अधर्म विस्तारक


नेशनल हाईवे के चैबीस घन्टे के कोलाहल से तंग आकर शान्ति की आस में मैं यहाँ एक पहाड़ी गाँव में आ गया। जब मैं पहली बार यहाँ मकान देखने आया था तो नयनाभिराम दृश्य को देख ये सोच लिया था कि रचनात्मक कार्यो के लिए इससे उपयुक्त स्थान कोई हो ही न सकता। लेकिन पहली सुबह ही मेरा मोह भंग हो गया। मुझे लगा कि मेरे पूरे जीवन का अनुभव बेमानी है मुझे इतनी भी अक्ल नहीं कि कम से कम ये तो देख लेता कि इस मकान के ठीक ऊपर मंदिर है।

       सुबह साढ़े चार बजे मैं नहा धोकर योगाभ्यास के लिए तैयारी कर ही रह था कि एक बेसुरी गगन भेदी आवाज ने पूरे वातावरण की एैसी तैसी कर दी। एक तो बेताली भोंडी वाणी दूसरे राष्ट्रभाषा हिन्दी के उच्चारण का जनाजा साथ धर्म-विस्फोटक (लाऊडस्पीकर) का फुल बॉलयूम। मैं बेवस होकर बैठ गया और इंतजार करने लगा कि महाराज थक कर चुप हो जायगे लेकिन एैसा नहीं हुआ- देसी घी और फल मेवा दुध खाकर पीकर पली सजी संवरी एनर्जी हमारे पूर्व जन्मो के पापों का इंतकाम ले रही थी।

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       मैं झेलता रहा…..झेलता रहा जब न रह गया तो गुस्से में बाहर निकल आया एक पत्थर पर नजर गई सोचा धर्म-विस्तारक भोपू पर दें मारूँ लेकिन मेरे अंदर के भारतीय विवेक ने कहा बेटा कहीं एैसा न कर बैठना अधर्म हो जाएगा। पाप का बाप हो जाएगा इससे भी बड़े नर्क में चैरासी हजार योनी भुगनी पड़ेगी……।‘‘ वो पत्थर मै अपने सर पर मारने ही वाला था कि ख्याल आया यहाँ अस्पताल तो छोड़ो आर.एम.पी. भी नही है जो अपने इलाज के बाद अस्पताल का पता ही बता दे। ये सोच कर मैने अपने पर काबू पाया कि आखिर इन इन्सान योनी के गधे महाराज को झेलने वाला मै अकेला ही तो नहीं हूँ- अचानक रचानत्मक विचार कोंधा क्यों न मै इस परिस्थिति में अपनी झेल-शक्ति का परीक्षण कर लूं। आखिर इससे अच्छा मौका कौन सा होगा। मैं साँस रोकर बैठ गया पर कुछ ही देर में हमारी झेल शक्ति जवाब देने लगी। फिर भी हमने हिम्मत न हारी विवेक और साहस का स्वयं को परिचय देते हुए अपनी झेल-शक्ति के अंतिम डिजिटल पॉइंट का संज्ञान हासिल करने में लग गए।

       कुछ ही समय के अंतराल के बाद हमारे धेर्य ने दुलत्ती झाड़नी शुरू कर दी और चीख-चीख कर कहने लगा कि एक बात हो तो उसे सह लिया जाए आखिर बेसुरे पन की भी हद होती है फिर महाराजधिराज जी का पवित्र आत्मा से प्रस्फुटित उच्चार स और श की शामत के साथ अक्षरों की जोड़ तोड़ का जो साहसिक दुस्साहस परम पूज्य कर रहें है वो संस्कृत और हिन्दी-पंजाबी फारसी तुड़ कन्नड़ का एैसा मिक्सचर सुनाई दे रहा है जैसे इन भाषाओं के कंकड़ किसी टूटे बर्तन में डाल कर हिलाए जा रहे है। मैने इस दलील से खुद को सांत्वना दी की च्यवनप्राश में भी तो दर्जनो जड़ी-बूटियों का मिश्रण का दावा होता है और लाखों बुड्ढ़े जवान होने की आस में उसे चाटते और झेलते रहते है। ………तभी भक्ति अनुराग में जो प्रलंयकारी गलेबाजी शुरू हूई कि मैं चेतनाशून्य केवल इतना महसूस कर पा रहा था कि कोई स्वरों के श्रगाँर को उजाड़-उजाड़ कर लय और ताल को सुबह की पावन बेला में विघवा कर रहा है !- हमारे कानो में लेन्डस्लाइडिगं करके पहाड़ से पत्थर गिरा रहा है!! ध्वनि विस्तारक से निरन्तर जो जहालत का विस्तार किया जा रहा है वो किसी भी नोरमल इंसान के लिए सह पाना संभव नहीं है।

       तंग आकर हमारे मन ने हमारे सामने घुटने टेक दिए तो हमें अपनी झेल-शक्ति के लास्ट डिजिटरल पॉइंट का अहसास हो गया और हम बेबस हो बाहर निकल आए दूसरी दिशा में। हम एक पहाड़ की चोटी की तरफ अग्रसर थे लेकिन वो रैंक-ध्वनि लगातार हमारा पीछा करने से बाज नहीं आ रही थी और तभी दूसरी ओर से एक और जवाबी हमला शुरू हो गया। एक दूसरे मन्दिर के बेरहम लाऊड्स्पीकर ने अपनी पूरी विस्तारक क्षमता से मतवाले ईश्वर प्रेमियों का जान लेवा कीर्तन प्रसारित करना शुरू कर दिया। लगता था जैसे एक सौ इक्यावन स्वर अलग-अलग अलाप रहे हैं। मैं कानों में उंगली डालकर एक टीले पर बैठ गया तभी सामने की झोंपड़ी से कई गधों और खच्चरों ने उनके सुर में सुर मिला दिया।

       शुरू में तो मैने सोचा कि ये ईश्वर प्रेमी भी अपनी श्रद्धा में ढेंचू-ढेंचू कर रहे है लेकिन दूसरे ही क्षण मुझे एैसा महसूस हुआ कि ये किसी इंकलाब की तर्जुतानी में अपना प्रोटेस्ट दर्ज करा रहे है। मुझे आत्मग्लानी हूई कि मुझसे अच्छे तो ये गधे ही है। सच कहता हूँ मुझे उनके ढेंचू-ढेंचू में ये साफ सुनाई दे रहा था अरे शोर मचाने वालो, बेसुरे कीर्तन आतंकियों ईश्वर तुम्हे सभ्य बनाए। ईश्वर ने जो सुबह की शान्ति दी है वह अनमोल है उसे भंग मत करो। अब इस सदी में तो सभ्य आचरण सीख लो पिछली सदियाँ तो इसी आस उम्मीद में निराश ही बीत गई।

(यह रचना नव भारत टाइम्स, नयी दुनिया और दैनिक ट्रिब्यून में प्रकाशित)

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