मेरी बस्ती


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        इस बस्ती को छोड़े हुए पैंतीस वर्ष हो चुके है। पाकिस्तान से उजड़ कर आने के बाद, एक लम्बे अरसे तक हमारा परिवार न जाने कहाँ-कहाँ भटका और फिर इस बस्ती में आकर ठहर गया था। मेरा बचपन यहीं बीता। मैं इस बस्ती को कभी भुला नहीं पाया, गाहे-बगाहे यादों में ये इतनी सजीव हो उठती है।

        गली, कूचे, सड़क कहीं से भी डुगडुगी बीन, सारंगी ढ़ोल की आवाज सुनायी देती, तो बच्चे गलियों और मोहल्लों से भागना शुरू कर देते। देखते-देखते लोगों का मजमा जमा हो जाता। हर आता-जाता, छोटा-बड़ा मजमे में शामिल हो जाता। अक्सर तमाशबीनी करते वक्त हम ये भूल जाते कि घर से हमें किसी जरूरी काम से भेजा गया था और फिर हमारे कामकाजू होने की विशेषता पर प्रश्नचिन्ह लग जाता।

         मदारी का खेल खत्म होते ही हमें होश आया कि हमारे हाथ की एक आने की बर्फ पिघल कर एक पैसे भर रह गयी है। और घर पहुँचते-पहुँचते ये भी बचेगी या नहीं ? हम मुश्किल में फंसे नजर आ रहे थे। काफी देर हो चुकी थी, एक तो इसका डर और हमारी दूसरी मुश्किल ये भी कि ईमानदारी से एक आने की खरीदी बर्फ का एक पैसे भर रह जाना। ज्यों-ज्यों हम सोचते, बर्फ पिघलती ही जाती। हम सोचते-सोचतें अब घर की गली में दाखिल हो चुके थे, लेकिन कदम वही रूक गये। आगे बढ़ने की हिम्मत न हुई……. हमने अपनी बेबसी में आँसू बहाने शुरू कर दिये। तभी गली से गुजरती जगत नानी (सीता नानी) ने हमें जार-जार रोते गली में बरामद किया। हमारे भीगे हुए कपड़ो को देखकर वे गंभीर हो गयी। नानी ने सोचा, बच्चा इस कदर रोया है कि कपड़े तक भीग गये। मोहल्ले भर की नानी ने हमारे सिर पर हाथ फेरते हुए हमें हृदय से लगा लिया। वो हमे दुलारती और चुप कराते हुए पूरे मोहल्ले पर अपना क्रोध प्रकट करने लगीं, ‘‘चुप हो जाओ, अरे………अरे राजा बेटा चुप हो जाओं………..मुझे बताओं तो सही किसने मारा है?………. बच्चा गली में खड़ा रो रहा है और पूरा मोहल्ला कान में तेल डाले बैठा है। इस मोहल्ले में इन्सान नहीं रहते  बच्चों के दुश्मन रहते है……. नासपीटे……..।’’

nani 0011                कहाँ हम इस काली-कलूटी बुढि़या को देखकर डर जाया करते थे और अब उसके वक्ष से लगे उसके दुलार में कोई अलौकिक आनन्द अनुभव कर रहें हैं। बडी विचित्र बुढि़या है ये सीता नानी। इसका पहनावा, इसकी बातचीत, इसका मानस सब विचित्र है। बड़ी कन्नी की धोती पर सीधा पल्ला और उसके साथ मर्दानी कमीज, धोती पर मर्दाना जूता। ये उसकी सहज पोशाक है। कभी लगता है, ये अनपढ़ हैं और कभी दोहे-चौपाई श्लोक और यहाँ तक कि उर्दू की शायरी भी बोल जाती हैं। कहते हैं युवा अवस्था में ही सीता नानी के पति, जो फौज में थे, लड़ाई मे काम आये। उम्र कम थी, लेकिन अपने मायके वापस नहीं गयी। पूरी उम्र उन्होंने यहीं इस बस्ती में गुजार दी। नानी के आँचल में ये पूरी बस्ती उसी तरह सिमटी हुई है, जिस तरह मैं इस वक्त।

वे मुझे पुचकार रही हैं, दुलार रही हैं और तभी हमारे हाथ में बची बर्फ से उनका स्पर्श हुआ। चौंक कर उन्होंने हमारे हाथ की बर्फ को देखा तो उन्हें बात समझने में देर न लगी, ‘‘ओह! ये बात है, बर्फ लेकर कहीं खेलने लगे थे क्या ?’’ – हमने बिना हील-हुज्जत के सारी बात ज्यों कि त्यों कह सुनायी।

                नानी ने हमें एक आने की बर्फ दिला दी। हमने सोचा, चलो एक समस्या तो हल हुई। अब हम दूसरी समस्या के विषय मे मुँह बनाये सोचने लगे। हमने नानी से नीचे झुकने का इशारा किया और उनके कान में दूसरी समस्या डाल दी। हादसे की गंभीरता को समझते हुए वे मेरे साथ-साथ घर भी आ गयीं।

                माँ गुस्से में तपी बैठी थी। घर आये मेहमानों के लिये शिकन्जी तैयार किये, वह बर्फ का न जाने कब से इंतजार कर रही थी। घर में प्रवेश करते ही माँ की नजर सीधा हम पर पड़़ी और हम फौरन नानी के पीछे हो लिये। नानी को देखते ही माँ का गुस्सा एक आने से एक पैसे भर रह गया था। हमें डरा देखकर नानी ने हमारी तरफ से देरी के लिये सफाई दे दी, ‘‘अरे अरे अरे……..क्या गर्मी है आज……. बर्फ वाले की बर्फ खत्म हो गयी थीं। हम दोनों तबसे बर्फ वाले के पास ही थे बर्फ के इंतजार में।’’

                नानी की सफाई से माँ का रहा सहा एक पैसे भर का गुस्सा भी शांत हो गया। हमने बर्फ बड़ी जीजी के हाथों सौप निजात पायी। फिर तो बात आयी-गयी हो गयी। माँ, नानी और मेहमान बात-चीत में मशकूल हो गये। हमें भी औरों कें साथ शिकन्जी पीने को मिली। चैन पड़ते ही हम ठंडे दिमाग से सोच रहे थे कि नानी को झूठ बोलना भी नहीं आता, लगता है बहाना बनाने में बिलकुल अनाड़ी हैं। सोचो, कही माँ पूछ लेती कि नानी आपकी बर्फ कहाँ है, जो आप वहाँ एक घण्टे से बर्फ के इंतजार में बैठी हुई थी। अगर ऐसा कहीं हो गया होता, तो नानी के झूठ के साथ-साथ हमारी भी पोल खुल जाती कि नहीं?

                ये तो एक सहज तर्क मेरे दिमाग में चक्कर लगा रहा था लेकिन असल बात ये थी कि उस वक्त किसी भी बड़े की कही गयी बात पर शक नहीं किया जाता था और बड़ों से तर्क करना  अनुचित, सर्वथा अनुचित समझा जाता। इससे बड़े का बड़प्पन और गरिमा भी बनी रहती और छोटे का प्यार भी बना रहता। ऐसी थी मेरी बस्ती, ऐसे थे मेरे लोग।

                कुछ देर बाद नानी को कुछ ख्याल आया और वे एकदम से ये कहती हुई उठीं, ‘‘ ओहो, मैं घर से किस काम के लिये निकली थी और कहाँ आ गयी ? मुझे एक जरूरी काम हैं। मैं चलती हूँ।’’ और ये कहते हुए वे चली गयीं। उनके जाने के बाद फिर हम मन में सोचने लगे कि कुछ विशेष बातें सिर्फ हमारे साथ ही नहीं जुड़ी हैं, बल्कि बड़े-बड़े लोगों के साथ भी वही होता है कि वे घर से जिस जरूरी काम से निकलते है, अक्सर वे भी तो भूल जाते है। इसी धारणा को मन में रखकर निश्चिन्त हो गये और दो-तीन दिनों के बाद ही हमने एक और हादसा दोहरा दिया।

                दोपहर का वक्त था और हमें दही लाने भेजा गया। हम हलवाई की दुकान पर पहुँचे ही थे कि हमें ढोल और थाली बजने की आवाज सुनायी दी। सामने मैदान में जहाँ पीपल के दो विशाल पेड़ हैं, वहां नट का खेल चल रहा है। बस हम भी तमाशबीनों में जा खड़े हुए। हमें उनके करतबों ने इतना आकर्षित किया कि हम दुनिया भूल गये।

                खेल खत्म हुआ तो हमें होश आया कि हम अपने साथ दही का बर्तन भी लाये थे। आखिर वह बर्तन चला कहाँ गया? एक नजर हलवाई की दुकान पर ड़ाली, पर बर्तन नजर नहीं आया। और हलबाई महोदय से जाकर पूछने कि हिम्मत इसलिये नहीं हूई कि वो हमसे ही दस सवाल पूछ बैठेगे। वैसे भी हमें इन हलवाई महोदय से डर ही लगता था। कई बार हम इस दानवी शख्शियत को रामलीला में रावण की भूमिका मे देख चुके थे और आते-जाते जब भी हमारी नजर उन पर जाती, वे अपनी मूछों को घुमाते और ताव देते नजर आते। वैसे उनका अपनी नाक से भी कुछ अजीब ही रिश्ता नजर आता था। वे नाक की नाक में दम किये रहते। अपनी नाक के साथ, उनकी अविराम छेड़-छाड़ कोई मामूली बात नहीं थी, बस अब आप इसी बात से समझ जाइए कि उनकी मूँछ आँख बचाकर कुछ घड़ी ही चैन महसूस कर पाती थी। हम भी उनसे आँख बचाकर एक निर्जन गली में आ खड़े हुए। सोच रहा था कि क्या किया जाये? तभी हमारे मानस में एक नाटककार धीरे से दाखिल हुआ।

                मैं कभी भी इस गली को भूल नहीं सकता। अजीब संकरी गली थी ये, पचास कदम चलने के बाद, आगे जाकर बंद हो गयी थी। कहतें है, एक बार आधी रात गये चौकीदार समेत कई लोग एक आदमी को चोर समझ कर उसके पीछे भागे, वह आदमी इस गली में दाखिल हुआ और लोग भी उसके पीछे-पीछे आये लेकिन वह आदमी इस गली में घुस कर कहाँ गायब हो गया, कुछ पता न चला। इस हादसे के बाद कई लोगों ने उसे कई बार देखा है। कहते हैं रात को अक्सर वह इस गली के आस-पास नजर आता है और फिर गली मे जाकर लुप्त हो जाता है। मुझे लगता है वही आदमी नाटककार के रूप में मेरे मस्तिष्क में प्रवेश कर गया है और अब वह हमारी वर्तमान समस्या की स्क्रिप्ट लिख रहा है तभी मेंरी आत्मा ने चेतावनी दी – ’’जनाब! बेबसी मे रोने से पहले आपकों जल्दी-जल्दी घर की ओर बढ़ना चाहिये, क्योंकि आपको काफी देर हो चुकी है। अरे भूल जाओ दही के बर्तन को । किसी दूसरे हलवाई से जाकर कुल्लहड़ या दोने में दही ले लो – अरे किसी को क्या याद होगा कि हम बर्तन लेकर दही लेने निकले थे और फिर घर के लोग दरवाजे पर खड़े होकर तुम्हारा इंतजार कर रहे होगे। जनाब, आप चुपके से रसोईघर में जाकर दही किसी बर्तन में पलट देगे, तो बात ही खत्म हो जायेगी।………हाँ! इस बीच अगर किसी की नजर आप पर पड़ी और कहीं किसी ने पूछ लिया, कि वह बर्तन कहाँ है, जो तुम दही के लिये ले गये थे तो?……. यकीनन आपका ऐसी स्थिति में रोना बहुत जरूरी हो जायेगा। वैसे भी ऐसी स्थिति में अगर रोये नहीं, तो आपकी पहचान ही बदल जायेगी।……… हाँ ! रोते-रोते सिर्फ दो लाइन का डाॅयलाग बोलना है, याद कर लीजिये, ‘‘हम किनारे-किनारे जा रहे थे, तेज रफ्तार से एक साइकिल आयी और हमें टक्कर मार दी’’- ये कहकर जोर से रो पड़ना ताकि सामने वाला आपके प्रति सहानुभूति प्रकट करना शुरू कर दे। ………’’हूँ! हूँ! ऊँ! ऊँ! अच्छा हुआ कि हम नाले में नहीं गिरे…….. सिर्फ दही लेने जो बर्तन ले गये थे, वही नाले में जा गिरा बस।’’………इसके बाद सिर्फ सिस्कियाँ लेते हुए, दही का कुल्लहड़ या दोना किसी भी उपयुक्त पात्र को पकड़ा देना और नल से हाथ-पैर धोना शुरू कर देना और उसके बाद दबी आवाज में पूछना है, ‘‘वो,वो…..वो आयोडेक्स कहाँ रखा है?’’

हम ये सब मन मे दोहराते हुए बहुत खुश नजर आ रहे थे, साथ ही यह भी सोच रहे है कि एक पंथ दो काज हो जायेंगे। एक तो अपने नाटककार और कलात्मक गुणों का टेस्ट भी हो जायेगा और आने वाली मुसीबत से भी निजात मिल जायेगी। बस हमने घर करीब आते ही गंभीर मुद्रा धारण कर ली और हल्का-सा लंगड़ा कर चलना शुरू कर दिया।

                लेकिन घर के अंदर दाखिल होते ही हमारे होश गायब हो गये। हमारी नजर रसोईघर के बाहर रखे टेबल पर गयी। दही का वह बर्तन जो हम ले गये थे, वह पते से ढ़का टेबल पर रखा था। ये समझते हमें देर न लगी कि उसमें दही ही होगा। हमारे कदम बरामदे में ही रूक गयें। पास के कमरे से दबी-दबी हँसी और खुसर-पुसर सुनायी दी। हमारी आहट पाकर सभी में हलचल पैदा हो गयी थी।

                ‘‘नौटंकी महाराज पधार गये हैं।’’

                ‘‘देखो इधर से देखो हाथ में कुल्लहड़……’’

                ‘‘आहिस्ता बोल…..’’

                हमें मामला कुछ संगीन नजर आने लगा। हमें साफ-साफ दिखायी दे रहा है कि हमारे अंदर अभी-अभी जन्मे नाटककार की एैसी-तैसी होने लगी है। अंदर के दरवाजे से हमारे आगमन की सूचना मुख्यालय में पहुँच चुकी थी और कुछ ही क्षणों मे हमें अंदर पेश होने का आदेश सुनायी दिया।

dahi 0011                माताश्री के आदेश के स्वर में कुछ ज्यादा ही क्रोध परिलक्षित हो रहा है। हमें लग रहा है जैसे हमारे पैर लोहे के हो गये हैं। खिड़की से ताँक-झाँक के दौरान हमें बड़े भाई साहब की रनिंग कामेन्ट्री के स्वर साफ सुनायी दे रहें हैं।

                ……..अब वे एक कदम चलकर रूक गये हैं – जनाब नौटंकी पसीने से नहा गयें हैं…… हिम्मत करकें एक कदम फिर चले…….. लो फिर रूक गये। इसको देखकर लग रहा है कि अब कुछ क्षणों में भोंपू बजने वाला है………।

                हमने कमेंटेटर(Commentator) की तरफ पीछे मुड़कर खीज प्रकट की और धमक कर कमरे के अंदर माँ के सामने जा पहुँचे। पूछताछ के दरम्यान हम पूरी समझदारी से काम ले रहे थे। माताश्री से मुनासिब दूरी तो बनाये ही रहे, साथ ही हाथ के कुल्लहड़ को शील्ड़ की तरह एकदम सामने रखा है। देखते-देखते सभी भाई-बहन हमारे इर्द-गिर्द जमा हो गये।

                हमारे बयान के एक-एक शब्द को ध्यान से सुना जा रहा है और उस पर गैरमुनासिब प्रतिक्रिया भी की जा रही है। हमारे कुछ भी कहने से पहले ही, ये लोग इस तरह से ठहाका लगा रहे हैं, जैसे आज टी.वी.की सुपरहिट कामेड़ी मे बेबात लाफटर लूप लगा रहता है। कुछ देर हम आँय-बाँय कहते रहे और फिर हमनें पैंतरा बदला और अपने जुर्म को स्वीकार कर लिया। सोचा कल से हमें अपने सत्यवादी होने का फायदा तो मिल जायेगा, यानी ‘भागते भूत की लंगोटी भली।’

                हमने जुर्म का इकबाल तो किया, लेकिन एक भारतीय होने के नाते इतना झूठ अवश्य बोला कि ये गलती हमसे पहली बार हूई है। वह भी इसलिये कि हमारी जगह कोई और भी होता, तो उससे भी यह गुनाह हो जाना स्वाभाविक होता। हमने बताया, नट का तमाशा एैसा-वैसा नही था। हमने ढ़ोल-थाली के बजने से लेकर नटों के करतब की तफसील बयान करनी शुरू कर दी। अचानक हमें खयाल आया कि हम विषय से कहीं भटक गये हैं। सब लोग कुछ ज्यादा ही तल्लीनता से हमें सुन रहे थे। उनकी व्यंग्यात्मक भाव-भंगिमाएँ और आपस में मूक संकेत हम ताड़ गये। अपनी झेप मिटाते हुए हमने बड़े भाई साहब की ओर मुखातिब होकर कहां, ‘‘क्या आप आसमान में चल सकते हैं? …….नहीं ना, फिर वे जो खेल दिखाने वाले रस्सी पर चल रहे थे उनका मजाक मत बनाइए……।’’ तभी हमें बीच में रोक कर पूछा गया, ‘‘आपको नट का तमाशा देखने के लिये भेजा गया था या दही लेने?’’ हमने सादगी से उत्तर दिया, ‘‘दही लेने,……. लेकिन माँ! उसी वक्त तो नट का खेल हो रहा था ना……।’’

                हमसे फिर वही सवाल जरा ज्यादा सख्ती से पूछा गया। ‘‘…..तुम्हें किस काम के लिये भेजा गया था ?’’

                अबकी हमने अपनी जिरह में इस विचित्र काम्प्लेक्स सिचुएशन को सामने रखकर समझाने की गरज से कह ही डाला, ‘‘बताइये, क्या हम तमाशा करने वालों को बोल कर आते कि रूको! हम घर दही देकर वापस आते हैं, फिर खेल शुरू करना….. और अगर वो मान भी जाते, तो आप (माँ से) हमें इस भरी दुपहरी में दोबारा जाकर तमाशा देखने की इजाजत दे देती क्या?’’

                हमारे इस बयान से सबके सब एकदम स्तब्ध रह गये। अक्सर खतरनाक मौकों पर हमारे कान स्वतः लाल हो जाया करते हैं और वही हुआ जो हमने महसूस किया। हमारे सत्यवादी होने की श्रेष्ठता को चूल्हे में डाल, हम पर मुँहजोरी करने का भारी भरकम इल्जाम लगा दिया गया। यही नहीं मुँहजोरी के इल्जाम के साथ हमारे पैदा होने से पहले की भी तमाम नागवार घटनाओं का भी जिम्मेदार हमें ही ठहरा दिया गया कि हम इतने अशुभ, नाशुक्रें और अजीब प्राणी हैं कि देश के टूकड़े होने के बाद हम पैदा हुए और हमारे पैदा होने के कुछ ही वर्ष पहले देश के टुकड़े हो गये। हमारी समझ में नहीं आ रहा कि 15 अगस्त को स्वाधीनता दिवस पर स्कूल, कालेज और पूरे शहर में खुशियां मनायी जाती हैं, फिर माँ दुखी क्यों है? खैर, उन्हें दुखी देखकर हम एक अपराधी की तरह से अपने पैदा होने पर पूरी तरह से शर्मिदा हैं और हैट स्टैण्ड पर लटके हैट की तरह से हमारा झबरें बालों वाला सर हमारी गर्दन पर लटक गया।

                हमें मलाई कितनी पसन्द हैं, इसका अंदाजा आप इसी से लगा सकतें है कि इस मोहल्ले की बदनाम बिल्लियाँ, बन्दरों को हमेशा शक की नजर से देखा जाता है। कुल्लहड़ के एक किनारे से पत्ता हट गया है और हमें दही पर की मोटी मलाई की परत साफ-साफ दिखायी और सुंघाई दे रही है, हे भगवान! कैसी मजबूरी हैं। हमारे बालों की आड़ में कुल्लहड़ का फासला सिर्फ छह इंच भर है और इन क्षणों में हमें पैदा होने पर शर्मिन्दा होकर अफसोस प्रकट करना पड़ रहा है।

                हमारी इकबालिया मुद्रा ने हमारे प्रियजनों को हम पर खुलकर दोषारोपण करने के लिये मजबूर कर दिया और वो लोग भारतीय राजनीतिज्ञों की तरह आचरण भी करने लगे। हमसे एक वर्ष बड़े भाई साहब, जो हमसे चुपके-चुपके, स्वयं कोठे पर घडीसाज के बाप की तरह बैठकर हम पर हुक्म चलाते और घडि़याँ मंगवा-मगवा कर ठीक किया करते थे, दसियों बार हमें चोरों की तरह नीचे से औजार लाने पड़ते थे फिर हमें श्रीमान आज्ञा देते थे कि इनको वहीं वापस रखकर आना। अब हमें पार्टी से निकाल कर कह रहे हैं कि सिर्फ एक घड़ी को छोड़ कर जिस पर ड्राम्ची साहब का हाथ नहीं लगा है, वो चल रही है बाकी सब घडि़यां इन्होंने मरम्मत करके बिगाड़ दी हैं। कैसी मुश्किल में हम फंस गयें। अब तो सफाई देने की भी गुंजाइश नहीं, क्योकि हमारी तो पैदाइश ही गलत साबित हो चुकी है। हम बहुत गड़बड़ आदमी हैं, लेकिन फिर भी हमारा खास ख्याल रखा जाता हैं। इस घर में जो भी काँच के बर्तन आते है, वे सिर्फ हमारे तोड़-फोड़ के शौक को पूरा करने के ही लिये लाये जाते है। कहा जा रहा है कि हमें चैन नहीं आता, जब तक हम दिन मे दो-तीन पेन की निबें न बर्बाद कर दे। घर की सारी कीमती किताबों से चित्र काट-काट कर हमने किताबों को बर्बाद कर डाला है, और दूसरे लोगों ने वे सारे चित्र फिर से किताबों में लगाने के लिये अपने पास रख छोड़ें है। ये बरसों से पड़ी टूटी साइकिल, जिसकी काया से कभी भी कोई भी हिस्सा निकाल लिया जाता है, दूसरी साइकिल को ठीक करते समय। अब उसके सदुपयोग और दुरूपयोग की गुंजाइश समाप्त हो चुकी हैं ऐसी स्थिति में उसका घोड़ा बनाकर, मैं ही कभी-कभी उपयोग कर लेता हूँ और बकायदा उस पर चढ़ने और उतरने के वक्त हम उसकी कीमत भी चुकाते हैं, खरोंच लगवाकर या कपड़े फडवाकर और आज, इस साइकिल को इस दुर्दशा तक पहुँचा कर, इसे अपंग बनाने का इल्जाम भी हमीं पर थोपा जा रहा है।

                हम पर न जाने कौन-कौन से इल्जाम, बीते सनों की वारदातें, गड़बडि़याँ हमारे नाम ही लिख दी जाती है। एक बात की तो आपको दाद देनी ही पड़ेगी और मुझे भी इस पर सदा गर्व रहेगा कि मेरे पूरे परिवार की स्मरणशक्ति काबिले तारीफ हैं।

                जनाब, हमारी रोनी सूरत पर बारह बज चुके थे, हमें मुँह धोने का आदेश मिला। हमने सोचा कि चलो जान छूट गयीं लेकिन मुँह धोते-धोते ही हमें सूचना मिली कि मुँह-हाथ धोकर फौरन मुख्यालय में हाजिर हो जायें।

                हमारे कारनामों को देखते हुए, जिसमें कसबे को परेशान करने का आरोप भी गंभीरता से शामिल है। हम दिन पर दिन गैरजिम्मेदार इंसान होते जा रहे हैं। हमारा घर के किसी भी काम में मन नहीं लगता। घर से दही लेने के लिये भेजा गया और बाहर जाकर खेल देखने लगे। खेल के चक्कर में बर्तन तक भूल गये। कितनी तकलीफे हुई, हलवाई किरनपाल चाचा खुद दही पहुँचा कर गये।

                हमें हुक्म दिया गया कि हम अब स्कूल के अलावा कही बाहर न जाये। बाहर का अब कोई भी काम हमें नहीं दिया जायेगा। मेरा माथा ठनका, अच्छा तो ये सब हलवाई महाराज का पैतरा है। हलवाई महाराज हमें बलवाई महाराज नजर आने लगे। हमें जानबूझ कर डॉट  खिलवाने के लिये उन्होंने ऐसा किया। गुस्से में हमें बस उनका ही चेहरा नजर आ रहा था। हमनें इसी वक्त उनसे बदला लेने की योजना गढ़ ली। हम बड़े होकर रामलीला में राम का रोल करेगें और तब इस हलवाई रावण चाचा को मारने से पहले पूछूंगा कि तूमने हमें डॉट  खिलवाने के लिये ही उस दिन दही मेंरे घर पहुँचाई थी न ?…….. और फिर इसी जुर्म में ऐसा तीर मारूंगा कि डॉक्टर के पास जाना पड़ेगा, तब पता लगेगा बच्चू को कि डॉट  कैसे खिलवायी जाती है।

                कई दशक बीत गये इस घटना को। आज इतने वर्षो के बाद जब मैं मानस की दृष्टि से अपनी पुरानी बस्ती का अवलोकन कर रहा हूं तो लगता है हम कहाँ से कहाँ आ गये। सब कुछ छूट गया, वह अपनापन, अपने से लोगो की बस्ती चली गयी। मन करता है मैं फिर से उतना छोटा हो जाऊँ, दही लेने जाऊँ, खेल देखने लगूँ, दही का बर्तन भूल जाऊँ। फिर दही समेंत बर्तन अपने आप घर पहुँच जाये और फिर मुझे कोई डाँटे कि मैं कितना गैर-जिम्मेदार होता जा रहा हूँ।

                उस वक्त लोग कितने सरल हुआ करते थे। दूर से ही पता लग जाता कि यह व्यक्ति सभ्य और सुशील है। सर में तेल लगा हुआ है, बाल ठीक से झारे हुए है, आँखो में सुरमा या काजल लगा हुआ है, कपड़े साफ और धुले हुए है। व्यक्ति का चरित्र इन छोटी-छोटी बातों से पता लग जाता था। फिर वो व्यवहार में भी उसी तरह की एहतियात बरतते थे। विनम्रता एक श्रेष्ठ गुण माना जाता था उस वक्त।

बाजार से गुजरते ढोल-ताशो और नक्कारों की आवाज सुनते ही दुकानदार और अन्य लोग टोपी

title सीधी कर सम्हल कर बैठ जाते और सर नंगा हुआ, तो फौरन टोपी झाड़ कर पहन लेते कि भला बाजार से गुजरते लोग क्या सोचेंगे?

                धर्म-जाति कोई भी हो। हर ब्याहता को पूरी बस्ती का आशीष मिलता। हर मरने वाले को पूरी बस्ती कंधा जरूर देती। कितना भी जरूरी काम क्यों न हो, लोग मय्यत में शामिल जरूर होते और दस कदम चलकर अंतिम नमस्कार अवश्य करतें, मन ही मन जाने वाले से जाने-अनजाने में हुई किसी भी गलती के लिये क्षमा माँग लेना जरूरी समझते थे।

                छोटे-बड़े का लिहाज इतना था कि आँख उठाकर देखना और बड़े के सामने ऊँची आवाज में बोलना अशिष्टता समझा जाता था। हमने कभी बड़ों के सामने आँख उठाकर नहीं देखा था और इसका फायदा अक्सर मुझसे एक डेढ़ साल बड़े भाई साहब उठाते, उस उम्र में भी वे हुक्म चलाने में दादाओं-परदादाओं से भी आगे निकल जाते। वे घर के बाहर हमें कहीं भी पा जाते, तो आँखें तरेर कर ऐसी फटकार लगाते कि हमे हमारी साझा नानी याद आ जाती।

4 001                मई-जून की तपती दोपहरी में बच्चों को बाहर नहीं जाने दिया जाता था। माँ हम सबको कमरो में खेलते या आराम करते देख निश्चिन्त हो जाती थी और अपने कमरे में जाकर सो जाती थी। बस फिर चुपके-चुपके बाहर निकल भागने की तरकीबें ढूंढ़ ली जाती और सभी कमरे खाली हो जाते। हम लोग अपने कार्यक्रमों और योजनाओं के अनुसार पतंग उड़ाने, गुल्ली-डंडा खेलने, जामुन, आम, करोदे, इमली खाने निकल पड़ते। बहुत आनन्द आता। बाग घर से काफी दूर थे, बहुत बड़े-बड़े बाग, मीलों सड़क के किनारे जामुन के पेड़ थे – इस  दुपहरी मे इन घने पेड़ो के नीचे क्या मजा आता था! लेकिन हम कहाँ हैं और क्या कर रहे हैं – जामुन की कच्ची डालों पर झूल रहे हैं या करौदे और बेरियों की झाड़ में लुका-छिपी खेल रहे है या ट्यूबवेल पर नंगे बदन मस्ती कर रहे हैं, घंटो पानी में नहा रहे है, तपती रेत पर दौड रहे है।– ये सारी की सारी खबरे ज्यों कि त्यो बिना टेलीफून के हमारे घर पहुंच जाती थी | उस वक्त अपनेपन और सरोकार का नेटवर्क बहुत जबरदस्त था। आदमी-आदमी से जुड़ा हुआ था। लोंग एक दूसरे के प्रति जवाबदार थे। बच्चा किसी का भी हो, भले ही दुश्मन का भी, वो भी आवारागर्दी क्यो करे। इसलिए हमें भी कभी-कभी लोगो की सद्भावनाओं का शिकार बनना पड़ता था।

                शाम को पिताजी के सामने अदालत में पेश होकर या तो अपनी सफाई में झूठ बोलना पड़ता था या फिर चुप रहकर अपना जुर्म कबूल करने में ही भलाई होती। लेकिन दोनों स्थितियों मे सजा वही होती, उस वक्त के सारे कामों के लिये हैडपम्प पर पानी भरना पड़ता, सबके बिस्तर लगाने पडते और लालटेन की रोशनी में मन लगाकर पढ़ना पड़ता । ऐसा था कम्यूनिकेशन का नेटवर्क और उसका रचनात्मक रूप। कभी-कभी यह संचार व्यवस्था विस्तारित हो स्कूल तक में हमारे आवारा होने की सूचना भी दे देती। यही नहीं सूचना के साथ सिफारिश भी की जाती कि इन्हे सुधारने की सख्त जरूरत है और फिर न जाने ये पूरी बस्ती कैसे जान जाती कि हमें स्कूल में  फलाने जुर्म की सजा में मुर्गा या कऊआ बनाया गया था । फिर हम लोगों से आँखे चुराते फिरते और यह शर्मिदगी हमारे लिये जान-लेवा हो जाती।

                जनाब कुछ समझ में आया आपके?…… हमारे बड़े भाई साहब, जो उस वक्त हमसे एक साल बड़े थे, वे आज पचास वर्षो के बाद भी हमसे एक वर्ष बड़े हैं। लेकिन उनका रूतबा आज पचास गुना बढ़ गया है। वे अभी भी हमसे पुराने तेवर में ही पेश आते हैं।

                मोघा चाचा हर रविवार को हमारे यहाँ बाल काटने आते थे, लेकिन बाल काटने से ज्यादा हमें हिदायत दे जाते। एक बार तो वे हमारे बारे में सुनी-सुनायी हमारी आवारागर्दी की बातों से इतना नाराज हो गये कि गुस्से में उन्होंने हमारे आधे बालों को आधा इंच और आधों को ढ़ाई इंच का हो जाने के बाद, हम ही को इसका जिम्मेदार ठहराया और फिर गुस्से के ऊपर गुस्सा करते हुए,जब उनकी समझ में कुछ नही आया तो हमारे पूरे सर पर उस्तरा फेर दिया।

1 001                बहुत दिनो तक हम उनसे नाराज रहे ! इतना नाराज कि हर बार मोघा चाचा घर से गुजरते हुए, सूरज हलवाई की  चोंकलेट वाली बर्फी हमारे गंजे सिर पर कुरबान होकर और मुस्करा कर देखने की गरज से दे जाते लेकिन उनकी बर्फी का कोई वार हम पर नहीं चला, जब तक हमारे सर पर मुनासिब बाल नहीं आ गये। लेकिन इस हादसे से हमें आज भी याद रहा कि बरसात में जामुन की ड़ालें कच्ची होती हैं और अक्सर लोग उस पर से गिर पड़ते हैं।

                सोचिये, एक नाई को उस वक्त हमारे सर के बालो से ज्यादा हमारे हाथ-पाँव की फिक्र थी। ऐसी थी मेरी बस्ती और ऐसे थे वे लोग ।

बक्शीखाने से ताड़ीखाने का फासला कम नहीं हैं। दोनो कस्बे के ओर-छोर पर हैं। पर बक्शीखाने से उठी बौड़म  (जमाल) के ढोल की गमक से ताड़ीखाना भी होश में आ जाता था। लोगो के कान और दिमाग दोनों ही साफ हो जाते जनाब। फिर ऐसा कोई भी कान न रह पाता, जो बौड़म की मुनादी न सुने। लीजिये आप भी नमूना ए ऐलान सुन लें, तो आग बढ़ें –

‘‘अब तक तो बोली ये खाल,

अब बोलेगा चचा जमाल।

तो हिन्दू को राम राम,

मुस्लमान को सलाम।

धम धम धड़ाम धडाम।।

ढोल मुनादी से ज़िक्रे

कंकरखेडा भी कम नहीं,

कस्बे की सड़कें जो आज

कही नीची कहीं ऊँची हैं,

बेढ़ब कंकरीली और पथरीली है।

यूँ किया मैंने इस कस्बे की

जांगराफी का जिक्र,

सुन लीजिये मेरी फिक्र।

मुलाहिजा फरमाइये जनाबेआला,

कि बाहर से हर आने वाला,

यूँ समझता है कि ये पूरा कस्बा

घर से पीके निकलता है।

वर्ना हर आदमी क्यों डगमगाता है,

जब चलता है।।

जनाब इस कसबे का नाम ही है कंकरखेड़ा

यही तो है सारा बखेड़ा,

तो, राह पे चलते मेरे भाइयों

थड़े पे बैठे व दुकान पे खडे़।

तोलते, बोलते मकानों से झाँकते

झरोखों से ताकते,

महानुभावो देवियो और सज्जनो!

3 001आपको सूचना दी जाती है कि कस्बे के दो पहलवानों का मुकाबिला होने जा रहा है। पहलवान मांगीराम ने निरंजन पहलवान का चैलेज कबूल कर लिया है। ताकीद हो, निंरजन पहलवान लाहौर की सरजमी पर लंगर घुमा चुके हैं और उन्हें उस्तादे जमा उस्ताद का दर्जा हासिल है।

आजादी के बाद हिन्दोस्तान की सरजमी पर उनकी यह पहली कुश्ती होगी। लिहाजा कुश्ती के शौकीनों से, आम व खासुलखास तमाशबीनों से, गुजारिश है कि 24 जनवरी दिन सोमवार वक्त शाम 4 बजे मुकाबला देखने के लिये हाजिर रहें।

मुकाविला कमेले के तकिये के रमजानी के अक्खाडे मे होगा। जैसा कि आप जानते हैं कि ये दोनों मुअजिज पहलवान इसी कस्बे की शान हैं। लेकिन इनकी आमद कस्बे के दो किनारों से होगी। निरंजन पहलवान रेलवे फाटक से दाखिल होगे और पहलवान मांगीराम की छावनी स्टेशन से आमद होगी। डंग-डंगन-डंग-डंग-डंग…..! हाजरीनो। मुनादी की तहरीक लिखने व मुनादी करवाने वाले मुअजिज़ हैं नन्हें खाँ आलू वाले…….डंग धड़ाम डंग धडाम डंग डंग डंग डंगन डंगन डंग धड़ाम……।’’

इस ऐलान से पूरे कस्बे में सरगर्मी बरपा हो गयी। जिधर देखो इन पहलवानों की चर्चा। हमें भी पहलवानों और कुश्ती की मालूमात हासिल हुई। माँगीराम का ये पुश्तैनी कस्बा है। काफी पहले उनके दादा यहाँ आकर बस गये थे और निरंजन पहलवान मुल्क के बटवारे के बाद शरणार्थी बनकर इस कसबे के ईद-गिर्द काफी समय तक भटकते रहे और फिर इस कसबे में पनाह मिल गयी। जिन्दगी में बड़े उतार-चढ़ाव के बाद रफ्ता-रफ्ता एक छत का साया भी मिल गया, निरंजन पहलवान के परिवार को।

मांगीराम का कद्दावर जिस्म और जवानी का दौर था। हाथी की तरह झूम के चलता था वह, चेहरे पर दोआबे का पानी नजर आता था। गजब की सुर्खी थी उसके चेहरे पर। मांगीराम भोलाभाला जीव, राम-राम कह तो सकता था, लिख-पढ़ नहीं सकता था। अब काम की तलाश करते-करते अनाजमण्डी में पल्लेदारी करने लगा था। अपने हिम्मत और दमखम के लिए वह दूर-दूर तक मशहूर था। अनाज का पूरा एक ट्रक वह अकेले एक घंटे में खाली कर देता था। ट्रक बस्ती के बाहर खड़ा होता था, जहाँ से मंडी का फासला करीब तीन फर्लाग का था, ग़ज़ब की फुर्ती थी उसमें।

जिस वक्त अनाज का ट्रक आता, लोगों में हलचल मच जाती और तमाशबीनों की तरह लोग ट्रक के पास इकट्ठे हो जाते। घड़ी देख कर लोग शर्त लगाते। मांगीराम की फुर्ती और दम की शर्त पर लोग सैकड़ो हार-जीत जाते। मांगीराम का लोग बड़ा अहतराम (इज्जत) करते थे। वह बस्ती के अलावा आस-पास के इलाकों में भी मशहूर था। पुष्ट शरीर लेकिन तबियत से बाल-सुलभ। बोलता कम था और कभी बोलता भी था तो आहिस्ता से, जो शायद ही किसी को सुनायी देता।

लेकिन निंरजन पहलवान मांगी का बिलकुल विलोम। पत्नी तो उसकी संगमरमरी थी, परन्तु पहलवान जी का रंग उल्टे तबे से मेल खाता था। कड़का शरीर, लेकिन पहलवान जी एक साँस में लाहौर से बन्नू कोहाहट होते हुए पेशावर, रावलपिंडी पहुंच जाते थे। वह अपने वतन, वहाँ के लोगो के रहन-सहन, आबोहवा और प्रकृति की इतनी तारीफ करते कि सुनने वाले को लगता जैसे वह कोई ख्वाब देख रहा हैं। पिश्ते-बदाम, चिलगोजे, अखरोट, खुमानी, मेवे हमेंशा उनकी बातों में बरसते रहते। एक बार की मुलाकात में सूखे मेवों की चारों ओर मानो ढेरियाँ लग जाती। अपनी पाकिस्तानी जिन्दगी का सुख, वहाँ के लोगो मे आपसी प्यार और व्यवहार की तारीफ करते-करते पहलवानजी कभी-कभी थक कर सुस्ताने लगते और उनकी आँखें नम हो चमकने लगती। उनका वर्तमान अब वतन से उजड़ कर सदमा भर रह गया था।

अभी भी उनमें जवानी का रंग बाकी है लेकिन उन्हें देखकर उस पहलवान की कल्पना करना कठिन है, जिसका जिक्र वह अक्सर किया करते हैं।

अक्सर वह गली के नुक्कड़ पर या बाजार के किसी दुकान पर आपाबीती कहानियाँ और लन्तरानियाँ हाँकते बरामद हो जाया करते। लिहाजा उनकी पहचान हर छोटे-बड़ों को थी। कई बार उनके पास खड़े श्रोताओं में हमारा भी शुमार होता। एक बार हमने उन्हीं की जुबानी सुना था कि जब वह पाकिस्तान में थे, तो आधा सेर अखरोट की गिरी, एक पाव बादाम, एक पाव देसी घी, एक बाल्टी दूध और दो दर्जन अंडे वे आखाड़े से लौटकर नाश्ते में चट कर जाते थे। वे बताते कि दिन भर वे आते-जाते मुठ्ठियाँ भर-भर के सूखा मेवा खाते रहते थे। ये कहते-कहते वे अपने हाथों को प्रदर्शित करते जो वाकई काफी चौड़े थे। वो अपने जहो जलाल अपने वतन की तारीफ करके कोई रूहानी सुकून मन में महसूस किया करते थे।

हिंदुस्तान का नाम जुबान पर आते ही उनके मुँह का जायका खराब हो जाता। उनका कहना था, हिन्दुस्तान आते ही, दुश्वारियों, मुश्किलातों कंगाली, और यहाँ की आबोहवा की ही मेहरबानी है कि उनके चेहरे की लाली कोयले में तब्दील हो गयी। वे अपने नसीब को बड़ी बेदर्दी से कोसते कि वक्त ने कहाँ से कहाँ लाकर डाल दिया। वो कमीज का पल्ला उठाकर आँसू पोंछते, जैसे वे अपनी यादों के मोती अपनी झोली में इकट्ठे कर रहे हों। कभी-कभी वे इतना उतेजित होकर तड़पने से लगते कि किस मुसीबत की सजा भुगत रहे है वो, वर्ना वे भी आज किसी अंग्रेज से कम न होतें, बड़ी बारीकी से हलफ-बयानी करते कि मंजर और पसमंजर साफ-साफ दिखायी देने लगता।……

एक बार, जॉन डेकोस्टा एक अंग्रेज अफसर, जंगल में शिकार खेलने आये। शेर पर वार करते-करते उनके हाथ से बंदूक छूट गयीं। निरंजन पहलवान उस वक्त जंगल में सैर सपाटा करने गये हुए थें। अंग्रेज की दहशत भरी आवाज सुनकर वे उसकी तरफ मुखातिब हुए। वे उनकी तरफ बढ़ने को हुए ही थे कि पहलवान जी की नजर शेर पर पड़ी और शेर की नजर पहलवान जी पर। नजर मिलाई की रस्म के एक दो इन्टरकट्स के बीच ही जॉन डिकोस्टा अंग्रेज, अपनी जान बचाकर पेड़ पर चढ़ गये। ज्यों ही शेर अंतिम रस्म अदा करने उस्तादे जमा उस्ताद की ओर झपटे, तो पहलवान जी ने ऐसा पैंतरा बदला कि शेर जाकर पेड़ से जा टकराया कि उसके होश ठिकाने आ गये। फिर तो क्या था शेर को पता चल गया कि कोई सवा सेर भी होता है। जब उनमें दो-दो हाथ हो रहे थे, तभी पहलवानजी के हाथ बंदूक आ गयी, लेकिन इतना मौका नहीं था, घोड़ा ढूंढ़ कर दबा सकें। उन्होने दहाडते शेर के खुले मुँह में बंदूक ही घुसेड़ दी कि शेर को दम तोड़ने पर मजबूर होना पड़ा, अचानक हबड-दबड में घोड़ा दब गया। अंग्रेज ने पेड़ से डरते-डरते काँपते हाथों से गले में पड़े कैमरे से फोटो खींचें। कहते है कि अंग्रेज अफसर को बहादुरी का पुरस्कार मिला कि उन्होंने इतने खतरनाक हादसे के फोटो लिये।

निरंजन पहलवान ये किस्सा सुनाते-सुनाते दोनों हाथों से कमीज कों ऊपर उठाकर जंग के निशान दिखाते और कभी-कभी तो कमीज ही उतार ड़ालते और वे शेर से जंग की तमाम निशानियां उजागर करते जैसे मरने से पहले शेर उनके सीने पर हस्ताक्षर करके गया था कि ये निशान उसी से हुई जंग के हैं।

02अचानक वे रहस्यात्मक मुद्रा धारण कर लेते और गोपनीय तथ्य उजागर करने लगते।…….. मुझे अपनी तीन बातों से बड़ा डर लगता था। एक तो जवानी, दूसरी पहलवानी और तीसरी हिम्मत और बहादुरी। मेरी बहादुरी की तारीफ सुनकर पहले तो अंग्रेज डेकोस्टा की मेम जेनेट को यकीन ही नहीं आया, लेकिन जब मेम ने मेरा और शेर का फोटो देखा तो खाना-पीना छोड़ एक ही रट लगा ली कि, आई वान्ट टू सी दिस ब्रेवे मैन। मि. डेकोस्टा की जेनेट से लव मेरिज हुई थी। उसे डर था, कि कहीं उसे निरंजन पहलवान से मिला दिया, तो फिर उसका क्या होगा? पर मजबूर होकर अंग्रेज साहब को अपनी मेम से हमें मिलाना पड़ा। देखते ही वो हम पर कुर्बान हो गयी और एक दिन मौका मिलते ही अकेले मे मेम ने हमारे सीने पर सर रख दिया, वहीं जहाँ कभी शेर ने पंजा रखा था और कहने लगी, ‘‘पहलवान निरंजन आई वान्ट ब्रेवमेन लाइक यू – आई लव यू…… अब मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकती मैं तुमको अपना साठ (साथ) इंग्लैण्ड ले जायेगा।……

लेकिन हाय रे लंगोट। इस लंगोट की खातिर हमने अपनी अंग्रेजी मोहब्बत कुर्बान कर दी। उसने बहुत जिद की, यहाँ तक कहा कि वह उनसे शादी कर लेगी। लेकिन हमेशा लंगोट बीच में आ जाता।…. वे एक लम्बी ठंडी आह भर कुछ समय के लिये आसमान की ओर देखते और जब आसमान से वापस आते तो लोगों की नजरों में झांक कर अपने रूतबे का जायजा लेते। लोगो के मन मे कई सवाल उठते कि उन्होंने फिर शादी क्यों कर ली, जब उन्हें लंगोट का इतना खयाल था। कई स्वाभाविक प्रश्न लोगों के जहन में आते, लेकिन इस दौर में दूसरो की भावनाओं और जजबातों की कद्र करना, लोग अपना फर्ज समझते थें। लोग हर बात पर यकीन, और बिना हील-हुज्जत और तर्क के, विश्वास, अपनेपन और जीवन में सामंजस्य को बनाये रखने के लिये जरूरी समझते थे।

निरंजन पहलवान से शेर की लड़ाई की बात सुनकर हमारे अंदर उनकी कुश्ती देखने की इच्छा और प्रबल हो गयी। हम अपनी इस जिज्ञासा को लेकर युक्त्यिाँ सोचने लगे कि कल निरंजन पहलवान और माँगीराम की कुश्ती देखने कैसे जा सकेगें क्योंकि उस वक्त बहुत सख्ती और पाबन्दियाँ हुआ करती थी। हम कुश्ती देखने की अनुमति ग्रहण करने के लिये युक्तियाँ सोचने में लग गये। एक युक्ति समझ में आ गयी लेकिन जरा कठिन काम था। हमें गऊ समान और एक सुधरे हुए इंसान का रूप धारण करना था ताकि कल तक अच्छे बच्चे के इमेज को इनकेश कर, अच्छे बच्चे के अच्छे माता-पिता से, बिना शर्त कुश्ती देखने की अनुमति प्राप्त की जा सके।

हमने शू रेक से सबके जूते निकाल एक किनारे रख दिये। सोचा ये तो सामान्य बात रहेगी। सो हमने घर के सभी सदस्यों के प्रति प्यार और समान प्रदर्शित करने के लिये कमरो, छत, परछती, सभी जगह से, उन ऐतिहासिक जूते चप्पलों को भी निकाल लिया जिनका सिर्फ एक ही पैर उपलब्ध था। हमारे मेंहनती और अच्छे बच्चे होने में लेशमात्र भी किसी को संदेह नहीं रहना चाहियें इसलिए हमने पालिश की तीन डिब्बियाँ उन पर रगड़ मारीं और उन्हें ऐसा चमका दिया कि कोलतार से भी काले दुलीचन्द अंकल भी उसमें अपना मुँह देख लें।

2 001हमने सभी जूतो, चप्पलों, सैंडलो को घर के बड़े आँगन में सजा दिया ताकि हर आने-जाने वाले की नजर पड़ती रहें। लेकिन हाय री किस्मत, बाहर के खुले दरवाजे से एक अनजान व्यक्ति पुराने जूतो की कबाड़ी की दुकान समझ कर धड़धड़ाते अंदर चले आये और लगे हमसे मोलभाव करने। हमने पूछा कि क्या ये तुम्हें दुकान दिखायी देती है ? तो उस पर जनाब कहते है कि, ‘‘दुकान नहीं है, तो फिर लगा क्यों रखी है।’’ वैसे आस-पास देखकर उन्हें समझ में तो आ गया था कि ये किसी कबाड़ी का घर नहीं हो सकता, फिर भी जिज्ञासावश पूछने लगे, ‘‘ये सारे जूते-चप्पल……?’’ – हमने भी जरा हिम्मत से काम लिया, ‘‘अंकलजी, इन जूते-चप्पलों में विशेष रूचि के लिये धन्यावाद। यहाँ आकर सेवा में बाधा उत्पन्न करने की आवश्यकता नहीं हैं। आप जल्दी से बाहर निकल जायें , वर्ना अंदर से कोई आ गया, तो आपको मुश्किल हो जायेगी।’’ – बेचारा हमारी सूरत को देखता बाहर निकल गया। शुक्र करो। इस वक्त सब लोग अंदर के कमरों में हैं बाहर कोई भी नहीं है। वर्ना ये सारे के सारे जूते अभी हमारे सर पर ही पड़ते। खैर हमें अपनी गलती का अहसास हुआ और हमने अपनी जूता प्रदर्शनी की जगह बदल दीं।

अभी बहुत से काम बाकी हैं। ये सोचकर कि अच्छे कामों में भी लोग विघ्न बाधायें उत्पन्न कर देते हैं। हम जल्दी-जल्दी कामों को निपटाने में लगे हैं। अच्छा है न, इस वक्त यहाँ कोई भी नहीं है। हमने अपनी किताबों की आलमारी के साथ-साथ, बड़े भाई साहब की आलमारी की सारी किताबें और अन्य चीजें भी करीने से लगा दीं।

हम इस वक्त बहुत अच्छे बच्चे है जनाब। अभी-अभी कुछ मेहमान घर में दाखिल हुए हैं – हमने उन्हें बैठक (अतिथि कक्ष) में पहॅुंचा, माँ को उनके आने की सूचना दे दी और शीघ्र ही कपड़े बदलकर, साफ हाथों से माँ की आज्ञा की प्रतीक्षा किये बिना, ट्रे में लाकर पानी भी दे दिया। माँ ने हमारी ओर गौर से देखते हुए, मुस्करा कर शबाशी भी दे दी। हमने मन में सोचा चलो हमारे खाते में एक शाबाशी तो दर्ज हुई। धीरे-धीरे दूसरे कारनामों पर जब नजर पड़ेगी, तो हो सकता है हमारे कामकाजी, सुशील, बुद्धिमान और लोकहितकारी होने के गुणों के कारण हमें इस घर में कोई विशेष स्थान मिल जाये, जिससे इस घर के हर सदस्य का यह पूछने का अधिकार खत्म हो जाये कि हम कहाँ जा रहे हैं! क्यो जा रहे हैं!! और हम कहां गये थे !!! और हमें ये अधिकार मिल जाये कि बिना अनुमति लिये कहीं भी आ-जा सकें। यह सब सोचते-सोचते हमने मेंहमानों के सामने ही गमलों मे पानी देना शुरू कर दिया। महमानों में आयी एक महिला ने हमारी माताजी से दरयाफ्त किया, ‘‘यही तो अमर है न………’’ हमने इनका नाटक देखा था, उसी में तो इनको बेस्ट एक्टर का एवार्ड मिला है यू. पी. का…… हमने सुना है हमेशा पढ़ने में भी फस्ट आते हैं…… बड़ा होनहार है बहनजी आपका बेटा……।’’

हम अक्सर लोगों से अपने बारे मे सुनते ही रहते है। लेकिन आज अपनी तारीफ सुनकर हम चिन्तित हो गये। कल ही हमारे घर मे कोई बता रहा था कि अमुख बच्चे को नजर लग गयी और वह बीमार हो गया। अक्सर सुना करते हैं कि अच्छे काम करने वालों और अच्छे बच्चों को नजर लग जाया करती हैं। और कहीं इनकी नजर लगकर हम बीमार हो गये, तो पहलवानो की कुश्ती कैसे देख पायेंगे?

हम फौरन किचन मे गये और तवे से कालिख निकाल अपने माथे पर हमने टीका लगा लिया और कोशिश की कि तारीफ करने वाले मेहमानों के सामने न दिखयी दूँ।

इस बीच हमारे हाथ झाडू लग गयी। बस फिर क्या था, हमने कमरे, दालान, घर के बाहर चौतरे के अलावा गली में भी झाडू लगानी शुरू कर दी। हम झाडू लगाने में तल्लीन हैं – हमें इसका अहसास ही नहीं कि हमारी नुमाइश लगी हुई है। लोग हमारे हालात पर अफसोस कर रहे हैं।

-ओहो! बेचारे को लगता है सजा मिली है।-एक महिला ने अपने पति से कहा।

– मैं जाऊँ क्या?….. बाबूजी से कहके आऊँ कि इससे झाडू न लगवायें।

-बड़ा भोला सा है। किसी और ने शैतानी की होगी और इसका नाम लगा दिया होगा। रूको मैं इसे ही ले आता हूँ – थोडी देर बाद बाबूजी का गुस्सा शांत हो जायेगा फिर इसे छोड़ आयेगे – बाबू जी समझ जायेंगे कि इसकी सिफारिश के लिये लोग आये हैं। बड़े अच्छे हैं बाबूजी, हर किसी का मान रखते है। कोई भी पहॅुंच जाये, बिना खातिरदारी के नहीं जाने देते।

और भी लोग आस-पास के इर्द-गिर्द जमा हो गये, जैसे कोई बहुत बड़ा हादसा हो गया हो। इन सबको आस-पास देखकर हम समझ गये, कि ये लोग समझ रहे हैं कि हमें शायद सजा मिली होगी। हमने चुपके से एक आंटी के कान मे राज उगल दिया ‘‘हमें सजा नहीं मिली है -हम अच्छे बच्चे हैं न, इसलिये काम कर रहे हैं।’’ इस बात को हम दबा गये कि इस प्रकार अच्छे बच्चे बनकर दिखाने का आखिर अभिप्राय क्या है। लोग भी समझदार हैं, हमसे पूछ ही लिया कि आखिर इतनी इमरजेंसी क्या आ गयी, कि आपको सुपरलेटिव डिग्री का अच्छा बच्चा बनना पड़ रहा है।- हमने उन्हें बता दिया, एक बात है- वो न, कल आपको पता चल जायेगा।…. लोग हँसते-हँसते अपने-अपने घर चले गये कि ये सजा का मामला नहीं हैं ये तो कोई और गूढ बात है, जो अब कल ही पता चलेगी, कल तक इंतजार करना पड़ेगा।

अब आप समझ सकते हैं कि सिर्फ एक कुश्ती देखने के लिये आज्ञा पाना कितना कठिन काम हैं। हमें कितने पापड़ बेलने पड़ रहे है इसके लिये, अच्छा बच्चा बनना कोई मामूली बात नहीं है। अब हम हाथ-मुँह धोकर पढ़ने बैठ गये। पढते-पढते बीच-बीच में हम ये भी सोच रहे हैं कि अच्छा बच्चा बनने के लिये और क्या किया जा सकता है। ठीक है ये मुश्किल कार्य भी आज कर ही डालते है और बिना हील-हुज्जत के हमने, लौकी की सब्जी और मसूर की दाल अपने हलक से नीचे उतार ली और सोचते रहे कि भगवान ये दिन किसी को न दिखाये।

अक्सर हमारा रिश्ता, अपनी बड़ी जीजी से इसी बजह से ठीक नहीं रह पाता था। क्योंकि हमें यकीन भी हो गया था कि ये हमारी बड़ी जीजी करेला, लौकी, कद्दू, मूँग की दाल, मसूर की दाल सिर्फ हमें सताने के लिये बना देती हैं और दूध जैसी चीज़ हमें एक सांस में पीने के लिये कहती हैं। बताइये इससे और बड़ी सजा क्या हो सकती है जनाब! जब हम ये सब सहते-सहते थक जाते, तो हमारा क्रांतिकारी रूप प्रबल हो उठता और हम इन अत्याचारों के खिलाफ प्रोटेस्ट में इतना जोर से रोते कि आसपास के सभी लोगों को पता चल जाता कि आज हमारे घर में कौन-कौन सी सब्जियाँ और दालें बनी है। अक्सर ऐसे मौकों पर घर के लोगों का कम्प्रोमाइजिंग एटीट्यूट होता। हमे घी, गुड़, चीनी, मलाई जेम आदि आफर किया जाता। हमारे मूड की बात होती, कभी-कभी तो घरवालों का षडयंत्र काम कर जाता और कभी-कभी हम इन तमाम प्रयत्न और निवेदनों को ठुकरा कर भूख हड़ताल की धमकी दे देते। ऐसे मौकों पर इस क्रांन्तिकारी की धुलाई की नौबत भी आ जाती थी लेकिन इससे पूर्व ही मोहल्ले भर से दस-बारह सब्जियाँ, दाले, हलवा, और विभिन्न पकवान, हमारी आह-कराह सुनकर लोग भागे लिये चले आते। और हमारा रूदन एक राष्ट्रीय शंखनाद बन जाता। राष्ट्रीय दृष्टि से महत्वपूर्ण हमारे इस कार्यक्रम मे , हिन्दू-मुसलमान, सिख, इसाई हर धर्म और हर जाति के लोग शामिल होते लेकिन आज की परिस्थिति भिन्न है, हमें कुश्ती देखने जाना है न कल, तो हमे अपना हर कदम फूंक-फूंक कर रख रहे हैं।

हम महसूस कर रहे हैं कि हमसे सभी खुश हैं और कल हमें कुश्ती देखने जाने की इजाजत मिल जायेगी लेकिन जब हम ऐसा सोच रहे थे तभी हमारे बड़े भ्राताजी ने कमरे में इन्ट्री ली। उनकी नजर आलमारी पर पड़ी उन्हें लगा कि आलमारी के उनके खाने में कुछ गड़बड़ हुई है। उनके दिमागी-उधेड़बुन पर पूर्ण विराम लगाने की गरज़ से हमने तुरन्त अपनी सफाई पेश कर दी कि ये साफ-सफाई का नेक काम हमारे हाथों संपन्न हुआ है। इतना सुनना था कि उन्होने हमें ऊपर से नीचे तक गौर से देखा, उन्हें आशंका हुई कि हमने जरूर उनकी किताबों के खाने में छिपी पतंगो, कंचो, लट्टुओं, कैंची, उस्तरों और रेडियों घड़ी आदि ठीक करने के उपकरणों की सूचना हेड आफिस में पहुँचा दी होगी……. और हो सकता है कि इन नौटंकी महोदय (मैं) ने इस नम्बर दो के माल में से कुछ माल मार भी दिया हो। हेड आफिस कोई एक्शन ले, इससे पूर्व ही इस मामले को ऐसे उलझा दिया जाये, ताकि असली मुदा दब जाये। बस उन्होंने मन में षडयंत्र रच डाला और हंगामे की बुनियाद रखते हुए अलमारी से किताबे आदि उठा-उठा जमीन पर फेंकनी शुरू कर दी ‘‘इन ड्राम्ची महोदय को क्या जरूरत थी हमारी किताबों को छेड़ने कीं। इन्होने तो किताबों-कापियों के सारे पन्ने ही फाड़ डाले।’’

उनकी तुरूपचाल देखकर हम दुवीधा मे आ गये लेकिन फौरन होश पर काबू पा, हम दरवाजे के पीछे छिप गये। हमें लग रहा है कि अब हमारे किये-धरे पर पानी फिरने जा रहा है। माँ ने अगर बिना बारीकी से तहकीकात किये, कही इन महोदय पर यकीन कर लिया, तो हमारी हजामत होनी निश्चित है, बस फिर तो कल की बात को भूल जाना होगा। हिल तो चुके थे लेकिन हमारे अंदर जन्मे नवजात नाटकार ने इस विचित्र स्थिति में इस श्रेष्ठ प्राणी का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण कर तुरन्त दरवाजे की आड़ से भ्राता श्रेष्ठ को चुप रहने का संकेत दिया। धीरे से दरवाजे की आड़ में उन्हें आमंत्रित किया, अत्यंत गंभीर मुद्रा धारण कर उनके कान में राजदाराना भाव से कहा, ‘‘भ्राताजी आप परेशान न हों। आपका नम्बर दो का माल, बिलकुल सही सलामत है, हमने उसे ऐसी तरकीब से लगा दिया है कि किसी को कुछ पता नहीं चलेगा। आप निश्चित रहें, जब हम ये नेक काम कर रहे थे, तो उस वक्त माँ यहाँ थी ही नहीं……. वे तो पड़ोस में थी इसलिए आप परेशान न हो।’’

भ्राताजी ने चैन की सांस ली। हमने भी उनकी षडयंत्रजनित कार्रवायी पर पूर्ण विराम लगा, चैन अनुभव किया। उन्होंने अपने खुशगवार टोन में हमें सिर्फ छोटी सी हिदायत दी, ‘‘सुनो! आयन्दा से सफाई-वफाई करनी हो, तो पूछ कर करना।’’

हमने भी परिस्थिति का लाभ उठाते हुए एक कारतूस हवा में चला डाला, ‘‘भाई जिस वक्त हम ये सफाई का नेक काम कार रहे थे, आप तो उसी वक्त कड़ी धूप में गुल्लीडंडा खेल रहे थे ना – हम वहाँ कैसे आकर आपसे पूछते, क्योकि हमें तो धूप में घूमने की इजाजत ही नहीं है आजकल………।’’

‘‘अच्छा! अच्छा…… ठीक है……. ठीक है।’’ ये कहते हुए वे रसोईघर की तरफ रवाना हो गये।

दूसरे दिन सुबह हम स्नानादि से निवृत होकर, माता-पिताजी के चरण स्पर्श कर, कुश्ती के लिये आज्ञा मांगने की हिम्मत जुटा ही रहे थे कि हमारी समझदारी ने हमें चेतावनी दी – अच्छें बच्चे बनना ढोंग साबित होगा और तुम्हारी नियत का तुरन्त ही पर्दाफाश हो जायेगा। हमने अपनी नियत को उजागर होने से बाल-बाल बचा लिया और उज्जवल मन लिये घर के मंदिर मे पूजा के लिये जा बैठे, जैसे परीक्षा के दिनों में बैठा करते है। पूजा करते-करते मन तर्क जाल में फंसा हुआ है। अगर हमने माताजी-पिताजी से आज्ञा माँगी और कहीं उन्होनें मना कर दिया तो? – बात बिलकुल ही बिगड़ जायेगीं आदेश का उल्लंघन होगा ना – प्रभु के चरणों में सिर झुकाये मन में दोनों पहलुओं पर सोच-विचार जारी हैं। प्रभु के चरणो में ध्यान केंद्रित कर, हम साफ-साफ देख तो रहे है कि अगर हमने आज्ञा मांगी, तो डाँट-फटकार मिलेगी, इजाजत नहीं मिलेगी और फिर अगर हम गये, तो आज्ञा उल्लंघन के भयंकर परिणाम होगे। सो बिना पूछे ही, चुपके से बिना किसी को भनक पड़े चले जाने में ही हमारा कल्याण है। हमारे मन में चोरी-चकारी की बात भगवान साफ-साफ देख तो रहे हैं, ठीक है भगवान से क्षमा माँग लेना जरूरी है – क्षमा माँगते हुए हमने प्रभु से कोई युक्ति सुझा देने की प्रार्थना कर अपनी पूजा का समापन किया।

कहते हैं चोर-चोर मौसेरे भाई और वे भाई थे हमारे मदन सिंह। उम्र में हमसे बड़े थे और फेल होते-होते अब हमारे साथ आ गये थे। कभी-कभी जब उन्हें बहुत प्यार आता, तो कहते कि मैं तो तुम्हारे साथ आने के लिये ही फेल होता रहा – इन्हीं के साथ आज विचार-विमर्श के बाद युक्ति हाथ आ गयी लेकिन ये आखिरी पीरियड खत्म हो तो युक्ति को कार्यान्वित किया जा सकेगा ना।

हम लोग छुट्टी के बाद अपने-अपने घर पहुँच गये और पूर्व नियोजित कार्यक्रम के अनुसार सत्यवादी मदन सिंह जी हमारे घर आये। माताजी को अभिवादन कर पूर्ण विश्वास से बोले ‘‘मौसीजी स्कूल में नाटक का रिहर्सल है रमेंश मास्टरजी ने अमर को फौरन बुलाया हैं।’’ पिछले दो वर्षो मे हमने अपने क्षेत्र और राज्य में अभिनेता के रूप में एक अहम स्थान बना लिया था। अतः हमारे इस गुण ने हमारे परिवार को भी सम्मानित किया था। नाटक के लिये हम पर कोई रोक नहीं हो सकती, इसके लिये हम पूर्ण रूप से आश्वस्त थे और हमें फौरन ही आज्ञा मिल गयी।

उपरोक्त रेखांकित जुमला हमारे जीवन चरित्र में स्वर्ण अ़क्षरों में लिखे जाने योग्य हैं। इस जुमले ने हमारी व्यक्तिगत स्वतंत्रता को कायम रखने में बहुत मदद की और इसी की बदौलत हम आवारा और बेलगाम जीवन का भी अनुभव प्राप्त कर सके। बहरहाल अभी हम इसी जुमले की कृपा से अखाड़े पर मौजूद हैं।

दोनों पहलवानों की टोलियाँ गाजे-बाजे के साथ, धूम धड़ाक करते हुए मेले के तकिये पे पहुँच गयी। इन पहलवानों का बस्ती के लोगों ने जमकर स्वागत किया। गेंदे और गुलाब के हारों से लदे पहलवान मूछों पर ताव दे रहे थे।

कस्बे के अलावा आस-पास के गाँव और शहर के शौकीन लोग भी वहाँ आ पहुँचे थें और दंगल की रवायतों को निभाने के लिये तैयार बैठे थे।

घड़ी देखकर चेयरमैन साहब और अन्य गणमान्य व्यक्तियों की प्रतीक्षा की जा रही थी। इधर हम भीड़ में घुसने की कोशिश कर ही रहे थे सामने से भाई साहब नजर आ गये और अब हम उलटे पैर भीड़ में से निकल भागने की कोशिश में लगे हुए हैं। फंसते-निकलते हम किसी तरह भीड़ के बाहर आ गये। बड़ा अजीब अनुभव था हमारे लिये ये, बहरहाल हमारे कान लाल हो गये थे इस वक्त। तभी हमने एक पेड़ पर मदन महाराज को बरामद किया। वे हमें पेड़ पर आमंत्रित कर रहे थे – लेकिन हमारे सामने मुश्किल यह थी कि पेड़ से हमें भाई साहब और अन्य उनके मित्र साफ-साफ देंख लेंगे। हमने अब हथियार डाल दिये और सोच लिया कि हम कुश्ती नही देख पायेंगे। इसी वक्त एक व्यक्ति की नजर हम पर पड़ी, उन्हें हमारी परेशानी का अंदाज लग गया था। वे किसी तरह भीड़ से निकल कर आये और उन्होंने हमारा हाथ पकड़ लिया, ‘‘अरे यहाँ कैसे खड़े हो, चलो-चलो वहाँ मेरे साथ बैठना।’’

अब हम विशिष्ट लोगों की दीर्घा में बैठे थे और हमारे चेहरे पर हवाइयाँ तैर रही थी। इस जगह बैठा हर व्यक्ति साफ-साफ नजर आ रहा है। अब तो यकीनन हमारा झूठ ब्याज सहित घर वालो के सामने आ ही जायेगा। इस मनःस्थिति में हम इधर-उधर देखकर भागने का रास्ता खोज ही रहे थे, कि चेयरमैन साहब पधार गये। हमें देखते ही उन्होंने मुस्कराते हुए कहा, ‘‘अच्छा तो आप भी पधारे हुए हैं।’’ अब तो हमारी हालत और खराब हो गयी। चुगली करते वक्त भाई साहब सबूत पेश करेंगे कि आप चलकर चेयरमैन अंकल से ही पूछ लीजिये। हमारे मन में विचारों की कुश्ती छिड़ी हुई है।

और इधर पहलवानों ने लंगोट पर रूमाली कस ली। ढोल की आवाज से कान में सुरसुरी दौड़ने लगी। बदन में गर्मी लाने के लिये पहलवान दंड लगा रहें हैं। कुश्ती का ऐलान होते ही, माँगीराम पहलवान अपने शुभचिन्तकों और विशिष्ट व्यक्तियों से हाथ मिलाते हुए अखाड़े की तरफ बढ़ रहें हैं तभी निरंजन पहलवान ने ढोल वालों की और इशारा करके ढोल बंद करने का संकेत किया। ढोल के बंद होते ही सभी लोग स्तब्ध हो गये।

निंरजन पहलवान पूरे जोश से हाथ उठाकर, जनता को संबोधित करने लगे, ‘‘भाइयों, आजाद हिन्दुस्तान में ये मेरी पहली कुश्ती है।…… मैं कुछ कहना चाहता हूँ।’’

लोग निंरजन पहलवान की ओर मुखातिब हुए। निरंजन पहलवान ने पैंतरा बदला, उनकी रगें तनी हुई नजर आ रही थीं – बुलंद आवाज में उन्होंने वक्तव्य जारी रखा, ‘‘……..मुल्क का बंटवारा हुआ, हम बेवतन हो गये, सब कुछ लुटाकर, शरणार्थी बन हम यहाँ हिन्दुस्तान में आये पाकिस्तान से। अपने मुल्क से, अपने जमीं, अपने आसमान और अपने लोगों से जुदा होकर इस बस्ती में पनाह ली……… यकीन मानिये हमसे……… हमसे जैसे सब कुछ छिन गया!…… लेकिन पहलवानी का जोश हमारे अन्दर से कभी जुदा नहीं हुआ। आज मैं इस अखाड़े में एक शर्त के साथ कुश्ती लडूंगा।’’

भीड़ से कुछ आवाजें आयी, ‘‘क्या शर्त है ? कैसी शर्त ?’’ निंरजन एक ऊँचे टीले पर खड़ा हो गया।

‘‘शर्त ये है कि आज अगर मैं हार गया, तो मैं वो घर, जिसे मैंने बीस बरस की मेहनत से बनाया है, अपनी मर्जी से पहलवान माँगीराम जी को दे दूंगा और अगर मैं जीत गया, तो ये अपना घर मेरे नाम कर देगें।’’

उनकी शर्त सुनकर लोग सकते में आ गये। शर्त की बात सुनकर माँगीराम की आँखों में खून उतर आया। लोगों में तरह-तरह की प्रतिक्रिया शुरू हो गयी।

माँगीराम का सूर्ख चेहरा दहक रहा हैं। वे निरंजन से चौगुने हैं और उन्हें देखकर कोई भी कह सकता है कि वे निंरजन पर भारी पड़ेगे। माँगीराम खुद भी ये जानते हैं लेकिन उनके अंदर जो इस वक्त उथल-पुथल हो रही है, उसने उन्हें शक्तिहीन कर दिया। अचानक घर से जुड़ी बातों ने उन्हें अखाड़े से ले जाकर घर-संसार में धकेल दिया। वे सोच रहें हैं, उनके मकान का रिश्ता उसकी पुश्तों से जुड़ा है। उसकी माँ इस मकान में दुल्हन बनकर आयी थी। इसी मकान मे उसने अपनी पहली साँस ली थी। इसी मकान के आँगन में बचपन पला, वह यहीं जवान हुआ। उसे अपना मकान केवल ईट-पत्थर का ही बना नजर नही आ रहा था, बल्कि उस भावना, सुख-दुख जीवन का द्योतक नजर आ रहा था अपना घर। उसे अपना घर इस बस्ती का दिल नजर आ रहा है और इससे जुड़ने वाली गलियाँ, बाजार, कूँचे  जैसे शिराएं और रगें लग रही हैं किसी शरीर की। वह बस्ती की काया साफ-साफ देख रहे हैं। दर्शकों की नजरें उन पर टिकी हैं और वह अब सोचते-सोचते सुन्न होते जा रहे हैं।

कुछ लोग निरंजन को समझाने में लगे हैं। कुछ ये भी कह रहे हैं कि वह अपना घर भी तो दाँव पर लगा रहा है। कुछ आवाजें माँगीराम को आश्वस्त कर रही कि पीछे मत हटना! जीत तुम्हारी ही होगी।

निरंजन अपनी शर्त पर अटल नजर आ रहा है। उसने पुनः अपनी शर्त दोहरायी और अब तो यह भी वह कह रहे हैं कि, अगर माँगीराम को शर्त मंजूर न हो, तो बिना लड़े वो हार मान लें। निरंजन के पक्षधरों में कुछ गर्मी आयी और ढोलियों ने ढोल बजाना शुरू कर दिया। जबाब में दूसरी ओर से भी ढोल बजना शुरू हो गया। ढोलियों की स्पर्धा ने, पूरे वातावरण में, गलतफहमी पैदा कर दी कि माँगीराम ने शर्त मंजूर कर ली है।

कस्बे की और से भीड़ उमड़ती दीख रही है। यहाँ कोई भी बात करंट की तरह से पूरी बस्ती में फैल जाती है। निरंजन की शर्त की बात भी पूरी बस्ती में फैल गयी।

निरंजन, लाल रूमाली पहने टीले पर खड़ा है। इस वक्त उसके कड़के शरीर में गजब की ताकत परिलक्षित हो रही है। उसकी आँखों में आत्मविश्वास की चमक है और उसके चेहरे से कोई राजदाराना रूआब झलक रहा है। प्रतिष्ठित लोग सलाह-मश्विरे में व्यस्त दीख पड़ रहे है। आम लोगों में जिज्ञासा है जानने की कि क्या हो रहा है। लोगों ने बडे-बडे दंगल देखे हैं। दूर-दूर के पहलवान इस आखाड़े में उतर चुके हैं लेकिन आज पहला अवसर है जब कोई पहलवान शर्त लगाकर अड़ा हुआ है।

भीड़ के साथ कुछ औरतें भी है। दंगल में महिलाओं की उपस्थिति वर्जित समझी जाती है, अतः कुछ शिष्ट लोग उन्हें रोकने के लिये भीड़ को चीरते हुए उनके पास पहुँचे। महिलाओं में दोनों पहलवानों कें परिवारों के साथ, कुछ अन्य स्त्रियां एवं सीता नानी है। सीता नानी ने छूटते ही इन शिष्ट जनों की बखिया उधेड़ दी, वाह रे बाबूलाल, मुन्ने खाँ बड़ी सफेद-सफेद टोपियाँ सर पर धरे तमाशबीनी कर रहे हो, अब बस्ती के लोगो की खुशियों और घरों को दाँव पर लगाकर, जुआ खिलवाओगे तुम लोग ? तुम्हारी हवेलियाँ सलामत रहें, लेकिन इन बेचारों का घर जुए में चला गया, तो कहाँ रहेगे ये लोग ? मै खबरदार करने आयी हूँ तुम लोगों को, झूठी शान और शौक के लिये मैं किसी के घर को दाँव पर नहीं लगने दूँगी। अन्य महिलायें भी अपनी-अपनी तरह से अपना आक्रोश प्रकट कर रही हैं।

-अजी किससे पूछकर ये लोग घर-बार जुए में लगा रहे है?

-ऐसी बात सोची भी कैसे…….?

-वाह जी वाह घर फूंक तमाशा देख…….।

-अजी इन दोनों पहलवानों को अकल ना है, पर क्या पूरी बस्ती की अकल घास चरने चली गयी ?………हम देखेगे कैसे बेघर कर देगे इन बच्चों को, बड़े मर्द बने हैं।

माँगीराम की पत्नी को शायद ही किसी ने कभी बोलते देखा हो, अब उसमें भी हिम्मत जाग गयी। वह गुस्से में बोल पड़ी, ‘‘ पुश्तों से किसी ने ये बात न सोची, किसी ने पुरखों की सौगात का सौदा न किया, पर ये पहलवान जी तो निराले निकले।’’

निरंजन पहलवान की पत्नी अति भावुक होकर जैसे विफर गयी, ‘‘पाकिस्तान से लूट-पिटकर आये, क्या-क्या दिन न देखे हमने। हिन्दूस्तान के हाकम औथ्थे दी पापर्टी दा सबूत माँगते थे। किथ्थों लांदे सबूत-एक कपड़े दे विच खाली हाथ जान बचा के ते टुर पए असी। सानू ते धेला वी न मिलया। असी छावनी टेशन ते झोपड़ा पाके ते कड्डे कई साल……….. बरसात दे दिना विच ऐन्ना-ऐन्ना पाणी भर जान्दा सी। एथ्थे साडा हर दिन परेशानी ते बेहाली विच लंगया……..पहलवान साब नू जरा याद दलाओ। ऐ सन बावन दी गल है – मैं झूठ नहीं बोलदी। ऐ पहलवानजी तंग आके ते इक दिन रूआँसा होके बोलया – लछमी चल बचयाँ नू जहर देके ते असीवी जहर खा लेने आँ………। मैं केहा जे मरना सी ते उत्थेई मर जाना सी – बुझदिल बनके असी नई मरना। असी अपने सब्रदा बोते कठन इमतिहान दिता, ते रब ने खून पसीने दे बदले ऐ घर दिता – जिना दे घर तिन्न-तिन्न नौकर होन्दे सी, उनसू लोकां दे बर्तन मांजने पए – साडे पुतरा नू रेलवे लाइन तो कोला चुगना पया – पहलवानजी खुद दिन विच कारखाने कम करदा, ते रानू चोकीदारी – ऐस तराँ सानू नसीब होई छत……….पहाड़ जेई मेहनत करके तिनका रखदे असी घर बनान बास्ते, ते दूजे पल कोई तूफान बगाड़ देन्दा सी, बर्बाद कर देन्दा सी साडा घोसला। बड़ी मुशकलाँ देखियाँ असी – ते अज ऐ पहलवानजी अपना कुश्ती दे शोक वास्ते, उसदा जुआ खेलना चवन्दे हन। झूठी शान दे वास्ते ?….. जा वीरां उसनू समझा ओ ए ना करे…….।’’

बाबूलाल और मुन्ने खाँ सर नीचा किये सब सुनते रहे। नानी ने दोनों महिलाओं को बाहों में थाम आश्वासन दिया कि ऐसा नहीं हो सकता। मैं एक-एक के कान खेंचकर रख दूंगी। बाबूलाल और मुन्ने खाँ ने शर्मिदा होते हुए कहा, ‘‘ये ले नानी जूता और हमारे सरों पे मार। हम सच कहते है कि कुश्ती की कोई भी शर्त तय नहीं हुई थी। शर्त की बात तो ऐन कुश्ती के शुरू होने से पहले पैदा हुई, आप हमारी बहनें हैं। हम पर यकीन करों। हमारे जीते जी ऐसा कभी नहीं होगा – वहाँ चेयरमैन साहब और बड़े-बड़े लोग मौजूद है। कोई भी गैरजिम्मेदाराना बात नहीं होगी। आप लोग घर जाओ। नानी माफ कर दे हमे और इन्हें लेजा, तेरा हुकम बजाने के लिये ही तो हम जिन्दा है नानी माँ।’’

आश्वास्त होकर महिलाये लौट गयीं। काफी देर तक चेयरमैन साहब और अन्य गणमान्य व्यक्तियों के बीच सलाह मशविरा चलता रहा – बस्ती की इज्जत का सवाल सबसे अहम है। बाहर के लोग भी यहाँ आये हुए हैं। आखिर में ये तय हुआ कि एक निश्चित धनराशि जीतने वाले को इनाम स्वरूप दी जायेगी और निश्चित की गयी धन राशि चेयरमैन साहब और बस्ती के धनाड्य लोग तुरन्त देने का मन बना बैठे थे।

ये राशि पहलवानों के घरों के बराबर ही थी लेकिन निरंजन पहलवान की जिद के सामने किसी की न चली – वह पगलों की तरह किसी भी तर्क को मानने के लिये तैयार न हुआ। मजबूर होकर आयोजकों को कुश्ती रद्द करनी पड़ी।

कुश्ती नही हुई और हमारी पिछली दो दिनों की मेहनत पर पानी फिर गया। घर पहुंचने पर आज शुरूआत बड़े भाई से हुई – देर से आने के कारणों की पूछ-ताछ के दौरान, जब उन्होंने देखा कि डाँट-फटकार शुरू होने वाली है, तो जनाब ने हमें भी अपने साथ लपेट लिया। अब हमारी सफाई देने की बारी आयी तो हमने कह दिया कि हम तो बड़े भाई साहब को बुलाने के लिये गये थे। कुछ क्षणों तक मामला भ्रमित रहा। हमने सोचा चलो बच गये, लेकिन हमारी बड़ी जीजी जो इस वक्त जूरी की सदस्या हैं, फौरन हमसे पूछ बैठी, ‘‘बड़े भाई को बुलाने के लिये आपको किसने भेजा था ?‘‘ हम तो इस प्रश्न की उम्मीद कर ही रहे थे, कि ये पूछा जा सकता हैं। हमने स्वयं को संभालते हुए जरा धीमी आवाज में उतर दिया, ‘‘ठीक है, हमें किसी ने भी बुलाने के लिये नहीं भेजा था, हम अपने आप गये थे। शायद आपको याद होगा उस दिन जब मौसाजी की चाय के लिये हमें शक्कर लाने को कहा गया था, हम रसोई से जब शक्कर लेकर आये, तो हमें तमाम लोगों के सामने शक्कर के साथ चम्मच न लाने के लिये शर्मिदा किया गया। बार-बार हमसे कहा गया कि हम अपनी समझ से भी कोई काम कर लिया करें। आज ये पहला मौका हमें मिला अपनी समझ इस्तेमाल करने का और हमने…….।’’ -कुछ देर तक वातावरण में स्तब्धता छायी रही, फिर हमने ही शान्ति भंग की, ‘‘……वैसे हमारा भी मन था कुश्ते देखने का……हमने सोचा, कभी हमें पहलवान का रोल करना पड़े और कोई सीन ऐसा डायरेक्ट करना पड़े तो देखना जरूरी था ना…. वैसे भाई भी शायद इसलिये गये थे कि हो सकता है कि कभी कुश्ती पर इन्हें लेख लिखना पड़े, तो……..।’’

हमारी बात सुनकर सब लोग एक दूसरे की ओर देखकर मुस्करा रहे थें। कुछ क्षणों के बाद पिताश्री बड़े भाई की ओर मुखातिब हुए, ‘‘देखा तुम उसकी चुगली कर रहे थे और वह तुम्हें बचाने की कोशिश कर रहा है, शर्म आनी चाहिये और आप! मेहरबानी करके अपनी समझ का इस्तेमाल उसी जगह करें, जहाँ उचित हो। और जरा कम बोला करें………. चलिये, बड़े भाई हाथ मुँह धोयेगे, जाकर नल चलाइये।’’

123अपनी ही आँखों के सामने अपना चेहरा अजनबी लगने लगता है। फिर भी क्या हम कभी सोच पाते हैं कि ये हम नहीं है। उस बस्ती को छोड़े हुए पैंतीस बरस से भी ज्यादा हो जायेंगे, पर लगता नहीं कि वह हमसे छूट गयी है। पता नहीं वो जाने-पहचाने चेहरे अब होंगे भी या नहीं – मेरी तरह कहीं चले गये होगे। साथ खेलने वाले और पढ़ने वाले, हमजोली, वह बच्चे इस बीच बाप दादा बने कहीं बैठे होगे, उनके अपने जीवन के सामने पुरानी बातें महत्वहीन हो गयी होगी। कभी मिले तो एक-दूसरे को पहचान पायेंगे? वक्त ने अब तक वो सब कुछ बदल दिया होगा। मानस पटल पर ये सब बातें जब उभरती है, तो लगता है मन के अंदर कोई बैठा जैसे डस्टर से इन प्रश्नों और दुविधाओं को पोंछ देता है। अभी तक ये बचपन बड़ा नटखट और जिद्दी है।

ये बचपन ले तो आया इस बस्ती में, और तलाशने लगा, ढूंढ़ने लगा यहाँ खुद को। सब कुछ तो यहाँ बदल गया था, कितना अजनबी लग रहा हूँ मैं आज यहाँ। कहाँ खो गया वो सब जो मेरी स्मृति में है।

इसका झुर्रीदार चेहरा देखकर ऐसा लग रहा है जैसे मकड़ी के जाले का डिजाइन लेकर चेहरे पर लकीरें खीची गयी हैं। दुधिया सफेद बाल, मालूम देता है धुलते-धुलते कच्चा रंग चला गया, पुराना आदमी, बिलकुल परदादाजी की मुडि़या भाषा कि किताब जैसा या फिर उनकी रामायण जैसा, जिसके आधे से ज्यादा पन्ने गायब है, बालकांड से सीधा लंका दहन में खुलता है अगला अध्याय। ये लहीम-शहीम बूढ़ा मुंगफली के ठेले पर अपना बोझ तक्सीम किये ढ़केलता चला जा रहा है। मन कितना कच्चा हो रहा हैं उसे न पहचान कर। वह बस्ती के लिये जितना पुराना होगा, उतना ही नया नहीं हूँ अब क्या, मैं यहाँ के लिये।

मैं बजार के बूढ़ो में पुराने बचपन के चेहरे या उनकी जवानी कें चेहरों को ढूंढ़ रहा हूँ। लगता है, ये सब नुमाइश में शामिल हैं और मैं नुमाइश देखने वाला हूँ।

हम लोगों की नुमाइश देखते चले जा रहे थे कि एक अधेड़ अपनी पत्नी और जवान लड़कों के साथ उधर से गुजरा और कुछ दूर जाकर वह लौटा और हमारे सामने आकर खड़ा हो गया। बोला, ‘‘ तुम्हारी आदत नहीं छूटी, अरे अब ये हलवाई की दुकान नहीं है, मेडिकल स्टोर है……..अमर हो ना…..।’’

हम दोनों की ही आँखों में आँसू छलक पड़े। प्यार उमड़ कर ऐसा बरसा कि दुनिया भूल गये, उम्र भूल गयें। ‘‘मैंने पापाजी को कभी किसी से ऐसे मिलते नहीं देखा, ‘‘लड़का बोला। मैं समझ गया था ये इनके सुपुत्र होगें और वो इनकी पत्नी। इससे पहले कि वह मुझे परिचय करवाता मैं उससे पहले ही बोल पड़ा, ‘‘ये आपके पापा बाद में, ये हैं मेरे मौसरे भाई, चोरों के शहनशाह, हर गलत और झूठ में मेरे साझीदार मदन लाल समझ गये न…….. मैं आपके पापाजी का पुराना बचपन का मित्र हूं।’’ – गीली आँखों से उसने पत्नी और बच्चों का परिचय करवाया – कहीं किसी रिश्तेदार के यहाँ जा रहे थे, इरादा बदल दिया और उलटें पाँव घर लौट आये मुझे साथ लेकर।

पूरी रात जश्न मनाया गया, बातें करते-करते थक गये, लेकिन बातें खत्म न हुई। दूसरे दिन वह होटल से मुझे निकाल लाये – वो एक स्थानीय स्कूल में पढ़ाते हैं, उन्होंने स्कूल से कई दिनों की छुट्टी ले ली। उनकी पत्नी और बच्चे मुझसे आत्मीय हो गये थे, वो बताते हैं कि पापा अक्सर मेरी बातें किया करते है। – इतने वर्षो बाद जब मिले, तो बीते दौर का लमहा-लमहा याद आ गया, कितने खुश हैं हम। शायद अपने पापा को इन लोगों ने कभी इतना खुश, इतना जीवन्त और इतना संतुष्ट पहले कभी नहीं देखा। हम बहुत हँसे, बहुत रोये बहुत से खोये हुए लोगों को याद करके।

ये बस्ती अब काफी बड़ी हो गयी है, काफी फैल गयी है – वे टीले-पहाड़, ताल-पोखरे, बाग-बगीचे, कुएँ-रहट, कोल्हू, पवनचक्की, वो वीराना  मंदिर, वो प्याऊ और वे सब लहलहाते खेत कहाँ चले गये। दूर बंजर में अकेला खजूर का लम्बा पेड़ भी तो था यहीं कहीं। हाँ दूर जंगल के पास एक बाबा की कुटिया हुआ करती थी। कुटीया के बाहर एक फूस का छप्पर था, जिसके नीचे साधुओं की जमात बैठती थी और चिलम के दौर चला करते थे। सबकी चिलम साझा थी लेकिन बड़े बाबा की चिलम अलग थी, बड़ी विचित्र लम्बी सी चिलम। चरस-गाँजे की भरी ताजी चिलम वे एक साँस में राख कर देते थे, न जाने उस नब्बे बरस के कड़के प्राणी में साँस कहाँ छिपी थी। कई मिनट वे पूरी ताकत से दम खींचते, चिलम राख हो जाती और लौ चिलम छोड़ छप्पर में जा खो जाती लेकिन कभी छप्पर में आग नहीं लगी। हम अक्सर परीक्षा के दिनों में अपने मित्रों के साथ यहीं पास के बाग में पढ़ने आते थे और बड़े बाबा के चिलम पीने का नजारा देखते थे। कहाँ चली गयी वो कुटिया, वो बाबा और साधुओं की जमात।

अभी जब मैं अपने मित्र के साथ बस्ती में घूम रहा था तो मुझे अचानक पगली साबों की आवाज सुनायी दी – हाँ, ये आवाज सिर्फ मुझे ही सुनाई दे रही हैं। मदन बातें करते जा रहे हैं, और मैं मौन साबों की वह आवाज सुन रहा हूँ, जो कभी मैंने अपने बचपन में सुनी थी। पगली साबो, उससे मस्खरी करने वालों को पत्थर मारती लेकिन बच्चों को देख, फौरन आसमान की ओर हाथ उठा दुआ करने लगती थी। शाम होते-होते जब उसे बच्चे सड़कों और गलियों में दिखायी नहीं देते, तो वह लोगों के घरों के सामने खड़े होकर मीठी आवाज में दुआ करती। शाम को जगह-जगह गूंजती थी उसकी आवाज। आँखे ढूँढ रही हैं साबों पगली को, कहाँ चली गयी वह….।

यादों में कहीं सीता नानी मुझे अपने वक्ष से लगाये खड़ी है, और सिर पर उसके हाथ का स्पर्श अभी भी महसूस हो रहा है – तर आँखों के झिलमिल मे उनका चेहरा मुझे दिखायी दे रहा है।

सफेद बालों और झुर्रियों में छिपा, मैने शामलाल का चेहरा ढूँढ़ लिया। जन्मान्ध शामलाल की बेंत अभी भी वही हैं। मैंने पास रखी बेंत को हाथ लगाया, तो उन्होंने एकदम मेरा हाथ पकड़ लिया। मैंने प्रणाम किया, तो चौंक कर खडे हो गये और कुछ सोचते हुए मुझे गले लगा लिया। मेरे सिर्फ ‘‘प्रणाम चाचाजी’’ कहने भर से उन्होंने तीस साला पुराना अमर कैसे बरामद कर लिया। इस अंधे प्राणी का शीघ्रबोध और उनकी सूक्ष्म चेतना ने मुझे चकित कर दिया। कहने लगे ‘‘याद आ गयी तुम्हें हम लोगों की …….. एक दिन अचानक मैंने रेडियों लगाया……… आवाज सुन कर चौक गया………. कोई महिला तुम्हारा इंटरव्यू ले रही थी…….. अंदाज मेरा सही निकला, जब तुम विदेश से किसी फिल्म का निर्देशन करके लौटे थे……. उस वक्त।……. क्यो भाई गोरी चली पिया के देस गाना सुनना है?…….. तो दो पप्पी लगेगी ………।’’ सबके ठहाको के बीच मेरे आँसू छलक पडे। मुझे लग रहा है कि इंसान लाख बदल जाये, प्यार कभी नहीं मरता। अपनापन वैसा ही रहता है।

हांलाकि ये बस्ती हमारे परिवार के लिये एक पनाहगाह ही रही। मैं यहाँ बचपन में केवल आठ-नौ वर्ष ही रहा लेकिन भोले बचपन ने सदा इसे अपना समझा। सरकारी रिकार्ड में मेरा होम टाउन हमेशा यही रहा जबकि यहाँ अब कुछ नहीं है लेकिन – आज भी ये बस्ती मुझे अपनी ही लगती है ये पूरी बस्ती आज भी मेरे मानस मे वैसी ही बसी लगती है।

मुझे यहाँ आये तीन दिन हो चुके थे, और आज शाम की गाड़ी से रिजर्वेशन मिल गया था। जाने की बात सुनकर मदनजी एवं उनका परिवार बहुत उदास हो गया, मुझे भी अच्छा नहीं लग रहा है। मदनजी का आग्रह था कि मैं यही आ जाऊँ। सच पूछो, तो ये मेरे मन की बात थी कि इतने वर्षों यहाँ से दूर रहने के बाद यहीं आ बसू और साथ ही अपना कला-संसार भी यही बसा लूँ। मेरी योजना से अवगत होकर सब बड़े खुश हुए।

करीब पूरी बस्ती घूम ली थी, केवल उत्तर का भाग बाकी था। सोचा शाम तक का समय है, क्यों न उधर का एक चक्कर लगा लूँ। मदन भाई को साथ लेकर छोटे बाजार से होते हुए नयी बस्ती की ओर चले जा रहे थे कि अचानक गली से निकलकर मेरी नजर मेन सड़क के बीचों-बीच टँगे लगोट पर गयी। मैंने मदन से पूछा ‘‘अरे ये क्या है यार।’’ उन्होंने मुझे याद दिलाया, ‘‘बहुत पुरानी बात है, याद है एक बार हम लोग कमेले पर बने अखाडे मे कुश्ती देखने गये थे – निरंजन पहलवान का नाम याद है न………?’’ वो हादसा और उन पहलवानों को मैं भी कभी भूल ही नही सकता बड़े पापड़ बेले थे हम लोगों ने कुश्ती देखने के लिये। -ये क्या-ये निंरजन पहलवान की याद मे ……….?

– भाई साहब याद में नहीं – वो अभी बरकरार हैं और उनका चेलेंज भी अभी बरकरार हैं। ये लंगोट उसने चेलेंज के प्रतीक के रूप में टँगा है।

-‘‘क्या बात कर रहे हो………. तीस साल बाद भी……?’’

-‘‘रूकों…… कुछ दिन पहले ही इस कस्बे की दीवारें पोस्टरों से भरी हुई थीं………हाँ ये रहा एक पोस्टर……. पढ़ लो।’’

निरंजन पहलवान का माँगी को चैलेज……. चौक पर टँगा मेरा उतरा लंगोट है। इसे बतौर-ए चेलेंज सड़क की बीचो बीच टाँगा गया है। मैं डंके की चोट पर आज भी अपनी पुरानी शर्त पर कुश्ती का ऐलान करता हूँ।…….याद रख या तो कुश्ती करके अपनी ताकत आजमा ले – नही तो जिस दिन तू इस लंगोट के नीचे गुजर जायेगा – समझा जायेगा कि तूने अपनी हार मान ली है……….।

‘‘क्या समझे भाई साहब…………….माँगीराम का तो इन्होंने नाक्ता पानी बंद कर रखा हैं। वह फाटक पर मूंगफली का ठेला लगाता था और इसी सड़क से आता-जाता था। जब से निरंजन पहलवान ने लंगोट टाँगा है, बेचारा यहाँ तक फेरी लगाकर यहां से मुड़ जाता है या फिर बेचारा ठेला लिये-लिये गली कूचों  में घूमता रहता है। वह बूढ़ा माँगीराम लंगोट के नीचे से निकलने की शर्मिदगी नहीं उठाना चाहता।’’

‘‘बेचारा!…….. वह मूंगफली का ठेला लगता है काफी बूढा हो चुका है ? उसका चेहरा झुर्रियों से भरा है सफेद बाल हैं, हाँ….मुझे पहले दिन दिखायी दिया था……वही होगा।’’

मदनजी और हम, माँगीराम की मजबूरी और पहलवान जनाब निरजन के दिमागी दिवालियेपन की बात कर ही रहे थे कि आहिस्ता-आहिस्ता सीढि़यों से कमर पर हाथ रखे एक बूढ़ा नीचे सड़क पर उतरा। मदनजी ने फौरन कहा, ‘‘बड़ी लम्बी उम्र है इनकी…….. पहचानों कौन हैं ये ?……….. यही हैं वे निरंजन पहलवान।’’

मैंने देखा पहलवानजी दस कदम चलने के बाद एक दुकान के थड़े पर बैठकर सुस्ताने लगे। फिर उठे और थोडी दूर चलकर एक खम्बें पर हाथ टिकाकर खड़े हो गये और एक मिनट के बाद फिर उन्होंने बाजार-यात्रा शुरू कर दी। यह क्रम वो दोहराते हुए चले जा रहे थे। उन्हें देखकर मुझे उनका चेलेज, पोस्टर, लंगोट बड़ा हास्यपद लगा।

उनमें उम्र का परिवर्तन देख, मन में कुछ दूसरी बाते पैदा हो गयी। मुझे लगा मेरे अंदर उनके प्रति अश्रद्धा और तर्क का भाव समाप्त हो रहा हैं। उनके पास आते-आते हम दोनों ही शांत हो गये। अचानक मैं उनकी ओर मुड़ा, उनके पास जाकर चरण-स्पर्श किये । उनकी परीक्षा लेने के लिये मैं हाथ जोड़ उनके सम्मुख शांत खड़ा हो गया। एक अजनबी का इतना आत्मीय और श्रद्धामय अभिवादन ? मेरे कंधे पर हाथ रखकर वो मुझे  गौर से देखने लगे। तभी मैंने उनसे पूछा, ‘‘नहीं पहचाना ताऊजी ?’’ – वे मुझे गौर से देखते हुए बोले, ‘‘पुत्तर शिकस्त ते असी कदी मानी नहीं, मजबूरी दी गल जुदा है – है तों बीबा पुत्तर…. मन ने तो पहचान लिया है – लेकिन तेरा नाम जुबान ते नहीं आ रहा है – एक बडी-बड़ी आँखों वाला बिबा बच्चा होन्दा सी – एक्टिगं-शेक्टिंग दे विच बड़ा अदाकार कहलान्दा सी ओ ‘कृष्णा…नहीं…..नहीं….’’

मैंने उनकी परेशानी हल कर दी, उन्होंने मेरा नाम दोहराया और उनकी आँखे नम हो गयी।

‘‘ओफ कितने साल बीत गये……. सुनता हूँ तुम फिल्म में लिखते हो और डायरेक्ट करते हो….. सही है न…. यार तुम लोग शूटिंग करने बाहर भी जाते हो, कभी शूटिंग करने पाकिस्तान जाना तो कोहमरी…… मरी की शूटिंग जरूर करना – बहुत खूबसूरत पहाड़ है, बहुत खूबसूरत….. दुनिया जहान में शूटिंग करते है लोग, वहाँ क्यों नहीं जाते आँखों मे बसाने लायक नजारे हैं……. देखों कभी मौका लगे तो?…… कभी वहाँ की फिल्म बने तो जरूर दिखाना…. बड़ी खूबसूरत जगह हैं वहाँ…….।’’

काफी देर तक वे पाकिस्तान के हुस्न की तारीफ करते रहे। मेरे मन में एक बात आयी। अच्छा मौका है, क्यों न कुश्ती के विषय में पूछा जाये। मैंने हिम्मत करके उनसे पूछ ही लिया, ‘‘मेरे बचपन की बात है – और ये बात इसलिये याद है, क्योंकि बिना इजाजत लिये मैं और ये मदन भाई आपकी कुश्ती देखने के लिये गये थे बहुत बड़ा हँगामा हो गया था उस दिन। लोग बड़ी दूर-दूर से कुश्ती देखने आये थे, लेकिन ऐन कुश्ती के वक्त आपने हार-जीत के लिये शर्त रख दी और कुश्ती नहीं हो पायी, लोग बहुत निराश हुए।……. मैंने अभी आपका इश्तिहार पढ़ा, आज भी आप उसी शर्त पर उसी पहलवान से कुश्ती लड़ने पर आमादा हैं। आपकी इस जिद का कारण क्या है। आपके मन में गहरी बैठी वह टीस क्या है……..?’’

काफी देर वे खामोश रहे और फिर क्रोध में उनकी आँखें लाल हो गयी और अचानक दर्द से आहत उन्होंने मेरे कंधे का सहारा लिया, उनकी आँखें नम हो गयीं।

‘‘…..आज पहली बार किसी ने मेरे मन के अंदर झाँकने की कोशिश की है…….. लोग मुझे पागल ते सनकी करार देन्दे रहन्दे ने………… ऐ ओ दिन सी जद रब ने आखाँ बन्द कर लितियाँ सी ते इन्सान अंना (अंधा) हो गया सी…….. सन 47 का वह दिन था ये, मैं अपने परिवार के साथ उसी दिन रावलपिंडी से घर वापिस पहुंचा था।…… अचानक आधी रात चारों तरफ से शोर-गुल, चीखें, मातमी आवाजें, चारों तरफ से हवाओं में तैरने लगीं, सब जाग के ते उठ बैठे। कोठे चढ़के जो मंजर वेख्या ते होश गुम हो गये। थोड़े दूर घर जलदे नजर आये। लोग जान बचा-बचा भाग रहे थे, लोग बर्छे-भाले तलवार लिये उनका पीछा कर रहे थे। भाग-दौड़, आह-कराह, मार-काट अँख्खाँ नू विश्वास नई हौदां सी। इथ्थे दी आवाजाँ नू लंगके एक जनानी दी आवाज दिलाँनू चीर के निकलन लगी। ओ जान बचान वास्ते कोठे ते चढ़े गयी, ओ जालिमा नूँ तरले मिन्नातां कर रई सी – हथ जोड़दी पैराँ पड़दी ‘‘मेरे बच्चें  नू न छिन्नों इस नू न मारना बक्श दो साडी जान।’’ लेकिन बेगैरत वहशियाँ ने उसदा पिच्छा न छडया। पच्ची ती(पच्चीस तीस) हैवाना ने उसनू घेर लिता, बर्छी भाले, तलवारां तो लेस सीगे ओ सब।

इक साल दे बच्चे नू छाती तों चिपटा रख्या सी उस बचारी ने…….. ओ बिलकुल बेबस हो गई सी, ओस जनानी ने कहया रूक जाओं तुसी मैं आन्दीआँ…….. उसने अपने तिन साल दे पुतर नू आवाज लाई, जो कोठे लुकया बेठा सी, सहमया बच्चा आड़ तों निकल के आ गया – बस जनाब उसने अपने दूसरे बच्चों को अपनी पीठ पर चढ़ा लिया और भाग के मुंडेर पर पहुंच गयी – उसने मुडेर पर खड़े होकर दहाड़ा ‘‘देखो न तो मैंने अपना धर्म बदलना है, नाही मैं अपने जीतेजी अपनी इज्जत लुटने दूंगी और न अपने बच्चों को तुम्हारे हाथों कत्ल होने दूंगी।’’ उसने अपने दोनों बच्चों को प्यार किया और मुंडेर से दोनो बच्चों के साथ कूद गयी।

उसदी दिलेरी ते हिम्मत दे आगे साडा माथा झुक गया ते साडा हौसला जे बुज गया सी, वापस आ गया। ऐन्नी देर विच साडे घर दे पिछले पास्से दे दरवाजे दस्तक होई पूरा घर सहम गया कि कहीं यहाँ भी………. हमने कोठे से छिपकर देखा – एक बुजुर्ग आदमी कुछ ज्यादा ही घबराया हुआ बहुत नीची आवाज में घर के बुजुर्ग रामलाल को पुकार रहा था। दरवाजा खोलकर उसे अंदर बुला लिया गया, उसने एक साँस में सब कुछ कह डाला, ‘‘पुत्तर तेन्नू खुदा दा वास्ता मैनू गलत न समझना – कुछ वी सोचनदा वक्त नहीं है। जल्दी इथ्थों जान लई त्यार हो जाओ, मुल्क दा बटवारा हो गया है, कुछई देर पेल्लाँ रेडियों ते ऐलान आया है। जनूनी लोकाँदे खूनी दस्तेयाँ ने लूट-पाट, मार-काट शुरू कर दिती हैं। इथ्थे वी जल्दी खूनी दस्ते पहुंचन वाले ने। जल्दी ही थ्वानू इत्थो निकलना है, मेरे भाई स्टेशन तो स्पेशल गड्डियाँ अमृतसर दिल्ली ते जलंधर जा रही हैं। ओए रामलाल नही दिखाई नहीं दे रहयां ओ किथ्थे है।

– पापा जी तो कोमरी गये होए ने।

– खुदा उनानूँ सलामत रखे लेकिन पुत्तर त्वानूं इथ्थों इसी वक्त निकलना पएगा…… ।

मैंने जाने से साफ इन्कार कर दिया – अपने मुल्क और अपने घर से मैं चोरो की तरह  निकल भागूँ ?…… नई असी नई जाना……. जे सानू मरना वी पाया ते असी इत्थेई मराँगे।

मुस्लिम बूढ़ा एकदम हताश होकर बोला, निरंजन जिद न कर, न कर जिद। मैं ते राम्याँ, असी एक थाली विच खाके बड़े होएआँ। भ्रावाँ तो बढ़के है अस्सी एक-दूसरे लई। इक दिन वास्ते ओ कित्थे चला जांदा सी ते मैं इस घर दे चार-चार चक्कर लाके पता करदा कि रामलाल आ गया कि नई। ते मेरे वगैंर उस्दा बी कोई कम नहीं होदा सी। निरंजना तेरे भाई दी दो दिना दे बाद बरात जानी सी ते अज – औफ! त्वानू ईत्थों भेज, तूँ समजदा है कि असी खुश रह सकदें हन? साडा ते टब्बर बर्बाद हो जाऊगा।

-चलों पुत्तरों ऐ सोचन द वक्त नहीं है, निरंजन बच्चयां नुं………..। मैं अपने दोनों पुत्तरां नू त्थानू खैरियत नाल स्टेशन छड्डन लई लेदा आया, ते गड्ड़ीयां बी, असी अपनी जान हथेली रखके ए काम करन दी तैयारी किती। तेरी अम्मी ते बच्ची निच्चे लुकी खड़ी हन। गड्डी स्कूल दे कोल अंधेरे विच लाई होई ए। हाँ निरंजन घर ते जायदाद दे कागजात लेना न भूलना। हाँ जेवरात और नकदी जो भी हो ले लेना। ओय चलो बी – रामलाल नू भी इसी वक्त जाना सी। खैर अस्सी और इतजार नही कर सगदे। थ्वानू खुदा का वास्ता देर न करो -हालात ठीक हो जाये तो लौट आना – अरे जान ही न रही तो ये घर दुनिया किस काम की। यहाँ मिलिटरी न जाने कब तक पहुंचे तब तक तो……. खुदा खैर करें।’’

-ठीक है अब्बा जान घर के कागजात तो शायद नीचे के बाक्सों में होगे पापाजी को ही मालूम है।

मेरी ओर इशारा करके उन्होने बक्सो को उतरवाने के लिए कहा, ’’पहलवान जी आप जरा मदद फरमाये।’’

अश्फाक अब्बा बहुत कमजोर लग रहे थे बक्से उतारते हुए अफसोस करने लगे, ‘‘मेरी माँ यहीं इसी घर-आँगन में छोड़ जाती थी मुझे और खुद बग़ान का कामकाज देखने निकल जाती थी,  पूरा दिन मैं और रामलाल यहीं खेलते-यही पले बड़े हुए और मैं इनसे वतन छोड़ने जिद कर रहा हूँ -पता नहीं मेरा भाई कैसा होगा या खुदा कुछ समझ मे नही आ रहा है कैसा वक्त आ गया है।

अभी बक्से उतारने ही शुरू किये थे कि बाहर कुछ लोगों ने भीड़ के साथ आवाज लगायी। रामलाल!ओ रामा!!…… नहीं खोलता तो दरवाजे तोड़ दो!!!! नाराए तदबीर – अल्ला हू अकबर।

अब यहां एक पल सांस लेने का भी वक्त न था। इन लोगों की काफी बड़ी तादात मालूम दे रही थी। अश्फाक ने अपने माथे पर दुहथ्थड़ मारा, या खुदा इन गाफिलों को अक्ल दे।

हम सभी जल्दी-जल्दी जैसे थे, वैसे ही पहाड़ी के नीचे भाग निकले, एक सुई तक न उठा पाये हम लोग अपने ही घर से। औरतों, बच्चों के साथ हम लोग अंधेरे में गिरते पड़ते गाडि़यों के पास पहुंच गये। आरिफा अम्मा भी हाँफते-काँपते वहां आ गयी थीं – उन्होंने पहले ही पूछा राम कहाँ है राम दिखाई नहीं दे रहा। उन्हें तफसील बताने का वक्त ही न था। मार काट की आवाजे साफ सुनाई दे रही थी जल्दी-जल्दी उन्होंने जो कुछ अपने घर में खाने की चोजे थीं, वहीं ले आयी थी सूखे मेवे, बिस्किट्स, रोटी आदि वे हमें पकड़ा दीं। हमें खाली हाथ देखकर उन्होनें अंदाज लगा लिया था कि हम सब, कुछ भी न ले पाये होगे। उन्होंने जल्दी-जल्दी अपने सारे जेवर उतार मुझको देते हुए कहा बेटा किस्मत को हमें इसी तरह ज़ुदा करना था, खैर ये रख लो मना मत करना, परदेस में काम आयेगा। एक बंडल रूपयों का भी दिया और दुआऐं-अशीष देके जल्दी-जल्दी सानू विदा किता – अश्फाक ने आँसू भरियां आँखा कस के बन्द कर लितियाँ बोला मैं त्वानू कहदाँ ते आँ के जाओ….जाओ। लेकिन थ्वानू जांदे देखन दी हिम्मत नई।

अश्फाक अब्बा ते उनादे दोवाँ पुतराँ ने जान हथेली ते रखके सानू स्टेशन पहुँचा दित्ता। लेकिन मेरे मन विच रह-रह के फादर साब दा ख्याल आ रया सी, असी उनानू कोमरी दे घर विच कल्ला छडके आये सन। मेरी जनानी बी बार-बार पूछदी सी पापाजी दा किस तराँ होयेगा। अश्फाक दे बड़े पुतर ने साडी परेशानी देख के अपने नू साडे हवाले कर दिता। मैं जनानी ते बचयाँनू सबदे नाल छडके अमृतसर शरनार्थी केम्प दे विच मिलन दी गल किती और असी मरी दे वास्ते रवाना होए। बड़ा खतरनाक सी पूरा रास्ता, लाशांतो पटियाँ पड़ी सी सड़काँ। जनूनी बन्दे, रास्ते ते पत्थर रखके गड्डी रोक लेन्दे सी।

जनाब बड़ी मुश्किलों का सामना करके हम अपने घर मरी पहुँचे। घर अंदर से बंद था। बडी आवाजें दी, लेकिन कोई जवाब नहीं आया। हार कर हम दीवार चढ़के घर के अंदर पहुंचे, तो देखा कि खून के समन्दर में वालिद साब की लाश पड़ी हैं। चीख पाने की हिम्मत लाशें देखते-देखते खत्म हो गयी थी, घुटकर रह गया। किस्मत ने हमे वहां भेज के कितना बड़ा दग़ा किया। ओफ! वो हमें ढूंढ़ने के लिये बाहर निकले होगे और किसी जालिम ने उन पर वार कर दिया होगा। अंदर आकर उन्होंने डर से कुंडा बंद कर लिया होगा। जिन्दगी और मौत के बीच तड़पते हुए उन्होंने अपने खून में उंगली डुबा-डुबा कर दीवार पर मेरे नाम संनेहा (संदेश) लिखा, ‘‘निरंजन पुत्तर इत्थे न रूकीं फौरन बचयां नाल निकल जाओ केन्दे ने हुन ऐ वतन साडा नंई है। मेरी अकल काम नहीं कर रही हैं। कित्थे जाओगे? मैं होन्दा….. ते सियासतदाराँ नू पूछदा। पुत्तर भगवान त्वाडी रक्षा करन। मेरे मूँ गंगाजल हो सके तो पा देना……..सबनू प्यार। मैनू छड निकल जाओ-जाओ…….मेरे बचने दी कोई उम्मीद नही है।

तड़पदे-तड़पदे किस तराँ लिखया होयेगा – ऊफ! सानू ते वतन नू याद करदे प्रान छड्डे सी उनना ने। मैंने उनकी लाश को उठाया, लेकिन अक्ल काम नहीं कर रही थी की कहाँ ले जाऊँ, क्योकि घर-वतन तो वही था। आदमी कहीं मरे, घर और वतन लाया जाता है। मैंने दीवार पर अपना सर दे मारा। पिताजी दी अंतम क्रिया ? – हाँ मुझे गँगाजल तो मिल गया था, मैंने उनके मुँह में पा दिता। फिर पैरी हाथ लाके उनादे अहसाना दा शुक्रिया अदा किता…… अपनी बेबसी लई माफी मांगी।……. उनादे उते मट्टी दा तेल छिड़कया पूरे घरनू फिर अगला दिती। ऐस तराँ मेरे फादर साब, साडे वतन, साडी खुशियाँ ते साडे भविष (भविष्य) दी अंतम क्रिया (अंतिम क्रिया) हुई।…. जलते हुए घर की रोशनी बहुत देर तक न देख सका। खूनी और जनूनी दरिन्दों को मेरा ऐसा करना अच्छा न लगा। जैसे मैं अपने हाथों  अपने बालिद साहब की लाश और अपने घर को आग भी नही लगा सकता था। उन्होंने मुझे उस आग में मुझे जिन्दा जला देने की पूरी कोशिश की, मुझ पर वार किये, लेकिन मोहल्ले के कुछ लोगों और अश्फाक के फरजंद रहमत अली ने मुझे बचा लिया और मुझे अपने गाड़ी में स्टेशन पहुंचा दिया। वहीं जहाँ से मैं अपने वालिद साहब को लेने गया था।

स्टेशन पर हजारों बेवतन, मुसीबत के मारे गाड़ी के इंतजार में है। लाखों लोग रास्तों और घरों में फंसे हुए हैं, मिलिट्री और पुलिस लोगों को निकालने और लोगों की हिफाजत के लिये तैनात हो चुकी है लेकिन लूट-पाट, मार-काट का सिलसिला अभी भी वैसा ही है। जो लोग भी यहां पहुंच रहे हैं, उनकी आह-कराह और रोने-पिटने में, अपनों के कत्ल होने, मार दिये जाने, जिन्दा जला देने, इज्जत लूट लेने, माल-असबाब लूट लेने के स्वर चारों ओर सुनायी दे रहे हैं। बेवायें सर धुन रही है, मातायें छाती पीट रही हैं कि कैसी बेदर्दी से उनके बच्चों को मारा गया और उनके नन्हें-मुन्नों को हवा में उछाल कर भालों और नेज की नोकों पर उनको रोक, कैसे मासूम फुल्लाँ दी नर्म-नर्म चीकाँ (चीख) उनांदे कनाँ (कानो) विच पे रई एँ। उनांदी अखाँ विच नन्हें बचयाँ दा दम तोड़दा भोला चेहरा हुनवी दिखायी दे रेहा हैं।

औरों की तरह मैं भी इस हुजूम में जिल्लत, बेबसी, उज्र महसूस कर रहा हूं और अब आपने मसाइब दबाते-दबाते सुन्न होने लगा था। तभी रहमत अली ने मुझे संभालते हुए कहा, ‘‘भाइजान गाड़ी ते आ रही हैं।’’ मैं उठ खड़ा हुआ, ‘‘गड्डी ते आरई ऐ लेकिन पता नहीं असां कित्थे जाना ए……. ऐ वीराँ, इत्थों मैं….. इत्थों हाथ विच ढेर सारा दर्द, अपनी झोली दे विच वतन दी याद, ते अपने मत्थे तुसाँदा अहसान लेके जा रहा हाँ………।’’

उसने गले लगाकर आँसुओं से विदाई दी, ‘‘अपनों पर कभी एहसान नहीं होता। हमें हमेंशा आपकी फिक्र रहेगी, आप सबकी। गलती माफ कर देना। बस खुदाबन्द करीम से यही दुआ है कि वहाँ भी आपको किसी अश्फाक और उसके कुनबे से मिला दे चाहे, वह किसी भी धर्म का हो…….।’’

फिर ठोकरे ही हमारा नसीब बन गयी। यहाँ पनाह मिली, लेकिन हर अजनबी गली हमारा पता पूछने लगी। हर आँख हमारी गुम पहचान पर शक करने लगी, जैसे हम मुफलिस, लाखैरे और लाचार ही पैदा हुए थे।

वो तल्खीए अय्याम और बेदर्द हालात बयाँ करते-करते बेसुध नजर आने लगे। मैंने हाथ का सहारा देकर उन्हें थड़ें पर बैठाया। कुछ देर की खामोशी के बाद संय्यत होते हुए बोले, ‘‘बरखुदार आपने कुश्ती की शर्त के बारे में पूछा था………. और ये भी सही है कि मैं आज भी अपनी शर्त पे कायम हूँ।

मैं उस वक्त भी जानना चाहता था और…….. बताना भी चाहता था कि अपना बसा बसाया घर, अपनी खुशियाँ, अपनी पहचान, अपने बजुर्गो की निशानी दाँव पर लगा पाना कितना मुश्किल होता है।……. जब तीस साल पहले कुश्ती के लिये मैं तैयार हुआ था, उस वक्त मैं पहलवान कहाँ रह गया था -गर्दिश और बेदर्द हालात ने सब कुछ बदल दिया था। माँगीराम उस वक्त भरा-पुरा पहलवान था, वह खुद भी जानता था कि वह ये -शर्त आसानी से जीत सकता है लेकिन शर्त सुनकर लरज़ गया और आज तक भी वह हिम्मत न जुटा सका। जब खुद के लिये ऐसे फैसले लेना मुश्किल हो तो, चंद सियासी लोग, करोडो के मुस्तकबिल का फैसला कैसे कर सकते हैं?

हमसे बिना पूछे, हमें बिना बताये, हमारी बनी संवरी जिन्दगी, हमारे बसे बसाये घर, हमारी साँसों में महकती हमारी तहजीब, कुदरत के लिखे हमारी पीढियों के नाम हमारे वतन से हमें बेदखल करने का फैसला किसने किया और क्यों किया ? अपने भविष्य और अपनी खुशियों को मिटा डालने का अधिकार हमने किसी को नहीं दिया था। फिर हमारे लिये क्यों वे बेरहम और बेदर्द हालत पैदा कर दिये गये।

हम कभी वह जोरो-जुल्मों की इंतहाँ भूल नहीं सकते। लाखों कत्ल कर दिये गये, जिन्दा जला दिये गये। माताओं के सामने जवान बेटों को हलाक कर दिया जाता। नन्हें मासूम फूल से बच्चों को हवा में उछाल, नेजों और भालों के नोक से बींध दिया जाता, उनके लाचार माँ-बाप उन्हें तड़पते देखते रहते, फिर या तो वे उनकी तलवारों के शिकार होते या फिर वो दीवारों पर सर पटक-पटक कर मर जाते। भाइयों और शौहरों के सामने अनगिनत बहनों और बीवियों की अस्मत लूटी गयी। कोई बेकस गर मुश्तइल (गुस्सा) होता, तो उन्हें सजा मिलतीं।

कोई हमें बताये कि ये जुल्म और सितम सहने पर हमें क्यों मजबूर किया गया, कोई हमें बताये कि हमारा कसूर क्या था ?

हमने अपनी बेबसी और मजबूरी के लिये खुद को बहुत बेइज्जत और अपमानित महसूस किया। हम बेबतनों ने यहाँ बहुत खाक छानी। ईट और सीमेंट का एक मकान बना। मैं एक बार इसे अपनी मर्जी से…… अपनी मर्जी से दाँव पर लगाना चाहता था ताकि मैं उस बेबसी और मजबूरी को भूल सकूँ और बतला सकूँ कि घर ईट-सीमेट, मिट्टी से नहीं बनता। घर ईट, मिट्टी, सीमेंट का नहीं होता, वतन कोई सीमाओ में घिरा जमीन का टुकड़ा नहीं होता, जिन्दगी सिर्फ जीने का नाम भर नहीं होती, मुझे आज भी लगता है कि जिन्दगी-घर-वतन वही था जो कहीं छूट गया है। मैं आज भी वहीं हूँ।

मैंने बम्बई आने के लिये अपना आरक्षण रद करवा दिया। कई दिनों तक मन बहुत बोझिल लग रहा था। रह-रह निरंजन पहलवान की बातें दिमाग में घूम रही थी। मुझे वह बहुत एकाकी लगा। आधी शताब्दी से भी ज्यादा समय बीत गया और वह अब तक अपने अजनबी और एकाकीपन को ढो रहा है। लगता कि उसमें बटवारे के दर्दनाक हादसों के घाव अब कभी भर नहीं पायेंगें। उसने अपने दिल में समेट कर रखी हैं अपने बतन और अपने लोगों की यादें। आज भी वे उन यादों में मुस्करा पाने की कोशिश करते है।

आदमी का अपना संसार कितना विचित्र होता है। कभी-कभी लगता है इंसान का वह निजी भावनात्मक संसार उसका कुल वजूद हैं। यह अपनापन कितना सूक्ष्म और विस्तृत भाव है और यह अपनापन मिल पाना और समझ पाना कितना कठिन होता है अपने ही में।

मदनजी ने मेरे मन में झाँकते हुए कहा – ‘‘निरंजन पहलवान आज मुझे बिलकुल एक जुदा आदमी लगा। कितना गहरा आदमी है वह। सच पूछो हम उसे पागल और सनकी ही समझते रहे हैं।’’

हम लोग किसी अव्यक्त भाव को मन में साधें काफी समय तक खामोश रहे, हम शायद अपने अंदर अपनेपन की हल्की-सी कोई रेखा बनती महसूस कर रहे है। तभी मैंने मदनजी से आग्रह किया कि चलो पहलवानजी से मिलकर आते है। मदनजी बोले, मैं भी यहीं कहने वाला था।

मैंने तो पहलवानजी को बचपन में देखा था, पर मदनजी तो हमेशा इस कस्बे में रहे। आधी शताब्दी बीत जाने के बाद, पहली बार निरंजन पहलवान से संबंध बन पाया है। कितना समय लग जाता है खुद में किसी की सही पहचान बनने में, जो इंसान को अपनेपन तक की हदों में ले आती है।

हम दोनों पहलवानजी के घर जा धमके। हमें अचानक अपने घर में देख, उन्हें थोड़ा आश्चर्य हुआ, उन्होंने हम दोनों को गले लगाकर, ढेरों आशीष दे ड़ाले। उनमें जैसे खुशी की लहरें दौड़ने सी लगीं। अपनी पत्नी से मिलवाने के लिये, एक साथ कई आवाजे लगा दीं उन्होंने। बेचारी भागती दौड़ती आयीं। मदनजी को तो वो गाहे-बगाहे, आते-जाते कहीं न कहीं बस्ती में देखती रही है लेकिन मुझे बरसों बाद देखकर उन्हें आश्चर्य हुआ, ‘‘ओय होय एन्ना बड़ा हो गया है, ये तो ड्रामे वाला कृशन भगवान है। ओय रब्बाँ कितने बरस बीत गये एस नू देख्खे। इन्ना जया होन्दा सी।………. अच्छा तो तुम दोनों से ही मुलाकात की होगी इन्होंने। बार-बार तुम लोगों का जिक्र कर रहे थे कई दिनों से……. मैन्नू ते समझ न आयी केन्दे फिल्म डायरेक्टर आया होया है। वो बड़ी-बड़ी आँखों वाला। ड्रामेवाला कृशन कहते तो मैं फौरन पहचान लेती। ……. भई वा……… पहले तो तुम्हें अक्सर टी.वी. पे देखते थे……पहलवानजी लोगों को आवाज दे देकर बुलाते और दिखाते देखो …….. ये अपना अमर है। ……. बहुत अच्छा किया पुत्तर जो हमें भी मिलने आ गया। सच कहती हूँ मुझे तो बहुत खुशी हुई।…….. ये मास्टरजी भी आज पहली ही बार आये हैं हमारे यहाँ।’’

पहलवानजी और उनकी पत्नी ने हमसे खाना खाकर जाने की हामी भरावाली। पहलवानजी ने मुझसे आग्रह किया कि अब मैं जब भी यहाँ आऊँ, उनके यहाँ ही ठहरूं। उन्होने कहा, उस दिन मुलाकात के बाद जब वो घर आ गये तो उन्हें अफसोस हो रहा था कि उन्होने इतने समय बाद देखा और घर नहीं बुलाया। ये बात उन्होंने कई बार दोहरायी। वह इस बात से बहुत खुश थे, वह बुलाना भूल गये थे, और हम आ गये। हम लोग ये सब बातें कर ही रहे थे कि दरवाजे से आवाज आयी।

‘‘अरे भाई तुम्हें तो ये बुलाना भूल गये थे और हमें तो इन्होंने कभी बुलाया ही नही ….।’’ माँगीराम को अचानक अपने घर के दरवाजे पर देखकर पहलवानजी चौंक गये, ‘‘माँगीराम कैसे आये भाई?’’ – पहलवानजी ने आने का सबब जानना चाहा।

माँगीराम का बूढ़ा चेहरा अभी भी उतना ही भोला है, उस भोले चेहरे से कुछ झुर्रियाँ मुस्करायी, ‘‘निरंजन पहलवानजी तुम्हें चँगा देखकर दिल को तसल्ली हुई, शुकर है भोलेनाथ का – मैं तो एकदम घबरा ही गया था। ऐसा था जी हद तक पहुंच के, मूंगफली का ठेला शटिंग के लिये घुमा ही रहा था कि ऊपर नजर गयी, लगा जैसी किसी गलत जगह आ गया हूँ। चारो तरफ नजर घुमा कर देखा तो जगह सही निकली। कई बार ऊपर आसमान में देखा, तो लंगोट नजर नहीं आया, आँधी तूफान में भी आपका लंगोट तो कभी हटा ही नहीं था फिर आज क्या हो गया। काफी देर तक नीचे खड़ा सोचता रहा- फिर रहा नहीं गया, मन से दुआ की, भगवान मेरा रकीब मुझे तंदुरूस्त मिले और बिना तेरे मिजाज की परवाह किये कि तू बिन बुलाये मेहमान के साथ कैसे पेश आयेगा मैं कोठ्ठे पर चढ़ आया।’’

निरंजन ने माँगी को अपने गले से लगा लिया, ‘‘माँगी तुझे अपने घर पर देखकर मुझे कितनी खुशी हो रही है यह मैं बयाँ नहीं कर सकता। पहली बार तू आज मेरे घर आया है…….।’’

माँगीराम को उम्मीद नहीं थी कि निरंजन उसे इतने तपाक और प्यार से गले लगायेगा। उसने सहज भाव से डरते-डरते मूंगफली का थैला उसे पकड़ा दिया, ‘‘पहले तो मैं पशोपेश में रहा कि जाऊँ कि न जाऊँ, जब फिर आने के लिये सोच लिया तो लगा कि पहली बार पहलवान के घर जा रहा हूँ, खाली हाथ कैसे जाऊँ – ये मूंगफली रख लीं – चल पेलवान अपने वक्त का ये भी बदाम है, ले सेहत बना लेना……।

दोनों को गले मिलते देख हम सभी के आँख में आँसू छलक पड़े, उनकी आँखें भी भीग कर नये रिश्तों की तर्जुमानी कर रही थी। निरंजन, एक पहलवान से किसी दार्शनिक में परिवर्तित होता नजर आ रहा हैं, ‘‘माँगी तू जीत गया मैं हार गया…..कोई घर, अपना वतन दाँव पर नहीं लगा सकता – यही देखना था मुझे और यही जताना था मुझे।’’

माँगी ने निरंजन का हाथ अपने सिर पर रखते हुए कहा, ‘‘बड़ा सख्त इम्तिहान लिया है तूने बड़े भाई का और मुझे उसमे पास भी कर दिया – बड़े भाई दुश्मनाँ दे दिल मिलदे किन्ने साल लग गये………. देख, न ए घर तेरा है न ओ घर मेरा हैं। ये बस्ती है न, ये पूरी तेरी है और पूरी ही मेरी है क्योंकि जो हद लगा रखी थी तूने जमीन और आसमान में, वह आज से खतम हो गयी।’’

उन्हें इस तरह मिलते देख सबको आश्चर्य हो रहा है। मैं यहाँ कोई अद्भूत घटना होते देख रहा हूँ – पूरी जिन्दगी बैसाखी लगाये चलते रहे और आज अभी बैसाखी को हटाते ही डगमग करते वे लोग संभलकर खड़े हो गये और उन्हें अभास होने लगा है कि वो अधूरे और कमजोर नही है। मैं भी उनमें अपनेपन की उस छिपी शक्ति के दर्शन कर रहा हूँ।

लक्ष्मी निरंजन की पत्नी अपने पल्लू में कुछ छिपाये प्रतीक्षा कर रही थी, ‘‘आप लोगों का भरत मिलाप खत्म ही नहीं होने में आ रहा है……….।’’

सबका एक जोरदार ठहाका लगा। माँगी के बूढ़े झुर्रीदार चेहरे में से जैसे कोई बच्चा खिलखिला उठा, ‘‘भाभी, पहलवान जरा मोटी अकल के होते हैं माफ करना…….।’’

लक्ष्मी ने पल्लू हटाकर गुड़ की डली दोनों के मुंह में डाली और माथे पर नजर का टीका लगाते बोली – ‘‘दोनों भाइयों को हमारी नजर न लगे……. भगवान जानता है, आज मुझे कितनी खुशी है। जबसे हम पाकिस्तान से आये आज पहली बार यहाँ सब कुछ अपना लग रहा हैं। अब तो मैं कहती हूँ – रब सबदी उम्राँ सौ साल होर वधा (बढ़ा) दे। सच आज दा दिन बड़ा शुभ हैं। आज पहली बार माँगी साड़े (हमारे) घर आया और ये अमर ते मदन भी पहली बार ही आये ने।

माँगी ने एक नजर मुझ पर डाली, वह मुझे पहचानने की कोशिश कर रहा था – मेरा नाम सुनते ही एकदम चौंक गया, ‘‘अमर ? ओ हो हो……. वही मैं कहूँ ये चेहरा कुछ पहचाना-सा लग रहा है। अपना वह ड्रामे वाला अमर है…..?’’ -यह कहते हुए वह उठा और मुझे गले लगा लिया, ‘‘पच्चीस साल तो हो गये होंगे शायद, वाह भगवान भौलेनाथ क्या लीला है तेरी, यहाँ ऊपर न आता, तो शायद मुलाकात ही न होती……… इसे तो हम अक्सर याद करते हैं…….. एक बार क्या हुआ …… मैंने ठेके के पास पकौडे का धन्धा शुरू किया, एक मैगजीन का कागज फाड़ के उसमें पकौड़े दे ही रहा था कि मैंने इन बाबूजी का फोटो देखा – पकौड़े निकाल के वह कागज मैंने धर लिया और दूसरे में ग्राहक को पकौड़े दे दिये। मैगजीन का पूरा पन्ना था – बड़ी तारीफ छपी थी, पूरी हिस्ट्री थी अपने अमर की। वह कागज मैंने सैकडो लोगो को पढवाया, एक गते पर चिपका कर घर मे टाँगा – फिर पता नहीं कहाँ चला गया……… भई आज में बहुत खुश हूँ ……. ये मदन मास्टरजी तो कभी कभार मिल जाते हैं, लेकिन अपने अमर को देखे तो जमाना गुजर गया…… ये समझ लो…..बचपन में देखा था जी…….।’’

मुझे आश्चर्य हुआ ये जानकर कि ये व्यक्ति इतने आत्मीय हैं। बचपन में मैंने इन्हें देखा भर था, कभी बात नहीं हुई थी। फिर तो बहुत सारी बाते हुई। बचपन में मेरे द्वारा खेले गये नाटक अभी तक याद हैं इन्हें। मैं अपने अंदर-अंदर महसूस कर रहा था कि मैंने उस दिन इन्हें देखकर भी, इनसे मिलने की बात नहीं सोची थी – कुछ ही देर मे हमारी आवभगत शुरू हो गयी, उस बूढ़ी माँ ने मिठाइयाँ, पकवान हम सबके सामने रख दिये – उनमें न जाने कहाँ से इतनी स्फूर्ति आ गयी की हर काम भाग-भाग करने लगी। इस बीच शायद माँगीराम भूल गये थे कि उनका मूँगफली का ठेला नीचे अकेला खड़ा है।

अचानक दरवाजे पर खडे़ कुछ लोगों की हँसी ने हम सबको आकर्षित किया। निरंजन पहलवान उठ खड़े हुए, ‘‘क्या बात है भई कौन हो तुम?’’

दरवाजे पर खड़े लोगों में से एक आगे बढ़ा मसला समझाने, ‘‘…… कुछ ना जी, वह बात ऐसी है जी कि हम मूँगफली लेने आये। काफी देर इंतजार किया, तभी किसी ने बताया मूँगफली वाले पहलवानजी ऊपर गये हैं – फिर ऊपर नजर दौड़ायी तो लंगोट नदारत। बात करते-करते कई लोग नीचे इकट्ठा हो गये। हम तो देखने आये कि कहीं पहलवानों की ऊपर कुश्ती तो न हो रई हैं। यहाँ देखे तो कुछ ओर ई (और ही) नजर आ रया (रहा) है। ये दुसमन (दुशमन) तो गले में हाथ डाले मिठाई खा रहे हैं। निरंजन पहलवान ने एक मिठाई की प्लेट उन महाशय की ओर बढ़ाते हुए अपनी सफाई पेश की, ‘‘ऐसा है पहले आप मिठाई खालो जी……..लो लो – हाँ आज मैं माँगी पहलवान से हार गया, इसीलिये लँगोट उतार लिया……।’’

-’’हार गये? ……. लेकिन आप……. आप हार गये तो फिर ये मिठाई कैसे बाँट रहे हो!’’ -’’आखिर बात क्या है ?’’ एक दूसरे व्यक्ति ने पूछा।

माँगी पहलवान उठ खड़े हुए बात का उतर देने, ‘‘बात ये है बेटे…….. कि……..पहलवानजी जीत गये, मैं हार गया। मैं जीत गया या पहलवान जी हार गये। दोनों हालत में आप लोगों को फायदा ही फायदा है – जाओ……. हाँ कितने लोग है नीचे…….।’’

-‘‘बीस पच्चीस होंगे……..?’’

-‘‘ जाओ सबको ठेले की पूरी मूँगफली बाँट दो, मैं और पहलवानजी दोनों जीत गये…….।’’ ‘रूको’, निरंजन अंदर गये और पूरी पाँच सेर की भेली (गुड) को लाकर एक लड़के के हाथ में दे दी, ‘‘ये गुड मेरी तरफ से…….. मूँगफली बाँट के ठेला नीचे सीढ़ी के किनारे लगा दियो।’’

गुड़ की भेली लिये युवा आश्चर्य से एक दूसरे को देखने लगे। कुछ भी समझ में न आने पर बोले – ‘‘हमारे लिये तो दोनों पिता समान हैं…….. बुजुर्गो का हुकम हमारे सिर-मात्थे पें। ……… ठीक है जी …….. पर लोग केवें है कि तीस साल से यानी हमारे पैदा होने के पहले से वे आप लोगों की कुश्ती का इंतजार कर रहे हैं। उन सबको जवाब आप लोग दे देना। बाकी हम खुशी मना लेते हैं। अजीब ही कुश्ती हुई जी, दोनों पहलवान जीत गये और दोनों ई (ही) हार गये। हार में भी खुश और जीत में भी खुश …….चलो भाई चलो ……..।’’

मैं अपने मन में सोच रहा हूं। ये सिर्फ इन्हीं लोगों की बात नहीं है ये बस्ती ही ऐसी है। अब आप सबसे जानना चाहता हूँ कि कैसी है मेरी बस्ती ?

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(यह रचना नवनीत, भारतीय विद्या भवन मुंबई में अप्रैल 2002 में पहली बार धारावाहिक के रूप में प्रकाशित हुई, उसके बाद मुम्बा शक्ति नवी मुंबई, से धारावाहिक रूप से प्रकाशित)

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