रा के साथ श्रद्धा से उठाया हुआ है। हिन्दी, अ़ग्रेजी और उर्दू में बेनरों पर अंकित है।

‘‘ हम किस ढंग या धर्म के माध्यम से ईश्वर तक पहुँचते है ये बात महत्वहीन है, बेमानी है। ’’

‘‘ खूदा की ज़बान महोब्बत है / ईश्वर की भाषा केवल प्रेम है। ’’

बस्ती का शायद ही कोई एैसा व्यक्ति बचा होगा जिसने उन्हे कन्धा और मिट्टी न दी हो। रहमत साहब को सपुर्देख़ाक कर दिया गया। लेकिन उनका प्यार उनकी बातें आज हर एक की जुबान पे है।

शाम को रामजी की सवारी निकली लेकिन कोई झगड़ा, फसाद नहीं हुआ। ज्यादातर बस्ती के घरों पर दो-दो झंडे एक साथ लहराते नजर आ रहे है उसी तर्ज पर जैसे रहमत साहब अपने मकान पर वो बाँध कर गए थे। बुझी हुई जिन्दगी से उन्होने अख़लाक और भाईचारे का चराग़ फिरसे रोशन कर दिया है, लगता है इस बस्ती में, अभी भी वो अपनी जिन्दगी का वही अलख जगाए यहाँ मौजूद हैं।

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