Snatani


सनातनी

अमर स्नेह   

अनुआ ने ढोल नपीरी की आवाज सुनी तो चन्द्रो से हाथ छुड़ा कर भाग गया, टोकरी-झाडू रख वो उसके पीछे भागी लेकिन वो हाथ कहाँ आने वाला था।

छःसात बरस का एक बच्चा नई पोशाक और टोपी पहने लोगों के बीचों-बीच बड़ी शान से चल रहा है, ढोल नपीरी बज रही है। अनुआ कुछ दूर के फासले से उस हमउम्र बच्चे पर नज़र गड़ाए टोली के साथ-साथ चलने लगा। बच्चा दूर के एक गाँव से पंडित दयाशंकर शर्मा की पाठशाला में भर्तीं होने जा रहा है। उसके साथ उसका पूरा परिवार है और कुछ गाँव के लोग भी है।

अनुआ कुछ देर तो टोली से दूर-दूर चलता रहा फिर मौका पाते ही वो भीड़ में घुस गया और ऐसे चलने लगा जैसे ये जश्न उसके लिए हो रहा है।

बीस-पच्चीस मील के इलाके में अगर कोई लिखा-पढ़ा मिल जाय तो समझलो उसने पन्डित दयाशंकर जी की पाठशाला से ही शिक्षा प्राप्त की है। उनके इस विद्यालय में मुहूर्त दिखवा कर कभी भी प्रवेश लिया जा सकता है।

टोली, ढोल-नपीरी के साथ बच्चे को पूरे कस्बे में घुमा चुकी है और अब पाठशाला की ओर अग्रसर है। अनुवा मौका पाकर पाठशाला में प्रवेश पाने वाले बच्चे के साथ-साथ चलने लगा। चन्द्रो पास के ही घरों के सामने नाली साफ कर रही थी, उसकी नज़र जब अनुआ पर पड़ी तो उसकी साँस गले में ही अटक गई। वो उसकी तरफ भागी तभी बच्चे के चाचा ने अनुआ को साथ चलते देख लिया, वो यहाँ का स्थानीय बाशिन्दा है उसने अनुआ को पहचान लिया – उसके हाथ में छड़ी थी उसने खिसिया कर अनुआ को ऐसी जड़ी की वो किकियाता हुआ एक तरफ जा खड़ा हुआ। तभी उसकी माँ ने भी उसे पकड़ कर थप्पड़ो से उसकी ताजपोशी कर दी। लड़के का चाचा चन्द्रो पर बमक पड़ा, ‘‘ अरी ओ कुजातन सरम न आती तुम लोगों को किसी के धरम-करम की परवाह है कि न…….. बड़े दिन लग रए है चल ले जा इसे। ’’

मंडली आगे निकल गई तो चन्द्रो ने बिलखते हुए अनुआ को अपनी छाती से लगा लिया, उसे प्यार करने लगी। अनुआ सिसकते हुए अपनी माँ की आँखो में देख उससे पूछने लगा, ‘‘ मुझे क्यों मारे हैं सब……….माँ…….. माँ तू मेरे नए कपड़े कब सिवावेगी – मैं भी बाजे के साथ पाठशाला में जाऊँगा………। ’’ माँ ने उसे अपनी छाती से जकड़ लिया, उसने अपनी दहाड़ को पल्लू में कैद कर लिया – तभी किसी भागीरथ ने पथराए ख्वाबों पर प्रहार किया और कोई सनातनी कलकल करके चन्द्रों की आँखों से बह निकली।

मुहुर्त में अभी समय है। टोली बाहर के चबूतरे पर प्रतीक्षा कर रही है। गुरू जी अंदर के घेर में पढ़ा रहे हैं। प्रवेश पाने वाले बच्चे का पिता और चाचा भी इसी पाठशाला के विद्यार्थी रहे हैं। पाठशाला छोड़ने के बाद आज पहली बार यहाँ आए हैं, उनमें अजीब सी उमंग है – वो साथ आए लोगों को पाठशाला के विषय में बता रहे है। – ‘‘बिलकुल पाठशाला वैसी की वैसी है, छप्पर मुझे लगे है तभी के पड़े हुए हैं……… इस हाल के पीछे दो और कमरे है एक में गुरू जी पड़े हैं (सोते आराम करते हैं) और दूसरे में खाना बने है। – पिच्छे (पीछे) बहोत बड़ा घेर है कई पेड़ हैं, बचपन में बड़े जामण खाए इस पेड़ के – स्कूल के पिच्छे जंगल ही जंगल, आग्गे जाके पहाड़ी सुरू हो जावें हैं – यहाँ फीस न ली जात्ती, ये मिट्टी कें चार कूंडे से जो धरे हैं इसमें लोग-बाग श्रद्धा से आट्टा, दाल, अनाज और कोई-कोई अधन्ना, इक्कन्नी पैसे भी डाल जावे है…. बस उसी से गुरू जी का गुजारा चले है। चारों वेदों का ज्ञान है पन्डित पे, संस्कृत, हिन्दी, गणित, इतिहास, ज्योतिष-शास्त्र सबमें पारंगत हैं – अंगे्रजी, फारसी भी जाने है गुरू जी। इनके पढ़ाए आज बेरिस्टर तक हो गए……..।’’

– इनकी लिखी संस्कृत की कई किताबें हैं – बनारस के कई पन्डित सास्त्रार्थ के लिए नेबता दे के जावें हैं बड़ी मानता है इनकी……… क्यों जी भाई साब सामने बड़ी बिल्डि़गं नज़र आ रई है पहले तो न थी……… बच्चे के पिता ने स्थानीय सज्जन से पूछा।

– वो घसीट्टे बाब्बा की समाद्धी (समाधी) है।

– हाँ मैं जब यहाँ पढ़ू था एक बाब्बा की झोपड़ी सी थी इधर कू……. गान्जे की चिलम का परसाद देवे था वो……..।

– हाँ बस बस वोई……… वो कहीं से, केंवें हैं वो दिल्ली के पास से एक सेठानी कू ले आया था चेल्ली बनाके – दस सेर तो पक्का सोन्ना (सोना) था उस पे, बड़ा माल लेके आई थी वो – पक्के कोठ्ठे तो तिबी (तभी) बणं गए थे……… केवें है बाब्बा जी बिरम महूरत (ब्रह्म-महूर्त) में ध्यान करें थे……  एक दिन घसीट्टे बाब्बा अपनी कुटिया में ध्यान में बेठ्ठे और सुबह कू लोगों ने देख्खा तो बाब्बा की जगह गेन्दे के फूल मिले – बस तबी से हर सोमवार को समाद्धी पे गान्जा चिलम चढ़ाके भंडारा होवे है और साल में एक बार मेल्ला भरे है – ग्यारह एकड़ जमीन किसी ने दान की अभी और कसबे के सेठ लोग वहाँ संगमर की समाधी और मन्दिर बनवा रए हैं……..।

इसी बीच गुरू जी की खडाऊं की चट्ट-चट्ट सुनाई दी तो लोग स्तब्ध हो गए। गुरू जी बाहर आए तो पैर छूने की लोगों में होड़ लग गई, कुछ लोगों साष्टांग प्रणाम किया और गुरू जी ने ‘‘ स्वस्ती कल्याण भव ’’ कह कर प्रत्येक को आर्शीवाद दिया। बड़ा प्रभावशाली व्यक्तित्व है गुरू जी का, ताम्र वर्ण, गहरी लम्बी आँखें, नुकीली नाक, उन्नत ललाट पर चंदन का लेप, गले में जनेऊ, मुन्डे सर पर लटकती लम्बी चुरिया, ओजस्वी बाणी, धोती और बन्डी का लिबास।

पुराने शिष्यों से भेंट कर वों प्रसन्न लग रहें है। विधिवत पूजन के साथ बच्चे की दीक्षा की गई और पाठशाला में प्रवेश कराया गया। गुरू जी ने बच्चे का हाथ पकड़ कर तख्ती पर वर्ण माला का पहला अक्षर लिखवाया, बोलो अ से अक्षर। बच्चे ने दोहराया। गुरू जी ने अक्षर की तर्जुमानी की। अक्षर का अर्थ होता है ब्रह्मा, विष्णू, महेश – अविनाशी, मोक्ष, तपस्या, धर्म। अक्षर को जो समझ पाए उसके लिए हर विद्या अगूढ़ हो जाती है…………..।

बच्चे ने गुरू जी के चरण धोए – माथा टेका और गुरू जी ने ढेर सारे आर्शीवाद अर्पित किए। गुरू-दाक्षिणा में गुरू जी को धोती, अंगोछा, थाली के साथ सवा रूपया दिया गया। बताशे बाँटे गए।

चन्द्रो बस्ती के काम से फारिग हो, नहा-धो कर सफाई के लिए पाठशाला पहुँच गई और आज तो उसे नेग की भी उम्मीद है, पाठशाला में आखरी पीरियड सदुपदेश का होता है। वो अक्सर इस समय तक पहुँच जाती है। अनुवा भी उसी के साथ होता है। नए विद्यार्थी के परिवार के लोग अभी रूके हुए छुट्टी की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

चन्द्रो पिछले दरवाजे से ही अंदर आती है और वहीं दरवाज़े पर ही स्कूल की झाडू आदि रखा रहता है पर आज नेग की उम्मीद में मुख्य द्वार पर आ खड़ी हुई तो झाड़ खानी पड़ी। उसने नेग की याचना की तो लड़के का चाचा भड़क गया, ‘‘अरे तूने सुनी ना पेल्ले (पहले) चौंतरे से निच्चे (नीचे) उतर जा…….. सुसरे बेशर्म हो रए हैं दूसरो का धरम – करम बिगाड़ने आ जावें हैं……. चल निच्चे………।’’

चन्द्रो अनुआ को लेकर चौंतरे से नीचे उतर गई, चाचा ने चार-पाँच बताशे उसके पल्लू में हाथ ऊपर करके डाल दिए। लड़के के पिता ने भी दो पैसे का सिक्का उसके पल्लू में दूर से फैंक दिया, ‘‘चल बस जा। ’’

चन्द्रो ने अनुआ को आगे करते हुए आग्रह किया, ‘‘अजी बच्चे को भी तो दो।’’ अनुआ ने डरते-डरते हाथ फैलाया। चाचा ने ऊपर से तीन-चार बताशे उसके हाथ पे डाले और वो हाथ से लग कर नीचे नाली में जा गिरे – अनुआ निराश सा देखता रह गया। चाचा ने चौंतरे पर से अनुआ को आदेश दिया, ‘‘ अबे ठाले ’’ (उठा ले) – बेबसी से वो नाली के किनारे बताशे देखता रहा तो चन्द्रो दबी अवाज में बोली, ‘‘जाने दे गिर गए तो गिर गए, ये ले।‘‘ उसने अपने पल्लू के बताशे उसकी जेब में डाल दिए।

गुरू जी द्वारा बोले गए अमृत बचनो को सभी बच्चे ज़ोर-जोर से दोहरा रहे हैं। पूरे वातावरण में अमृत बचन गूंज रहे है। ‘‘ बोलो धर्म की जय ’’ – ‘‘ अधरम का नाश हो ’’- ‘‘ सत्य की विजय हो ‘‘- ‘‘ विश्व का कल्याण हो ’’- ‘‘ धर्म की रक्षा हो ’’- ‘‘ ज्ञान का प्रसार हो ’’- ’’असत्य बोलना पाप है। ’’- ‘‘ चोरी करना पाप है ’’- ‘‘ बोलो वेद भगवान की जय’’ – ‘‘ ज्ञान की जय, विश्व गुरू भारत की जय………। ’’

बच्चों की छुट्टी हो गई तो चन्द्रो ने पूरी पाठशाला की झाडू बुहारी की। अनुआ सहमा-सहमा पूरी पाठशाला को देख कर क्या महसूस कर रहा है, शायद कोई समझ न पाए। वो खोया हुआ सा खड़ा था तभी चन्द्रो ने उसे घर चलने के लिए कहा, ‘‘ चल बेट्टे (बेटे) हो गई सफाई। ’’

चन्द्रो के जाने के बाद गुरू जी ने पानी भरे लोटे में गँगा जल की कुछ बून्दे टपकाई और मन्त्रोच्चार के साथ पूरे स्कूल में छींटे मार के रोज की तरह फिर से शुद्ध कर दिया।

इन तीन चार वर्षो में यहाँ कोई ज्यादा परिवर्तन नहीं आया, कुछ नए बच्चे पाठशाला में और आ गए हैं और कुछ ने पाँचवीं के बाद पढ़ना छोड़ दिया है, शायद उनकी बुनियादी जरूरतों के लिए इतना ही पढ़ना पर्याप्त था कि वो हिन्दी पढ़ना-लिखना सीख भर जाएँ और अपने-अपने पुश्तैनी कार्यो में लग जाएँ। धन्दों के गुर फिर वो परम्पराओं के स्त्रोतो से हासिल कर, सामाजिक चक्र में स्थापित हो ही जाएँगें। शायद इसी लिए हमारे अंदर सभ्य समाज की संस्कृति पनप नहीं पाई और प्रश्न चिन्ह से आगे नहीं बढ़ी।

इस पाठशाला में एक परिवर्तन अवश्य दीख पड़ता है कि पहले बच्चे अपने-अपने साथ टाट बोरी के आसन लेकर आते थे बैठने के लिए लेकिन अब पाठशाला की पट्टियों पर बैठते हैं।

अनुआ अब चन्द्रो के साथ नहीं जाता, वो वाठशाला के पिछले दरवाज़े पर ही बैठा रहता है। वो टूटे दरवाज़े के फांफर से पाठशाला के अंदर झाँकता रहता है। आधी छुट्टी में उसकी भी इच्छा होती है कि वो पाठशाला के बच्चों के साथ खेले लेकिन एैसा हो नहीं पाता। हाँ, पाठशाला के बच्चों की गेंद नाली में या जोहड़ में चला जाय तो अनुआ की मदत ज़रूर लेते हैं – इससे उसे थोड़ी सी खुशी ज़रूर मिलती है। कभी-कभी वो अनुआ को जामुन के पेड़ पर चढ़ा, डालो को बंदर की तरह हिलाने को कहते है और जामुन बीन कर वो लोग तो पाठशाला के अंदर चले जाते हैं और अनुआ फिर पिछले दरवाज़े पर जाकर बैठ जाता है।

चन्द्रो नहा धोकर पाठशाला की सफाई करने आती है तो वो उसे यहीं मिलता है। अनुआ को सबसे ज्यादा खुशी तब मिलती है जब उसे अपनी माँ के साथ स्कूल के अंदर आने को मिलता है। वो पाठशाला की हर चीज़ को बड़े कौतुहल से देखता कभी-कभी माँ से पूछ बैठता है ‘‘ अरी माँ ये किस बाब्बा जी का फोट्टो (फोटो) है? ’’

– ये गाँधी बाब्बा जी हैं।

– अच्छा तो ये वो है…….. इसी ने देस आजाद करवाया…….. बहुत काम के बाब्बा जी हैं ये, पन्डित ने कई कहानी सुनाई इनकी……. घर चल के सुनाऊँगा।……. अरी माँ इन पट्टियों पे लाइन से बच्चे बैठे हैं छोटे आग्गे (आगे) बड़े पिच्छे (पीछे)…….. अरी सुन मैं पट्टी पे बेट्ढूं (बैठूगाँ) – मैं पट्टी पे बेठ रया हूँ तू पन्डित जी बनके पढ़ाइओ……..।

– अरे रेन दे (रहने दे) देख, हम पट्टी पे न बैठ सकते।

– क्यूँ न बैठ सकते ?

– बस न बैठ सकते तो न बैठ सकते…….. जिद मत न करे। कल पन्डित जी ने जिद के पीछे एक बच्चे की पिटाई की थी ओर (और) क्या कहा था………….।

– कहा था अच्छे बच्चे जिद न करते। ……….जान दे (खैर जाने दे)…….अरी माँ देख-देख, ये किताब पड़ी है यहाँ, बड़े फोटू है इसमें – इसे छिपा के धर ले, घर चल के देखेगें मैं सब पढ़ के बता सकू हूँ……।

– हाँ! बड़ा ज्ञान्नी (ज्ञानी) हो रया है सब पढ़के बता देवेगा ।

– अरी रख तो ले….. ले रखले।

– बहुत दिनो से ऐसेई पड़ी है, ये कहते हुए चन्द्रो ने किताब अपने पल्लू में छिपा ली और कूड़ा समेटने लगी।

पन्डित जी लोटे में जल लिए प्रतीक्षा कर रहे थे, उन्होने उनकी पूरी वार्ता तो सुन ही ली थी खिड़की की आड़ से, चन्द्रो को किताब पल्लू में छिपाते भी देख लिया था। क्रोध से उनकी त्योरियाँ चढ़ गई – वो दो कदम आगे बढ़े लेकिन कुछ सोच कर रूक गए। सोचने लगे नीच जात है कहीं चोरी पकड़े जाने से फैल न मचा दें, उनके चरित्र पर अकारण ही लांछन लग जाएगा। लेकिन वो अवसर मिलने पर चोरी की बात तो कह ही डालेगें……. आज उसने छोटी सी चीज़ चुराई है, कल को………. सारा कुछ तो यूँ ही खुला पड़ा रहता है रूपया पैसा भी………। – रह रह कर उनमें शंकाएँ उभरने लगीं, ये तो प्रत्यक्ष उन्होने अपनी आँखों से देखा है क्या पता पीछे क्या-क्या चीज़ ले गए होगें ये लोग – वो आज ही अपनी सभी कीमती चीज़ो का मुयाना करेगें, बरसों से उन्होने अपना बक्स नहीं खोला है जिसमें माँ की यादगार के गहने रखे है। उन्हे तो अब अनुआ के पिछले दरवाजे पे बैठे रहने पर भी कोई भारी साजिश नज़र आने लगीं।

चन्द्रो ने कूड़ा समेट के अनुआ को अपने पास बुलाया। शायद इस बीच उसमें भी मानसिक द्वन्द चलता रहा होगा। उसने अनुआ को दुलारते हुए पूछा, ‘‘ये बता तेन्ने (तूने) पन्डित जी की शिक्षा सुनी है कि न… वो न… केत्ते है (कहते है) कि चोरी करना पाप होता है।’’

– हाँ, ये मुझे याद क्यों न रया, चोरी करना पाप होत्ता है, असत्य बोलना पाप होत्ता है, असत्य का मतलब होत्ता है झूठ।……… ला माँ मैं ये किताब वहीं धर देत्ता हूँ।……..उसने चन्द्रो से किताब लेकर वहीं रख दी जहाँ से उठाई थी, ‘‘माँ तू मेरे कान पकड़ के थप्पड़ लगा ताकि मुझे याद रहवे कि चोरी करना पाप होत्ता है, मैं अब किसी की कोई चीज न चुराने का, चाहे सोन्ना ही क्यों न पड़ा हो हाथ न लगाने का।’’

चन्द्रो उसकी बातें सुन कर आश्चर्य चकित हो गई उसने प्यार से उसके गाल पर थपकी दी, ‘‘ तू इतना समझदार है मैने कभी सोच्चा भी न था। ’’ वो चन्द्रो से लिपट गया।

पन्डित जी ने यह सब देखा तो स्तब्ध रह गए। चन्द्रो कूड़ा उठा पन्डित को हाथ जोड़ चली गयी अनुआ को लेकर। – अचानक पन्डित जी के विचारों की तन्द्रा टूटी तो उन्हे आत्मग्लानी होने लगी। अगर थोड़ा धैर्य और संय्यम ना बरता होता तो ? – आज जिस सत्य का साक्षात्कार उन्होने किया उससे वो कभी परिचित न हो पाते। चन्द्रो के जाने पर वो हमेशा गँगाजल से पूरी पाठशाला और दिशाँए शुद्ध किया करते थे। अचानक उन्होने गँगा जल भरा लोटा जो उनके हाथ में था अपने सर पर उड़ेल लिया और मन ही मन ईश्वर से प्रार्थना की, ‘‘ हे प्रभू मेरा मन – अंतर पवित्र करो, मेरी दृष्टि मेरे विचार शुद्ध करो, मेरा ज्ञान निर्मल करो। उन्हे स्वयं का अनुभव ही किसी सच्चाई का निर्विवाद आधार लगने लगा, स्वतः की अनुभूति से किसी प्रकाश को वो बहुत समीप पा रहे है, उन्होने महसूस किया कि उनकी शास्त्रों की विद्यत्ता, धर्मशास्त्र – वेद – वेदांग – वेदान्त और साहित्य के ज्ञान का गुमान आज चूर हो गया है। आज उन्हे किसी जकड़न से मुक्ति मिल गई है। उनमें किसी विशेष चैतन्य सत्ता का प्रत्यक्ष संचार हो रहा है और उन्हे एक एैसे अनुभव-बिन्दु की प्रतीति हो रही है, जहाँ मनुष्य समान है, केवल मन, विचार और धारणाएँ मलिन है।

लम्बी कमीज लटकाए घूमने वाला अनुआ आज पहचान में ही नहीं आ रहा। उसने आज नहाकर लाल चैकड़ी वाली बुशर्ट और नेकर पहनने की जि़द की और उसकी माँ ने उसे वो कपडे़ पहनने को दे दिए। कुछ दिन पहले ही जोंन की माँ ने ये सूट चन्द्रो को अनुआ के लिए दे दिया था। जोंन ने एक आध बार ही उसे पहना था, वो सूट उसे छोटा हो गया था। लेकिन अनुआ को बिलकुल ठीक आ गया। दरअसल उसने कल गुरू जी को ये कहते सुन लिया था कि कल गुरू पूर्णिमा है सब बच्चे साफ और अच्छे कपड़े पहन कर आएँ – सब को गुरू फेरी पर जाना होगा। उन्होने पाठशाला से बच्चो को चट्टे (रास खेलने की डाँडी) भी दिए और खेलना भी सिखाया। अनुआ ने भी कहीं से दो डन्डो का जुगाड़ कर लिया था।

पूरे दिन गुरू जी के साथ चट्टे खेलती बच्चों की टोली घर-घर जाती और वहाँ गुरू जी का सम्मान किया जाता और दक्षिणा दी जाती। – पूरे दिन अनुआ दूर ही दूर रहा। जब भी कभी उसने टोली में शामिल होने का प्रयास किया तो किसी न किसी बच्चे ने उसे धक्का देकर बाहर निकाल दिया। – शाम होने को है कुछ ही घर बाकी रह गए हैं।

अगला घर लाला जी का है बहुत बड़े जाने-माने धनी व्यक्ति है इस इलाके के। इनका लड़का विपिन पाठशाला में ही पढ़ता है। – काफी देर से यहाँ प्रतीक्षा की जा रही है। आते ही गुरू जी के चरण धोये गये, हार-फूल से स्वागत कर गुरू जी को दक्षिणा अर्पित की गयी। लाला जी बड़े प्रसन्न नज़र आ रहे हैं, उन्होने नौकर से परात लेकर अपने हाथ से बच्चों को मिष्ठान बाँटना शुरू कर दिया। अनुआ भी इसी टोली में शामिल हो गया। अनुआ को देख विपिन चिल्लाया, ‘‘ अजी ये चन्द्रो का अनुआ बीच में घुस गया। ’’ लाला जी ने उसे देखकर पूछा, ‘‘ चन्द्रो का…….उस सफाई वाली का है ? अनुआ के ‘‘ हाँ जी ’’ कहते ही लाला जी भड़क गये, उनकी त्योरियाँ तन गई, ‘‘ तू कैसे आया इन बच्चों के साथ और तुझे नए कपड़े किसने पहनाए….?’’ लाला जी गुस्से में जैसे पागल हो गए, ‘‘तुम लोगों कू दिन लग गये हैं तम वी (तुम भी) नये-नये कपड़े पहरोगे तो हमारे बच्चों में और तुम लोगों में फरक क्या रह जायगा?’’ भारी भरकम लाला जी अनुआ पर टूट पड़े और उन्होने दाँत पीसते हुए अनुआ की नई पोशाक को चीथड़ों में तब्दील कर दिया और ज़ोर-ज़ोर से चीखने लगे ‘‘कमजातो तुम्हे सिर्फ उतरे हुए कपड़े पहनने हैं, धर्म ने तुम्हें सिर्फ इसी की इजाज़त है – समझे। उतरे कपड़े पहनना और झूठा खाना यही धर्म है तुम्हारा।’’

इससे भी उन्हे शान्ति नहीं मिली तो उन्होने अनुआ को ऐसी लात मारी कि वो तड़प कर रह गया……। अनुआ दर्द से आहत तड़प रहा है और आस-पास खड़े छोटे-बड़े सभी उसकी खिल्ली उड़ा रहे हैं। गुरू जी ने दान-दक्षिणा वाला बोझ उतार फैंका और अनुआ को उठा अपने वक्ष से लगा लिया। लगता है वे अपने क्रोध को पी रहे हैं, वो अनुआ की चोट को सहलाने लगे, उन्होने उसके आँसू पोंछे और उनकी स्वयं की लाल आँखों में आँसू छलक पड़े। – पूरे वातावरण में चुप्पी छा गयी। केवल अनुआ की घुटन भरी सिसकियाँ ही वातावरण में सुनाई दे रही हैं।

निःशब्द गुरू जी की नम आँखों में कोई प्रश्न-चिन्ह टूटता है और फिर अपना आकार ग्रहण कर लेता है।

लाला जी ने जैसे अधर्म के खिलाफ मुहिम छेड़ दी। उन्होने बहुत से सम्मानित व्यक्तियों को जमा किया और गुरू ब्रह्मचारी जी की मनोदशा ठीक करने पाठशाला पर आ धमके। लेकिन उन सबकी आँखे खुली की खुली रह गयीं, जब उन्होने पाठशाला के मुख्य द्वार पर यह लिखा पाया, ‘‘इस पाठशाला को सदा के लिए बंद कर दिया गया है।’’

कुछ देर मंत्रणा करने के बाद वो लोग पीछे के द्वार से पन्डित जी के निजी कक्ष में पहुँचे। गुरू जी मौन, ध्यान मग्न आसन पर बैठे थे। लोगों की उपस्थिति का ज्ञान होते ही उन्होने एक व्यक्ति को पास बुलाया और एक कागज पर लिखकर उसे दे दिया कि उन्होने मौन व्रत धारण किया हुआ है और साथ अन्न-जल त्याग कर प्रायश्चित कर रहे हैं। उन्होने आग्रह किया है कि उन्हे अब एकान्त में छोड़ दिया जाय।

उन लोगों ने सोचा चलो इन्हे अपने आप ही अपनी गलती का अहसास हो गया है, तो उन्होने उनसे व्रत तोड़ने का आग्रह किया, लेकिन पन्डित जी अपनी हठ पर अड़े रहे – उनके अन्न-जल त्याग की बात पूरे इलाके में फैलते देर न लगी – लोगों की भीड़ इकट्ठा होने लगीं – उनके नए पुराने शिष्य भी आये लेकिन उन्होने किसी का भी आग्रह स्वीकार नहीं किया। लोग उनसे प्रश्न करते और वो लिख कर उत्तर दे देते। लोगों में एक दूसरी तरह की हलचल मच गयी जब उन्होने एक प्रश्न के उत्तर में लिखा – कि इस प्रायश्चित करने के पीछे कारण क्या है ? उन्होने बताया कि समाज के अमानवीय आचरण, समाज में व्याप्त रूढि़यों, असमानता, अत्याचार, जातिभेद के लिए हमारी शिक्षा ही जिम्मेदार है। आज जो भी समाजिक विकृतियां नज़र आती है उन सब के लिए वही जिम्मेदार हैं ऐसा उन्होंने स्वयं अनुभव किया है। अतः वे अपराधी है और वो इसका प्रायश्चित करते-करते स्वयं का अंत करना चाहते हैं।

आज तीसरा दिवस शुरू हो गया था। वो बहुत कमज़ोर लग रहे हैं, उनकी आँखे अंदर धंस गई हैं। लेकिन उनमें अद्भुत चमक प्रकाशित हो रही है। जिन लोगों में कुछ विपरीत प्रतिक्रिया हो रही थी वे उनके संकल्प के सामने झुकते प्रतीत हो रहे है। दूर दराज के लोग़ों ने भी आना शुरू कर दिया, जिले के अधिकारीगण भी यहाँ पहुँच गए। वे सब भी गुरू जी से व्रत तोड़ने का आग्रह कर रहे हैं लेकिन लगता है वो अपना संकल्प नहीं तोड़ेगे।

ज्यों-ज्यों समय बीत रहा है उनकी जीवन-ज्योति मद्धम पड़ती जा रही है। शरीर पूरी तरह से शिथिल हो चुका है। जिले के अधिकारी गणों ने शहर के सिविल अस्पताल से बड़े डाक्टर को बुला लिया, जैसे-तैसे करके एंबुलेन्स भी यहाँ तक पहुँच गयी। डाक्टर मुआयना करके स्थिति असमान्य बता रहे हैं। उन्होने बताया कि दो घन्टे में बहुत गम्भीर स्थिति पैदा हो सकती है। गुरू जी ने किसी भी स्थिति में वैद्यकीय सहायता लेने से इन्कार कर दिया। उनकी शक्ति अब चुकती जा रही है और वे बैठ नहीं पा रहे है।

तभी भीड़ से निकल अनुआ अपनी माँ के साथ गुरू जी के कक्ष के सामने पहुँचा और गुरू जी से उनके पास आने की अनुमति माँगी। सहमें, डरे-डरे मलिन रहने वाले लड़के के अभिवादन, शिष्टाचार और वाणी को देखकर गुरू जी आश्चर्य चकित रह गये। उन्होने हाथ के संकेत से उसे अंदर बुलाया। अनुआ ने चरण-स्पर्श करके, वहीं रखे कागज और पेन्सिल को उठाया और कागज पर कुछ लिखने लगा। वे स्थिर एकटक उसकी ओर आश्चर्य से देख रहे हैं। लोगों पर भी इसकी आश्चर्य जनक प्रतिक्रिया हूई – उसको लिखते देख तो अचरज हो ही रहा है लेकिन उसके साहस से भी वह विलक्षण लग रहा है। अनुआ ने लिख कर कागज गुरू जी के चरणों में रख दिया। गुरू जी ने उस कागज को पढ़ा, उनके अंदर किसी अलौकिक चेतना का संचार हुआ और वे उठ कर बैठ गये। कागज पर लिखा था – ‘‘ परम पूज्य गुरू जी , मैं जीवन में पहली बार हाथ में कागज पेन्सिल पकड़ रहा हूँ गलती क्षमा करना। मेरी प्रार्थना है कि आप मौन व्रत तोड़ दें, भोजन और जल ग्रहण करें – यदि आपने एैसा नहीं किया तो यह शिष्य अपने परिवार सहित अन्न-जल का त्याग कर अपने प्राणों को त्याग देगा। आपका शिष्य। ’’

गुरू जी के नेत्रों में उल्लास छलक आया – उनमें गहरी उत्कठा जाग्रत हूई और उन्होने लिख कर पूछा, बेटा तुमने पढ़ना लिखना कब और कहाँ सीखा ?

‘‘पूज्य गुरू आप ही है, पाठशाला के पिछले दरवाजे के फाँफर से चार वर्षो तक धूप, जाड़े में मैने एक से लेकर आठवीं कक्षा तक की पूरी पढ़ाई वहीं की है। सब बच्चे तो अपनी-अपनी कक्षा की पढ़ाई करते थे, मैं रोज एक से आठ तक पढ़ता था क्योकि सभी कक्षाएँ एक साथ एक ही स्थान पर बैठती थीं – कोई बच्चा अगर गलती करता, तो मैं समझता मैं ही गलती कर रहा हूँ। कोई अगर सही उत्तर देता तो मैं समझता में ही हूँ और आप जब समझाते, बताते तो मैं समझता मुझे ही बताया जा रहा है…….. आपने एक बार एकलव्य की कहानी बच्चों को सुनाई थी। उस दिन मैं माँ के साथ था, माँ इंतजार कर रही थी छुट्टी का। मैने तभी सोच लिया था कि मैं भी पढ़ सकता हूँ  सीख सकता हूँ।

गुरू जी ने जिज्ञासावश लिख कर प्रश्न किया, ‘‘ लेकिन तुमने बिना किताब, कलम, तख्ती, कॉपी के लिखना कैसे सीखा ? ’’

– गुरू जी मुझे बहुत दिन बाद पता चला कि पिच्छे (पीछे) की पहाड़ी भगवान जी ने मेरे लिखने के लिए बनाई है। यहाँ से सफाई के बाद, मैं माँ के साथ घर जाता और चूल्हे से लकड़ी का कोयला बीन पहाडि़यों पे पहुँच जाता और खूब लिखता। और फिर अंधे कुएँ में मुहँ करके मैं शब्दों का उच्चारण करता। आपके द्वारा बोले गए शब्दो को याद करके तब तक अभ्यास करता जब तक उच्चारण में आपकी वाणी न सुनाई देने लगती। गुरू जी मैने आज से पहले अपनी पढ़ाई के विषय में किसी को बताया नहीं………..।

गुरू जी पहले तो अनुआ को विस्मित दृष्टि से देखते रहे, फिर उनकी भावभंगिमा में कोई अलौकिक आनन्द परिलक्षित होने लगा। अनुआ में सैकड़ों जमा लेगों को प्रतिभा की साक्षात मूर्ति के दर्शन हो रहे हैं। दूर बैठी अनुआ की माँ का पल्लू भीग गया है।

अनुआ ने अपनी प्रार्थना को दोहराया, ‘‘ गुरू जी आप अन्न-जल ग्रहण करें , हमारी प्रार्थना को स्वीकार करें। ’’

गुरू जी आत्ममंथन की प्रक्रिया में कुछ देर शान्त रहे – फिर एक दम कागज उठाया और लिख दिया। ‘‘ मुझे कभी इतनी प्रसन्नता मिलेगी मैं विश्वास नहीं कर पा रहा हूँ, मुझे तुम पर गर्व है। मैं समाज में विकृत-मानव निर्माण करने का दोषी हूँ, मेरे ही कारण तुम्हारा अपमान होता है, यातनाएँ सहनी पड़ती है, शोषण होता है। समाज के अमानवीय आचरण जो निर्मित हुए है – मैं उसका दोषी हूँ अतः मुझे पश्चाताप करने दो, मेरा संकल्प शायद मुझे कुछ आत्मसम्मान दे सके।’’

अनुआ ने भी परिवार सहित अपने और अपने परिवार के आमरण अनशन की घोषणा कर दी और वहीं सामने बैठ गया। – कुछ देर तक पूरे वातावरण में सन्नाटा छा गया – कुछ देर बाद अनुआ पुनः खड़ा हुआ और उसने गुरू जी को पुकारा। वे शांत भाव से उसकी ओर आकर्षित हुए, ‘‘गुरू जी एक बार कक्षा में आप बच्चों को पढ़ा रहे थे आपने कहा था अगर कोई गलती करता है तो उसे क्षमा कर देना चाहिए। अगर आप ऐसा सोचते हैं कि यह सब आपके कारण हुआ, आप दोषी हैं तो क्या आप अपने आप को क्षमा नहीं कर सकते, आप अपने आप को क्षमा कर दें।’’

गुरू जी सहसा ठहाका मार के हँसे और हँसते ही रहे। उनका कंठ भर आया और उनका मौन व्रत स्वतः ही टूट गया, ‘‘ वत्स तुम्हारे तर्क के आगे मैं नतमस्तक हूँ……….तुम्हारी लगन, परिश्रम और निष्ठा ने हर जगह सिद्धी पायी है और यहाँ भी तुम सफल हुए, एक जीवन को बचाने में।’’

उन्होने उसे वक्ष से लगा लिया। – गुरू जी की प्रफुल्लित आँखों से सनातनी की ममता बह निकली। माँ का हृदय ही ऐसा है, दुख हो या खुशी आँखे भर आती है।

सभी में हर्षो उल्लास की लहर दौड़ गयी, गुरू जी ने अनुआ के हाथों से शर्बत ग्रहण किया।

शाम हो चुकी थी, ढलते सूरज ने आकाश को अनंत रंगों से रंग दिया था और ढलते-ढलते उसने वायदा किया कि वो कल फिर निकलेगा सभी के लिए उजाला लेकर।अनुआ ने ढोल नपीरी की आवाज सुनी तो चन्द्रो से हाथ छुड़ा कर भाग गया, टोकरी-झाडू रख वो उसके पीछे भागी लेकिन वो हाथ कहाँ आने वाला था।

छःसात बरस का एक बच्चा नई पोशाक और टोपी पहने लोगों के बीचों-बीच बड़ी शान से चल रहा है, ढोल नपीरी बज रही है। अनुआ कुछ दूर के फासले से उस हमउम्र बच्चे पर नज़र गड़ाए टोली के साथ-साथ चलने लगा। बच्चा दूर के एक गाँव से पंडित दयाशंकर शर्मा की पाठशाला में भर्तीं होने जा रहा है। उसके साथ उसका पूरा परिवार है और कुछ गाँव के लोग भी है।

अनुआ कुछ देर तो टोली से दूर-दूर चलता रहा फिर मौका पाते ही वो भीड़ में घुस गया और ऐसे चलने लगा जैसे ये जश्न उसके लिए हो रहा है।

बीस-पच्चीस मील के इलाके में अगर कोई लिखा-पढ़ा मिल जाय तो समझलो उसने पन्डित दयाशंकर जी की पाठशाला से ही शिक्षा प्राप्त की है। उनके इस विद्यालय में मुहूर्त दिखवा कर कभी भी प्रवेश लिया जा सकता है।

टोली, ढोल-नपीरी के साथ बच्चे को पूरे कस्बे में घुमा चुकी है और अब पाठशाला की ओर अग्रसर है। अनुवा मौका पाकर पाठशाला में प्रवेश पाने वाले बच्चे के साथ-साथ चलने लगा। चन्द्रो पास के ही घरों के सामने नाली साफ कर रही थी, उसकी नज़र जब अनुआ पर पड़ी तो उसकी साँस गले में ही अटक गई। वो उसकी तरफ भागी तभी बच्चे के चाचा ने अनुआ को साथ चलते देख लिया, वो यहाँ का स्थानीय बाशिन्दा है उसने अनुआ को पहचान लिया – उसके हाथ में छड़ी थी उसने खिसिया कर अनुआ को ऐसी जड़ी की वो किकियाता हुआ एक तरफ जा खड़ा हुआ। तभी उसकी माँ ने भी उसे पकड़ कर थप्पड़ो से उसकी ताजपोशी कर दी। लड़के का चाचा चन्द्रो पर बमक पड़ा, ‘‘ अरी ओ कुजातन सरम न आती तुम लोगों को किसी के धरम-करम की परवाह है कि न…….. बड़े दिन लग रए है चल ले जा इसे। ’’

मंडली आगे निकल गई तो चन्द्रो ने बिलखते हुए अनुआ को अपनी छाती से लगा लिया, उसे प्यार करने लगी। अनुआ सिसकते हुए अपनी माँ की आँखो में देख उससे पूछने लगा, ‘‘ मुझे क्यों मारे हैं सब……….माँ…….. माँ तू मेरे नए कपड़े कब सिवावेगी – मैं भी बाजे के साथ पाठशाला में जाऊँगा………। ’’ माँ ने उसे अपनी छाती से जकड़ लिया, उसने अपनी दहाड़ को पल्लू में कैद कर लिया – तभी किसी भागीरथ ने पथराए ख्वाबों पर प्रहार किया और कोई सनातनी कलकल करके चन्द्रों की आँखों से बह निकली।

मुहुर्त में अभी समय है। टोली बाहर के चबूतरे पर प्रतीक्षा कर रही है। गुरू जी अंदर के घेर में पढ़ा रहे हैं। प्रवेश पाने वाले बच्चे का पिता और चाचा भी इसी पाठशाला के विद्यार्थी रहे हैं। पाठशाला छोड़ने के बाद आज पहली बार यहाँ आए हैं, उनमें अजीब सी उमंग है – वो साथ आए लोगों को पाठशाला के विषय में बता रहे है। – ‘‘बिलकुल पाठशाला वैसी की वैसी है, छप्पर मुझे लगे है तभी के पड़े हुए हैं……… इस हाल के पीछे दो और कमरे है एक में गुरू जी पड़े हैं (सोते आराम करते हैं) और दूसरे में खाना बने है। – पिच्छे (पीछे) बहोत बड़ा घेर है कई पेड़ हैं, बचपन में बड़े जामण खाए इस पेड़ के – स्कूल के पिच्छे जंगल ही जंगल, आग्गे जाके पहाड़ी सुरू हो जावें हैं – यहाँ फीस न ली जात्ती, ये मिट्टी कें चार कूंडे से जो धरे हैं इसमें लोग-बाग श्रद्धा से आट्टा, दाल, अनाज और कोई-कोई अधन्ना, इक्कन्नी पैसे भी डाल जावे है…. बस उसी से गुरू जी का गुजारा चले है। चारों वेदों का ज्ञान है पन्डित पे, संस्कृत, हिन्दी, गणित, इतिहास, ज्योतिष-शास्त्र सबमें पारंगत हैं – अंगे्रजी, फारसी भी जाने है गुरू जी। इनके पढ़ाए आज बेरिस्टर तक हो गए……..।’’

– इनकी लिखी संस्कृत की कई किताबें हैं – बनारस के कई पन्डित सास्त्रार्थ के लिए नेबता दे के जावें हैं बड़ी मानता है इनकी……… क्यों जी भाई साब सामने बड़ी बिल्डि़गं नज़र आ रई है पहले तो न थी……… बच्चे के पिता ने स्थानीय सज्जन से पूछा।

– वो घसीट्टे बाब्बा की समाद्धी (समाधी) है।

– हाँ मैं जब यहाँ पढ़ू था एक बाब्बा की झोपड़ी सी थी इधर कू……. गान्जे की चिलम का परसाद देवे था वो……..।

– हाँ बस बस वोई……… वो कहीं से, केंवें हैं वो दिल्ली के पास से एक सेठानी कू ले आया था चेल्ली बनाके – दस सेर तो पक्का सोन्ना (सोना) था उस पे, बड़ा माल लेके आई थी वो – पक्के कोठ्ठे तो तिबी (तभी) बणं गए थे……… केवें है बाब्बा जी बिरम महूरत (ब्रह्म-महूर्त) में ध्यान करें थे……  एक दिन घसीट्टे बाब्बा अपनी कुटिया में ध्यान में बेठ्ठे और सुबह कू लोगों ने देख्खा तो बाब्बा की जगह गेन्दे के फूल मिले – बस तबी से हर सोमवार को समाद्धी पे गान्जा चिलम चढ़ाके भंडारा होवे है और साल में एक बार मेल्ला भरे है – ग्यारह एकड़ जमीन किसी ने दान की अभी और कसबे के सेठ लोग वहाँ संगमर की समाधी और मन्दिर बनवा रए हैं……..।

इसी बीच गुरू जी की खडाऊं की चट्ट-चट्ट सुनाई दी तो लोग स्तब्ध हो गए। गुरू जी बाहर आए तो पैर छूने की लोगों में होड़ लग गई, कुछ लोगों साष्टांग प्रणाम किया और गुरू जी ने ‘‘ स्वस्ती कल्याण भव ’’ कह कर प्रत्येक को आर्शीवाद दिया। बड़ा प्रभावशाली व्यक्तित्व है गुरू जी का, ताम्र वर्ण, गहरी लम्बी आँखें, नुकीली नाक, उन्नत ललाट पर चंदन का लेप, गले में जनेऊ, मुन्डे सर पर लटकती लम्बी चुरिया, ओजस्वी बाणी, धोती और बन्डी का लिबास।

पुराने शिष्यों से भेंट कर वों प्रसन्न लग रहें है। विधिवत पूजन के साथ बच्चे की दीक्षा की गई और पाठशाला में प्रवेश कराया गया। गुरू जी ने बच्चे का हाथ पकड़ कर तख्ती पर वर्ण माला का पहला अक्षर लिखवाया, बोलो अ से अक्षर। बच्चे ने दोहराया। गुरू जी ने अक्षर की तर्जुमानी की। अक्षर का अर्थ होता है ब्रह्मा, विष्णू, महेश – अविनाशी, मोक्ष, तपस्या, धर्म। अक्षर को जो समझ पाए उसके लिए हर विद्या अगूढ़ हो जाती है…………..।

बच्चे ने गुरू जी के चरण धोए – माथा टेका और गुरू जी ने ढेर सारे आर्शीवाद अर्पित किए। गुरू-दाक्षिणा में गुरू जी को धोती, अंगोछा, थाली के साथ सवा रूपया दिया गया। बताशे बाँटे गए।

चन्द्रो बस्ती के काम से फारिग हो, नहा-धो कर सफाई के लिए पाठशाला पहुँच गई और आज तो उसे नेग की भी उम्मीद है, पाठशाला में आखरी पीरियड सदुपदेश का होता है। वो अक्सर इस समय तक पहुँच जाती है। अनुवा भी उसी के साथ होता है। नए विद्यार्थी के परिवार के लोग अभी रूके हुए छुट्टी की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

चन्द्रो पिछले दरवाजे से ही अंदर आती है और वहीं दरवाज़े पर ही स्कूल की झाडू आदि रखा रहता है पर आज नेग की उम्मीद में मुख्य द्वार पर आ खड़ी हुई तो झाड़ खानी पड़ी। उसने नेग की याचना की तो लड़के का चाचा भड़क गया, ‘‘अरे तूने सुनी ना पेल्ले (पहले) चौंतरे से निच्चे (नीचे) उतर जा…….. सुसरे बेशर्म हो रए हैं दूसरो का धरम – करम बिगाड़ने आ जावें हैं……. चल निच्चे………।’’

चन्द्रो अनुआ को लेकर चौंतरे से नीचे उतर गई, चाचा ने चार-पाँच बताशे उसके पल्लू में हाथ ऊपर करके डाल दिए। लड़के के पिता ने भी दो पैसे का सिक्का उसके पल्लू में दूर से फैंक दिया, ‘‘चल बस जा। ’’

चन्द्रो ने अनुआ को आगे करते हुए आग्रह किया, ‘‘अजी बच्चे को भी तो दो।’’ अनुआ ने डरते-डरते हाथ फैलाया। चाचा ने ऊपर से तीन-चार बताशे उसके हाथ पे डाले और वो हाथ से लग कर नीचे नाली में जा गिरे – अनुआ निराश सा देखता रह गया। चाचा ने चौंतरे पर से अनुआ को आदेश दिया, ‘‘ अबे ठाले ’’ (उठा ले) – बेबसी से वो नाली के किनारे बताशे देखता रहा तो चन्द्रो दबी अवाज में बोली, ‘‘जाने दे गिर गए तो गिर गए, ये ले।‘‘ उसने अपने पल्लू के बताशे उसकी जेब में डाल दिए।

गुरू जी द्वारा बोले गए अमृत बचनो को सभी बच्चे ज़ोर-जोर से दोहरा रहे हैं। पूरे वातावरण में अमृत बचन गूंज रहे है। ‘‘ बोलो धर्म की जय ’’ – ‘‘ अधरम का नाश हो ’’- ‘‘ सत्य की विजय हो ‘‘- ‘‘ विश्व का कल्याण हो ’’- ‘‘ धर्म की रक्षा हो ’’- ‘‘ ज्ञान का प्रसार हो ’’- ’’असत्य बोलना पाप है। ’’- ‘‘ चोरी करना पाप है ’’- ‘‘ बोलो वेद भगवान की जय’’ – ‘‘ ज्ञान की जय, विश्व गुरू भारत की जय………। ’’

बच्चों की छुट्टी हो गई तो चन्द्रो ने पूरी पाठशाला की झाडू बुहारी की। अनुआ सहमा-सहमा पूरी पाठशाला को देख कर क्या महसूस कर रहा है, शायद कोई समझ न पाए। वो खोया हुआ सा खड़ा था तभी चन्द्रो ने उसे घर चलने के लिए कहा, ‘‘ चल बेट्टे (बेटे) हो गई सफाई। ’’

चन्द्रो के जाने के बाद गुरू जी ने पानी भरे लोटे में गँगा जल की कुछ बून्दे टपकाई और मन्त्रोच्चार के साथ पूरे स्कूल में छींटे मार के रोज की तरह फिर से शुद्ध कर दिया।

इन तीन चार वर्षो में यहाँ कोई ज्यादा परिवर्तन नहीं आया, कुछ नए बच्चे पाठशाला में और आ गए हैं और कुछ ने पाँचवीं के बाद पढ़ना छोड़ दिया है, शायद उनकी बुनियादी जरूरतों के लिए इतना ही पढ़ना पर्याप्त था कि वो हिन्दी पढ़ना-लिखना सीख भर जाएँ और अपने-अपने पुश्तैनी कार्यो में लग जाएँ। धन्दों के गुर फिर वो परम्पराओं के स्त्रोतो से हासिल कर, सामाजिक चक्र में स्थापित हो ही जाएँगें। शायद इसी लिए हमारे अंदर सभ्य समाज की संस्कृति पनप नहीं पाई और प्रश्न चिन्ह से आगे नहीं बढ़ी।

इस पाठशाला में एक परिवर्तन अवश्य दीख पड़ता है कि पहले बच्चे अपने-अपने साथ टाट बोरी के आसन लेकर आते थे बैठने के लिए लेकिन अब पाठशाला की पट्टियों पर बैठते हैं।

अनुआ अब चन्द्रो के साथ नहीं जाता, वो वाठशाला के पिछले दरवाज़े पर ही बैठा रहता है। वो टूटे दरवाज़े के फांफर से पाठशाला के अंदर झाँकता रहता है। आधी छुट्टी में उसकी भी इच्छा होती है कि वो पाठशाला के बच्चों के साथ खेले लेकिन एैसा हो नहीं पाता। हाँ, पाठशाला के बच्चों की गेंद नाली में या जोहड़ में चला जाय तो अनुआ की मदत ज़रूर लेते हैं – इससे उसे थोड़ी सी खुशी ज़रूर मिलती है। कभी-कभी वो अनुआ को जामुन के पेड़ पर चढ़ा, डालो को बंदर की तरह हिलाने को कहते है और जामुन बीन कर वो लोग तो पाठशाला के अंदर चले जाते हैं और अनुआ फिर पिछले दरवाज़े पर जाकर बैठ जाता है।

चन्द्रो नहा धोकर पाठशाला की सफाई करने आती है तो वो उसे यहीं मिलता है। अनुआ को सबसे ज्यादा खुशी तब मिलती है जब उसे अपनी माँ के साथ स्कूल के अंदर आने को मिलता है। वो पाठशाला की हर चीज़ को बड़े कौतुहल से देखता कभी-कभी माँ से पूछ बैठता है ‘‘ अरी माँ ये किस बाब्बा जी का फोट्टो (फोटो) है? ’’

– ये गाँधी बाब्बा जी हैं।

– अच्छा तो ये वो है…….. इसी ने देस आजाद करवाया…….. बहुत काम के बाब्बा जी हैं ये, पन्डित ने कई कहानी सुनाई इनकी……. घर चल के सुनाऊँगा।……. अरी माँ इन पट्टियों पे लाइन से बच्चे बैठे हैं छोटे आग्गे (आगे) बड़े पिच्छे (पीछे)…….. अरी सुन मैं पट्टी पे बेट्ढूं (बैठूगाँ) – मैं पट्टी पे बेठ रया हूँ तू पन्डित जी बनके पढ़ाइओ……..।

– अरे रेन दे (रहने दे) देख, हम पट्टी पे न बैठ सकते।

– क्यूँ न बैठ सकते ?

– बस न बैठ सकते तो न बैठ सकते…….. जिद मत न करे। कल पन्डित जी ने जिद के पीछे एक बच्चे की पिटाई की थी ओर (और) क्या कहा था………….।

– कहा था अच्छे बच्चे जिद न करते। ……….जान दे (खैर जाने दे)…….अरी माँ देख-देख, ये किताब पड़ी है यहाँ, बड़े फोटू है इसमें – इसे छिपा के धर ले, घर चल के देखेगें मैं सब पढ़ के बता सकू हूँ……।

– हाँ! बड़ा ज्ञान्नी (ज्ञानी) हो रया है सब पढ़के बता देवेगा ।

– अरी रख तो ले….. ले रखले।

– बहुत दिनो से ऐसेई पड़ी है, ये कहते हुए चन्द्रो ने किताब अपने पल्लू में छिपा ली और कूड़ा समेटने लगी।

पन्डित जी लोटे में जल लिए प्रतीक्षा कर रहे थे, उन्होने उनकी पूरी वार्ता तो सुन ही ली थी खिड़की की आड़ से, चन्द्रो को किताब पल्लू में छिपाते भी देख लिया था। क्रोध से उनकी त्योरियाँ चढ़ गई – वो दो कदम आगे बढ़े लेकिन कुछ सोच कर रूक गए। सोचने लगे नीच जात है कहीं चोरी पकड़े जाने से फैल न मचा दें, उनके चरित्र पर अकारण ही लांछन लग जाएगा। लेकिन वो अवसर मिलने पर चोरी की बात तो कह ही डालेगें……. आज उसने छोटी सी चीज़ चुराई है, कल को………. सारा कुछ तो यूँ ही खुला पड़ा रहता है रूपया पैसा भी………। – रह रह कर उनमें शंकाएँ उभरने लगीं, ये तो प्रत्यक्ष उन्होने अपनी आँखों से देखा है क्या पता पीछे क्या-क्या चीज़ ले गए होगें ये लोग – वो आज ही अपनी सभी कीमती चीज़ो का मुयाना करेगें, बरसों से उन्होने अपना बक्स नहीं खोला है जिसमें माँ की यादगार के गहने रखे है। उन्हे तो अब अनुआ के पिछले दरवाजे पे बैठे रहने पर भी कोई भारी साजिश नज़र आने लगीं।

चन्द्रो ने कूड़ा समेट के अनुआ को अपने पास बुलाया। शायद इस बीच उसमें भी मानसिक द्वन्द चलता रहा होगा। उसने अनुआ को दुलारते हुए पूछा, ‘‘ये बता तेन्ने (तूने) पन्डित जी की शिक्षा सुनी है कि न… वो न… केत्ते है (कहते है) कि चोरी करना पाप होता है।’’

– हाँ, ये मुझे याद क्यों न रया, चोरी करना पाप होत्ता है, असत्य बोलना पाप होत्ता है, असत्य का मतलब होत्ता है झूठ।……… ला माँ मैं ये किताब वहीं धर देत्ता हूँ।……..उसने चन्द्रो से किताब लेकर वहीं रख दी जहाँ से उठाई थी, ‘‘माँ तू मेरे कान पकड़ के थप्पड़ लगा ताकि मुझे याद रहवे कि चोरी करना पाप होत्ता है, मैं अब किसी की कोई चीज न चुराने का, चाहे सोन्ना ही क्यों न पड़ा हो हाथ न लगाने का।’’

चन्द्रो उसकी बातें सुन कर आश्चर्य चकित हो गई उसने प्यार से उसके गाल पर थपकी दी, ‘‘ तू इतना समझदार है मैने कभी सोच्चा भी न था। ’’ वो चन्द्रो से लिपट गया।

पन्डित जी ने यह सब देखा तो स्तब्ध रह गए। चन्द्रो कूड़ा उठा पन्डित को हाथ जोड़ चली गयी अनुआ को लेकर। – अचानक पन्डित जी के विचारों की तन्द्रा टूटी तो उन्हे आत्मग्लानी होने लगी। अगर थोड़ा धैर्य और संय्यम ना बरता होता तो ? – आज जिस सत्य का साक्षात्कार उन्होने किया उससे वो कभी परिचित न हो पाते। चन्द्रो के जाने पर वो हमेशा गँगाजल से पूरी पाठशाला और दिशाँए शुद्ध किया करते थे। अचानक उन्होने गँगा जल भरा लोटा जो उनके हाथ में था अपने सर पर उड़ेल लिया और मन ही मन ईश्वर से प्रार्थना की, ‘‘ हे प्रभू मेरा मन – अंतर पवित्र करो, मेरी दृष्टि मेरे विचार शुद्ध करो, मेरा ज्ञान निर्मल करो। उन्हे स्वयं का अनुभव ही किसी सच्चाई का निर्विवाद आधार लगने लगा, स्वतः की अनुभूति से किसी प्रकाश को वो बहुत समीप पा रहे है, उन्होने महसूस किया कि उनकी शास्त्रों की विद्यत्ता, धर्मशास्त्र – वेद – वेदांग – वेदान्त और साहित्य के ज्ञान का गुमान आज चूर हो गया है। आज उन्हे किसी जकड़न से मुक्ति मिल गई है। उनमें किसी विशेष चैतन्य सत्ता का प्रत्यक्ष संचार हो रहा है और उन्हे एक एैसे अनुभव-बिन्दु की प्रतीति हो रही है, जहाँ मनुष्य समान है, केवल मन, विचार और धारणाएँ मलिन है।

लम्बी कमीज लटकाए घूमने वाला अनुआ आज पहचान में ही नहीं आ रहा। उसने आज नहाकर लाल चैकड़ी वाली बुशर्ट और नेकर पहनने की जि़द की और उसकी माँ ने उसे वो कपडे़ पहनने को दे दिए। कुछ दिन पहले ही जोंन की माँ ने ये सूट चन्द्रो को अनुआ के लिए दे दिया था। जोंन ने एक आध बार ही उसे पहना था, वो सूट उसे छोटा हो गया था। लेकिन अनुआ को बिलकुल ठीक आ गया। दरअसल उसने कल गुरू जी को ये कहते सुन लिया था कि कल गुरू पूर्णिमा है सब बच्चे साफ और अच्छे कपड़े पहन कर आएँ – सब को गुरू फेरी पर जाना होगा। उन्होने पाठशाला से बच्चो को चट्टे (रास खेलने की डाँडी) भी दिए और खेलना भी सिखाया। अनुआ ने भी कहीं से दो डन्डो का जुगाड़ कर लिया था।

पूरे दिन गुरू जी के साथ चट्टे खेलती बच्चों की टोली घर-घर जाती और वहाँ गुरू जी का सम्मान किया जाता और दक्षिणा दी जाती। – पूरे दिन अनुआ दूर ही दूर रहा। जब भी कभी उसने टोली में शामिल होने का प्रयास किया तो किसी न किसी बच्चे ने उसे धक्का देकर बाहर निकाल दिया। – शाम होने को है कुछ ही घर बाकी रह गए हैं।

अगला घर लाला जी का है बहुत बड़े जाने-माने धनी व्यक्ति है इस इलाके के। इनका लड़का विपिन पाठशाला में ही पढ़ता है। – काफी देर से यहाँ प्रतीक्षा की जा रही है। आते ही गुरू जी के चरण धोये गये, हार-फूल से स्वागत कर गुरू जी को दक्षिणा अर्पित की गयी। लाला जी बड़े प्रसन्न नज़र आ रहे हैं, उन्होने नौकर से परात लेकर अपने हाथ से बच्चों को मिष्ठान बाँटना शुरू कर दिया। अनुआ भी इसी टोली में शामिल हो गया। अनुआ को देख विपिन चिल्लाया, ‘‘ अजी ये चन्द्रो का अनुआ बीच में घुस गया। ’’ लाला जी ने उसे देखकर पूछा, ‘‘ चन्द्रो का…….उस सफाई वाली का है ? अनुआ के ‘‘ हाँ जी ’’ कहते ही लाला जी भड़क गये, उनकी त्योरियाँ तन गई, ‘‘ तू कैसे आया इन बच्चों के साथ और तुझे नए कपड़े किसने पहनाए….?’’ लाला जी गुस्से में जैसे पागल हो गए, ‘‘तुम लोगों कू दिन लग गये हैं तम वी (तुम भी) नये-नये कपड़े पहरोगे तो हमारे बच्चों में और तुम लोगों में फरक क्या रह जायगा?’’ भारी भरकम लाला जी अनुआ पर टूट पड़े और उन्होने दाँत पीसते हुए अनुआ की नई पोशाक को चीथड़ों में तब्दील कर दिया और ज़ोर-ज़ोर से चीखने लगे ‘‘कमजातो तुम्हे सिर्फ उतरे हुए कपड़े पहनने हैं, धर्म ने तुम्हें सिर्फ इसी की इजाज़त है – समझे। उतरे कपड़े पहनना और झूठा खाना यही धर्म है तुम्हारा।’’

इससे भी उन्हे शान्ति नहीं मिली तो उन्होने अनुआ को ऐसी लात मारी कि वो तड़प कर रह गया……। अनुआ दर्द से आहत तड़प रहा है और आस-पास खड़े छोटे-बड़े सभी उसकी खिल्ली उड़ा रहे हैं। गुरू जी ने दान-दक्षिणा वाला बोझ उतार फैंका और अनुआ को उठा अपने वक्ष से लगा लिया। लगता है वे अपने क्रोध को पी रहे हैं, वो अनुआ की चोट को सहलाने लगे, उन्होने उसके आँसू पोंछे और उनकी स्वयं की लाल आँखों में आँसू छलक पड़े। – पूरे वातावरण में चुप्पी छा गयी। केवल अनुआ की घुटन भरी सिसकियाँ ही वातावरण में सुनाई दे रही हैं।

निःशब्द गुरू जी की नम आँखों में कोई प्रश्न-चिन्ह टूटता है और फिर अपना आकार ग्रहण कर लेता है।

लाला जी ने जैसे अधर्म के खिलाफ मुहिम छेड़ दी। उन्होने बहुत से सम्मानित व्यक्तियों को जमा किया और गुरू ब्रह्मचारी जी की मनोदशा ठीक करने पाठशाला पर आ धमके। लेकिन उन सबकी आँखे खुली की खुली रह गयीं, जब उन्होने पाठशाला के मुख्य द्वार पर यह लिखा पाया, ‘‘इस पाठशाला को सदा के लिए बंद कर दिया गया है।’’

कुछ देर मंत्रणा करने के बाद वो लोग पीछे के द्वार से पन्डित जी के निजी कक्ष में पहुँचे। गुरू जी मौन, ध्यान मग्न आसन पर बैठे थे। लोगों की उपस्थिति का ज्ञान होते ही उन्होने एक व्यक्ति को पास बुलाया और एक कागज पर लिखकर उसे दे दिया कि उन्होने मौन व्रत धारण किया हुआ है और साथ अन्न-जल त्याग कर प्रायश्चित कर रहे हैं। उन्होने आग्रह किया है कि उन्हे अब एकान्त में छोड़ दिया जाय।

उन लोगों ने सोचा चलो इन्हे अपने आप ही अपनी गलती का अहसास हो गया है, तो उन्होने उनसे व्रत तोड़ने का आग्रह किया, लेकिन पन्डित जी अपनी हठ पर अड़े रहे – उनके अन्न-जल त्याग की बात पूरे इलाके में फैलते देर न लगी – लोगों की भीड़ इकट्ठा होने लगीं – उनके नए पुराने शिष्य भी आये लेकिन उन्होने किसी का भी आग्रह स्वीकार नहीं किया। लोग उनसे प्रश्न करते और वो लिख कर उत्तर दे देते। लोगों में एक दूसरी तरह की हलचल मच गयी जब उन्होने एक प्रश्न के उत्तर में लिखा – कि इस प्रायश्चित करने के पीछे कारण क्या है ? उन्होने बताया कि समाज के अमानवीय आचरण, समाज में व्याप्त रूढि़यों, असमानता, अत्याचार, जातिभेद के लिए हमारी शिक्षा ही जिम्मेदार है। आज जो भी समाजिक विकृतियां नज़र आती है उन सब के लिए वही जिम्मेदार हैं ऐसा उन्होंने स्वयं अनुभव किया है। अतः वे अपराधी है और वो इसका प्रायश्चित करते-करते स्वयं का अंत करना चाहते हैं।

आज तीसरा दिवस शुरू हो गया था। वो बहुत कमज़ोर लग रहे हैं, उनकी आँखे अंदर धंस गई हैं। लेकिन उनमें अद्भुत चमक प्रकाशित हो रही है। जिन लोगों में कुछ विपरीत प्रतिक्रिया हो रही थी वे उनके संकल्प के सामने झुकते प्रतीत हो रहे है। दूर दराज के लोग़ों ने भी आना शुरू कर दिया, जिले के अधिकारीगण भी यहाँ पहुँच गए। वे सब भी गुरू जी से व्रत तोड़ने का आग्रह कर रहे हैं लेकिन लगता है वो अपना संकल्प नहीं तोड़ेगे।

ज्यों-ज्यों समय बीत रहा है उनकी जीवन-ज्योति मद्धम पड़ती जा रही है। शरीर पूरी तरह से शिथिल हो चुका है। जिले के अधिकारी गणों ने शहर के सिविल अस्पताल से बड़े डाक्टर को बुला लिया, जैसे-तैसे करके एंबुलेन्स भी यहाँ तक पहुँच गयी। डाक्टर मुआयना करके स्थिति असमान्य बता रहे हैं। उन्होने बताया कि दो घन्टे में बहुत गम्भीर स्थिति पैदा हो सकती है। गुरू जी ने किसी भी स्थिति में वैद्यकीय सहायता लेने से इन्कार कर दिया। उनकी शक्ति अब चुकती जा रही है और वे बैठ नहीं पा रहे है।

तभी भीड़ से निकल अनुआ अपनी माँ के साथ गुरू जी के कक्ष के सामने पहुँचा और गुरू जी से उनके पास आने की अनुमति माँगी। सहमें, डरे-डरे मलिन रहने वाले लड़के के अभिवादन, शिष्टाचार और वाणी को देखकर गुरू जी आश्चर्य चकित रह गये। उन्होने हाथ के संकेत से उसे अंदर बुलाया। अनुआ ने चरण-स्पर्श करके, वहीं रखे कागज और पेन्सिल को उठाया और कागज पर कुछ लिखने लगा। वे स्थिर एकटक उसकी ओर आश्चर्य से देख रहे हैं। लोगों पर भी इसकी आश्चर्य जनक प्रतिक्रिया हूई – उसको लिखते देख तो अचरज हो ही रहा है लेकिन उसके साहस से भी वह विलक्षण लग रहा है। अनुआ ने लिख कर कागज गुरू जी के चरणों में रख दिया। गुरू जी ने उस कागज को पढ़ा, उनके अंदर किसी अलौकिक चेतना का संचार हुआ और वे उठ कर बैठ गये। कागज पर लिखा था – ‘‘ परम पूज्य गुरू जी , मैं जीवन में पहली बार हाथ में कागज पेन्सिल पकड़ रहा हूँ गलती क्षमा करना। मेरी प्रार्थना है कि आप मौन व्रत तोड़ दें, भोजन और जल ग्रहण करें – यदि आपने एैसा नहीं किया तो यह शिष्य अपने परिवार सहित अन्न-जल का त्याग कर अपने प्राणों को त्याग देगा। आपका शिष्य। ’’

गुरू जी के नेत्रों में उल्लास छलक आया – उनमें गहरी उत्कठा जाग्रत हूई और उन्होने लिख कर पूछा, बेटा तुमने पढ़ना लिखना कब और कहाँ सीखा ?

‘‘पूज्य गुरू आप ही है, पाठशाला के पिछले दरवाजे के फाँफर से चार वर्षो तक धूप, जाड़े में मैने एक से लेकर आठवीं कक्षा तक की पूरी पढ़ाई वहीं की है। सब बच्चे तो अपनी-अपनी कक्षा की पढ़ाई करते थे, मैं रोज एक से आठ तक पढ़ता था क्योकि सभी कक्षाएँ एक साथ एक ही स्थान पर बैठती थीं – कोई बच्चा अगर गलती करता, तो मैं समझता मैं ही गलती कर रहा हूँ। कोई अगर सही उत्तर देता तो मैं समझता में ही हूँ और आप जब समझाते, बताते तो मैं समझता मुझे ही बताया जा रहा है…….. आपने एक बार एकलव्य की कहानी बच्चों को सुनाई थी। उस दिन मैं माँ के साथ था, माँ इंतजार कर रही थी छुट्टी का। मैने तभी सोच लिया था कि मैं भी पढ़ सकता हूँ  सीख सकता हूँ।

गुरू जी ने जिज्ञासावश लिख कर प्रश्न किया, ‘‘ लेकिन तुमने बिना किताब, कलम, तख्ती, कॉपी के लिखना कैसे सीखा ? ’’

– गुरू जी मुझे बहुत दिन बाद पता चला कि पिच्छे (पीछे) की पहाड़ी भगवान जी ने मेरे लिखने के लिए बनाई है। यहाँ से सफाई के बाद, मैं माँ के साथ घर जाता और चूल्हे से लकड़ी का कोयला बीन पहाडि़यों पे पहुँच जाता और खूब लिखता। और फिर अंधे कुएँ में मुहँ करके मैं शब्दों का उच्चारण करता। आपके द्वारा बोले गए शब्दो को याद करके तब तक अभ्यास करता जब तक उच्चारण में आपकी वाणी न सुनाई देने लगती। गुरू जी मैने आज से पहले अपनी पढ़ाई के विषय में किसी को बताया नहीं………..।

गुरू जी पहले तो अनुआ को विस्मित दृष्टि से देखते रहे, फिर उनकी भावभंगिमा में कोई अलौकिक आनन्द परिलक्षित होने लगा। अनुआ में सैकड़ों जमा लेगों को प्रतिभा की साक्षात मूर्ति के दर्शन हो रहे हैं। दूर बैठी अनुआ की माँ का पल्लू भीग गया है।

अनुआ ने अपनी प्रार्थना को दोहराया, ‘‘ गुरू जी आप अन्न-जल ग्रहण करें , हमारी प्रार्थना को स्वीकार करें। ’’

गुरू जी आत्ममंथन की प्रक्रिया में कुछ देर शान्त रहे – फिर एक दम कागज उठाया और लिख दिया। ‘‘ मुझे कभी इतनी प्रसन्नता मिलेगी मैं विश्वास नहीं कर पा रहा हूँ, मुझे तुम पर गर्व है। मैं समाज में विकृत-मानव निर्माण करने का दोषी हूँ, मेरे ही कारण तुम्हारा अपमान होता है, यातनाएँ सहनी पड़ती है, शोषण होता है। समाज के अमानवीय आचरण जो निर्मित हुए है – मैं उसका दोषी हूँ अतः मुझे पश्चाताप करने दो, मेरा संकल्प शायद मुझे कुछ आत्मसम्मान दे सके।’’

अनुआ ने भी परिवार सहित अपने और अपने परिवार के आमरण अनशन की घोषणा कर दी और वहीं सामने बैठ गया। – कुछ देर तक पूरे वातावरण में सन्नाटा छा गया – कुछ देर बाद अनुआ पुनः खड़ा हुआ और उसने गुरू जी को पुकारा। वे शांत भाव से उसकी ओर आकर्षित हुए, ‘‘गुरू जी एक बार कक्षा में आप बच्चों को पढ़ा रहे थे आपने कहा था अगर कोई गलती करता है तो उसे क्षमा कर देना चाहिए। अगर आप ऐसा सोचते हैं कि यह सब आपके कारण हुआ, आप दोषी हैं तो क्या आप अपने आप को क्षमा नहीं कर सकते, आप अपने आप को क्षमा कर दें।’’

गुरू जी सहसा ठहाका मार के हँसे और हँसते ही रहे। उनका कंठ भर आया और उनका मौन व्रत स्वतः ही टूट गया, ‘‘ वत्स तुम्हारे तर्क के आगे मैं नतमस्तक हूँ……….तुम्हारी लगन, परिश्रम और निष्ठा ने हर जगह सिद्धी पायी है और यहाँ भी तुम सफल हुए, एक जीवन को बचाने में।’’

उन्होने उसे वक्ष से लगा लिया। – गुरू जी की प्रफुल्लित आँखों से सनातनी की ममता बह निकली। माँ का हृदय ही ऐसा है, दुख हो या खुशी आँखे भर आती है।

सभी में हर्षो उल्लास की लहर दौड़ गयी, गुरू जी ने अनुआ के हाथों से शर्बत ग्रहण किया।

शाम हो चुकी थी, ढलते सूरज ने आकाश को अनंत रंगों से रंग दिया था और ढलते-ढलते उसने वायदा किया कि वो कल फिर निकलेगा सभी के लिए उजाला लेकर।

[ ये कहानी नवनीत ,विपाशा ,आउटलुक ,अमर उजाला ,नवभारत टाइम्स में प्रकाशित हो चुकी है .कृपया अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दर्ज करें ]

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