पहला पत्थर


-अमर स्नेह 

मैं जिनका किस्सा बयान करना चाहता हूँ वो सौ में से अस्सी हैं। हो सकता है, सूरत-शक्ल और जीवन शैली जुदा हो, लेकिन मज़बूरी, बेबसी, लाचारी और हालत में हमारी इनसे आस-पास की रिश्तेदारी नजर आती है। आप कहेंगे बाकी बीस जो बचे क्या वो दुश्मन हैं? कैसे कहे, वो ही तो कहलाते हैं खानदानी, सभ्य, शिष्ट, अदबी, श्रेष्ठ, शरीफ, एलीट चाहे ये ताज़दार हो या बेताज़ इनका मिजाज, सोच-समझ, नियत, प्रवृति वही रहती है।

 hindi         कहते हैं बीसा को बरदान है, इसके पाप, कुकर्म, जुर्म अपने आप पुण्य और सद्कर्मो में तब्दील होते रहते हैं। हाँ, अगर फिर भी पाप रह जाये तो ऊपरवाले ने उसकी भी व्यवस्था कर दी है, एक बार गंगा में डुबकी लगायी कि सब पाप धुल-धुला के जन्म जन्मांतरो के लिए पापों से मुक्ति।

          पाप करते रहने का रियाज होता रहे और आदत भी बनी रहे, साथ ही हौसला भी बुलंद रहे तो उसके लिए बारह साल में एक-एक डुबकी भी लगा ली तो बस, लाइसेन्स भी रिन्यू होता रहता है।

          कहते है अस्सी पापों की सजा भुगतते रहते है। तो ये भी पहुंच जाते है गंगा जी में डुबकी लगाने ताकि पिछले जन्मों के पापों से मुक्त हो जायें लेकिन इनके पाप धुलने के बजाये, बीसा के धुले पाप इनपे और चिपक जाते है और अगले कई जन्मों तक अस्सी, अस्सी ही रह जाते हैं, अस्सी को शायद पता नहीं है कि ये विशेष व्यवस्था केवल बीसा के लिए ही की गयी है।

          बीसा कभी बदलता नहीं, इसके रोबटिया अंदाज से पहचान सकते हैं। वास्तव में ये रोबोट हैं इन्सान नहीं हैं। इन बीसाओं के पास कहते हैं बड़ी रावनी विद्या है, मरते-मरते उसी गुण-धर्म के दस और रोबोट पैदा हो जाते है और वो भी टोपी झाड़ के और सीना तान के ऐसे खड़े हो जाते है जैसे इस दुनिया का हर ठाट-बाट, सुख-सुविधा, हर सम्मान, इस देश का खजाना, इनके बाप की जागीर है, इस सब पर सिर्फ इनका ही एकाधिकार है।

          बीसा पर जन्म से ही देशभक्ति की मुहर लगी रहती हैं, वो अपने शाही तौर-तरीकों और मिजाज के बल पर देश को बाइसवीं सदी में खैचे हुए है और बाकी सब तो इस देश की खुशहाली के दुश्मन है जो इसे आगे बढ़ने ही नहीं देते, चौथी सदी में सिकोडे बैठे रहते है, जनाब, देश की सारीउधोग और व्यवस्था बीसा की प्राइवेट लिमिटेड कंपनी है। इसने शुरू से ही स्वदेशी के नारे तले अस्सी को सड़ी-गली, निकृष्ट, घटिया, मिलावटी, नकली और इन्सानी प्रयोग के लिए वर्जित चीजों को ज़बरदस्ती निगलने और प्रयोग करने के लिए बाध्य किया हुआ है।ये स्वयं स्वदेशी नारे के अतिरिक्त किसी और घटिया चीज़ का इस्तेमाल नहीं करते और ये स्वयं इंपोर्टेड चीजों का ही इस्तेमाल करते है। इनके बच्चे, इनकी पीढि़या अमेरिका और योरूप में ही पढ़ती, बसती, पलती हैं। ये देश तो इनकी और इनके पुरखों की लूट-खसोट स्थली रही है। लूट-खसोटिस्तान, जिसका पैंसा ये विदेशी बैंको में रखते हैं।

          वैसे अस्सी भी कम वरदानी नहीं है। यहा हमें ईश्वर की साइंटिफिक प्रतिभा की दाद देनी पड़ेगी कि , उसने इस महान देश के लिए अस्सी जैसे विचित्र प्राणी का निर्माण किया जो एक साथ जिदा भी है और मरा हुआ भी है। इस अस्सी नाम के विशिष्ट प्राणी में इस देश के महान प्रजातंत्र को झेल पाने का विशेष संयंत्र लगा हुआ है जो कभी फेल नहीं होता, इसे मुर्दा हालत में जि़दा रखे रहता है। कभी-कभी तो ये प्राणी बरसों आखिरी सांस के सहारे टिका रह कर अगले इलेक्शन की प्रतीक्षा करता रहता है। उस वक्त इसे अगर आश्वासन युक्त भाषण मिल जाये तो इसकी अदृश्य दुम हिलने लगती है और इसमें लगा संयंत्र फिर से काम करने लगता है।

          पिछले चार-पांच वर्षो में 22 हजार से ज्यादा मिले और फैक्ट्रियां बंद हो चुकी हैं। पहले ही हाथ का काम करने वाली एक बड़ी जनसंख्या बेकार हो चुकी थी और ये संख्या बढ़ कर अब अस्सी प्रतिशत हो चुकी होगी। लोग दाने-दाने को मोहताज है, तरस रहे हैं बुनियादी जरूरतों के लिए बीस प्रतिशत आबादी को छोड़ कर लोग गरीबी और गरीबी रेखा से नीचे के स्तर पर जीने के लिए मजबूर हैं। आपको आश्चर्य नहीं होना चाहिए बंबई कलकता और दिल्ली जैसी एडवांस महानगरियों में भी अस्सी प्रतिशत लोग स्लम और गंदी बस्तियों में रहते हैं। इस देश के तीन चैथाई लोग सड़क , मैदान, गलियों , खेतों और अपनी ही पनाहगाह के आस-पास विष्टा त्याग करने को मजबूर हैं जहां तीन चैथाई लोग लाचारी और बेबसी का जीवन जी रहे हों वहां हर वर्ष करोड़ो टन अनाज और खाद्य सामग्री सड़ा कर फेंक दी जाती है कि कहीं अनाज सस्ता होकर अस्सी के पेट में न पहुंच जाये। ये कैसी व्यवस्था है, कैसा प्रजातंत्र है?

          यह इस देश का दुर्भाग्य है, ऐसे प्रजातंत्र को यहां का बुद्धिजीवी एन.ओ.सी. के साथ श्रेष्ठता का प्रमाण-पत्र भी देता है। आम आदमी का शोषण, बेबसी और मजबूरी की पराकाष्ठा को देखकर लगता है कि शीघ्र ही कोई क्रांति जन्म लेगी, कोई विप्लव शुरू होगा, वैसे पिछली सदी इसी के इंतजार में थक कर चली गयी।

 

मंज़र…

 poverty-in-india_7098         रोबोट ने ट्रक को रूकवाया और मुस्तैदी दिखाते हुए ट्रक का मुआयना करने लगा, अफसर की गाड़ी आकर पास रूक गयी, तभी ड्राइवर ने दो हरी पत्ती निकाली…. नोट देखते ही रोबोट का मन लहलहा उठा।

          रोबोट अफसर ने रोबोट की तरफ देखा और हाथ फैल गया, ड्राइवर ने एक और पत्ती का इजाफा कर रोबोट की मुट्ठी बंद की और ट्रक आगे बढ़ा दिया।

          सरकार को जाने वाला पैसा रोबोटो की जेबों में…… महान देश की परंपरा का साक्षात्कार कराता ट्रक , जिसके पीछे राष्ट्रीय जुमला जड़ा है ’‘मेरा भारत महान है।’’

          आगे जाकर देश की महानता और ट्रक दोनों विलीन हो गये। थोडी देर बाद वायरलेस पर बड़े रोबोट ने संवाद किया और जीप को सड़क के बीचो-बीच लाकर खड़ा कर दिया। कुछ ही क्षणों मे सामने से आता एक ट्रक दिखाई दिया, ट्रक जीप के पास आते-आते आहिस्ता हो गया और ट्रक से एक व्यक्ति नीचे उतरा- एक रोबोट को आड़ में ले जाकर कुछ वार्ता हुई, उसने नोटों की एक गड्डी रोबोट के हवाले की और व्यक्ति ट्रक में जाकर बैठा गया – ट्रक उसी प्रकार देश की महानता के दर्शन कराता आगे बढ़ गया।

आगे जाकर ट्रक एक सुनसान रास्ते पर मुड़ कर आहिस्ता हो गया। तभी ट्रक के आगे बैठे व्यक्ति की नजर अस्सी पर पड़ी, वो कुछ सोच में पड़ गया, अस्सी घंटो से इस निर्जन में बस का इंतजार कर रहा था परिवहन सेवा की एक बस वहां से गुजरी भी लेकिन हजार रोकने पर भी वो रुकी न थी और अस्सी निराश हो चुका था। कुछ दिन पहले ही उसे यहां एक फैक्ट्री में काम मिला था वो ट्रक को रुकता देख उसकी ओर बढ़ा। ड्राइवर ने उसे अपने पास बुलाया और एक कनस्तरी थमाते हुए दूर इशारा करके पानी की जगह दिखाई, ‘’जा वो सामने से पानी भर ला इंजन में डालना है – जा फिकर न कर, जहां कहेगा छोड़ देंगे जा…. अरे जा भागके पानी ले आ।’’

          पानी दूर-दूर तक कहीं नजर ही नहीं आ रहा है, लेकिन बेचारा गंतव्य तक पहुँच कर अपने बाल-बच्चो में शामिल हो जायेगा, इस आस में जहां-तहां भागा चला जा रहा हैं। उसके जाते ही ट्रक ढलान की ओर पीछे गया और झट से उसका पिछला हिस्सा खोला गया – एक ढकी-छिपी मारूति कार फट्टे के सहारे उतरी और हाइवे से होती स्टेशन की तरफ मुड़ गयी और ट्रक हाईवे पर आगे जाकर गायब हो गया।

          मुश्किल से पंद्रह-बीस मिनट ही हुए होगे पेड़ों के झुरमुट के पीछे से अस्सी पानी लिए चला आ रहा था। जब वो लौटा तो ट्रक नदारत। इधर-उधर नजर दौड़ाई लेकिन कहीं भी ट्रक नजर नही आया। रात बढ़ती जा रही है – बेचारा बेबस है क्या करे, आती-जाती कारें, गाडि़यां भला उसे क्यों बैठाने लगीं, कनस्तरी लिये वो ट्रक ढूंढ़ता निर्जन में ही चल पड़ा। शायद आगे जाकर कही कुछ मिल जाये।

          अचानक पुलिस की जीपें, गाडि़यां सायरन बजाती सड़क पर दौडने लगीं देखते-देखते सड़क पर जैसे भगदड़ मच गयी, दोनों ओर से गाडियों की आवाजाही बढ़ गयी, ट्रैफिक में फंसी गाडि़यों में बम-विस्फोट की चर्चाएँ हो रही हैं।

          स्टेशन पर एक मारूति कार में रखे बम से आधा स्टेशन उड़ गया था और एक आती हुई रेलगाड़ी के चार डिब्बे पटरी से उड़ गये थे, पूरी की पूरी गाड़ी पटरी से उतर गयी थी । सैकड़ो लोगों के शरीर के चिथड़े हर तरफ दीख पड़ रहे थे। आस-पास के वाहन तक उड़ गये थे, जान-माल का भारी नुकसान हुआ था।

अब पुलिस हरकत में आ चुकी है, कांस्टेबल से लेकर अफसर, अफसरों के अफसर मुस्तैदी दिखा रहे है। निकास के सारे रास्ते सील कर दिये गये हैं। हर गाड़ी, कार, बैलगाड़ी, यहाँ तक कि हाट से लौटते कुम्हार के गधों की भी तलाशी ली जा रही है। सिर्फ तलाशी ही नहीं ऐसी सख्ती से पूछ-ताछ की जा ही है कि गधें भी अपनी भाषा में मुँह उठाये अल्लाह मियां से फरियाद करने लगे है।

          पूछताछ, तलाशी और घेराव में हजारों लोग फंसे पड़े है, कारवाही चालू है, मरे हुए लोगो की शिनाख्त की जा रही है। अधमरे लोगो से प्रेस, टेलीविजन रेडि़यो के सक्रिय संवाददाता पूछताछ और इंटरव्यू करने से बाज नहीं आ रहे है और पुलिस का हर डिपार्टमेंट इस समय काम पर लगा हुआ है। बम के अंदर कौन-कौन सी बम बनाने की सामग्री इस्तेमाल की गयी है इसकी जांच-पड़ताल में लग गया है। पहले हुए हजारों बम कांडो में से इस बम कांड की किस बम कांड से रिश्तेदारी है, पता लगाने में अफसर जी तोड़ मुस्तैदी दिखा रहे है। ये पुलिस , वो पुलिस, रक्षा पुलिस, सुरक्षा पुलिस, बम स्क्वायड, सीमा पुलिस एक्शन में है। सभी तरह की पुलिस चीटियों की तरह बिल से बाहर निकल आई है।

          राजनतिक पार्टियों के नेताओं ने अपनी-अपनी टोपी झाड़ कर, अपनी खोपडि़यों को शोभायमान कर लिया है और अब वे भाषण-वक्तव्य आदि देने के लिए तैयार हैं। पुलिस, राजनितिज्ञ, प्रेस अपनी-अपनी कल्पना शक्ति की एैसी-तैसी किये हुए है। सभी ये जताने की कोशिश कर रहे है कि उन्हें देश से बेहद प्यार है और इस हादसे से उन्हें बहुत आघात लगा है। विपक्ष ने आधे घंटे के अंदर ही सरकार से इस्तीफे की मांग शुरू कर दी है, उसने ऐलान कर दिया है वो बंदकरेंगे, पार्लियामेंट नहीं चलने देगे, देश का चक्का जाम कर देंगे आदि आदि।

          अस्सी के सामने अब कोई चारा नहीं है। पुलिस, नेताओं, प्रेस की दौड़ती गाडि़यां और घायलों का ढोती एंबुलेंस आदि को देख वो भयभीत हो चुका है। पुलिस की पकड़ा-धकड़ी पूछताछ जारी है, उसकी हिम्मत टूट चुकी है वो सुनसान में एक टूटे मकान में छिपने का प्रयास करने लगा, तभी एक पुलिस दस्ते ने उसे धर दबोचा। उसका इस निर्जन स्थान पर होना वैसे भी शक़ पैदा करता है। जवाब तलब के दौरान उसकी गाथा सुन कर तो और भी शक़ बढ़ गया। पुलिस के हाथ बटेर लग गयी थी, कनस्तरी समेत उसे थाने पहुंचा दिया गया।

          दूसरे दिन समाचार पत्रों की सुर्खियो में वही गरीब बेबस हीरो बन गया। अस्सी ने पिटाई के आगे, उसकी समझ तक में न आने वाले सारे जुर्म कबूल कर लिए थे। आतंकवादी क्या बला होती है इसका मतलब तक उसे मालूम न था। पर अब जब वह बम-कांड का एक्टिव सदस्य मुकर्रर हो चुका है तब ग्रामोफोन रिकॉर्ड पर सूई अटक जाने की तरह अपनी गाथा बिना पूछे भी दोहराने लगा कि उसकी फैक्ट्री में नयी-नयी नौकरी लगी थीं। आखिरी बस छूट जाने के कारण उसकी मुलाकात ट्रकवालों से हुई, उन्होंने पानी लाने के लिए कहा और जब वो पानी लेकर आया तो ट्रक गायब हो गया।

          उसके बयानों और इकबालियां बयानों को लेकर तहकीकात शुरू हो चुकी है। पुलिस के हाथ बहुत महत्वपूर्ण सुराग लगा। ट्रक एक कच्चे रास्ते से अंदर गया था और उसी बिंदु से मारूति गाड़ी के चिन्ह मिले। मारूति के चिन्ह पहले कहीं भी न थे, मारूति के पहियों के चिन्हो को अन्य चिन्हों से मिलाया गया, मारूति गाड़ी और ट्रक का रिश्ता साफ नजर आ रहा है। अस्सी अब बहुत अहम व्यक्ति हो गया है इस बम कांड के कारण पुलिस अब उससे उसके विदेशों से संबंधों की तहकीकात कर रही हैं। उसका सही पता पूछा जा रहा है। बेचारा अपना क्या पता बतलाये! पहले जहाँ वो काम करता था वहां दो वर्षो से तालाबंदी चल रही थी और उसे इसी के कारण खोली छोड़नी पड़ी। इस सड़क से उस सड़क, दीवारों के साये में यह पनाह ढूंढते फिरते मजदूरी मिली तो कुछ खा-पी लिया, पुलिस, गुंड़ो आदि को दे दिया, पनाह के लिए कुछ न कुछ देना ही पड़ता था सबको। अभी कहीं झोपड़पट्टी में उसके परिवार को शरण मिलने वाली थी, सिर्फ पैसा देना बाकी था, बात हो चुकी थी। अपने निवास की जगह वो पुलिस को सड़को व रास्तो के नाम गिनाए जा रहा है। अपना उल्टा-सीधा पता बताए जा रहा है। तहकीकात करने से पुलिस का उस पर शक़ और बढ़ गया है।

 indian-poverty1         दो दिन बीत चुके थे। अस्सी जब नहीं लौटा तो उसके घर वालों की चिंताए बढ़ गयीं। उसकी घरवाली भग्गा आखिर उसे कहां ढूंढती पैसा कौड़ी भी न था पास में, भूख से बच्चे बिलबिला रहे हैं वो रोती-कलपाती उन्हें दिलासा दिला रही है कि बापू कुछ न कुछ लेकर आ ही रहा होगा। सड़क पर टकटकी लगाये बैठा है पूरा परिवार, कभी-कभी भग्गा सामने वाली टपरी पर जाकर लोगों से अपनी परेशानी बोल-बतियां लेती हैं। संवेदनावश टपरी वाला कुछ खाने को भी देता है। एक दो बार के बाद अब उसकी भी हिम्मत नहीं पड़ रही कि कुछ मांग ले। अब बेचारी भग्गा जाती है और खाली हाथ बच्चों के पास आकर सुन्न हो जाती है।

          अभी-अभी उसे पता चला था कि कहीं स्टेशन पर बम-विस्फोट हुआ है जिसमें सैकड़ो लोग मारे गये, वो सोचने लगी कही उसका आदमी तो…… नहीं….. वो तो काम के लिए गया था और वो तो बस से ही जाता है। लोगो ने उसे पुलिस स्टेशन जाकर दरियाफ्त करने को कहा। बेचारी जैसे-तैसे पुलिस स्टेशन गयी, लेकिन वहां उसकी कौन सुनता चौकी की सारी पुलिस तो मंत्रियों, मुख्यमंत्री , वी.आई.पी. वी.वी.आई.पी. लोगो की सुरक्षा और बंदोबस्त में लगी है। उसका हुलिया देखक, उसे किसी ने पास ही नहीं फटकने दिया, बेचारी रोती कलपती वापिस आ गयी।

          आते ही उसे एक और विनाशलीला का सामना करना पड़ा। नगरपालिका का विध्वंसक तोडू दस्ता, अपने सिपाहसलारों, हथियारों और बंदोबस्त के साथ झोपडपट्टी पर बुलडोजर चला चुका था। खुशहाली के दुश्मनों की पनाह उनकी आंखो के सामने मिटाई जा रही है, जिधर देखो दर्दनाक चीख, पुकार सुनाई देती है। इस भगदड़ और मारपीट में लोग अपना-अपना सामान लेकर ऐसे भाग रहे है जैसे किसी दुश्मन देश ने हमला कर दिया हो।

          समाज के त्यागे हुए कबाड़, टीन-टप्पड़ आदि से इन मजबूर गरीबों के सपनों के महल, देश को खुशहाल दिखाने के लिए सौदर्यीकरण की योजना के अंतर्गत ध्वस्त कर दिए गये। इन बचारो की कौन सुनता और मदद करता, अभी कुछ दिन पहले ही तो चुनाव हुए हैं और अब इस श्रेष्ठतम प्रजातंत्र में नेताओं का लोगों से अगले पांच साल तक सरोकार खतम हो चुका है।

          ये मजबूर इस देश की धरती और आसमान के बीच ‘‘कहाँ जायें ?’’ का सवालिया निशान बने हुए है। ऐ प्रजातंत्र, ऐ इस देश के संविधान, ऐ रहनुमाओं, इस देश की योजनाओं, ऐ मानवतावादियों, ऐ विदेशी कारों में घूमने वालो और एयरकंडीशन अट्टालिकाओं में बसने वालो, धर्म गुरूओं, वेदपुराण धर्मग्रंथों का उपदेश देने वाले महात्माओं, देश की बड़ी जमीनो पर कब्जा जमाकर बैठे बड़े-बड़े निर्मित आश्रमों के बाबाओं बताओं, ये कमजोर कहाँ जाये?

          भग्गा पागलों की तरह से अपने बच्चों को तलाश रही है , चीखते-पुकारते उस पर बेहोशी तारी होने लगी है। वो कभी-कभी सुन्न हो, शून्य दृष्टि से इस ध्वस्त बस्ती को देख सुबक पड़ती है जहाँ कभी पनाह लेने का सपना उगा था। वो अर्ध-विक्षिप्त सी भगवान से प्रार्थना कर रही है, ‘हे भगवान मुझे जिदा रखना, मेरे बच्चे मिल नही रहे हैं… कहां चले गये…….? वह बड़बडाये जा रही है, भूख प्यास से अब उसमें खड़े होने की भी शक्ति नहीं रह गयी है। उसकी आवाज रूंध गयी है, ‘‘ भगवान मुझे अपने बच्चो के लिए जिदा रखना…… भूखे प्यासे न जाने कहां होगें… मारना ही है तो उन्हें मेरी आंखो के सामने , मेरे से पहले मार देना……. हाँ मेरे पीछे न जाने उनका क्या हाल होगा…. ये भी तो न जाने कहां खो गये…….. सब कहां खो गये……।’’

          उसके बच्चे नगरपालिका के सूरमाओं से भयभीत होकर, पास के गंदे नाले में जा छुपे थे। बड़ा लड़का किसन आठ नौ का है और छोटा सिर्फ डेढ़ वर्ष का ही है, किसन नाले में पड़े एक बड़े पत्थर पर न जाने कब से टिका हुआ है। उसके पैर थकान से कांपने लगे है, वह गिर जाने के डर से नाले की दीवार से चिपटा हुआ है नाले के पानी के बहाव को देख कर वह डर जाता है कि कहीं गिर न पड़े। शुरू में उसने अपने छोटे भाई को भी नाले मे घसीटने का प्रयास किया था लेकिन गिर जाने के भय से उसे वही मेढ़ पर रोक दिया, तो रोता-बिलखता बेसुध मेढ़ पर ही पडा हैं। किसन नाले से निकलने का प्रयास कर रहा है कभी-कभी वो अम्मा-बाबू को नाले में से आवाज लगाता है लेकिन इस तरफ कोई भी तो नहीं है जो उसकी आवाज सुन कर मदद कर सके।

          किसन असहनीय थकान से कांपने लगा है। उसका धीरज और हिम्मत टूटती नजर आ रही है, लगता है वो सम्हल नहीं पायेगा। उजडे़ हुए लोगो को अब यहां बैठने भी नहीं दिया जा रहा है। पुलिस और नगर पालिका के अधिकारीगण उन्हें शीघ्र उस स्थान से चले जाने का आदेश दे रहे है, उन्हें शक है कि अगर इन लोगो को वहां से भगाया नहीं गया तो ये लोग फिर से यहाँ डेरा डाल देगे।

लोगो की जान पर बनी हुई है। आखिर ये लोग कहां जाये, क्या करे ? सुबह से अब तक लोगो को पानी भी नसीब नहीं हुआ। कुछ लोगो ने तो खबर लगते ही सामान वगैरा निकाल लिया था लेकिन अधिकतर लोगों के सामान समेत झोपडो पर बुलडोजर चला दिया गया था लोग खाली हाथ अपनी किस्मत को कोस रहे है, तंग आये लोग अपने बच्चों और परिवार के साथ धूप और गर्मी में बैठे है तो वहां बैठने भी नहीं दिया जा रहा है, अजब निजाम है यह ?

  poverty-2        भग्गा को मृत्यु पास आती नजर आ रही है। उसने अपने अंदर एक बार पूरी शक्ति बटोरी और किसन को आवाज लगायी। मां की आवाज सुनते ही किसन जान छोड़ कर चीख पड़ा, माँ मैं नाले मे हॅूं माँ, उसकी आवाज का अनुसरण करते हुए, भग्गा भागने लगी, न जाने उसमें कहां से शक्ति जाग उठी, छोटा भी माँ की आवाज को सुनकर उठ खड़ा हुआ भाग कर उसने उसे सीने से लगा लिया।

          किसन को जैसे-तैसे उसने नाले से निकाल लिया, नाले की गंदी गैस और धूप में अधमरा हो गया था वो। भग्गा ने दोनों हाथों से अपने बच्चों को ममता और प्यार के भावनिक संसार में समेंट लिया, कुछ क्षण वो सब, सबकुछ भूल से गये।

          पास ही वाटर वक्र्स के टूटे पाइप से झोपड़ी की जीवन धार बह रही थी। भग्गा ने अपने बच्चों का मुंह हाथ धुलाया और पानी पिलाया, कल से उसने भी पानी तक नहीं पिया था, पानी के सेवन से कुछ चैन मिला।

          थोडा होश में आते ही किसन ने बाबू के बारे में पूछा। बेचारी क्या बतलाती, उसने दिलासा दिया कि बाबू आ जायेगे, अचानक बस्ती के मलबे की तरफ देखते ही उसे अपने सामान की सुध आयी, उसने किसन से बार-बार सामान के विषय में जानना चाहा – लेकिन अब उसके मुंह से कुछ और ही अस्फुट स्वर सुनाई दे रहे है, ‘‘मां भूख लग रही है…. मां…. भूख…’’ वो बिलखते हुए बेसुध होने लगा कई दिनों से रोटी किसी ने देखी तक नहीं थी। छोटा भी बेसुध सा आंखे खोले एकटक उसकी ओर देख रहा है। वह डर गयी अपने जिगर के टुकडो को निष्प्राण होते देख, वह बिजली की तेजी से उठ खड़ी हुई। उसे अपने बच्चों और खुद को जिदा रखना है तो इसी क्षण कुछ करना होगा।

          दूर एक कॉलोनी नजर आ रही है जहाँ गगनचुंबी इमारतों का बड़ा लंबा-चैड़ा सिलसिला है। वह बच्चों को घसीटती हूई उसी ओर चल पड़ी।

          वह सामान भूल गयी , दुनिया की हर चीज़ इस वक्त वह भूल गयी है। बुदबुदाती बच्चों को दिलासा दिलाती, बढ़ी चली जा रही है, जैसे आपातकाल में मरीज़ को लिए एंबुलेन्स दौड़ती चलती है।

          ‘‘बस थोडी ही दूर तो है…. कोई न कोई ज़रूर मदद करेगा…….. हां मैं जानती हूं मेरे बच्चों तुम्हें भूख लग रही है, बस अभी कुछ न कुछ मिल जायेगा….. भगवान हमें बचा लो….. भूख से तड़प रहे है मेरे बच्चे…..हां……हां थोड़ी दूर है….बस्ती ….वो क्या….. आ गयी……. न जाने वो भी कहां है…… वह हमें अकेले छोड़ कहां चला गया?…. होता तो क्या ये हाल होता हमारा……बच्चो हिम्मत करो बस….. थोड़ी दूर……. बस…….।’’

          कॉलोनी में प्रवेश करते ही उसने एक बंगले पर आवाज लगायी लेकिन कोई उतर नहीं आया। दूसरे दरवाजे पर जाकर पूरी शिदत से खटखटाया तो एक महिला ने दरवाजा खोला और इन्हें देखते ही वह क्रोध में आगबबूला हो गयी, ‘‘चल-चल! तेरी हिम्मत कैसे हुई इस तरह से दरवाजा खटखटाने की? चली जा नही तो……।’’

          उसकी हिम्मत पस्त हो गयी, नहीं वह कोशिश करेगी अपने बच्चों और खुद को बचाने की, उसने दो-तीन घरों पर आवाज़ लगायी, ’’मेरे बच्चे भूख से तड़प रहे है कोई मदद करों – हमने तीन दिनों से खाना नही खाया है हमें बचा लो, आपके बच्चों को हमारी दुआएं लगेंगी, मेरे बच्चे भूखे हैं खाने को दे दो…….।’’

          तभी एक संभ्रांत महिला जो अपनी गाड़ी घर के बाहर पार्क करने जा रही थी। गाड़ी रोक कर भग्गा को गौर से देखने लगी। उसने फट से गाड़ी लगायी और बाहर आ गयी। भग्गा ने बड़ी उम्मीद से याचना दोहराई, अश्रु भरी आंखें छलक पड़ी लेकिन उस युवती पर उल्टी ही प्रतिक्रिया हुई।

          ‘‘खबरदार ये एक्टिंग मुझे न दिखाना – चल दूर हट तुम लोगों को काम करते आफत आती है, मज़े से भीख मांग लो – भीख मांगना, चोरी चकारी करना और बच्चे पैदा करना – बस ये ही काम है तुम लोगों के, चलो भागो यहां से, सरकार ने भीख मांगने पर पांबदी लगाई है…..चली नहीं….।’’

          युवती की फटकार से वो सुन्न हो गयी। एक दूसरी युवती जो दूसरी मंजिल से ये सब देख रही थी उसने भी प्रतिक्रिया की, – ‘‘इन लोगों की ही वज़ह से देश तरक्की नहीं कर पा रहा है। एक दिन मैं अपने विदेशी पार्टनर्स के साथ मार्किटिंग के लिए गयी – साले भिखारियों के हज्जूम इकट्ठा हो गये हमारे इर्द-गिर्द, हजार दुत्कारने पर भी चिपटे ही रहे।

          दोनों महिलाए आपस में बाते करने लगी, तभी घर का नौकर जिसने खिड़की से देख लिया था और किचन से कुछ खाना लेने चला गया था। वह चार-पांच रोटी और सब्जी लिये बाहर आया, उसे बीबीजी के आ जाने का ज्ञान न था, शायद वे इस समय घर आती भी नहीं है। नौकर के हाथ में रोटियां देख कर वो उस पर टूट पड़ी,- ‘‘हरामखोर तुझे किसने कहा रोटी देने के लिए….. बड़ा दाता-दानी बन रहा है।‘‘ उसने गुस्से में उसके हाथ से रोटियां छीन पास बैठे कुते के सामने फेंक दी, कुते ने रोटी सूंघ कर छोड़ दीं।

          दूर जाती भग्गा ने देख लिया था – उसमे एक विद्युत का संचार हुआ और भागकर उसने रोटियां और सब्जी जमीन से उठा ली।

          मालकिन ने नौकर से चौकीदार को तलब किया, ‘‘देखा कैसे नौटंकी कर रही है, अपने कहे को सही बताने के लिए , दरअसल ये औरते सालियाँ दिन में मालूमात इकट्ठा करती है और रात में इनके मर्द आकर चोरी करते है।’’

          भग्गा जान छोड़ अपने बच्चों को घसीटती भागी चली जा रही है जैसे कुबेर का खजाना उसके हाथ लग गया हो, वह कॉलोनी से बाहर निकलने वाली ही थी कि पीछा करता चैकीदार आ गया, – ‘‘हरामजादी, जरा सा मैं मर्दाना काम करने चला गया तो कॉलोनी के अंदर घुस आयीमुझे डांट खिलवा दी।‘‘ भग्गा रोटी सीने से लगाये बच्चों को घसीटती निकल गयी। जैसे उसने कोई किला फतह कर लिया था।

 IMG_1792         अब वह अपने छोटे बच्चे के लिए दूध की फिक्र में बाजार की ओर निकल आयी, बच्चे ने रोटी का एक-आध ही लुकमा बड़ी मुश्किल से खाया था। वह अभी दूध पर ही था, कभी-कभार बिस्किट, दाल-चावल टूंग लेता। कई दिनों तक दूध न मिलने से वो बीमार भी हो गया था। इधर कई घंटे से वो तपती धूप में बेहोश भी पड़ा रहा था। भग्गा सोच रही है किसी डॉक्टर से मिन्नत कर लेगी, शायद तरस आ जाये लेकिन दूध के लिए कही से कुछ पैसे मिल जाते तो?……

          बेचारी बीमार बच्चे को सामने रख, आने-जाने वालों के सामने गिड़गिड़ाती, याचना करती, बच्चे की हालत निरंतर खराब होती जा रही है। आते-जाते लोगों ने कुछ पैसे उसकी झोली में डाले, उसने तुरंत अपने बड़े लड़के को वो पैसे दूध लाने के लिए दे दिये और प्रतीक्षा करने लगी।

          तभी इस सड़क पर कॉलोनी वाली संभ्रांत युवती की गाड़ी ठीक उसके सामने आकर रूकी, शायद सड़क पर ट्रैफिक अधिक था। महिला ने बाहर की ओर झांका तो उसे भग्गा अपने बच्चे के साथ बैठी नजर आयी। महिला ने अपने साथ बैठी दूसरी युवती को उसे दिखाया, – ‘‘अरे इधर ये देख, देख ये वही है न,’’ उसने मजाक करते हुए उसे आवाज लगायी, ‘‘ऐ! क्यों एक्ट्रेस…….. वाह! क्या बात है, देखो साली ने इस छोटे से बच्चे को भी क्या ट्रेन्ड किया है कैसे सिसकियां ले रहा है साला, जैसे अभी दम निकलने वाला है, वंडरफुल एक्टर है।‘‘ यह कहकर दोनों जोर से हंसने लगी। तभी किसन एक टूटे गिलास में दूध लेकर आ गया उसने शाबाशी लेने के लिए अपनी मां से कहा, ‘‘मां दो रूपये का कोई दूध नही दे रहा था – मैंने…. एक आदमी की जेब से पांच रूपये निकाल लिये… हाँ ले……. भईयां को पिला……. गरम है।‘‘

गाड़ी में बैठी महिलाओं ने शायद ये सब सुन लिया था एक गुस्से में उतरी और गिलास पर एक हाथ मारा, गिलास दूर जा पड़ा और साथ दो-चार घूंसे भी रसीद किये, ‘‘चल मैं तुझे अभी पुलिस को देती हूं बास्टर्ड जेब काटता है, चोर साला।‘‘ तभी पीछे वाली गाडियों के होर्न बजने लगे थे, ट्रैफिक चल पड़ा था, उसे भाग कर अपनी गाड़ी में जाना पड़ा वर्ना किसन को तो वह मार ही डालती। दम तोड़ते बच्चें से नजर उठा कर भग्गा ने महिला को देखा, उसमें भी पूरी दुनिया को भस्म कर देने का आक्रोश जागा लेकिन अपने दम तोड़ते बच्चे की ओर नजर डालते ही वह बेबस हो गयी, वह तड़प कर रह गयी – ये वैसी ही बेबसी की कैफियत है और इस मुल्क के आम-आदमी की बेबसी से मेल खाती हैं। अब उसमे इतनी भी शक्ति न थी कि चिल्ला कर अपना रोष प्रकट कर सके या रो भी सके।

          किसन ने गिलास में बचा कुछ दूध अपने भाई के मुंह में डाला बच्चे ने दूध की बूंदें मुंह में पड़ते ही आंखें खोल दी। किसन चिल्लाया, ‘‘माँ भईया ने आंखे खोल दी, मैं और दूध लाऊंगा……… हां….और……।‘‘ नन्हा सा बेजबान कुछ कहना चाह रहा होगा लेकिन वह अपनी यात्रा के अंतिम बिंदु पर “माँ”कहने की भी स्थिति में नहीं हैं अपनी खुली आँखों में अपनी माँ और भाई के दृश्य अंकित करते-करते वह चला गया दूर…..बहुत दूर।

          दुर्भाग्य है कि इक्कीसवीं सदी में भी इनकी कहानी की इस फिल्म के प्रोसेसिंग और पॉजिटिव बनाने की अभी भी इस देश में कोई लैब नहीं है। नेगेटिव इंसान की जिदगी के साथ सड-गल जाता है उसका यथार्थ, खतम हो जाता है उनके साथ ही और कभी प्रकाशित नही होता।

      

हालांकि बम-कांड की जिम्मेदारी ली जा चुकी थी लेकिन पुलिस अस्सी के पकड़े जाने के बाद अपनी मुस्तैदी का सबूत देना चाहती थी। अस्सी से पुलिस ने उसके न किए सारे जुर्म भी स्वीकार करवा लिये थे।

          अस्सी का कोई पता तो था नहीं, हां….. गंदी बस्ती में पनाह मिलने की उम्मीद मे उसका परिवार बस्ती के पास ही डेरा डाले हुए था। यही उसका पता था लेकिन वह दुख झेलते परिवार को और मुसीबतो में नहीं डालना चाहता था इसलिए वह हमेशा पुलिस को इस बस्ती का पता नही देता था लेकिन इधर रह-रह कर उसे अपने परिवार की याद सताने लगी, सोचता कैसे गुजर-बसर कर रहे होगे वो लोग…….. क्या कुछ बीत रहा होगा उन बेचारो  के साथ … इंतजार कर करके पागल हो चुकी होगी उसकी पत्नी और बच्चे जिनसे उसे बहुत लगाव था। आज की पूछ-ताछ में उसने आखिर उस बस्ती का सही पता बतला ही दिया कि उसे अपने बच्चों को देखने का शायद मौका मिल जाये।

          लेकिन पुलिस का शक़ उस पर और भी पुख्ता हो गया। क्योंकि तहकीकात से मालूम हुआ कि वह बस्ती कुछ दिन पहले ध्वस्त की जा चुकी थी पुलिस का मानना था कि हिरासत में रहते हुए भी उसे कोई गाइड कर रहा है, वर्ना उसने उस बस्ती का ही पता क्यों बताया जिसे कुछ दिन पहले ध्वस्त कर लिया गया था। पुलिस ने रिमांड की अवधि बढ़वा ली और अब उस पर थर्ड डिग्री इस्तेमाल किया जाने लगा और अब तो वह पूरी तरह से आतंकवादी साबित हो चुका हैं।

          जिन लोगो ने बम-कांड की जिम्मेदारी ली थी उन्हें न तो पकड़ा गया और न ही उनसे कुछ पूछा गया। हजारों के मारे जाने, अरबों के नुकसान, भय और आतंक फैलाने के जुर्म, देश-द्रोह करके कबूल कर लेने पर भी राजनीतिक कारणों से उन पर अभी तक कोई कार्यवाही नहीं हुई थी कि कहीं दूसरी राजनीतिक पार्टियां इसका फायदा न उठा ले। वोट की राजनीति में बम-कांड के जिम्मेदार लोग सीना तान के अपनी ताकत का एहसास करा रहे हैं और दूसरी तरफ अस्सी मार खा-खा कर अब शायद मरने के करीब है।

 30poverty5         अस्सी के बारे में अभी हाल की तहकीकात से पता चल चुका था कि वो एक कपड़ा मिल में फोरमैंन था। मिल में तालाबंदी के बाद मालिकान उसे मौका पाते ही बेच कर अमेरिका चले गये थे और मिल की जगह खरीदने वालों ने लोगो से मिल के मकान आदि खाली करवा लिये थे, नौकरी और छत दोनो चले गये। करीब दो सौ मिले बंद हो चुकी थी और लोग बेसहारा हो चुके थे। अस्सी को भी एक अरसा हुआ था, कहीं काम-धाम न मिला था -कुछ दिन पहले ही यह नौकरी मिली तो ये कांड हो गया। पुलिस के पास सारे तथ्य आ चुके हैं लेकिन वह तो इसे खतरनाक आतंकवादी साबित कर चुकी थी, अब अफसर परेशान हैं। कुछ दिन पहले ही पुलिस कस्टडी मे एक मौत हो चुकी थी, वह मसला अभी ठंडा भी न पड़ा था कि अस्सी की हालत खराब हो गयी।

          पुलिस आखिर क्या करती। एक दिन अखबारों में सुर्खियां आई – ’’एक खतरनाक आतंकवादी पुलिस की हिरासत से भाग निकला और शक़ किया जा रहा है कि वह किसी बाहर के मुल्क में जा चुका है।’’

सात-आठ वर्षो से अधिक का समय बीत चुका है, सबकी जिदगी मे निर्धारित परिवर्तन आ चुके है, जैसा कि हम अक्सर देखा करते है। अस्सी की बेबसी और वक्त ने उसका जो मेकअप किया है वह घूरे पर वर्षो से पड़े किसी जंग लगे कनस्तर की तरह से ही था जो जंग से गल-सड़ गया था और अब जिसकी टूट-फूट की मरम्मत की गुंजाइश खतम हो चुकी थी। अस्सी के जख्म नासूर बन चुके थे, हाथ-पैर टूट चुके थे। किसी के मर जाने के बाद उस मृत की एक बैसाखी उसे मिल गयी थी और वह उस पर लटक-लटक कर सड़क के एक सिरे से दूसरे सिरे तक, जहां लोगो की आवाजाही रहती पहुंच जाता और भीख मांगता नजर आता है।

          वह कभी-कभी भीख मांगना भूल कर आती-जाती भीड़ में अपनी पत्नी और बच्चों को तलाशता रहता हैं। रोज उसमें एक आस उगती और मर जाती और फिर इंसान को जिदा रहने के लिए मजबूर कर देती कि कभी तो वो मिलेगे।

          शायद इसी आस ने भग्गा को भी जीने के लिए मजबूर किया होगा लेकिन पिछले पांच वर्षो में उसमें रोटी के लिए इतनी बीमारिया लग चुकी है कि अब वह जिदा रह पायेगी या नहीं, यह कह पाना बहुत मुश्किल है। रंडियों की इस बस्ती में वह सस्ती गिनी जाने वालियों में से थी, बीमारी जब बदन पर झांकने लगी तो उसे वहां से निकाल दिया गया। अब वो अपनी रोटी कमाने लायक नही रह गयी थी। किसन आवारा होने के अलावा और क्या बन सकता था वह पंद्रह का हो चुका है और आवारा लड़को के साथ स्टेशन पर अड्डा जमाये रहता –हाँ कभी कभार वह अपनी माँ की सुध ले लेता था।

Homeless children reach out from behind a fence as they wait to collect free clothes at a local charity in the northeastern Indian city of Siliguri          आज देशव्यापी हड़ताल थी और ऐसे में बड़ी मुश्किल हो जाती है गरीबों, मुफलिसों और भिखारियों के लिए क्योकि लोग सड़क पर निकलते ही नहीं, अक्सर इस तरह के लोग ऐसी स्थिति में स्टेशन पहुंच जाते है, ताकि गाडि़यों के यात्रियों से बचा-खुचा खाना या पैसा-धेला मिल जाएगा।

          एक गाड़ी के रूकने पर अचानक प्लेटफार्म पर भगदड़ मच गयी। दर्जनो लोग डिब्बों से उतरकर किसी को मार रहे है, ‘साला चोर! हरामजादा!!’ –आने जाने वाले भी लात घूंसा जमा कर अपना फर्ज अदा कर रहे है, बेचारा तड़प रहा है, उसकी चीख के साथ ही एक औरत उसे बचाने की खातिर उस पर अपने शरीर की आड़ किये हुए है लेकिन लोगो का मारना-पीटना जारी हैं औरत दया की भीख मांग रही है, मिन्नतें कर रही हैं। दूर खड़ा बेबस अस्सी गौर से इन्हें देख रहा है – उसकी सांस भारी हो रही है। लगता है जैसे वो सारे प्रहार उसी पर हो रहे है। वह सोच रहा है कि अगर उसका लड़का जिन्दा होगा तो इतना ही बड़ा हो चुका होगा। अचानक अस्सी में उसके प्रति सहानभूति जाग गयी, प्यार उमड़ आया। वह बैसाखी लिये आगे बढ़ा, लोगो से मिन्नते करने लगा, ’’…….साब बच्चा है इतना तो मारा है बेचारे को -छोड़ दीजिए – हट जाइए – बस बहुत हो गया – उसने बैसाखी की आड़ बच्चे को दे दी, गाड़ी ने सीटी दे दी, यात्री-गण भाग कर गाड़ी में चढ़ गये तभी किसन की जान बची।’’

          लड़के और औरत पर बेहोशी तारी है, अस्सी ने एक पानी की गंदी सी बोतल निकाली और लड़के के मुंह में पानी डाला…… औरत को भी पानी पिलाया। वो दोनों तनिक होश में आये , बूढ़े ने हिदायत दी, – ‘‘अरे जल्दी उठा ले इसे , पुलिस आ गयी तो मुश्किल में पड़ जाओगे, चलो उठा लो,’’ बूढ़े ने भी हाथ का सहारा दिया और प्लेटफार्म से बाहर ले आये, धूप तेज थी , वे थोड़ी ही देर में वो उसे एक बरगद के पेड़ के नीचे उसे ले आये।

          बूढ़े ने नजर भर कर उस लड़के को देखा और फिर उस औरत को , उसे आभास तो हो गया है कि कही ये उसकी ही पत्नी और लड़का है। उसने फिर भी जतन से काम लिया,- ‘‘मेरा बेटा भी इतना ही बड़ा हो गया होगा, किसन नाम था उसका।’’ लड़का और वह स्त्री एकदम से चौंक पड़े, ’’हां इसका नाम भी किसन है मेरा ही बेटा है ये,’’

          अस्सी आश्चर्यचकित सा उनकी ओर देखने लगा, ’’कहीं तुम्हारा नाम भग्गा तो नहीं।’’

          ‘‘हां मैं भग्गा हूं कितना बदल गये हो तुम!’’ यह कह कर भग्गा अस्सी से लिपट गयी,-‘‘ये क्या हाल बना लिया है तुमने…… किसन ये तेरे बाबू हैं रे……।’’ वक्त ने और हालात ने उन्हें इतना बदल दिया था। सब एक-दूसरे को अजनबी लग रहे है लेकिन आत्मीयता की आँख उन्हें कब का पहचान चुकी थी, उन्होंने एक दूसरे को जकड़ लिया। भग्गा रूंधे गले से बुदबदाई – ‘‘ईश्वर तूने मिलाया भी तो इस हाल में, इस तरह?’’

          किसन बाप के सीने से लगा बिलख पड़ा, ‘‘कहां चले गये थे बाबू हमें छोड़ के……….कहां चले गये थे? बाबू यह तो तूने आज देखा है – सच बाबू मेरी कोई भी हड्डी साबुत नही है। बाबू बहुत मारते है लोग और पुलिस। माँ को भी रंडी बाजार में कई बार पिटना पड़ता था, कभी पुलिस, कभी लोग मारते थे, बहुत मारती है दुनियां हमें…..मालूम है, छोटा भईयां भूख से तड़फ रहा था और उस दिन एक मेम साहब ने दूध भरे गिलास में हाथ मार कर गिरा दिया था नहीं तो भईयां भूख से नहीं मरता – कई दिनों की भूख से वह तड़प रहा था- वह भूख से मर गया…..।’’

          अस्सी सुन्न हो गया था और अचानक उसमें क्रोध की ज्वाला प्रज्जवलित हुई… उसने बैसाखी एक तरफ फेंक दी और एक पत्थर उठाया। उसने अपनी पूरी ताकत से वह पत्थर उधर से पास होने वाली एक लोकल ट्रेन पर दे मारा जैसे वह बदला ले रहा हो इस बेरहम समाज से, उसकी और ज्यादतियों से, इस मुल्क की व्यवस्था और कानून से, यहां के प्रजातंत्र और मानवतावादी दोगलों से, यहां की सभ्यता-संस्कृति और इतिहास से और उस धर्म से जो इन्हे नपुंसक बनाये हुए है। इस बीसा के खिलाफ अस्सी की बगावत का यह पहला पत्थर है, अस्सी की युद्ध घोषणा है यह पत्थर!

»»»«««

(यह कहानी कथाबिम्ब, आउटलुक, नवनीत नयी दुनिया आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी है)

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s