मौजूदा फिज़ा

ज़ब्त बेअसर न हो जाय कहीं,
 मेरा ज़र्फ है की सम्हाले हुए हूँ मैं |
 इत्तिहाद किस तौर मेह्फूज़ हो ,
बैचैन हूँ बस, मैं खामोश हूँ ||
अमर स्नेह 
इत्तिहाद – भाईचारा 

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खुद को आज़माना सीख ले

 

  *अमर स्नेह

सीख ले ,अपने इंसान को,

खुद में, दफनाना सीख ले,

अब यहाँ |

जहाँ वो सड़कों ,गलियों ,चौराहों ,बस्तियों में,

घेर कर,लाठी-लोह की छड़ों-लात-घूसों से,

पीट जिंदा इंसानों को लाशों में तब्दील करते आरहे रहे,

वो,जहाँ गाडियों के पीछे रस्सों से बांध-बांध,निहत्थे बेबसों को बेरहमी घसीट सरेआम ले लेते है जान,

सड़कों,पगडन्डियों पर ये खून और इंसानी गोश्त से सनी- बनी लकीरें कर रहीं है,

जहाँ संस्कृत-भाषा में लिखी वर्ण व्यवस्था, गीता के चौथे अध्याय के तेरवें श्लोक का खून-भाषा में अनुवाद,

जहाँ जिंदा फूँक देते हैं बेबसों को उनकी बेबसी के आविष्कारक,

जहाँ से जिन्दा जलते इंसानों  की उठती रहती है, चरचराती अगियाई लपटें, चीखो-पुकार,

जहाँ धर्म-ध्वजक पेड़ों से बांध माँ-बाप-भाइयो-मरदों की आँखों सामने कमजोरों की बेटियों-बहनों-औरतों के साथ,

बलात्कार कर ये सूरमा उन्हें कत्ल किया करते हैं ,

जहाँ वो उनकी बेटियों उठा ले जाते हैं और इज्ज़त लूट,उनकी लाशों को पेड़ों पे टांग दिया करतें हैं,

जहाँ  लोहे के सूजों से आँखे फोड दी जाती हैं,

वो,जहाँ यूनिवर्सटी-स्कूल-कालेजों मे नफरत,अनाचार,दुराचार,ज़ुल्म की सदियों से गुनी संहिताओं,शास्त्रों

की तर्जुमानी कर रहे,

वो,जहाँ बंद कर देते हैं चैन से पढ़ने,जीने के सारे रास्ते, मजबूर कर देंते हैं आत्महत्या के लिए,

वो जहाँ के हर शहर ,गांव- बस्ती-गली में है, इनकी ही ललकार- जय- जयकार, अनाचार-दुराचार,

वो ,जहाँ  कुजात करार दिए एडियाँ रगड़ते इंसान की भयाक्रांत पीढ़ियों को,

अविराम कुचलते रहने के धर्म-संस्कार,

इन बेबसों की हिमायत में,

यहाँ अब सिस्कियां भी उठें तो,घोट ले अपना गला,

सीख ले अपने आँसुओं को

छिपाना सीख ले |

अब तेरे इंसान होने की,

मिलेंगी सजाएं यहाँ |

सीख ले,

उनके ज़ुल्म,उनके कत्ल,

उनके कुफ्र,उनकी हर बात पे,

ताली बजाना सीख ले|

उनकी जुबान अपने मुहँ में

चलाना सीख ले |

सीख ले  ,अपने इंसान को,

खुद में, दफनाना सीख ले ||

अगर तुझे  मुनासिब नही ये सब ,

तो अब  यहाँ,

खुद को आज़माना सीख ले ||

                          

दो शेर हिंदुस्तान और पाकिस्तान को नज़र

हदों को खींच कर , हदों मे रहना भी गंवारा नहीं,

बेहद  मोहब्बत , हदों की  कायल  नहीं होती |

अमर स्नेह

बिना  इजारबंद  के नेफे, कसूरवार हैं यहाँ,

असले  बर्बादी  के , इजारबंद  नहीं  होते |

अमर स्नेह

असले बर्बादी – अस्त्र (मिजाइल अदि)

इजारबंद – पजामे का नाड़ा