कहाँ जाऊ


पुरानी मुंबई के इस उपनगर चर्नी रोड से मैं जब भी गुजरता हूँ,  तो इन गौ-मुखों को देखकर न जाने क्यों मेरे ज़हन में विनोबा जी का मुंह पर पट्टी बन्धा चेहरा उभरने लगता है और गौ हत्या बन्द का नारा बिजली की तरह मेरे मस्तिष्क में कौध जाता है, ये विशाल गौ-मुख इस गेट के दोनों छोरो पर स्थित है और इस जगह को गाय-वाड़ी के नाम जाना जाता  है। इसी के साथ आगे चल कर एक क्रान्तिनगर का लम्बा सा बोर्ड लगा हुआ है मुझे पता नहीं किस क्रान्ति की दास्ता इस क्रान्तिनगर से जुड़ी हुई है,  यूं मैने कभी जानने का प्रयास नहीं किया। क्योकि यहां कदम-कदम कोई न कोई क्रान्ति या तो झंडे की शक्ल में एक टांग पर खड़ी हुई है या बड़े-बड़े प्रसादों और बिजनस प्रतिष्ठानों में शान्ति से बैठी हुई है, या तमाम पार्टियो के आफिसों के दरवाजों पर बेबस खड़ी हुई है,  या फिर बोर्ड की शक्ल में किसी दीवार या डन्डे के सहारे कहीं लटकी हुई नज़र आती है।

                जहां मै खड़ा हूँ ठीक इसी के सामने तीन मंजिली घुटी चाल है। बम्बई में ऐसी लाखों चालें है जो कीड़ो की तरह से रेंगती हुई जिन्दगी की आरामगाह है। ये घुटी हुई जिन्दगी की आरामगाह है। ये घुटी हुई जि़न्दगी की सबसे बड़ी उपलब्धि है और आदमी की जीवन-यात्रा का आख़री पत्थर है। जिस चाल का अभी मैनें जिक्र किया है उसी-घुटन के नीचे दबा हुआ ग्राउन्ड फ्लोर है जिसकी कमजोर रेंलिग के सहारे-सहारे वो बाजार विस्तृत होता गया हैं। अन्दर से गुमसुम और ऊपर से चहकती हुई जिनके नाम के अन्त में देवी, कली और कुमारी जड़ा हुआ है बिकने को तैयार खड़ी हैं। – सामने के दरवाजे़ पर इन सबकों चीरती हुई मेरी नज़र लक्ष्मी देवी पर जाकर रूक गई। ये लक्ष्मी शाम होते ही दरवाजे़ पर खड़ी होती है। इसकी उम्र तेईस-चैबीस की होगी, इसे देखकर लगता है जैसे कोई कटी-छटी चट्टान बराबर भुरक रही है। सांवला सलोना रंग,  बड़ी-बड़ी तरल आंखें। मस्तक पर ये बड़ी सी लाल बिन्दिया सजाए रहती है। दुख-दर्द की परतें इसके सलोने बांकपन पर छायी हुई हैं- इसकी फिक्र में जैसे मायका खोया हुआ हैं।

kaha jaau                ये हिचकियां ही तो मेरी विरासत हैं, घर-गांव की यादों के तूफान दिल में उठते हैं, पल्लू भींगता और सूखता रहता है और हाथ मलती हूई दास्तान इस चौखट पर खड़ी कभी कभी गाहे बगाहे ताजा होती और मरती रहती है। एक हरिजन के यहां पैदा हुई, हिकारत और घृणा से जांचती आंकती अपने गांव और बस्ती की नजरों में पलकर बड़ी हूई। मां बाप का प्यार और दुलार ही खुशी थी मेरे लिए। हमारे अपने घर का वो बेबसी का अंधेरा ही सही वो मुझे जगमगाता हुआ एक रोशन आलम नज़र आता है। मेरा भाई जवान हो चुका था, मां बाप बूढे़ हो चुके थे अब वो कामक़ाज पर न जाते थे। भाई किसी न किसी तरह दो जून का रोटी पानी जुटा लेता था। वो दूर कर्बले की तकिया के पास संतू चैधरी के खेतों पर काम करता था। भाई हट्टाकट्टा जवान था। सारा दिन खेत में डंगरों की तरह से जुटे रहने पर भी वो बेगार मजदूरों की श्रेणी में था। हर रोज पांच रुपए मजदूरी में मिलते थे। इन पांच रुपए के लिए वो सारा दिन खटता रहता । मैं दोपहर को अक्सर दो सूखी रोटियां उसके लिए ले जाती थी। संतू चौधरी अक्सर इस वक्त मुझे खेत की पगडंडी पर मिलते वो हमेशा जहरीली नज़र से मुस्कुरा कर देखते और भोडे़ मजाक करते। वह दो बड़े बडे प्याज  देकर मुझे बोलता ये ले, लेजा सूखी रोटी खाता है, उसे दे देना उम्र के साथ साथ न जाने कितने ऐसे ही इनाम मुझे दिए जाते और मैं न चाहकर भी ले लेती।

                एक दिन संतू चौधरी भरी दोपहर में शहतूत के पेड़ के नीचे जैसे मेरा इंतजार कर रहा था। आसपास दूर दूर तक सन्नाटा था। मैं नंगे पैर जलती हुई ज़मीन पर लम्बे कदमों  से भाई को खाना देने जा रही थी कि संतू चौधरी ने मुझे आवाज़ दी। उसकी आँखों से उसके इरादों की लपटें निकलने लगीं वो होश खो बैठा और मेरे चींथड़ों से ब्लाउज़ के जिसको सी सी  कर तन को नंगा होने से में बचाए हुए थी वो सारे टांके उधड़ गए। मै रोयी, चीखी लेकिन कुछ बस न चला।

                एक बार के हादसे से संतू की हिम्मत खुल गई थी, वो हर रोज़ मेरी आबरू से खेलने की कोशिश करने लगा। उसे पता था कि हमारा बिरजू के सिवा और कोई नहीं है और ये तय हो चुका था कि हमारी रोजी़ रोटी संतू चौधरी की बदौलत ही चल रही है जहां तक मुझसे सहा गया मैने सहा लेकिन बिरजू भईया को शायद ये सब पता चल गया था। दशहरे का परब था, उधर राम ने रावण पर विजय पायी और इधर खून के समंदर में हमारी आस और दो जून की रोटियां डूब गई।

                अब अंधेरे और उजालों का फर्क मिटता गया। हमारी मज़बूरी और बेबसी पंचायती सामान की तरह से उठाई रखी जाने लगी। मेरे भाई के खून करने वाले का कोई निशान न मिला तहकीकात अपनी रफतार से चलती रही और इस तहकीकात के दौरान मेरे दामन में ढे़रो दाग और लग गए।

                इसी ग़हन अंधेरे में एक हल्की सी रोशनी दिखाई दी। प्रकाश दूर से ही ये सब खेल देख रहा था। एक दिन गांव की हद के बाहर उससे मुलाकात हो गई। मुझे अकेला और थका – मांदा देखकर उसने साईकिल रोकी और उसने वही पुराने सवालात देहराए जो अक्सर लोग गाहे-बगाहे पूछा करते थे। लेकिन उसकी हमदर्दी और हिमायत में मुझे थोड़ा सा फर्क लगा। वो खामोश सा मेरी तरफ देख रहा था-अब अक्सर बात करते या ख्याल आते मेरी आंखो में आंसू पिघलने लगते थे। कुछ दूर पैदल वो मुझे सुनता चला जा रहा था कि अचानक तैश में उसकी आंखे लाल हो गयी, उसने कहा लक्ष्मी ग़म न कर जिसका कोई नहीं होता उसका भगवान होता है उसने धीरज बन्धाते हुए साईकल पर बैठने को कहा चल मैं गांव ही जा रहा हूँ। गांव की हद पर पहुँचकर मैं अचानक साईकल से कूद पड़ी, “प्रकाश अब जा, गांव का कोई देख लेगा तो तरह-तरह की बातें होगी – तुम शरीफ आदमी हो।“ प्रकाश ने क्षण भर उसे देखा और कहा “तुझे दूसरों की इज्जत का इतना ख्याल है फिर भी लोग………लक्ष्मी तूने प्रकाश की शराफत देखी है हिम्मत नही देखी चल बैठ जा साईकल पर घर तक छोड़कर आऊॅगा।“

                लक्ष्मी अचानक फफक-फफक कर रो पड़ी उसे लगा जैसे उसके सामने कोई देवता खड़ा हैं। लक्ष्मी पैरो पर गिर गई। जि़न्दगी तिनके-तिनके होने से बच गई। लक्ष्मी ने आस और उम्मीद के तिनकों को जोड़-जोड़ कर एक घोसले की तामीर गढ़ डाली। ठहरा हुआ पानी अपनी राहें बना कर ठाठे मारता हुआ आगे बढ़ा।

                प्रकाश और लक्ष्मी जैसे खुद को चुराए पास के एक शहर में रहने लगें। प्यार की अंधी नदियों के बहाव में कुछ बडे़-बड़े पत्थर आए और ठहरे और चूर हो गए। शुरू-शुरू में दोनों अपना अस्तित्व भूल थे, लेकिन पानी के नीचे कहीं रेतीलापन और कंकर पत्थर तल में अब भी ठहरे हुए है। सतह पर तैरते-तैरते जब भी वो अन्तर की गहराइयों में डुबकी लगाते तो सांसे रेतीली हो जाती। आवेश का रंग वक्त की सच्चाई और क्रूरता के सामने, जैसे-जैसे दिन बीतते गए फीका होता चला गया। अब प्रकाश कुछ न कह पाता निरन्तर सिर्फ उसकी ओर देखा करता। जैसे अब अंदर कहीं चिडियों ने चहचहाना बन्द कर दिया हो, चहकना छोड़ दिया हो। अर्थ अब अर्थहीन जमीन पर अर्थ खोजने लगे। वो अब अंदर-अंदर षड़यंत्र बुनने लगा। ’लक्ष्मी अगर तुम गांव जाने से इतना ही डरती हो तो क्यों न हम ऐसा करें – अब न तो तुम मुझसे अलग हो पाओगी और न ही मैं……………..गांव में कुछ दिन तुम अपने यहां रहना और मैं अपने यहां…………… और मौका पाकर उपयुक्त समय पर शादी कर लेगे तो कैसा रहेगा?’

                ये सुन कर लक्ष्मी के अंदर जैसे धीरज और विश्वास उसी क्षण टूट गया । जमाने के बदलने की बात से पहले उसके सामने उसकी बदली हूई दुनिया नज़र आने लगी। उसने अपने अपने अंदर का पूरा तूफान रोक कर एक झूठी मुस्कराहट अपने होठों पर जड़ ली। वो अपने आपको ऊपर से साधे रही कि कही उसके देवता को ये न पता चल जाए कि उसके अंतर की गहराइयों मे उसकी आस्था टूट रही है। दौड़ती हुई लहरे अब किनारे पर आ लगी थी। एक दिन प्यार की साख रख कर उसकी आस्था ने इस किनारे पर ही दम तोड़ दिया। लक्ष्मी अपने अंदर ये बहम रख और प्रकाश के अंदर ये बहम पैदा करके कि मैं तुम्हें धोखा दे रही हॅू और मेरे जाने के बाद तुम भी कह सकोगे कि तुम्हारे साथ प्यार में धोखा हुआ, प्रकाश को वहीं छोड़ एक शाम चुपके से भाग निकली। अंधेरों ने उसकी रहनुमाई की और उसे लाकर अब बम्बई में इस देहलीज पर खड़ा कर दिया था, जहाँ उसकी कीमत पचास रुपए है। जिसमे से दस रुपए ठेकेदारिन के चार रुपए खाट के पांच रुपए पुलिस के, दो रुपए पानी भरने वाली के और पांच रुपए दलालों के, दस रुपए उसकी भविष्यनिधी एक ग्राहक के पीछे उसे तेरह रुपए मिलते है। कभी-कभी पांच-सात रुपए ग्राहक खुश होकर इनाम भी दे जाते। जिंदगी का एक छोटे से बहिश्त लिए वह हर बार एक ऊंचे पहाड़ पर चढ़ती और वक्त उसे आखिरी चोटी पर ले जा कर धकेल देता – मां – बाप की यादें उसकी सांसों के साथ बिंधी हुई है। उन बेसहारों को क्या हुआ होगा, वे जिन्दा भी होगें या नही? वो आसुओं के घूंट के सहारे निवाले तो उतार लेती लेकिन सांसों का बोझ उससे बर्दाश्त न होता। आत्महत्या और खुदकुशी करने के कई प्रयास उसने किए लेकिन हर बार उसे लगता कि उसके बूढ़े मां-बाप जबसे उसने घर छोड़ा था तब से ही पगन्डियों और रास्तों पर खड़े उसकी बाट जोह रहे है। इस तरह चार साल का अरसा उसने सोचते-सोचते निकाल दिया। उसकी कमाई का सारा हिस्सा ठेकेदारिन के पास जमा होता रहता था।

                लक्ष्मी हर क्षण अब कोई न कोई युक्ति सोचती – आखिर यहां इस तरह जीने का कोई सबब भी तो नहीं है। – आखिर मां- बाप की आशीष और दुआएं काम आ गई। उसने धीरे-धीरे ठेकेदारिन से सारे पैसे निकाल लिए और एक दिन एक ग्राहक के सहारे युक्ति गढ़ डाली उस ग्राहक के साथ किसी होटल में दो-चार रात बिताने के लिए दो सौ रुपए उसने ठेकेदारिन के हाथ पर रखे-उसने अपना सामान सम्भाला और चकमा देकर भाग निकली। स्टेशन पर पहुंच कर उसने एक बार वो रकम गिनी जो उसने चार सालों में कमाई थी, और बकसे में सम्भाल की रख दी। हारी हुई जिंदगी अब जीत में बदलती हूई  नज़र आई। पहली बार उसे अर्थहीन जि़ंदगी में अर्थ नज़र आया। उसने ट्रेन पकड़ी।

                सुबह हूई और तीसरे पहर उसका स्टेशन आ गया। स्टेशन से कुछ दूर ही बस अड्डा हैं, जहां से उसके गांव के लिए बस जाती हैं। वो बस में बैठ गई लेकिन अब इस बचे सफर में न जाने क्यों उसका मन कच्चा-कच्चा होने लगा।- वह अपने गांव जब पहुंचेगी तो बहुत से लोग उसे दूर से पहचान लेगे, न जाने इस बीच में लोगों ने क्या-क्या सोचा होगा। जिन लोगों से कोई वास्ता भी न था वो लोग भी पूछने का हक तो रखते ही है कि वो अचानक कहां चली गई थी और इतने बरस वो कहां थी। वो क्या जवाब देगी? जैसें जैसें बस घर का फासला कम कर रही थी, उसके अंदर बहुत से सवाल जैसे चीखने लगे थे और उन सबके जवाब में वो सुन्न होती जा रही थी।

                जब वो चली थी उसे वो रास्ता कितना लम्बा लग रहा था खत्म होने का नाम ही न लेता था लेकिन ये रास्ता कितनी जल्दी कट गया उसे पता भी न चला – वो गुम सी हो गई जैसे उस पर बेहोशी तारी होने लगी, बरसों की थकी हूई नीदे उसकी आंखो में आराम करने लगी थी – और अब जैसे-जैसे गौव नज़दीक आता गया उसे लगा जैसे उसके गांव से आती हूई हवाएं उसे थपकियां देकर सुला रही हैं।

बस को पहुंचे लगभग दस-बारह मिनट हो चुके थे सभी यात्री गाड़ी से उतर अपना-अपना सामान ले, अपने-अपने मुकामों की तरफ जा चुके थे। कंडक्टर ने आकर गाड़ी का मुआयना किया, लक्ष्मी अभी तक सो रही थी, उसने उसे जगाया, वह चौंक कर उठ बैठी अपने ही गांव के बस स्टेशन पर थी बह उतर पड़ी और कंडक्टर से सामान उतारने के लिए कहा। कंडक्टर बस की छत पर चढ़ा देखा वह कोई भी सामान न था वह पागलों की तरह से तेजी से खुद बस की छत पर चढ़ी, कई बार चढ़ी-उतरी लेकिन वो बक्सा जिसमें उसकी पूरी जि़ंदगी की कमाई थी, न मिला। वो विक्षिप्त सी, खाली हाथ इधर-उधर दौड़ती रही लेकिन सामान न मिला अंत में कुम्हलाया सा मन लिए वो अपने को छिपाती बस स्टेशन के एक कोने में बैठ गई उसका मन जैसे अंदर से पत्थर हो गया, उसे रूलाई भी न आ रही थी।

हर घड़ी उसके सामने मां-बाप की सूरत उभरती रही। रात काफी हो चुकी थी कई बार उठकर घर की तरफ चलने को हूई लेकिन फिर बेजान सी लौट कर वहीं बैठ जाती और सोचती। क्या पता उसके मां-बाप, जिन्होंने जि़ंदगी भर कदम कदम पर अपमान, भूख और सदमे सहे थे शायद अब न होंगे-और अगर हुए भी तो किस हाल में होंगे। क्या वो सब बर्दाश्त कर पाएगी। –कैसा मुकद्दर का खेल है जबसे उसने घर छोड़ा था उसे हर पल मां-बाप का ही ख्याल रहा और आज यहां पहुंचकर भी उनसे उतनी ही दूर है। अचानक स्टेशन की तरफ जाने बाली बस का ऐलान हुआ, उसका हाथ ब्लाउज में रखे रूमाल पर चला गया जिसमें उसने ऊपर के खर्चे के लिए कुछ पैसे रखे थे वह बिजली की तेजी से टिकट खिड़की के पास पहुंची। टिकट लिया और बस में बैठ गई। जि़ंदगी दो कदम चली और ठहर गई।

                न जाने जि़न्दा रहने की किस ख्वाहिश में वो वापिस लौट रही है। बस जैसे ही चली वो हरहरा कर बिलख-बिलख बच्चों की तरह से रो पड़ी, उसने खिड़की से गांव की ओर मुड़कर देखा छायाएं पेंड़,  मकान, खेत, और उगता हुआ सूरज सब वैसे ही जड़ है जैसे पहले थे उसे किसी ने आवाज़ देकर रोका नहीं-पर जैसे ही गांव से पार हूई उसे  अपनी मां की चीख सुनाई दी-उसने इधर-उधर दूर-दूर तक देखा, उसे लगा जैसे कि किसी मां की गोद से उसका, बच्चा वक्त का दानव भगाए लिए चला रहा है।

                रेतीली जि़ंदगी पर आस की कोई लकीर खिंची और मिट गई। आज फिर लक्ष्मी बिकने के लिए उसी देहलीज पर खड़ी है और सामने से वो पत्थराए गौ मुख इसी ओर देख रहे है-जिन्हें देचाकर अक्सर जहन में किसी बिनोवा का मुँह पर पट्टी बान्धे चेहरा उभरने लगता हैं।

(यह कहानी नव भारत टाइम्स मुंबई, कादम्बिनी, आउटलुक, शुक्रवार आदि में प्रकाशित)

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One thought on “कहाँ जाऊ

  1. कल मेरे भी दिन थे जब ये शरण आ बसे थे
    पतझड़ वाद ये पीठ दे भूल रहे कल क्या थे
    खँडहर होगये पर रही इमारत बुलंद होगी
    सामने बने घरोंदे भी नहीं भूले कि वे क्या थे

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