मातृका

लेखक: अमर स्नेह (C)

कल मुझे अपने एक प्रोजेक्ट के सिलसिले में तत्काल मुंबई निकलना है.मैंने अपंने कुत्तु बाबू से लुक-छिप कर तैयारी तो कर ली,लेकिन पर बाबू के वारे में सोच कर मन बोझिल लग रहा है.मुझे उदास देख कर माँ जी ( मकान मालकिन) ने मुझे आश्वस्त किया,”आप निश्चिन्त होकर जाओ हम सब इसका ख्याल रक्खेंगे,जब आप चले जाते हैं तो दिन भर ये गाय चराता है , हम सबके साथ गेंद खेलता है..हाँ थोड़ी-थोड़ी देर बाद नीचे आप के घर के चक्कर लगता है, ताले को बार-बार सूंघता और बार-बार भू.भू करके हमसे आपके वारे में पूछता है, पर हम सभी उसे प्यार से मना-फुसला कर सामान्य कर लेते है……. कल से तो यहाँ  इसके चहेते बच्चे भी होंगे छुट्टियाँ हो रही हैं ..आप निश्चिन्त होकर जाओ…..|’

मैंने चुपके-चुपके बाबू की पेडीग्री, बिस्किट्स, उसके नहाने-धोने-सोने का सभी सामान ऊपर माँ जी के पास रख दिया और बाबु को ऊपर माँ जी के पास कुछ देर के लिए कमरे में बंद करके घर के सामने से चैलचो़क के लिए लोकल बस पकड़ ली, जहां से मुझे दिल्ली के लिए पांच बजे की बस मिल जायेगी, जिसका रिजर्वेशन कर लिया है. फिर दिल्ली पहुँच कर कल सुबह ही मुबई की फ्लाईट मिल जायगी. मैं बस में बैठे कच्चा मन लिए बाबू के वारे में सोचता रहा और मुझे पता भी ना चला कि कबसे ये लोकल बस यहाँ रुकी खड़ी है | Continue reading

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PARISH

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Thirty-five long years have passed I left this parish. After we were devastated and deserted from Pakistan during India-Pakistan partition, we came to India. For, who knows, pretty long, my family kept wandering places for finding a safe haven and then finally we settled here in this Parish. I spent my childhood here. I could never forget this parish. Often in my vacant mood, the memories of this parish come so alive that I feel that the parish must be the same like what it was then.

Whenever a sound of drumbeats or harmonium or snake-charmer flute was heard the kids used to start running madly and hysterically from the small lanes and streets leaving behind every thing to witness the amusement show of monkey juggler, dancing bears, and gymnast feats; slowly juggler used to get surrounded by crowd and irrespective of age and status the spectators would jumble the show. Invariably I got amused and could never resist abstaining from the juggler’s show, which used to capture my mind completely in its amusement so much so that often I used to forget the domestic assignments and the hallmark of debauchery at home was kept reserved for me and my sincerity used to be always at stake.

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