अभी से..


जनाब, लागों के एतराज़ात, सिगरेट पेकेट पे लिखी वारनिंग आदि के बावजूद हम सिगरेट न छोड़ने को वैसे ही मजबूर है जैस हमारा भारतीय मानस बेईमानी और भ्रष्टाचार से हजार कानूनों के होते हमारी मॅारालिटि और सिविलिटि पर प्रश्न चिन्ह लगाने के बाद भी आदतन छोड़ पाने में असमर्थ दीख पड़ता है। इधर व्यक्तिगत स्वास्थ का प्रश्न है तो उधर कानून और मॅारालिटि का, जो स्वस्थ समाज की रचना करते है।

अभी से1बहरहाल अगर सार्वनिक स्थानों पर निषिद्धता के कारण हम नही पी पाये तो उसके आस पास की किसी दुकान के कोने के अन्दर या इधर उधर देखके ज़रा किनारे होकर हम सिगरेटिया आनंद ग्रहण कर देते है। जनाब, हम अपने भारतीय मानस में बैठी स्वदेशी फिलौस्फ्य के कायल है कि आँख बचाकर जो सुख भोग लो वही सुख है बाकी जिन्दगी में दुख ही दुख है।

लोगों के एतराज़ पर हम कभी-कभी ये दलीली जुमला धुएं की तरह हवा मे उछाल देते है कि अगर हम सिगरेट नही पियेंगे तो पता कैसे चलेगा की सिगरेट पीना बुरी आदत है। कभी-कभी हम लोगों को समझाते है कि सिगरेट पीने से खाँसी आती है और खाँसी से निमोनिया बाहर निकल जाता है। सिगरेट पीने से हृदय की धड़कन तेज हो जाती है और हम व्यायाम की कवायत से बच जाते है। सिगरेट पीने से भूख मर जाती है जो आदमी को मोटा होने से बचाये रखती है। सिगरेट पीने वालो की जमात का समपूर्ण समाज को ऋणी होना चाहिए कि हम लोग गिनीपिग का रोल अदा करते है। ताकि लोगों को पता चलता रहे कि सिगरेट पीने से कैंसर हो जाता है और उच्च रक्तचाप की बीमारी में ये इजाफा करती है। ये जो भी है छोडिएं सिगरेट पीने से दिल की बीमारी होनी है तो हो लेकिन उस वक्त जो दिली सुकून मिलता है उसका कोई जवाब नही। जनाब, क्या मसर्रत और मजा आता है जब रात में दुकाने बन्द हो जाती है और सिगरेट ढूंढे मिलती नही तो उस वक्त हम ऐश ट्रे से सिगरेट के टुर्रे (टोटे) निकाल निकालकर एक दो कश में परमानंद को प्राप्त हो जाते है।

अब अताईए जब हमारे धर्म धुरन्दर कहते है कि ये शरीर नश्वर है आत्मा अमर है, शरीर नया चोला धारण करता है तो फिर इस शरीर की इतनी चिन्ता ही क्यों? और उस अदृश्य आत्मा पे तो सिगरेट का कोई बुरा असर होने से रहा। -चलिए इसे भी छोडि़ए मैं कहता हूँ कि सिगरेट पीना हर तरह से ठीक नही है तो फिर इसका निर्माण ही क्यो किया जाएं, इसके निर्माण पर देश विदेश की सरकारों को प्रतिबन्ध लगा देना चाहिए लेकिन फिर उनके मुद्राकोष की सेहत का क्या होगा?

भले लोगों के कहने से हमने नशामुक्ति दिवस पर सिगरेट छोड़ने का इरादा कर ही लिया लेकिन ये वैसा ही हुआ जैसे पंद्रह अगस्त, छब्बीस जनवरी को झन्डा चढ़ा और भाषण देकर देशभक्ति के संकल्प से लोग फारिग हो जाते है। -जो हुआ सो हुआ अबकी हम खुद डंडा लेकर अपने पीछे पड़ गए, हमने अल्लाह को हाजिर नाजिर मानकर एैलान किया कि आज ये हमारी आखरी सिगरेट है-फिर दो-चार घण्टे बीते और आखरी एैलान किया कि ये हमारा अखीरी पॅकेट है लेकिन हमारी नियत से अल्लाह मियां ख़फा. नज़र आए……।

ये सिगरेट है! ऐसे नही छूटेगी जब हम अस्पताल में होंगे और हमारा कैंसर का इलाज चल रहा होगा या अटेक आने पर इन्टेंसिव केयर में होंगे ,ये शायद तभी छूटेगी। ……पर ऐसी कल्पना करके क्या हम अपने साथ अपना रिस्ता दुश्मनों जैसा तो नही बना रहे है? या फिर झुन्झलाहट में हम ऐसा तसव्वुर कर रहे है। फिर भी मन कहता है छोड़ यार छोड़ लेकिन कितनी बूराईयों को छोडे़गा, मरना तो एक दिन है ही दस साल पहले ही सही। पर इसी वक्त हमारे ज़हन में अब एक बुनियादी सवाल चक्कर काटने लगा है। मेरे चाहने वाले हमेशा कहते है कि यार हमें तेरी जरूरत है पर क्या हमें इन चाहने वालों की बात पर यकीन करना चाहिए? …..पर.मुझे कभी कभी उन दोस्तों और प्रियजनों की बहुत याद आती है, वो क्यों चले गए मन बहुत दुखी होता है, बड़ा मिस करता हूँ में उन्हें। ये प्यार का ज़ज्बा… कहीं मुझसे ये तो नही कह रहा कि खुद को इस तरह खत्म करने की क्या जरूरत है ….कहीं….मेरी बेटी, जरूर ये कामना करती होगी कि पापा आप की उम्र बहुत लम्बी हो।….मेरा कूत्तु जिसे मेरी हर क्षण जरूरत है वो हर क्षण मेरी मौजूदगी चाहता है, क्या उसे पता है कि मै क्या कर रहा हॅू अगर उसे पता चल जाये तो क्या वो मुझे सिगरेट पीने देगा? पेकेट उठाकर भाग जाएगा और तोड़मरोड़ कर उसके टुकडे़ – टुकड़ें कर डालेगा। मैं अपने लिए न सही, अपने प्रियजनों के लिए ज्यादा दिनों तक जी सकूं इसलिए मैं सिगरेट छोड़ रहा हूँ कल से नही आज से भी नही अभी से…….

पर बड़ी याद आएगी मेरी संगिनी सिगरेट जो खुद राख होकर न जाने कब से मेरी जान के पीछे पड़ी रही, और मेरे दिल का गुब्बार धुएं में तब्दील करती रही।

नसीब  में,  इश्क  के है, AmarSneh

हासिल   सिर्फ   जुदाई,

बहुत  याद  आएगा   तेरा,

लबों से लगना, सुलगते रहना,

हर क़शपे राख मे बदलते रहना।

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One thought on “अभी से..

  1. अवेनिन्द्र मान says:

    शायद छोड़ दूं या पीता रहूँ । वैसे 2012 में मेरा कैंसर का ऑपरेशन हो चूका है । आपकी पोस्ट ने झकझोर दिया ऐसा नही कहूँगा मगर बहुर बहुत गहरा निशाँ बना गयी मन पे ।

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