मास्टर जी


-अमर स्नेह

‘सास्त्रों (शास्त्रो) में लिखा है।’’ उनका तकिया कलाम बन चुका है। एक दिन एक शरारती लड़के ने उनकी खिल्ली उड़ाने की गरज़ से चार लोगों के सामने उनसे पूछ लिया, ‘‘क्यों गुरूजी आपने कौन-कौन से शास्त्र पढ़े हैं तो उन्होने धरती सरपे उठा ली, ’’अधम नीच तेरी इतनी हिम्मत कि तू मेरा इम्तिहान ले, अच्छा है ये कलयुग है कोई और युग नहीं है वर्ना खड़े-खड़े गुरु को अपमानित करने के अपराध में स्वयं भसम़ हो जाता। ……खैर कलयुग में तो गुरूओं का अपमान होना ही है सास्त्रों में लिखा ही है।’’ -लड़का उनके टालने की ट्रिक की प्रतिक्रिया में व्यंगात्मक भाव भंगिमाएँ बनाता रहा। मास्टर जी उसका मन्तव्य भाँप गए और उन्होने खिसिया कर कहा, ‘‘अरे जा तू मुझसे बड़ा बस, अपने बाप से भी बड़ा, अरे ब्रह्मा से भी बड़ा जा……।’’

 MAster jiकुछ देर के मौन के बाद लड़के ने फिर पिन मारी, ‘‘गुरू जी आपने मेरे सवाल का उत्तर नहीं दिया।’’ मास्टर जी भी खिलाड़ी थे उन्होने उसे उलझता देख जेब से एक चाक का टुकड़ा निकाला और दोनों हाथों की कुप्पी बाँध के हिलाया फिर दोनो हाथों को मुट्ठी बाँध उसके सामने कर दिया। लड़का खेल गया, उसने एक मुटठी पे हाथ रख दिया, उन्होने एैसे तीन आवर्तन किए और तीनो बार लड़के को खाली मुट्ठी मिली। (चाक तो कुर्ते की बाँह में छिपा लिया गया था) बस मास्टर जी फूल गए। उन्होने उसे दुत्कार कर कहा, ‘‘जब तेरी तकदीर में सब कुछ खाली ही खाली है तो मैं तुझे क्या जवाब दूँ।’’ लड़का शरमिन्द होकर खिसक गया। मास्टर जी ने अपनी झेंप मिटाने के लिए लोगों से कहा, ‘‘सास्त्रों में कहा गया है कि व्यर्थ के व्यक्ति के लिए सही सूचना भी व्यर्थ होती है।’’

शरारती लड़के ने हार न मानी वो मास्टर जी के पीछे हाथ धोकर पड़ा ही रहा। एक दिन मास्टर जी उसे एक हलवाई की दुकान पर शास्त्रों में मिष्ठान की महिमा का बखान करते दीख पड़े। बस उसने एक और शरारती लड़के को सिखा कर भेजा। मास्टर जी का शास्त्रिय बखान चालू था, ‘‘ सास्त्रों में लड्डुओं का बड़ा महत्व है……. लड्डुवन का भोग लगे संत करे सेवा जय गणेश जय गणेश देवा……..। ’’ लड़के ने बीच में ही पूछ लिया, ‘‘ गुरू जी रसगुल्ले, कलाकंद, बालूसाई, जलेबी का हमारे सास्त्रों में क्या महत्व है हमारे ज्ञान वर्धन के लिए इस पर भी प्रकाश डालें। ’’ मास्टर जी भौचक्के हो गए उन्होने उसे ऊपर से नीचे तक ग़ौर से देखा, ‘‘ भई मैं तो मिठाइयों के कुंड़बे के कुंड़बे का महत्व बता दूँगा, सास्त्रों की ज्ञान की गँगा बहा दूगाँ। सास्त्रों में लिखा है कि पाणी (पानी) मथने से घी नहीं निकलता। …..तो तेरी जेब में मिठाई खिलाने और खाने के पैसे हों तो जायके के ज्ञान के साथ सास्तरीय (शास्त्रिय) महत्व भी परकाशित (प्रकाशित) कर दूँगा। जेब में पैसे हों तो बोल?’’ -लड़का दुविधा मे पड़ गया। मास्टर जी ने उसका चेहरा भाँप तुरूप और लगा दी। ‘‘ सुन सास्त्रों में और क्या लिखा है। गुरू वैद अर जोतसी देव मित्र बड़राज, बिना भेंट इनते मिले पूरन होय न काज। ……..जा घर में पैसे धरे हों तो लेके आ जाइओ।’’ लड़का अपना सा मुहँ लिए चलता बना।

लोग सत्तू बाँध के मास्टर जी के पीछे पड़े नज़र आते हैं, रोज उनसे कोई न कोई उलझ ही जाता है। मास्टर तंग आ गए और अपना तबादला करवाने की सोचने लगे तभी एक हादसा हो गया। मास्टर जी लगता है अपना पढ़ा-लिखा तो मास्टर बनने से पहले ही भूल चुके थे फिर बच्चों को क्या पढ़ाते। हाँ, वो अपना दबदबा कायम रखने के लिए किसी भी बहाने से किसी न किसी बच्चे की एैसी पिटाई कर देते थे कि बच्चे सुन्न हो जाते थे। आज उन्होने उसी फार्मूले के अंतर्गत एक बच्चे की एैसी पिटाई की कि उसके माँ-बाप स्कूल आ गए। बच्चे के बदन पर नील पड़ी हुई थी, उन्होने मास्टर जी से इस तरह मारने की वजह पूछी। मास्टर जी पहले तो हिल गए, फिर सहलते हुए उन्होने शास्त्रों की दुहाई शुरू कर दी, ‘‘गुरू द्रोण ने एकलव्य से गुरू दक्षिणा में गूठा (अंगूठा) माँगा तो एकलव्य ने गुंठ्ठा काट के गुरू के चरनो में धर दिया और यहां जरा से पीटने पे गुरू से सफाई माँगी जा रही है, वहा रे कलयुग !…….कलयुग में अधर्म बढ़ेगा गाय, गुरू, सास्त्र और ब्रह्यणों का अपमान होगा एैसा सास्त्रों में पहले से ही लिखा दिया गया है, इसमें आपका कसूर नहीं है…….।’’ बात यहीं खतम नहीं हूई बहुत आगे तक पहुँच गई।

लोग तो सत्तू बाँध के मास्टर जी के पीछे पड़े हुए थे ही, और मास्टर जी भी तो चाहते थे कि उन्हे कहीं दूसरी जगह के स्कूल में भेज दिया जाए और उन्हे जल्दी ही एक दूसरे कस्बे के स्कूल में भेज दिया गया। ये मास्टर जी का दूसरा तबादला था। मास्टर जी के इस नए स्कूल में आने के बाद, स्कूल और विद्यार्थियों पर क्या गुज़री इसके फ्लेश फारवर्ड से पहले मास्टर जी के मास्टरिया जीवन के शुरूआत का एक छोटा सा फ्लेशबेक……..

ये गाँव का स्कूल, स्कूल से ज्यादा तबेला लगता है। तीन कमरों में से एक में मास्टर जी की गाए-भेंस बंधती है। एक कमरे में उनका निवास और एक कमरे में लगती है क्लास। बरामदे में चौकीदार ने टट्र बाँध के अपना जुगाड़ किया हुआ था। ये महांशय चौकीदार, स्कूल के चपरासी, मास्टर जी के निजि नौकर, मवेशियों की देखभाल करने वाले और इन सबके अलावा कस्बे में दूध की सप्लाई का काम भी इन्ही के जिम्मे है। इस स्कूल में और दो अदृश्य टीचरों की नियुक्ति भी है। राष्ट्रीय चरित्र बरकरार रखने के लिए हर पंद्रह अगस्त और छब्बीस जनवरी को बिना नागा किसी न किसी नेता द्वारा स्कूल में झन्डा भी चढ़ाया जाता है।

मास्टर जी क्लास में चारपाई पर लेट कर पढ़ाते है और अक्सर चार छः बच्चे उनके हाथ पैर दबाते या मालिश करते नज़र आते हैं। एक बार इसी परमानन्द के सीन के बीच एक सरकारी अफसर की एन्ट्री हो गई। उनकी उपस्थिति का आभास होने पर भी मास्टर जी ने सीन चालू रखा और शास्त्रिय कामेन्ट्री का इजाफा कर दिया, ‘‘देखो बच्चो आपने खुद अनुभव किया कि सेवा किसे कहते है ये सेवा का प्रेक्टीकल जो आपने किया, इससे आपको सेवा का सही अर्थ मालुम हो गया होगा कि निःस्वार्थ भाव से यानि जिस कार्य के बदले में कुछ न लिया जाए सेवा कहलाती है। सेवा का अर्थ सिर्फ हाथ-पैर दबाने से ही नहीं है, ये तो सिर्फ प्रेक्टीकल के लिए आपसे करवाया गया है, समझाने के लिए। इस सेवा के बदले में आपने मुझसे कुछ लिया तो नहीं न। इसे निःस्वार्थ-भाव से की गई सेवा कहते है। इसी भाव से माता-पिता, समाज, देश और कमजोरों की, गरीबों की सेवा, दूसरों के सुख के लिए, मदत और निर्माण कार्यो के लिए सेवा करनी चाहिए……..।’’

अफसर सेवा का प्रेक्टीकल देखकर आश्चर्य चकित हो गया। उन्होने मास्टर जी के पढ़ाने और सिखाने के अंदाज की प्रशन्सा की। यूँ तो मास्टर जी को पंद्रह वर्ष पढ़ाते हुए हो जाएगें और साल दो साल में कभी-कभार कोई अफसर ताका-झाँकी कर लेता है तो उसे कुछ समय के लिए मास्टर जी की तरफ से देशी घी, तेल, सब्जियों की फ्री सेवा-सुविधा हो जाती है।

एक बार की घटना है कि मास्टर जी क्लास में चारपाई पे बैठ के हुक्का पी रहे थे। तभी कोई शिक्षा विभाग का अधिकारी वहाँ आ पहुँचा। चैकीदार ने किनारे से मास्टर जी को इशारा किया तो मास्टर जी ने कामेन्ट्री शुरू कर दी, ‘‘देखो बच्चो, हवा कैसे दबाव डालती है आगे फूंक मारो तो पाणी निकलता है और पीच्छे (पीछे) हवा खेंचो तो धुँवा। तो हवा की ताकत का अंदाज कर लो ऐसे ही जब आँधी आती है……….।’’ अधीकारी मास्टर जी से बहुत प्रभावित हुआ उसने बिना साइन्स एपरेट्स के हुक्के के माध्यम से साईन्स पढ़ाने को लाजवाब कहा। मास्टर जी की लयाकत से वो बहुत प्रसन्न हुआ। मास्टर जी ने अपनी कृत्यज्ञता प्रकट करते हुए कहा, ‘‘ सास्त्रों में लिखा है जहाँ चाह वहाँ रहा।’’ और अधिकारी के सामने हुक्का चौकीदार के हवाले कर दिया जैसे उसका काम खतम हो गया हो। ये था छोटा सा मास्टर जी का फ्लेशबेक।

जनाब आप उत्सुक होगें ये जानने के लिए कि ये विचित्र प्राणी, अब अपने नए स्कूल में क्या कर रहा है। मास्टर जी अपना पीरियड शुरू होते ही बच्चों से डेस्क का मुहँ दूसरी तरफ करवा रहे है। यहाँ दीवार में ब्लेक बोर्ड होने के कारण सभी क्लासें पश्चिम में ही होती है लेकिन इन मास्टर जी का कहना है कि वो सास्त्रों की अवहेलना नहीं कर सकते, विद्यार्थियों को पूरब में ही मुख करके पढ़ना चाहिए। एैसा सास्त्रों के अनुसार वो चार महीने से करवा रहे है, हर रोज जब तक बच्चे डेस्क का मुहँ पूरब की ओर बदलते है तो मास्टर जी का पीरियड ही खतम हो जाता है।

वैसे तो ये सब आम स्वदेशी चलन है शिक्षा के क्षेत्र में, लेकिन इन मास्टर जी का चरित्र अधूरा रह जायगा अगर ये अतिरिक्त विशेषताएँ और ज़ाहिर न की तो। मास्टर जी की एक विशेषता तो यह है कि वो पास कराने की गारंटी के लिए टयूशन पढ़ाते है कुंजियों (गाइड) की मदत से और दूसरी विशेषता है, परीक्षा में नकल कराने की प्रीपेड सेवा, जिसके लिए वो कहा करते है कि, ‘‘सास्त्रों में लिखा है कि स्वयं शेवा (सेवा) का भी उतना ही महत्व है जितना पर-शेवा (सेवा) का और इस परकिरिया (प्रक्रिया) में दोनों ही महत्वपूर्ण कार्य पूरे हो जाते हैं, यानि स्वयं सेवा भी और परसेवा भी।’’

(यह व्यंग कादिम्बनी, नव भारत टाइम्स, नयी दुनिया, आजका आनंद आदि में प्रकाशित हो चुकी है)

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