मी येतो..


सदियाँ बदल गईं, लेकिन इनकी किस्मत कभी न बदली। हाथों पर पत्थर की लकीरें लिए ये इस सदी में पहुँच गए। इनकी बेबसी इक्कसवीं सदी के रहनुमाओं से कभी-कभी कह उठती है कि जरा मुड़कर तो देख लो……कहीं ऐसा न हो कि इस मुल्क की तरक्की का पैमाना वक्त इनको ही न मुकर्रर करदे, फिर उनके दम्भ का क्या होगा? – बहरूप भरके उनकी सदियों पुरानी साजिश इन बेबसों का पीछा करने से बाज नही आती है।

Mi yetoबाल पकड़-पकड़कर उसे घसीटा जा रहा था। लात, घूंसे और ठोकरों से मार-मारकर लोग अपना जौहर दिखा रहे थे। कुछ देर तो वह खुद को बचाता रहा लेकिन जब उसकी शक्ति चुक गई, तो उसकी बेबसी ने उसको मार खाने के लिए छोड़ दिया था। इस वक्त ऐसा लग रहा था, जैसे वह इस देश का संविधान है। भारतीय तहजीब का आईना है ये जो चूर-चूर हो चुका है।

वह बेदम हो चुका है और मारने वालों की आंखों में जीत की रोशनी नुमायां हो रही है उसकी रोटी का जरिया चारों ओर बिखरा पड़ा है। बस अड्डे के सैकडों तमाशबीनों के बीच से निकलकर एक कुत्तों के कुनबे ने हिम्मत दिखाई और वो मारने वालों पर भौंकने लगे , पर तमाशबीनों ने पत्थर मार कर उनकी हिमायत की भी खबर ले ली। इस बीच कुछ फिकरे हवा मे बराबर गूंज रहे थे – ’’ही मुंबई तुझा बापा ची आहे काय, या लोकान्य येथून काढ़ला पाहिजे !’’ (ये मुंबई तेरे बाप की है क्या! इन लोगों को यहाँ से निकालना पड़ेगा)।

उस वक्त उसके मस्तिष्क में वे पल कौंधने लगे थे जब उसके देस में सवर्णो ने एक नेता की छत्रछाया में सैकड़ों गरीबों के झोपड़ो को जलाकर राख कर दिया था। कुछ लोग तो सोते में अपनी झोपडि़यों के साथ ही जलकर मर गए थे।…… उसकी अधजली मां ने कैसे पूरे परिवार को जलती झोंपड़ी से निकाला था।

                अचानक एक पुलिस की गाड़ी शोरशराबा सुनकर बस अड्डे के पास रुकी। इंसपेक्टर कांबले मंत्रीजी की इलेक्शन रैली के बंदोबस्त से लौट रहे थे। यह एरिया उन्हीं की पुलिस चौकी की में पड़ता है, जो बस अड्डे के पास ही स्थित है। मारने वाले कुछ लोग तो पुलिस की गाड़ी देखकर भाग गए, लेकिन कुछ अभी भी चने वाले पर पिले पड़े थे। पुलिसकर्मियो ने किसी तरह मारने वालों को काबू किया, लेकिन दाएं-बाएं से वो फिर भी उन्हीं जुमलों के साथ दो-चार जड़ते रहे। ’’भईया साला….. या लोकांना येथुन काढ़ले पाहिजे…।’ इंसपेक्टर कांबले ने अपने पुलिसकर्मियों से मारपीट करने वालो को पुलिस चौकी ले जाने को कहा। वह जमीन पे पड़े चने वाले की तरफ मुड़ा, ‘काय नांव तुझा….. काय मारपीट केली तू ?’

‘मेरा नाम…. मेरा नाम…. रामप्रसाद पांडे….. साब मेरा कोई कसूर नहीं है। इन लोगों ने मुझे मारा  एक लाल कमीज वाला रोज मुझसे पांच हजार रुपया मांगता था, कहता था ये उसका एरिया है…।’ उसके सिर से खून की धार अभी भी बह रही थी।

                एक बूढ़े व्यक्ति ने हिम्मत करके उसे पानी दिया। कुछ घॅूट पानी पीने के बाद वह कुछ संभला और उसने अपनी जेब देखी, साइड की जेब ही कोई फाड़ ले गया था वो चिल्लाया, ‘साब, मेरी पूरे महिने की कमाई लूट ली साब….।’

                -‘देख देख तुम किदर में रखा होगा,’ इंसपेक्टर कड़क आवाज में बोला।

-‘साब जेब ही फाड़ ले गए….मेरी पूरे महिने की कमाई गई।’ तभी बूढ़े व्यक्ति की नजर एक पैकेट पर गई और वो उसे उठाकर चनेवाले के पास ले गया। चनेवाला जल्दी-जल्दी खोलकर देखने लगा, इंसपेक्टर ने पूछा, ’’ मिल गया तुम्हारा पैसा ?’’

-‘’नही साब ये तो मेरी एम.ए. की डिगरी है।’’ – उसकी डिग्री खून से सन गई थी, वह बिलखने लगा। दर्द से आहत वह खड़ा नहीं हो पा रहा था। इंसपेक्टर ने उससे पूछा, ‘और कौन था मारनेवाला ?’

वह कुछ भी नहीं बोल पा रहा था। इंसपेक्टर ने उसे पुलिस चौकी ले जाने का आदेश दिया। पुलिस वालों ने उसका सामान उसे समेटकर दे दिया और वह चने बेचने के कंटेनर को किसी तरह घसीटता चलने लगा, उससे चला नहीं जा रहा था।

इंसपेक्टर कांबले ने लोगों से पूछताछ के बाद उसे धक्का देने वाली महिला से पूछा कि क्या भइया ने उससे कुछ छेड़खानी की थी ? -तो उसने बताया कि ऐसा उसने कुछ नहीं किया और वह तेज आवाज में बोलने लगी, ‘’ ही भइया लोक चार-चार पांच-पांच हजार रुपए हर माह गावी पाठवितात, पोस्ट- आफिस मधे मोठया रागां लावतात….।’’ (ये भइया लोग पैसा कमा-कमाकर चार-चार पांच-पांच हजार रुपए अपने गांव भेजते हैं, जब देखो पोस्ट आॅफिस की लम्बी लाइनों मे मनीआर्डर के लिए खड़े रहते है।) इंसपेक्टर कांबले ने चुटकी लेते हुए कहा,‘आहो बाई काय करणार, हमारे वरिष्ठतम पुलिस अधिकारी भी उत्तर भारतीय हैं।’’ – उन्होंने कुछ चश्मदीद गवाहों और इस महिला से पुलिस चौकी पर चलने के लिए कहा। तभी उस बूढ़े की नजर उस लिफाफे पर गई, जो चनेवाले भइया के हाथ से फिर गिर गया था, उसने वह लिफाफा इंसपेक्टर को दिया, ‘साब, उसी का सर्टिफिकेट है शायद उसके हाथ से गिर गया था।’ – उन्होंने लिफाफे से उपाधि निकालकर देखी और एक क्षण सोचने लगे।

                रिपोर्ट आदि लिखे जाने की जब कारवाई पूरी हो गई, तो इंसपेक्टर कांबले ने चनेवाले भइया को अपने चेंबर में बुलाया। उन्होंने कड़क आवाज में पूछा, ’‘तेरा नाम क्या है ?’’

-‘’सर, मेरा नाम रामप्रसाद पांडे है।’’

                -‘’तू झूठ बोलता है, तेरी एमए की डिगरी में तेरा नाम राम प्रसाद पासवान लिखेला है।’’

                वह बिलख पड़ा, ’’हां साब मैं झूठ बोला। मुंबई आकर मैंने अपनी जात छिपा ली थी। नीच जाति की वजह से देस में लोग हमारे ऊपर अन्याय करते थे।…… हमारी झोपडि़यों को आग लगा देते थे। मेरी मां जल गई थी, उसकी टांगें काटनी पड़ी, वह सदा के लिए अपाहिज हो गई। गांव छोड़ हमें शहर आना पड़ा…… मेरे पिता ने रिक्शा चलाकर हमारा भरण-पोषण किया, लेकिन शहर में भी लोग हमें हीन दृष्टि से ही देखते रहे, ….. ।….नौकरी के लिए वहां भी बहुत कोशिश की, रिजर्वेशन का सिर्फ शोर ही शोर है। लोग पचास-पचास हजार रुपये रिश्वत मांगते थे, फिर मैं काम के लिए मुंबई आ गया और अपनी पहचान बदल दी बेबसी में यहाँ  मजदूरी की, कुछ जोड़कर चने बेचने लगा। यहाँ  पंडित बन कर थोड़ा सुख मिला, जात-पात के अपमान से बच गया।……….. लेकिन यहां फिर मेरी बदनसीबी भेस बदलकर मेरे पीछे लग गई ….।’’ – उसकी जबान लड़खड़ाने लगी। उसके जख्मों में और टीस भड़क गई। उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा है वह बुदबुदाने लगा, ‘’मुंबई मेरे देश में है, लेकिन साहब इस देश में कहीं मेरा गांव, मेरी छत….मेरा घर नहीं…..है।’’ -उस पर बेहोशी तारी होने लगी, उसकी नाक से खून बहने लगा। इंसपेक्टर कांबले की आँखों में आँसू छलक आए थे, उन्होंने उसे छिपाया, फिर आँसू पोंछते हुए अपने जूनियर को बुलाया और चने वाले भइया को अस्पताल भेज दिया।

                बहुत देर तक वो अकेले सोचते रहे, बार-बार उनकी आंखें नम होती रहीं, लगा जैसे भइया से उनका कोई रिश्ता है। उन्होंने भी निम्न जाति का होने के कारण कितने जुल्म और अपमान सहे थे और आज भी वह उससे मुक्त नहीं हैं।

                काफी सोचने के बाद इंसपेक्टर कांबले ने चनेवाले के केस में गिरफ्तार किए लोगों को अपने चेंबर में बुलाया। अकसर ऐसा होता नहीं है, लेकिन उन्होंने सम्मान से कुर्सियों पर बैठने को कहा, तो सबको आश्चर्य हुआ। वह गंभीर होते हुए बोले,‘माला काहीं सांगेचा आहे- आज हिंदी दिवस आहे, राष्ट्र भाषेचा सम्मान केला पाइजे मननू मी हिंदी तुन बोलणार, तुमाल है आवड़ेल का?’ (मुझे आप लोगों से कुछ कहना है। जो मैं कहना चाहता हूँ उसे हिंदी में कहूं तो आप लोगों को अच्छा लगेगा? आज हिंदी दिवस है, हिंदी राष्ट्रभाषा है, इसका सम्मान होना चाहिए)।

                सब लोगों ने अपनी सहमति जताई, तो उन्होंने हिंदी में अपनी बात कहनी शुरू की, ‘देखिए डिबेट या भाषण करना मेरा काम नहीं है मेरा काम लाँ ऐंड आँर्डर बनाए रखना है, लेकिन ऐसा करने से भ्रम और भ्रांतियां दूर हो सकती है तो क्या हर्ज है, इससे हमें भी कानून व्यवस्था बनाएं रखने में आसानी होगी। आज जो घटना घटी इसके पीछे बहुत विचित्र कहानी है। दरअसल एक गुंडा चने वाले भइया से पांच हजार रूपये मांग रहा था, उसका कहना था कि ये एरिया उसका है और बिना पांच हजार रुपए दिए वो यहां इस इलाके में धंधा नहीं कर सकता। उस बेचारे ने डरकर एक दो-बार सौ-पचास दिए भी लेकिन काफी समय से कुछ नहीं दिया। गुंडे ने एक योजना बनाई। उसे मालूम था महिने की आखिरी तारीख चल रही है, भइया के पास घर भेजने के लिए पैसे इक्ट्ठे हो गए होंगे। आज जब भइया बस में चढ़ा तो उसने एक-दो बार यंू ही उसे नीचे बुलाया और फिर यह कहते हुए बस में आ गया और शोर मचाने लगा कि ये मुंबई इनके बाप की नहीं है, इन लोगों को यहां से निकालना चाहिए। वह उसे घसीटकर बाहर निकालने  लगा। उसे मालूम था कुछ मराठी प्रतिक्रिया करेंगे, उसने आप की दबी हुई नफरत और भावनाओं को इन्कैश किया और आप लोग उसके साथ धक्का मुक्की और मारपीट करने लगे। मौका पाते ही वो पैसों समेत उसकी जेब ही फाड़ कर चम्पत हो गया – उसके पूरे महिने की परिश्रम से कमाई रकम चली गई जो उसने अपने घर भेजने के लिए जमा की थी। लेकिन आप लोगों के मन में नफरत क्यों है वो भी इस देश का नागरिक है जैसे आप। क्योकि वो छोटा और कमजोर आदमी है इसलिए बिना सोचे समझे लोग उस पर हमला करने लगे।……… इस देश के नागरिक को यह मौलिक अधिकार है कि वो कहीं भी जा सकता है और अपनी रोजी-रोटी कमा सकता है।

                एक और महत्व की बात है कि हम छोटे काम करने वालों से किसी भी प्र्रदेश को आकॅंना शुरू कर देते हैं। आज मुंबई में हजारों मराठी गरीब महिलाएं लोगों के घरों मे काम करती हैं तो लोगों को यह समझना चाहिए कि मराठी समाज या इस प्रदेश के पास खाने को नही है, ये लोग सिर्फ वर्तन मांजने वाले हैं ? – इस देश की अस्सी प्रतिशत आबादी गरीबों की हैं। जिनमें से बीस प्रतिशत को छोड कर बाकी ज्यादातर बेरोजगार और अनपढ़ है। ऐसे लोगों के पास न अपनी छत होती है न गांव, यूं कहना चाहिए कि इनका कोई स्टेट नही है, बस इन्हें जहाँ  कहीं भी आस उम्मीद होती है वहां अपनी रोटी कमाने चले जाते हैं और मलिन बस्तियों, छोटी अव्यवस्थित कालोनियों और फुटपाथों पर गुजार बसर करने लगते हैं फिर चाहे वह किसी भी प्रदेश का हो गरीब का न कोई स्टेट होता है न उसकी कोई पहचान, उसकी पहचान तो सिर्फ गरीबी है।

    अब बात आती है माईग्रेशन की, इन न्यू-र्याक, इफ यू स्टेन्ड एट टाइम – स्कवायर फार टेन मिनिट्स यू विल कम एक्रोस हंडेªस पीपल आफ डिफ्रेन्ट कलर्स एण्ड कंटरीज। – हमारे यहाँ  विभिन्न राज्यों के लोग हर बड़े महानगरों मे रहते हैं। और इसकी वजह हैं- व्यवसाय, व्यवसाय विशेष, शिक्षण, सरकारी नौकरी एवं तबादले इसके अलावा बेरोजगारी और अन्य सामाजिक कारण। अकेले उतर प्रदेश की बात करें तो वहाँ  बत्तीस से पैंतीस प्रतिशत लोग बाहर के प्रांतों के रहते है। रही बात जनसंख्या की तो जनसख्या का विस्फोट केवल मुंबई में ही नही है भारत के हर बडे़ महानगरों में है। – इस छोटे से जीवन का प्राइम टाइम एक स्थान पर काटने के बाद फिर लोग वहीं बस जाते है, उनकी परिस्थितियां बदल जाती है और वे वही के हो जाते है। भइया के संबन्ध में मुझे एक बात करनी है कि हमें मेहनत से कमाने वालों का सम्मान करना चाहिए। आप लोगों ने जो कुछ भी उसके साथ किया वो अमानवीय और गैरकानूनी है जिसके लिए आप को………..।’’

इसी बीच किसी मिनिस्टर के यहाँ से फोन आ गया कि भइया के केस में जिन लोगों को गिरफ्तार किया गया है, उन्हें फौरन रिहा कर दिया जाए। उन्होंने बहुत समझाने की कोशिश की कि यह एक गंभीर हादसा है, लेकिन उनकी कोई बात नहीं सुनी गई।

                वह मजबूर से खड़े सोचने लगे कि आज ही इलेक्शन रैली में मंत्रीजी ने राष्ट्रीय एकता और सामाजिक न्याय की बात की थी….. सोचते-सोचते वह उन लोगों के पास वापस आए, जिनको गिरफ्तार किया गया था, वो बेवस से कुछ देर तक सोचते रहे और फिर बोले, ’‘आप लोग जा सकते हैं।’’

                फोन की घंटी दोबारा बजी, लेकिन अब फोन अस्पताल से आया था। फोन पर बताया गया कि, ’’पुलिस द्वारा भर्ती किए गए मरीज को खून की सख्त जरूरत है, उसका कोई रिश्तेदार इधर में नहीं है।’’

इंसपेक्टर कांबले कुछ देर विचलित रहे और फिर उन्होंने एक बार सोचा और कहा, ’’मी इंसपेक्टर कांबले बोलतो मी खून देईल, मी…….?……. यस, मैं आता हूं, मैं खून दूंगा, शीध्र पहुंचता हूँ , मी येतो।’’

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s