WHERE TO GO

Whenever I pass by from here, I see two big stone statuettes of cow’s muzzles and I do not know why the face of the grate leader, Vinoba Bhave with his mouth covered by a white khaddar cloth, flashes on my inward eyes and his anti-cow-slaughter slogan sparks through me like an electric current.

These two big statuettes of cow’s muzzles are mounted on the pillars of the entrance-gate of a community; they are very conspicuous because they are disproportionate to the size of gate, besides they are protruding out awkwardly and bear gloomy looks. This locality is known as Gai-Wadi, tenement named after Gai, a cow. As you walk along the same pavement you come across a very long signboard of yet another tenement known as Kranti-Nagar. Well, I am not aware as to what story of revolution is attached to this place or it signifies; more so I never ever bothered to find it out, since each step as you walk further, you find either the revolution is standing one-legged in the form of different colored flags fluttering out or the revolution is sitting peacefully in an array of big buildings and business houses or it is standing helplessly on the door steps of numerous political-party offices or else in the form of  signboards seen loosely hung leaning against walls or poles.

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ख्याला

दस दिन पहले ही बिजलियों की कौन्ध और प्रलयंकारी तूफान में बादल फटा और ख्याला राम की पत्नी लाजो के साथ उसके बारह साल के बेटे रोडू को बहा ले गया। नदी के भीषण प्रवाह मे वो कहां खो गए पता ही न चला। उसके परिवार में अब वो और उसका बड़ा बेटा नोखू ही बच गए थे। उसका मिट्टी लकड़ी से बना घर पूरी तरह से ध्वस्त हो गया, सिर्फ घर की ढाई दीवार पर पहाड़ी चाकों (स्लेट) के टुकड़ो से बना छप्पर लटक रहा है उनकी बेबस जिन्दगी की तरह। अब तो उसके घर में मिट्टी के बर्तन तक नही हैं जिनमें वो खाना बनाया करते थे। कुल मिलाकर उनके पास एक पुश्तैनी खिन्द (गुदड़ी) और पहने हुए लबादे ही बचे हुए थे। Continue reading

अधर्म विस्तारक

नेशनल हाईवे के चैबीस घन्टे के कोलाहल से तंग आकर शान्ति की आस में मैं यहाँ एक पहाड़ी गाँव में आ गया। जब मैं पहली बार यहाँ मकान देखने आया था तो नयनाभिराम दृश्य को देख ये सोच लिया था कि रचनात्मक कार्यो के लिए इससे उपयुक्त स्थान कोई हो ही न सकता। लेकिन पहली सुबह ही मेरा मोह भंग हो गया। मुझे लगा कि मेरे पूरे जीवन का अनुभव बेमानी है मुझे इतनी भी अक्ल नहीं कि कम से कम ये तो देख लेता कि इस मकान के ठीक ऊपर मंदिर है।

       सुबह साढ़े चार बजे मैं नहा धोकर योगाभ्यास के लिए तैयारी कर ही रह था कि एक बेसुरी गगन भेदी आवाज ने पूरे वातावरण की एैसी तैसी कर दी। एक तो बेताली भोंडी वाणी दूसरे राष्ट्रभाषा हिन्दी के उच्चारण का जनाजा साथ धर्म-विस्फोटक (लाऊडस्पीकर) का फुल बॉलयूम। मैं बेवस होकर बैठ गया और इंतजार करने लगा कि महाराज थक कर चुप हो जायगे लेकिन एैसा नहीं हुआ- देसी घी और फल मेवा दुध खाकर पीकर पली सजी संवरी एनर्जी हमारे पूर्व जन्मो के पापों का इंतकाम ले रही थी। Continue reading