मास्टर जी

-अमर स्नेह

‘सास्त्रों (शास्त्रो) में लिखा है।’’ उनका तकिया कलाम बन चुका है। एक दिन एक शरारती लड़के ने उनकी खिल्ली उड़ाने की गरज़ से चार लोगों के सामने उनसे पूछ लिया, ‘‘क्यों गुरूजी आपने कौन-कौन से शास्त्र पढ़े हैं तो उन्होने धरती सरपे उठा ली, ’’अधम नीच तेरी इतनी हिम्मत कि तू मेरा इम्तिहान ले, अच्छा है ये कलयुग है कोई और युग नहीं है वर्ना खड़े-खड़े गुरु को अपमानित करने के अपराध में स्वयं भसम़ हो जाता। ……खैर कलयुग में तो गुरूओं का अपमान होना ही है सास्त्रों में लिखा ही है।’’ -लड़का उनके टालने की ट्रिक की प्रतिक्रिया में व्यंगात्मक भाव भंगिमाएँ बनाता रहा। मास्टर जी उसका मन्तव्य भाँप गए और उन्होने खिसिया कर कहा, ‘‘अरे जा तू मुझसे बड़ा बस, अपने बाप से भी बड़ा, अरे ब्रह्मा से भी बड़ा जा……।’’ Continue reading

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बरसे कम्बल भीगे पानी

Written By Amar Sneh

घसीटा राम ने सुन रखा था कि, ‘भगवान जब देता है तो छप्पर फाड़ के देता है।‘ इसी इंतजार और उम्मीद में उसने आधी से ज्यादा जि़न्दगी गुजार दी थी। अचानक उसे ख्याल आया कि भगवान देगा कहाँ से इसके लिए उसके पास छप्पर तो होना चाहिए ?

       अब तो, छप्पर के लिए बेचैन रहने लगा और इससे भी ज्यादा तो ये सोचकर परेशान हो जाता कि भगवान बेचारा भी उसके छप्पर के इंतजार में थक गया होगा। उससे न रहा गया। वो भगवान से क्षमा माँगने चल दिया। चैराहे पर आते ही वो सोचने लगा कि वो किस भगवान के पास जाए। यहाँ तो हर कदम पर-हर गली-कूँचे, सड़क, चौराहे , तिराहे, दो-राहे, यहाँ तक की बन्द गली में भी भगवानों के मन्दिर नज़र आ रहे हैं । और कहीं उसने कोई ग़लत दरवाज़ा खटखटा दिया तो क्या होगा ? Continue reading

परलोक सभा

©Amar Sneh

       चेता बेचारा निपट गंवार अनपढ़, लोग जब भी आपस में बातें करते तो वो उनका मुंह ताकता, कभी कुछ पूछ लिया तो लोग झिड़क देते, ‘‘अबे तेरी समझ में नही आएगी ये बातें, जा दो रोटी कमा और सोजा, क्या करेगा ये सब जान के।’’ हर जगह उसे यही सुनना पड़ता लेकिन चेता में हर बात को जानने की जिज्ञासा उसे बेचैन कर देती। सुना सुनाया ही उसका ज्ञान है आखिर वो सुनाये किसको और पूछे किस से, उसने हल ढूंढ ही लिया, सयाने राम आजकल अकेले बैठे हुक्का गुडगुडाया करते है, क्यों न उन्ही के पास बैठ के लोगो की बातों का उन्ही से खुलासा करवा लिया करें। अब वो हर रोज़ सयाने राम के पास आने लगा। आज आते ही राम-राम बजा के उसने बड़ी रहस्मय अंदाज में सयाने राम के कान में फुसफुसाया, “बडकू दसहरी कह रहा था की वो कही नेता जी का भासन (भाषण) सुने है, नेता जी जीत गए तो ओ राममंदिर बना कर रहेगा.. हम बेअक्कल कहता हूँ की इतना मंदिर मंदिर है.. फिर ई काहे…? बडकु हम छप्पर के टट्टर दाल के रहता हूँ लेकिन बिनिया माधो महल्ला के मंदिर के बनाये खातिर चार दिहाड़ी मजदूरी दान दिया… का बडकु फिर चंदा दे का पड़ी…? Continue reading