ख्याला


दस दिन पहले ही बिजलियों की कौन्ध और प्रलयंकारी तूफान में बादल फटा और ख्याला राम की पत्नी लाजो के साथ उसके बारह साल के बेटे रोडू को बहा ले गया। नदी के भीषण प्रवाह मे वो कहां खो गए पता ही न चला। उसके परिवार में अब वो और उसका बड़ा बेटा नोखू ही बच गए थे। उसका मिट्टी लकड़ी से बना घर पूरी तरह से ध्वस्त हो गया, सिर्फ घर की ढाई दीवार पर पहाड़ी चाकों (स्लेट) के टुकड़ो से बना छप्पर लटक रहा है उनकी बेबस जिन्दगी की तरह। अब तो उसके घर में मिट्टी के बर्तन तक नही हैं जिनमें वो खाना बनाया करते थे। कुल मिलाकर उनके पास एक पुश्तैनी खिन्द (गुदड़ी) और पहने हुए लबादे ही बचे हुए थे।

Kyala1   दस दिन तक वो पागलो की तरह लाजो और रोडे को ढून्ढते रहे, जंगल, नदीं, नालों और खड्ड का कोना-कोना छान मारा। वो सोचते कि जिन्दा नही तो कम से कम उनकी लाशें ही मिल जाती। उनका घर हजार फिट से भी ज्यादा ऊँची ढलान पर है और आसपास जंगल है। लोग समझाते कि इतने ऊपर से पानी के बहाव के साथ वो जरूर खड्ड के पानी में बह गए होंगे और लाशें कहीं पेड़-पाड़ में अटकी भी रही होंगी तो जंगली जानवर उनहें खा गए होंगे। इतने दिनों बाद उनकी उम्मीदें हार गई और आश्वस्त हो गए कि अब वो लोग इस दुनिया में नही है।

   आज ग्यारहवां दिन था, घर में अन्न का एक दाना भी न था। वैसे भी वो पंडित हेतु राम के यहाँ पुश्तैनी बेगार है। खेतो और घरों में काम के बदले बचा -खुचा, रूखा- सूखा खाकर, उतरन पहन कर ही अब तक जिन्दा रहे है। अपनी उनकी थोड़ी सी पुश्तैनी जमीन तो है लेकिन पत्थरीली, कुछ पैदा भी हुआ तो ऊॅचें लोगो की पशुओं की भेंट, झगड़ा करके वो तमाम इल्जामों के बायस बने, नही तो अपमान और मौत.. तो वो जमीन यूँ ही बेकार पड़ी हुई है। कमजोर, बेबस, अनपढ़ और गरीब यहाँ इसी तरह का जीवन गूजारने को बाध्य है। इन दिनों वह पेट भरने के लिए जंगल से कभी-कभी खर्न, आखें, कन्दलू (ये सभी पहाड़़ी जंगली फल हैं) आदि जीने के लिए खाते रहे। आज जंगल में कही से नोखे राम को तरड़ी (पहाड़ी कन्द) हाथ लग गई। आग जलाकर वो टूटे घडे़ के निचले हिस्से को वर्तन बना कर उसमे उबालने लगे।(यहाँ गरीब लोग अकसर कुम्हारों से टूटे घड़े ले आते है जिसके निचले हिस्से को हान्डी बना कर इस्तेमाल करते है।)

   वो बेमन से आज इतने दिनों बाद पेट की आग बुझाने में लग गए। तभी नागू राम जो कि पास के गावं में मियां(साहूकार) के यहाँ नौकर है उसकी आवाज सुनाई दी, वह पास की पहाड़ी पर चढ़कर कच्ची सड़क के पार से आवाज लगा रहा है, ‘ख्याले ओ ख्याले झट चल उचे गावां रे सयाणे आइरे।” (ख्याले जल्दी आ ऊँचे गावं के बूजूर्ग आए हुए हैं ज्लदी आ) आवाज सुनके वो दौड़ पड़े मन में ख्याल आया कि कहीं लाशें तो नही मिल गईं। वो हांफते -कांपते ऊॅची जात के लोगो को देखकर इस पार ही रुक गए (इक्कीस कदम की दूरी पर रुकना सामाजिक नियम है)। उनके सम्मान में उन्होंने अपने अपने जूते उतार कर सर पर रख लिए और हाथ बान्ध कर खड़े हो गए, ‘‘हाकम हुक्म करो जी।’’ –कौल सिंह ने बुजुर्ग ददेल सिंह ठाकुर को इशारा किया तो वो गम्भीर होकर बोले, ‘‘देख ख्याले हम सबको तेरी लाड़ी और मठ्ठे (घरवाली और बेटे) का अफसोस है। ये तो बात तय है सोचणे री ता गुन्जाइसे (गुन्जाइश) नी हई कि वो जिन्दा नही है मरी गईरे। गल ये हइ कि दुइरी (दोनो की) अकाल मृत्यू है। पंडित डागू राम जी फरमाते है कि तिन्हारा (उनका) कार्ज कर्म होना आवश्यक है। नइ तां दूए आकाल मृत्यू प्राप्त भूत प्रेत बणी ने पूरे गांवा जो  परेशान करणा। इसलिए उनकी आत्मा की मुक्ति का प्रबन्ध आवश्यक है।’’

गावं वालो का आदेश सुनकर उनके होश उड़ गए उन्होंने अपनी गरीबी और मजबूरी जताई कि उनके पास तो खाने के लिए दाना भी नही है। धेला पैसा देखे जमाना हो गया है, वो भला क्रिया-कर्म कहां से करवा सकते है, गॉंव वालों ने उनकी एक न सुनी उन्होंने आदेश दिया कि ये विधान तो उन्हें निभाना ही पड़ेगा। तभी साथ आए पंडित राम आसरे ने उपाय बताया, ‘‘मूर्ख भगवान श्री कृष्ण स्वयं गीता में कहा है कि ब्राह्मण पृथ्वी पर भू देवता है, पृथ्वी पर हर प्रकार की समस्या के निवारण के लिए ब्राह्मण को दान देने से भी हर प्रकार की बाधा, समस्या, पाप का निवारण हो जाता है, सो मृत्यू प्राप्त प्राणियों के नाम से कुछ और नहीं तो ब्राह्मण को दान वस्त्र दे कर उनकी मुक्ति याचना कर ब्राह्मण का आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हो………..।’’

   गावं वालों ने बनारसी पंडित राम आसरे की आसान युक्ति का यशोगान किया और ख्याला राम पर दबाव डालते हुए कहा, ‘‘तेबे ता करणाए पौणा।” (अब तो ये करना ही पड़ेगा)।

बाप बेटे दोनों सुन्न से शून्य में निहारते रहे फिर ख्याला ने सोचा, मालिकों से कह – सुनकर कुछ हल निकल आएगा। वो जूता पहनकर चलने को ही थे कि रजवाड़ो के कारिन्दें रास्ता चौकसी का एैलान  करते हुए गुजरे तो रास्ते पे आते जाते सभी लोग किनारे होकर दराते, लाठी, कुल्हाड़ी नीचे रख, हाथ बान्धकर खड़े हो गए। ख्याला राम और नोखू ने भी दूर जाकर जूते सर पर रख लिए। कुछ ही देर में दुर्गम पहाड़ी से गुजरता अंग्रेजी हकुमत का एक दल नदी के किनारे पहुँच गया। ये दल शिमला से यहाँ आया है। इसमें अंग्रेज सहबों के साथ देसी अफसर भी है जो पालकी पर सवार है। उनके साथ हकुमत के अपने सुरक्षाकर्मी बटलर, बावर्ची, मजदूर, बेगार तथा स्थानीय राजा के कर्मचारी भी है जो खच्चरों पर समाज लादे चल रहे है। पालकी नदी के किनारे एक स्थान पर आकर रुक गईं , सभी लोग आदेश मिलने पर अपने कार्यो मे लग गए। साफ सफाई शुरु हो गई साहबों के लिए छतरियों के नीचे कुर्सियाँ लगा दी गई, टैन्ट आदि भी लगने लगे। ये दल यहाँ नदी पर पुल निर्माण के सर्वेक्षण के लिए आया है। नदी में जब पानी भर जाता है। तो नदी के आर-पार का आवागमन ढप हो जाता है। नदी के पश्चिम छोर पर स्थित व्यापार केन्द्र पहुँच के बाहर हो जाता है। व्यापारी और जरूरतमंद लोगो को पानी उतरने की प्रतिक्षा करनी पड़ती है। कभी कभी महीने भर तक पानी उतरता ही नही, इसी लिए यहाँ पुल के निर्माण की योजना को लेकर तकनीकी सर्वेक्षण किया जा रहा है।

बड़े साहब कुर्सी पर बैठे बाइनाकुलर से आस पास देख रहे थे तभी उनकी नजर ख्याला राम और नोखू पर पड़ी तो रुककर उन्होंने अपने मातहत भारतीय अफरस से अंग्रेजी में बोला, ‘‘‘हे लुक वो लोग अपने सर पर जूता क्यों रखे हुए है?’’

ओ सर ये लोग डाउन कास्ट शूद्र है। ये लोग ऐसा करने के लिए बाध्य हैं। ऊँची कास्ट के लोगों से सामना होने पर, उन्हें इज्जत देने के लिए ऐसा करते हैं।

ओ ऐसा है!

सर, इटस् ओल कस्टम एन्ड रिलिजियस डिक्टेट। ये सामाजिक प्रथा और धार्मिक आदेश है,

ओ ऐसा है!

इटस् वेरी इन्ट्रस्टिंग….मुझे विस्तार से बताओ।

सर, हिन्दू धर्म में भगवान द्वारा चार वर्णों की सामाजिक व्यवस्था की गई है ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। ब्राह्मण को सर्वोच जाति की मान्यता है, ये विद्या-धर्म का ज्ञाता कर्म काण्डों के लिए उतरदायी और क्षत्रिय राज्य चलाने के लिए पैदा किया गया और वैश्य का वाणिज्य और हर प्रकार के उद्योगों पर उतराधिकार तथा शूद्र को इन सब की सेवा करने के लिए पैदा किया गया है। शुद्र को निम्नतम जाति का माना जाता है। इनके हिस्से में वो सभी निम्न कार्य आ जाते है, जिसकी सामाजिक प्राणियों को आवश्यकता होती है, सेवा करना इनका धर्म और क्रर्तव्य है। विद्या ग्रहण करने के लिए ईश्वरीय विधान इनको अनुमति नही देता। धर्म स्थलों और मन्दिरों में इनका प्रवेश निषेध हैं। जिन कुओं और प्राकृतिक जल स्त्रोतों पर ऊॅच जाति के लोगों का अधिकार है वहां से पानी लेना या प्रयोग करना इनके लिए निषिध है। इनके लिए नए कपड़े पहनना और ऊॅचें लोगों के गावं में प्रवेश भी वर्जित है। अधिकतर ये लोग ऊॅची जाति के लोगों यहाँ घरों और खेतों पर बन्धवा मजदूरी और बेगारी करते है। घरों खेतों के काम के अतिरिक्त पशुओं की देखभाल और चारे की जिम्मेंवारी भी इन्ही की है। बोझा ढुलाई से लेकर हर काम यही करते है।

वैट वैट वैट अभी तो तुमने कहा कि घरों में प्रवेश नही कर सकते ।

हाँ सर वो ऐसा है कि देवता की अनुमति से कर सकते है। लेकिन जूता पहनकर गावं में प्रवेश नही कर सकते। वो उनके घरों में कपड़े धोते है बर्तन मांजते है लेकिन परिसर और आंगन तक ही जा सकते है। उनके घरों के अन्दर प्रवेश नही कर सकते ऐसा करने पर उन्हें देवता से पहले लोग ही दण्डित कर देते हैं। अंग्रेज अफसर स्वयं से कुछ बुदबुदाया और पूछा, ’’ऐसे लोगों की कुल कितनी आबादी होगी।’’

देसी अफसर ने उसे बताया सत्तर-पिच्हतर प्रतिशत होगी जिसमें और भी बहुत सी निम्न जातियां शामिल है। हाथ से काम करने वाले भी शामिल है उनके साथ भी ऐसा ही सामाजिक व्यवहार होता है। अंग्रेज अफसर को सर्दी में भी पसीने का अनुभव हुआ उसने रूमाल से पसीना पौंछा और फुसफुसाया, ’’मैं बहुत कमजोर दिल का आदमी हूँ।’’ ये कहते कहते पालकी से उतर कर वो ख्याला और नोखे के पास से गुजरते हुए कुछ छण रुका, मुस्कुरा कर उसने हाथ हिलाया तो नोखे और ख्याला के चेहरे पर भी मुस्कराहट फैल गई, वो मत्र-मुग्द्ध उसे देखते रहे। उसने चारों ओर देखा तो बहुत सारे लोगों में से कुछ लोगों ने जूते अपने कन्धे पर डन्डी के सहारे टांगे हुए थे।

   साहब लोगों ने बैठने के बाद चारों ओर देखा तो बहुत सारे लोगों में से कुछ लोगों ने जूते अपने कन्धे पर डन्डी के, सहारे टांगे हुए थे। तभी रजबाड़ों के कारिन्दों ने लोगों की रुखसती का एैलान किया, तो सभी रूके हुए लोग अपने गन्तव्यो की ओर बिना पीछे देखे चले गए और कुछ दूर जाकर कुजातो ने जूते पहन लिए।

ߌ ख्याला और नोखू ने मालिको के गांव आते ही परम्परानुसार अपने जूतों को उतारकर अपनी बगल किया। एक तो हड्डी कंपकंपा देने वाली ठण्ड और दूसरी बर्फिली चट्टाने बस उनके पास मुश्किलातों में हमदर्दी और मदत की आस की गर्मी ही उनकी रगों में कुछ हलचल कर रही है। -लेकिन मालिकों के परिसर में दाखिल होते ही उनका गालियों और डांट फटकार से स्वागत् हुआ पंडिताईन मालकिन का पहला ही जुमले से ही उनकी धंसी सूखी आँखे डबडबा गई, ‘‘हरामियों कामचोरों तूसो कामचोरी रा बढ़ीया बहाना मिलि गया आज ग्यारा धयाड़े बाद अपनी मनहूस शक्ल लगीरे दसते।” (हरामियों कामचोरों तुम्हें कामचोरी का अच्छा बहाना मिल गया आज ग्यारह दिनों के बाद अपनी मनहूस सूरत दिखा रहे हो।) ये कहते हुए मालकिन ने ग्यारह दिनों के पड़े पूरे टब्बर (परिवार) के गन्दे कपड़े लाकर उनके सामने धोने के लिए डाल दिए और हिदायत दी की साबुन ज्यादा नही घिसना, नदी से कपड़े धोने के बाद बर्तन-भाण्डे साफ करने का काम पूरे परिसर और गौ शालाओं की धूलाई सफाई, पशुओं के लिए घास की कटाई, लकड़ों की चिराई सब्जियों के बोरे बाजार में छोड़ने और बाजार से घर का सामान ढोकर लाने आदि का आदेश वो एक सांस में देकर फारिग हो गई। हाँ, भविष्य में उनकी राहत के लिए एक जरूरी प्रस्ताव बड़े प्यार से उन्होंने दिया, ‘‘देख ख्याले तेरी लाड़ी घरा रा सारा काम कराँ थी। से ऐबे नइ रही ऐबे तू झटपट नोखू रा ब्याह कराई दे इथी रा काम भी चली पौण होर फेरी घरा एक जनाने रा हूणा भी जरूरी हा’’ (देख ख्याला तेरी घरवाली घर का सारा काम करती थी। वो नही रही अब तू जल्दी से नोखू की शादी कर दे तो यहाँ का काम भी चल पड़ेगा और फिर घर में एक औरत का होना भी जरूरी है।)

   ख्याला और नोखू होश में आ गए, कुछ कहना चाहते थे लेकिन कई दिनों की भूख ने उनकी जूबान पर ताला लगा दिया। नोखू ने अपने बाप को रोटी मांगने के लिए इशारा किया तो ख्याला ने अपने फटे लबादे की एक लीर से आँखे पौछते हुए रोटी की याचना की। तो उनके हालात और बेदम देखते शरीर को देखते हुए मालकिन के अन्तर्मन में संवेदना तो जागृत हुई लेकिन उन्होंने ने फौरन उस पर काबू पा लिया, मन में स्वदेशी तर्क उजागर होने लगा कि अगर इन्हें खाने को मिल गया तो ये काम क्या करेंगे। वो बोली, ‘‘थोड़ा झे काम दसया नइ होर लगी जाये भूखरा रोणा रोन्दे, चला पहले काम करा………’’ (जरा सा काम बोला नही की भूख का रोना रोने लगते है। चलो पहले काम करो…………. ।) -अबकी नोखू बोला भूखे काम होता है क्या…. कई दिनों की भूख…. जो हुक्म करो तो पेडू.( बाँस का बना एक बड़ा डिब्बा जिसमें जूठन और बासी रोटियाँ रख दी जाती है।)से……..।

रुकी जा पेडू जो छूहणे री जरूरत नी हई (रुक मै देती हॅू पेडू अपवित्र करने की जरूरत नही।)

        मालकिन ने पेडू से कोदरे (काला आनाज) की फंफूद लगी कुद रोटियां और उनके टुकडे़ ख्याला और नोखू की झोली में डाल दिया और बड़बड़ाती हुई अन्दर चली गई।

         इन लोग ने रोटियेां को दूर के पहाड़ी झरने पर धोया और आग सेंकते चरवाहों से आग मांगकर घास फूंस में उन्होंने वो रोटियां सेंकी जेब से नमकों का ढेला निकालकर चूरा किया और रोटी में लगाकर अपनी भूख शान्त की। पानी पीकर वो अपने अपने कामों में लग गए और दिन भर गिरते पड़ते डंगरों की तरह से काम करते रहे उनकी हड्डियां जबाव देने लगी थी लेकिन काम पूरा हुआ। सूरज डूब चुका था, वो लोगा चलने लगे तो पण्डित मालिक जो उनके परिसर से बाहर निकलने के बाद लोटे में पानी लिए मन्त्र पढ़कर घर का शुद्धिकरण कर रहे थे, हिम्मत करके गिड़गड़ाते हुए ख्याला ने उनसे फसल से बाटे की बात कही तो वो सहज भाव से बोले, ‘‘देख तेरी घरवाली और तेरा बेटा घर का काम करते थे वो मर गए तो बाटे की भीख भी उनके साथ चली गई। रही तेरी बात तो तू खानदानी बेगार है तेरे परदादा को मेरे लकड़दादा ने दो रूपये में खरीदा था।’’

   अबकी ख्याला थोड़ी हिम्मत जुटा कर बोला, ‘‘ये ता अन्याय हया मालिका आसा जिउन्दे किया रहणा’’ (ये तो अन्याय है मालिक आखिर हम जिन्दा कैसे रहेंगे।) मालिक ने उससे पूछा, ‘‘ख्याले तू ये दस… ठण्डा ते बचणे कठे तू धूपा सेका की नइ’’ (ख्याले ये बता तू ठण्ड से बचने के लिए धूप सेंकता है कि नही)।

जी हाँ सेका (जी हाँ सेंकता हूँ)

पाणी पीआ की नइ (पानी पीता है की नही)

पिया जी (पीता हूँ जी)

धरती पर चला की नइ (धरती पर चलता है की नही)

चला जी

ये हवा पाणी धूपा ताए बणाये (ये हवा पानी सूरत तूनैं बनाए)

नइ जी परमात्मे बणाये।

तो फिर तुम्हे उसका कर्ज तो देना पडे़गा। ये सब भगवान ने बनाया और भगवान ने ही धर्म बनाया। धर्म शास्त्रों का आदेश है की शूद्र को ऊॅची जाति वालो की सेवा करनी है जूठा खाना है उतरे कपड़े पहने है। धर्म मरजाद का जिस तरह आदि काल से तुम पालन करते हो, हमे भी उसका पालन करना है नही तो हमें पाप लगेगा देवता सजा देगा। चल पेडू ते जूठा बाही(बासी) तूसौ देई देया (तुम्हे दे देता हूँ)।

   पण्डित जी ने पेडू से निकालकर बासी रोटियां उन्हे दे दी और साथ ही एक टूटी सूराही में कई दिनों का मठ्ठा पड़ा था वो भी उन्हे थमा दिया। घर जा कर दोनों ने वैसे ही रोटी को धोया सेका नमक लगाया और मठ्ठे को गन्दे कपड़े से छाना जिसमें कीड़े पड़ चुके थे, वो रोटी खाकर और मठ्ठा पीकर सो गए और भूल गए की वो भी इन्सान है।

¤ पुल का काम शुरु हो रहा है। ख्याला का घर और जमीन पुल के पास होने के कारण ये जगह काफी महत्व की हो गई है। ख्याला की मजबूरियों के चलते महाजन टेक चन्द तो पहले से ही उस पर नजर गड़ाए हुए था और इस विकास को देखकर सोचने लगा कि ख्याला की जमीन मिल जाए तो उस पर व्यापारियों के लिए सराय और आढ़त का काम करके जीवन भर चाँदी काट सकता है। उसने ख्याला को घेर-घार कर सात रूपये में उसकी जमीन गिरवी रखवा ली, उसे मालूम है कि दो वर्ष की अवधि करार में ख्याला इतनी बड़ी रकम कभी नही जुटा पाएगा।

   ख्याला के पुरखो ने भी कभी इतनी बड़ी रकम कभी देखी न थी। बड़े जतन से उसने रात के वक्त कुछ पैसे अपने पास रखकर बाकी एक टूटी कुन्डी में डाल जमीन में गाड़कर छिपा दिया। रात भर वह सोया नही, उसके मन में टूटे घर को बनवाने, नोखू की शादी और घर में सभी जरूरी सामान डालने की योजनाएँ चक्कर काटती रही। न जाने कब उन्होंने ताजी रोटी और दाल खाई थी याद नही। वो सुबह होने की प्रतीक्षा करने लगा।

   सुबह हूई तो वो नोखू को लेकर बाजार निकल गया। बाजार से उन्होंने चावल, दाल, आटा, नमक, मिर्च, तेल और मिट्टी के बर्तन-भाण्डे खरीद कर एक पोटले में बान्ध लिए। चलते-चलते एक धेले की जलेबी भी ले ली। अचानक फेरा लगाते बनारसी पण्डित राम आसरे की नजर उन पर पड़ी, वो तो इनकी फिराक में न जाने कब से था। वो सुबह पांच बजे ही पोथी पत्रा झोले में डाल गावं गावं घूमता है और चुटकी-चुटकी आटा सीधा मांगता बाजार में आ जाता है। बस वो चुपके चुपके इनके पीछे हो लिया। नदी का पानी उतरा हुआ है, छिछली तलहटी से निकलते ही सुनसान में उसने इन्हे घेर लिया। ख्याला नोखू ने सामान एक पत्थर पर रखकर परम्परागत रूप से पण्डित जी का सम्मान किया और उनके पूछने पर घर के सामान के पूरी तफसील भी दे दी। पण्डित जी अपनी लम्बी चोटी को सहलाते हुए हिन्दी में ही बोले ख्याला तेरी घरवाली की आकाल मृत्यू हूई है, पितृ पक्ष का आज अंतिम दिन है जिसमें एक घण्टा शेष है। अभी ही उनकी आत्मा की शान्ति का उपाय कर लो वर्ना वो भूत चुड़ैल बनकर तुम्हारा कोई भी शुभ कार्य नही होने देंगे। क्या संयोग है कि इस वक्त भू देवता ब्रह्मण से तुम्हारी भेंट हो गई। नदी का किनारा भी है दान के लिए अन्न आदि भी है…. बस थोड़ी सी दक्षिणा लगेगी। मती शून्य ख्याला कुछ देर मूक रहा फिर बुदबुदायां, ‘‘एक रपैया घरा रा छाप्पर छाणे कठे रखिरा’’ (एक रूपया घर का छप्पर डालने के लिए रखा है)। पण्डित जी चौंके, एक रूपया ! पण्डित जी सदा दमडी धेले मे ही खेलते रहे, अब एक रूपया हासिल करने के लिए उन्होंने अपनी पूरी विद्या झोंक दी, ‘‘ख्याला प्रेत आत्मायें तूफान बनकर टूटा छप्पर तुम दोनों पर गिरा देगी, तिनहारी मुक्ति जरूरी हई (उनकी मुक्ति आवश्यक है)। ये कहकर पण्डित जी ने झटपट झोली से लाल कपड़ा निकाला और उसे पत्थर पर बिछाते हुए मन्त्र उच्चारण के साथ झोली से गंगाजली, पान सुपारी, सूखा नारियल और लोटा निकाला, उसमें पानी भरकर स्वयं मूज की चटाई पर बैठ गए और आदेश दिया। दोनों अपना मुंह पूर्व के करके बैठ जाओ। बेचारे कुछ सोच भी न पाये और बैठ गए। पण्डित जी मन्त्र पढ़कर उन पर छींटा लगाते हुए जोर जोर से बोले,’’ शुद्ध शुद्ध इनका तन मन शुद्ध हो दसों दिशाएँ शुद्ध हो।’’- झोली से आटा निकालकर उसने दो पिन्ड बनाए और पान पे रख कर नोखू के हाथ में दे दिए और अपने साथ साथ हिन्दी में कथ्य दोहराने को कहा, ‘‘हे माता….हे भ्राता…..इसे स्वीकार करो……और परलोक को सिधारो…..भू देवता ब्राह्मण का आशीर्वाद लेकर हम तुम्हारी मुक्ति….और स्वर्ग प्राप्ति की….प्रार्थना कर रहे है।’’- ये कहलवा कर मन्त्र पढ़ते हुए, उन पिण्ड़ो को पानी में छुडवा दिया। पण्डित जी ने ख्याला से उसकी पोटली का सब सामान निकालकर भूमि पर रखने का आदेश दिया, जिसका ख्याला ने अनुसरण किया, फिर मन्त्र पढ़कर पानी के छींटों से सामान शुद्ध किया और कहा, ’’ख्याला दक्षिणा का वो एक रूपया भी इस पर रख दो । ख्याला ने कांपते हाथों से वो रूपया उस पर रख दिया। पण्डित जी ने रूपया पानी से धोकर झट अपनी जेब में डाल लिया फिर पण्डित जी ने जलेबी का वो बड़ा दोना उठाया और पालथी मारकर सामने रख लिया, ‘‘जजमान ख्याला राम यह मिष्ठान भोग जो तुम भू देवता ब्राह्मण को करवा रहे हो यह सीधा मृत आत्माओं और तुम्हारे पितृों को जा रहा है। ये कहकर पण्डित जी जलेबियों पर टूट पड़े और उन बेचारों के देखते देखते पूरा दोना चटकर गए। फिर प्रसंन्न मुद्रा में खड़े होकर उन दोनों से स्वयं को दण्डवत प्रणाम करवाया और आशीर्वाद दिया, ‘‘हाऊ भू देवता खुशी हुई कने आशीर्वाद देंआ कि तूसारे सब काम शुभ हो होर मरी गईरे सम्बन्धि मुक्ति जो मिली जाओ’’ (मैं भू देवता प्रसंन हो कर आशीर्वाद देता हूँ कि तुम्हारे सब कार्य शुभ हों मृत्यू प्राप्त स्वजन मुक्ति प्राप्त करें)। पण्डित जी ने पूरा सामान झोले में भरा और थोडे से चावल निकाल कर मन्त्र उच्चारण के साथ ख्याला की झोली में डाल दिये, ‘‘इसे घर जाकर पकाना चार हिस्से करना दो तुम दोनों खा लेना और दो का लड्डू अपने टूटे छप्पर पर डाल देना। जाओ काल्याण भवः….पीछे मुड़ी कने देखदे देखया.. । (पीछे मुड़कर मत देखना )

¤ ख्याला ने किसी प्रकार अपना घर रहने योग्य बनाकर नोखू की शादी भी कर दी। नोखू को दहेज में चार बकरी एक बकरा एक पानी का बन्टा और एक रूपया नगदी मिला। मालकिन के यहाँ काम करते हुए ये लोग बकरियों की चराई भी किसी तरह कर लेते है। कुछ ही समय में बकरियों की संख्या तीन-चार गुनी हो गई। ख्याला के परिवार में अब शुभ संकेत मुखर होने लगे, नोखू एक बेटे का बाप  बन गया। घर से बाहर संघर्ष और सामाजिक विकृतियों के चलते अपमान घृणा और ज्यादतियों से पीछा न छूटा लेकिन घर में आकर चैन मिलता और सुख मिलता। गर्म कपड़े अब सभी के पास हो गए थे लेकिन इन नए कपड़ो को वो घर में ही पहन पाते थे। अब उनके पास बिस्तर आदि की भी पर्याप्त सुविधा हो गई थी। उसके हाथ में अब पैसे तो नही है परन्तु निरन्तर पशु धन की बढ़ोतरी से भविष्य सुरक्षित लगने लगा है। नोखू ने अभी तक वो दहेज का रूपया सीने से लगा कर रखा हुआ है। अब इनके चेहरों की चमक, इनका ये पनपता संसार अब लोगों की आँखों में खटकने लगा है।उच्च वर्ग के लोग अब पशुओं को लेकर कोई न कोई नया विवाद खड़ा कर देते। कभी स्वर्णो के गॉंव की सीमा लांघने का तो कभी चरागाहों पे पशुओं की चराई का, कभी जलाशयों को अपवित्र किये जाने का। उन लोगों ने अब इनसे निपटने के लिए देवता के पास शिकायत भी कर दी। यहाँ देवता सब कुछ होता है वो धर्म-साम्राज्य और परम्पराओं को सुरक्षित रखने की सबसे बड़ी ताकत है।

ݠ  देवता ने ख्याला के परिवार को तलब किया। उच्च लोग मंदिर परिसर के बहिर चौक के चबूतरे पर बैठे और देवता भी वही विराजमान हो गए। ख्याला का परिवार मंदिर की सीमा से बाहर इक्कीस हाथ की दूरी पर नंगे पैर सर झुकाये हाथ बान्धे खड़ा था। बड़े पूजारी के शरीर में देवता ने प्रवेश किया और पूजारी जी ने विचित्र मुद्रा धारण कर ली। धण्टे घडि़याल बजने लगे, घूप-दीप ,पुष्पों से छोटे पूजारी ने देवता को प्रस्सन किया । लोगों ने अपनी शिकायते दोहराई तो देवता क्रोध से फुंकारने, ‘‘अधर्म! अधर्म!! मेरे इलाके में कोई अधर्म करेगा तो मैं उसका सर्वनाश कर दूंगा।’’-ख्याला का परिवार भय से कांपने लगा रुदन करने लगा। देवता फिर फुंकारा, ‘‘ख्याला तेरी बकरियों ने चरागाहों से घास चरकर उसे जूठा और अपवित्र कर दिया है। गऊ माता ने उसी अपवित्र घास का सेवन किया……गऊ माता को अपवित्र किया तुम लोगों ने। उच्च जाति के लोगों के गावं में तुम लोगों का जाना वर्जित है लेकिन तुमने सीमायें लांघकर गॉंव को भी अपवित्र किया है तुम्हें क्षमा नही किया जाएगा।’’ ख्याला का परिवार बहुत रोया, गिड़गिड़ाया लेकिन देवता का क्रोध शान्त नही हुआ। छोटे पूजारी ने आरती उतार कर देवता को शान्त किया तो देवता ने आदेश दिया, ‘‘मेरे इलाके में सब अशुद्ध हो गया है मुझे पूजा चाहिए धर्म की पुनः स्थापना होगी। मेरी पूजा में दो बकरों की बली चाहिए नही तो सर्वनाश कर दूंगा। लोगों ने हाथ जोड़कर सर नवाये, तो देवता ने छोटे पूजारी से इशारों में कुछ बात की, छोटे पूजारी जिसका तर्जुमा किया ‘‘ख्याला जो एक रपये रा दण्ड होर दो बकरे तियाये देणे जो, बोलेया होर देवता ने हुक्म कित्या कि अगर फेरी एड़ा हुआ ता येओ इलाके ते सदा कठे बाहर काठी देणे।’’ (ख्याला को एक रूपये का दण्ड और दो बकरे इसी वक्त देने को कहा है और देवता का हुक्म है कि अगर फिर ऐसा हुआ तो देवता उसे अपने इलाके से हमेशा के लिए बाहर निकाल देंगे।)

   रोते कलपते ख्याला ने अपने बेटे से आग्रह किया, ‘‘बेटे आसे पाप कितिरा……आसे सजा रे भागी हये तू तेस रूपये जो देई दे तेबे पाप छूटी जाणा’’ (बेटा नोखू हमने पाप किया है………हम सजा के भागी के तू वो रूपया दे दे पाप छूट जाएगा)।

   आहें भरते नोखू ने अपनी गांठ से वो रूपया जो उसे दहेज में मिला था पूजारी के इशारे पर दूर एक पत्थर पर रख दिया जिसे पूजारी ने मन्त्र पढ़कर पानी से धोकर शुद्ध किया और देवता के चरणों में रख दिया। छोटे पूजारी ने आदेश दिया, ‘‘जाउआ होर बकरे जो लई आउआ होर इथि एस खून्डे के बानी कने चली जाया’’ (जाओ बकरे ले आओ और वहाँ खून्टे से बान्ध जाना)। ख्याला ने हामी भरी -धण्टे धड़ीयाल बजने लगे देवता की आरती हुई और देवता बडे पूजारी के शरीर से निकल कर अन्दर मूर्ती में चले गए।

ख्याला ने अपना कौल पूरा किया और किसी तरह सब्र कर लिया। अब वो बकरे बकरियों के पेट भरने के लिए पत्ते आदि लाते और गाहे बगाहे गॉंव से दूर एक पहाड़ी पर उन्हें चराने भी ले जाते लेकिन जंगल घना होने की बजह से जानवरों का खतरा बना रहता ।

नोखू का बेटा अब एक साल का हो चूका था। बकरी का दूध मिल जाने से वो हृष्ट पुष्ट भी है। समय के साथ मवेशियों की संख्या फिर बढ़ने लगी तो ख्याला सोच रहा है कि बकरियों केा बेचकर वो पूरा नही तो कुछ पैसा देकर घर जमीन बचा लेगा लेकिन इसी वक्त किसी व्यक्ति ने राजा के कारिन्दों का खबर कर दी कि ख्याला अब सुखी और सम्पन्न है उससे कर ले लिया जाए। राजा के कारिन्दे सूचना मिलते ही कर बसूली के लिए आ धमके। पैसा न दिया जाने पर वो सारे मवेशियों को ले गए। ख्याला का परिवार हाथ मलता रह गया। उनकी हर उम्मीद और खुशियाँ घुटकर रह गई, इस परिवार के सारे के सारे सपने ध्वस्त हो गए लेकिन टेक चन्द महाजन का सपना साकार हो गया, दो साल का करार का वक्त पूरा हो चुका था। कर्ज के पैसे मांगने पर ख्याला ने हाथ खड़े कर दिये, कुछ वक्त की मोहलत मांगी, मिन्नते की, पूरे परिवार ने दया की भीख मांगी, रोये गिड़गिड़ाए लेकिन महाजन पर इसका कुछ असर न हुआ। नोखू बहुत दौड़ा भागा, आस पास की बस्ती से कुछ लोगों को लेकर आया। उन्होंने भी मिन्नते की, रहम की गुजारिश की कि इस वक्त बर्फबारी में ये छोटे छोटे बच्चे को लेकर ये लोग कहाँ जाएंगे लेकिन हृदयहीन समाज और नैतिक शून्यता में पला महाजन टस से मस न हुआ। परिवार की बेबसी और चीखों पुकार के बीच महाजन के गुन्ड़ों ने उनका सामान बाहर फैंक दिया और ताला लगा दिया। बेबसों के बेबस हिमायती भी कुछ न कर पाये, ये सब भी उन्हीं की तरह साधन हीन, झोंपडि़यों में रहने वाले लोग है। उनमें से कुछ लोग आज इन्ही के साथ पेड़ के नीचे आग जला कर साथ बैठे रहे और सुबह बर्फ से ढंका पेड़ भी उनके हालात पर रो दिया।

मलिनों की बस्ती के बाहर ही पेड़ों की डालियों और पतियों के कबाड़ से झोंपड़ी जैसी पनाह बना तो ली लेकिन एक दो रोज में वो उड़ जाती तो बेचारों को फिर बनानी पड़ती। मालिको के यहाँ काम पर जाते तो वहाँ से जूठन और गालियाँ मिलती जिससे पेट न भरता। ख्याला आजकल कुछ विक्षिप्त हो चुका था, कभी कभार ही काम पर जाता था और ज्यादातर वक्त, बनते पुल के इर्द गिर्द ही बिताता। हर क्षण उसकी आँखों और व्यवहार से लगता जैसे वह किसी को ढूंढ रहा हो।

एक दिन एक छोटी सी पहाड़ी पर जब वो खड़ा था कुछ देखकर अचानक खुशी से उसकी चीख निकल पड़ी। कुछ सुरक्षकर्मी उसकी तरफ दौड़े तो पीछे से आवाज आई, ‘‘नो नो नो प्लीज़ लीव हिम।’’ –ख्याला सर पर जूता रखे एक टक देख रहा था, ये वही अंग्रेज अफसर था जो कभी उसकी तरफ देखकर मुस्कुराया था और ख्याला को जीवन में पहली बार अनुभव हुई थी निष्पाप, आत्मा से जुड़ने वाली अपनेपन की वो मुस्कुराहट, जो उसके अन्दर कहीं समा गई थी ओेर उसने अपने मन में कहीं उसे छिपा कर रख लिया था ।

¤  कुछ ही दिनों बाद ख्याला और नोखू का परिवार शिमला में स्थापित एक क्रिस्चन मिशनरी की शरण में आ गया। मिशनरी में नोखू को माली का काम मिल गया और कुछ समय बाद ख्याला भी मिशनरी के मेस में काम करने लगा। रहने के लिए एक साफ सुथरे कमरे की व्यवस्था भी हो गई। शुरु में उन्हें काम करने में थोड़ी दिक्कत होती थी लेकिन निर्देश मिलने पर वो अपना अपना कार्य कर तो लेते पर स्वयं को हीन समझने की प्रवृति उनके आड़े आ जाती। वो हर समय भयभीत बात बात में गिड़गिड़ाते, किसी अच्छे व्यक्ति को देखकर पीछे हटते हुए जूते हाथ में ले लेते और सर झूकाकर खड़े हो जाते जैसे उनका अपना कोई व्यक्तित्व ही नही है। मेस में कुर्सी टेबल पर भोजन करने के बजाए वो हाथ में रोटी ले जमीन पर बैठ कर खाने लगते, चर्च के अन्दर जाने की उनकी हिम्मत ही न होती। वो बेचारे व्यवस्थित और अनुशासित जीवन से परिचित ही कहाँ थे। -मिशनरी के लोगो के लिए उनका ऐसा व्यवहार एक चुनौती बना हुआ है। चर्च के फादर, फादर बनने से पहले एक कौलेज में साईक्लोजी के प्रोफ़ेसर रहे थे। उन पर इन सब को सामान्य करने और इनमें आत्म सम्मान जाग्रत करने का दायित्व आ गया और वो उन पर विशेष ध्यान देने लगे।

   कुछ समय बाद नोखू और उसका परिवार धर्म परिवर्तन करके क्रिस्चन बन गया लेकिन ख्याला ने धर्म परिवर्तन नही किया, क्यों नही किया ये शायद वो भी समझ नही पा रहा है। पर वो नोखू के परिवार के साथ रोज चर्च जाता है और प्रार्थना की समाप्ति के बाद भी हाथ जोड़कर क्राइस्ट की मूर्ती को देखता रहता है। फादर उसके इस व्यवहार से अचम्भित तो होते है लेकिन कभी उससे पूछते नही, और वो फिर माथा टेककर अपने काम पर चला जाता है।

   फादर ने इन्ही लोगो से प्रेरित होकर प्रौढ़ शिक्षा का नया सेक्शन शुरु कर दिया है जहाँ शाम के समय सभी अनपढ़ों के लिए कलास में आना अनिवार्य है। यहाँ उन्हें अंग्रेजी हिन्दी और उर्दू भाषा सिखाई जाती है।

   तीन-चार वर्षो की अवधि में इन लोगों के अन्दर कोई सुखद परिवर्तन परिलक्षित होने लगा है। पढ़ने में उनकी रुचि इतनी बढ़ी की नोखू इब्राहिम थॉमस मिशनरी के स्कूल से पांचवी की परीक्षा देकर पास भी हो गया है और लीला मेविस थॉमस नौखु की पत्नी पांचवी की परीक्षा की तैयारी में लगी हुई है। उनका बेटा जॉन भी अब स्कूल जाने लगा है। ख्याला की रुचि पढ़ने में तो है लेकिन परीक्षा देने में उसकी कोई लगन नही है। हाँ, वो समय मिलते ही हर्फ जोड़-जोड़कर पढ़ता ही रहता है।

   कहां जिन्दगी रूकी हुई थी और उन्हें पल-पल पहाड़ लगता था और यहाँ पता भी न चला सोलह वर्ष बीत गए। इस बीच नोखू इब्राहिम ने मॅट्रिक भी कर ली और मिशनरी में ही उसे कलर्क बना दिया गया। लीला मेविस भी पढ़ने में लगी ही रहती है। जॉन यहाँ के स्कूल से मिडल पास करने के बाद कहीं दूसरे स्थान पर पढ़ता रहा वो बी.एस.सी. पास करके अब नेवी में भर्ती हो गया है। जब कभी वो आता है तो अपने दादा ख्याला से हमेंशा उसकी मुलाकात या तो मिशनरी की लाईब्रेरी में होती है या फिर मेंस के काम को दौरान। इसकी उसे हमेशा शिकायत रहती है।

   ख्याला औफिशियली चर्च का मॅमबर नही है इस बात को लेकर सेन्ट्रल चर्च एडमिनिस्ट्रेशन ने कई बार सबाल उठाए लेकिन फादर ने उसके जवाब में हमेशा यही कहा, ‘‘ए ट्रू सन डज नॉट नीड एनी सर्टीफिकेट।’’ ख्याला मिशनरी का एक अभिन्न अंग है और चर्च और मिशनरी के कामों में भी बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेता है।

¤  मिशनरी के स्थापना दिवस पर उत्सव में भाग लेने के लिए देश विदेश से बहुत से लोग यहाँ पहुंचे। समारोह दो दिनों तक चला। मिशनरी के कार्य की चर्चा के अतिरिक्त, इसाई धर्म प्रचारकों, विद्वानों आदि के भाषण हुए। ‘‘मानवीय मूल्य और वर्तमान’’ जैसे विषयों पर चर्चा हुई। अंतिम सत्र में चर्चेज के चीफ द्वारा मंच पर एक अलग सा प्रस्ताव आया (इन्होंने पहले मिशन चर्च के फादर से ख्याला के विषय में कई बार जवाब तलब भी किये थे) कि इस मिशनरी में एक व्यक्ति काफी वर्षो से है लेकिन उसने न तो खुद को बॅपटाईज़ करवाया न ही चर्च का मॅम्बर बना वो व्यक्ति अगर यहाँ है तो क्या वो मंच पर आकर क्रिश्चनिटी और मिशनरी के बारे में अपने विचार, अनुभव और राय बतायेंगे और साथ ये भी की उन्होंने मॅम्बरशिप क्यों नही ली।

   ख्याला के परिवार के लोगों में कुछ हलचल हुईआज जॉन भी इस मौके पे मौजूद है उसने अपने दादा के कान में जाकर कुछ कहा। ख्याला अपनी जगह जाकर खड़ा तो हो गया लेकिन मंच तक जाने की हिम्मत जुटा नही पा रहा है तभी चर्च के फादर ने उसे मंच पर बुला लिया और चर्चेज के चीफ का मन्तव्य समझाकर उसे बोलने को कहा। वो कुछ क्षण मूक सा बना रहा फिर स्वयं से ही बुदबुदाया, ‘‘किया बोलू कुछ समझ नी लगीरा आउंदा……..’’ वो फादर से बोला, ‘‘फादर जी आई नो वेरी लिटिल इंगलिस……।’’ फादर ने उसे आश्वस्त किया कि, वो जो कुछ भी कहेगा लोग उसे समझेंगे, वैसे हिन्दोस्तानी में बोले तो वो उसका तर्जुमा करते रहेगे। उसने फादर का शुक्रिया किया और लोगों की तरफ मुखातिब हुआ। ‘‘चीफ साहब और यहां सभी को चरणवन्दे एण्ड गुड इवनिंग, आज जो कुछ भी मैं दिखाई दे रहा हूँ मुझे खुद को जकीन (यकीन) नही आता कि मैं वही ख्याला हूँ क्योंकि उस वकत (वक्त) हमें कभी मेहसूस ही नही हुआ की हम इन्सान है। फादर जी और मिशन की मेरबानी (मेहरबानी) से आज ख्याला को खुद में इन्सान दिखाई दे रहा है। फादर ने मुझे और मेरे कुटुम (कुटुम्ब) को पढ़ना -लिखना,, उठना- बैठना, बात करना, इज्जत से रहना सभी कुछ तो हमने यहीं सीखा बरसों… सोलह साल तक जिस दुनिया से हम आये थे वहां तो हमारी परछाई भी अपबित्र (अपवित्र) थी। शायद मैं आपको अपने जीवन की कहानी बताऊंगा तो आपको भी जकीन आ जायेगा। मैं आप से इजाजत चाहता हूँ।’’ –कुछ आवाजें हॉल से आई,‘ यस ख्याला गो ऑन।

ख्याला ने अपनी जिन्दगी की पूरी दास्तान जब सुनाई तो बीच बीच में लोग सुबकते, अपने आंसू पौछते नज़र आए। आखिर में वो खुद भी सुबकने लगा। कुछ देर के मौन के बाद वो संय्यत होकर बोला, ‘‘आज ख्याले रे मुहां मझ जुब्बान आईरी……..जी साहब आज ख्याला के मुहं में जुबान आ गई है। आज वो जो महसूस कर रहा है कह सकता है। नामुमकिन को मुमकिन बनाने की उस ताकत को महसूस कर सकता है……. क्राइस्ट जी ने कहा था जितना तुम खुद से प्यार करते हो उतना ही प्यार पड़ोसी करो…….चाहे वो पड़ोसी मुल्क हो, परिवार हो या आदमी……..चाहे वो किसी भी जात-धर्म का हो……..क्या ये प्यार वही तो नही है जो मुझे मिला और जिसे मैंने उस अजनबी अंग्रेज की मुस्कान में महसूस किया था…….मैं अक्सर यूशु की मूर्ति के सामने बैठकर उस अजनबी अंग्रेज की मुस्कान को ढूंढता रहता, जिसकी ताकत इतनी बड़ी थी कि मेरे अन्दर उस क्षण मरा हुआ इन्सान जीवित हो उठा था……उस मुस्कान में न जाने क्या था कि एक बुझे, हताश, टूटे हुए, जुल्म-जादतियों से बेजार, अपमानित- सोसित(शोषित)…… भूख और बेहाली से तड़पते इन्सान के रोम रोम की टीसों पर उस मुस्कान ने जैसे मरहम लगा दिया था। मैं कुछ क्षणों के लिए हर दर्द भूल गया था और जिन्दगी में पहली बार उस मुस्कान ने मुझे भी मुस्कुराने का मौका दिया था। न जाने क्या था उसमें………इन्सानी सरोकार, प्यार, संवेदना की वो डोर जिससे मेंरा अन्तर उससे जुड़ गया था……. इन्सान का सबसे पवित्र जज्बा जो मुस्कान में तब्दील हो जाता है, जीने में विश्वास पैदा कर देता है क्या मुजो कोई ये दसी संका, कि तेसा मुस्काना रा क्या धर्म था……क्या ……क्या मुझे कोई बताएगा कि उस मुस्कान का कौन सा धर्म था?’’

   कुछ देर के लिए पूरे वातावरण में सन्नाटा छा गया लोगों की आँखे कुछ क्षण उस पर टिकी रही और फिर नीची हो गई जैसे वो सब अपने अन्दर कुछ खोज रहे हो। तभी धीरे से उस चुप्पी के बीच एक स्वर उभरा, ‘‘क्या आपको क्राइस्ट की मूर्ती में वो मुस्कान मिली?’’

-……..हाँ, मेरी आँखों में कोई रौशनी पैदा हुई और मुझे वही मुस्कान अपने फादर में दिखने लगी। उन सब में वही मुस्कान नजर आती है जो सेवा में लगे हुए है, जो इन्सान की दुख तकलीफ में उनका साथ देते हैं, मजबूर, कमजोर गिरे हुए लोगों को हाथ पकड़कर सहारा देते है।… अब यहाँ उन सब में भी, मुझे वही मुस्कान नजर आ रही है……।’’

   प्रसंसा की ध्वनी और तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा हॉल गूंज गया, लोग खड़े हो होकर, हाथ हिला कर उसका सम्मान करते रहे, बहुत देर तक तालियाँ बजती रही।………….. प्यारे दोस्तों जब हम अपने अन्दर के दरवाजें खोल देते है तो हम में सबको अपने अन्दर समाने की ताकत पैदा हो जाती है जैसे आपने मुझे अपने दिल में जगह दी। जब ऐसा होता है तो लगता है कहीं हमारे अन्दर वो ईश्बर जाग गया है……. रोमन सैनिक जब ईसा के हाथ पैर कीलों से सलीब पर ठोक रहे थे तो ईसा मसीह ने ईश्वर से प्रार्थना की थी कि ए पिता, इन्हें क्षमा करना क्योंकि ये नही जानते की ये क्या कर रहे है……. मैं आज वही प्रार्थना उन लोगों के लिए करता हूँ जिन्होंने मुझे और मेरे परिवार को तकलीफें दीं अपमानित जिन्दगी जीने के लिए मजबूर किया……. हमारा सोसन किया, हमारी भूख को जूठन दिया। दमागी तकलीफें दीं…….. परमेस्वर उन्हें क्षमा करें……….।

एक बार पुनः हर्ष और तालियों से पूरा वातावरण गूंज गया और हमें अपनी किरपा और प्यार की ताकत देना ताकि हम हर इन्सान को मुस्कुराता देखने के अपने फरज (फर्ज) और मिशन को पूरा करी सके। ये येस गवार ख्याले री फरियाद हई।

एक बार पुनः हर्ष और तालियों से पूरा वातावरण गूंज गया।

दोस्तों मैं अपने प्यारे फादर के दिये गए पहले सबक को दोहराना चाहता हूँ इसे मैंने बरसों याद किया और मतलब भी समझा। इट इज… सेफर टू डिपेन्ड ऑन…. वट वी हेव… रिअलाइज़ड देन वट वी नो…….. हमें उस बात पर जकीन करना है जो हमें मेहसूस होता है उस बात पर नही जो हम जानते है। साहेबानो… से सब बोली दिता ख्खाले जे महसूस किता……. वो सब बता दिया है इस ख्याला ने जो महसूस किया ।

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(नवनीत, भारतीय विद्या भवन मुम्बई के दिसंम्बर 2014 के अंक में प्रकाशित)

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